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《जीवन भर अकेली सुगंध》 का आवरण

प्राचीन चीनी शैली का भावपूर्ण संगीत · AI संगीत सृजन

जीवन भर अकेली सुगंध

कू वूजी · AI संगीत · 4 बार पढ़ा गया

छाओ ज़ू की 《蓦山溪·梅》(मोशानशी छंद में आलूबुखारे के फूल)से प्रेरित।洗妆真态,不作铅花御;竹外一枝斜,想佳人,天寒日暮。黄昏院落无处著清香,风细细,雪垂垂,何况江头路。月边疏影,梦到消魂处;梅子欲黄时,又须作廉纤细雨。孤芳一世,供断有情愁,消瘦损,东阳也,试问花知否?(शृंगार धोकर अपना सच्चा रूप दिखाता है,सीसे के श्रृंगार का सहारा नहीं लेता;बाँस के बाहर एक टहनी तिरछी है,किसी सुंदरी की याद आती है,दिन ठंडा है और साँझ उतर रही है।साँझ के आँगन में निर्मल सुगंध टिकाने की जगह नहीं,हवा मंद-मंद है,बर्फ़ झर-झर गिरती है,नदी किनारे की राह का हाल तो और भी कठिन होगा।चाँद के पास विरल परछाइयाँ हैं,सपना उस जगह पहुँचता है जहाँ मन विह्वल हो जाए;जब आलूबुखारे पीले होने लगेंगे,फिर महीन फुहार बरसेगी।जीवन भर अकेले महकते हुए,प्रेम करने वालों को अंतहीन विषाद देता है,दोंगयांग के शेन यू भी विरह में दुबले पड़ गए,पूछो तो क्या फूल को यह पता है?)पुरुष और महिला स्वर एक ही बोल गाते हैं।

गीत की वह पंक्ति

साँझ का आँगन, निर्मल सुगंध के जाने को कोई जगह नहीं

हवा मंद-मंद, बर्फ झर-झर, नदी किनारे की राह तो और भी कठिन

प्रेरणा देने वाली मूल कविता त्साओ ज़ू ·《मोशानशी · मेइ》
पूरे गीत के बोल पढ़ें ↓

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शब्दों में गीत बसे हैं

गीत के बोल

[प्रस्तावना]

[अंतरा 1]

इस आलूबुखारे के पेड़ के फूलों ने कोई शृंगार नहीं किया

बिना शृंगार के भी उसका अपना अंदाज़ है

श्रृंगार के सारे रंग धो देने पर

उसका असली रूप और भी टिकाऊ निकलता है

बाँसवन के बाहर तिरछी निकली एक डाली

जैसे कोई सुंदरी पलटकर एक नज़र देखे

[मुखड़े से पहले]

इतनी जल्दी ठंड पड़ गई

और सूरज भी इतनी जल्दी ढल जाता है

[मुखड़ा]

साँझ का आँगन, निर्मल सुगंध के जाने को कोई जगह नहीं

हवा मंद-मंद, बर्फ झर-झर, नदी किनारे की राह तो और भी कठिन

चाँद के पास विरल परछाइयों का दुबलापन स्पष्ट है

सपने में मन सुध-बुध खो बैठता है जागने पर सब सूना है

वह जीवन भर अकेला ही खिलता है

और प्रेम करने वालों के अनगिनत दुख सामने रख देता है

[अंतरा 2]

भीनी सुगंध ने आँगन के तीन चक्कर लगाए

कोई ऐसा द्वार नहीं मिलता जहाँ ठहर सके

नदी किनारे की राह पर और भी ठंड है

हवा और बर्फ़ भी दुगुना सताते हैं

फिर भी वह खिल उठा

उस उजाड़ में खिलता है जहाँ कोई देखने वाला नहीं

[मुखड़े से पहले]

चाँद आकाश के बीच आ पहुँचा है

विरल छायाएँ तिरछी फैली हैं, पहले जैसी ही छरहरी

[मुखड़ा]

साँझ का आँगन, निर्मल सुगंध के जाने को कोई जगह नहीं

हवा मंद-मंद, बर्फ झर-झर, नदी किनारे की राह तो और भी कठिन

चाँद के पास विरल परछाइयों का दुबलापन स्पष्ट है

सपने में मन सुध-बुध खो बैठता है जागने पर सब सूना है

वह जीवन भर अकेला ही खिलता है

और प्रेम करने वालों के अनगिनत दुख सामने रख देता है

[वाद्य-संगीत]

[अंतरा 3]

जब आलूबुखारे पीले पड़ने लगेंगे

फिर एक महीन वर्षा है, जैसे रोती हो, जैसे मन की व्यथा कहती हो

फूल झर गए, हरे मेई फल लग गए

दुख भी साथ-साथ फलता और पकता है

वक़्त ऐसा ही होता है

लहर दर लहर उठता-गिरता है

[सेतु]

कोई उसके लिए घुलता जाता है

इतना दुबला कि कमरबंद फिर एक पट्टी भर ढीला हो गया

अकेला फूल जीवन भर खिलता रहा

प्रेमियों के सारे दुख उनकी जगह सहता रहा

लेकिन खुद फूल का क्या

क्या कोई है जो उसके अंजाम का भी ख़याल करे

केवल दोंगयांग ही दुबले नहीं हुए

और पेड़ तले फूल निहारता अकेलापन भी

[अंतरा 4]

मैं उससे पूछता हूँ क्या उसे पता है

इन लोगों ने उसके लिए जो कष्ट सहे

हवा ने उसकी डालियाँ हल्के से हिलाईं

उसे जवाब भी कह सकते हैं और अस्पष्टता भी

फूल आखिर तक कुछ नहीं कहता

पर उसकी सुगंध ने उसकी ओर से सब कुछ कह दिया

[अंतिम मुखड़ा]

साँझ का आँगन, निर्मल सुगंध के जाने को कोई जगह नहीं

हवा मंद-मंद, बर्फ झर-झर, नदी किनारे की राह तो और भी कठिन

चाँद के पास विरल परछाइयों का दुबलापन स्पष्ट है

सपने में मन सुध-बुध खो बैठता है जागने पर सब सूना है

वह जीवन भर अकेला ही खिलता है

और प्रेम करने वालों के अनगिनत दुख सामने रख देता है

[समापन]

बर्फ़ फिर गिरने लगी

बाँसों के बाहर एक डाल अब भी ढलती शाम की ओर झुकी है

शास्त्रीय काव्य का भावलोक और मौलिक गीत-बोल · AI संगीत सृजन

नीचे गीत के बोलों का अनुवाद है; रिकॉर्डिंग में मूल गायन ही है, ऑडियो दोबारा तैयार नहीं किया गया है।

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जीवन भर अकेली सुगंध

कू वूजी · AI संगीत

प्रस्तुति एक · पुरुष स्वर

4:34

प्रस्तुति एक · स्त्री स्वर

4:19

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