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《सुनहरी शरद हवा और मोती-सी ओस》 का आवरण

प्राचीन चीनी शैली का भावपूर्ण संगीत · AI संगीत सृजन

सुनहरी शरद हवा और मोती-सी ओस

कू वूजी · AI संगीत · 3 बार पढ़ा गया

छिन ग्वान की 《鹊桥仙》(मैगपाई के पुल का अमर गीत) के भाव पर आधारित। 纤云弄巧,飞星传恨,银汉迢迢暗度;金风玉露一相逢,便胜却人间无数。(पतले बादल सुंदर आकृतियाँ बुनते हैं,टूटते तारे विरह पहुँचाते हैं,दूर फैली आकाशगंगा चुपके पार की जाती है;सुनहरी शरद हवा और मोती जैसी ओस में एक मिलन,संसार के अनगिनत मिलनों से बढ़कर है।)柔情似水,佳期如梦,忍顾鹊桥归路;两情若是久长时,又岂在朝朝暮暮。(कोमल प्रेम जल जैसा है,मिलन की घड़ी सपने जैसी,मैगपाई के पुल से लौटने का पथ कैसे देखा जाए;जब दोनों का प्रेम चिरस्थायी हो,तो हर सुबह हर शाम साथ होना क्यों ज़रूरी हो।)पुल पार करती बुनकर कन्या झीन्यू की एक रात की मन की बातें और मन का बोझ उतरना। पुरुष और महिला स्वर में समान बोल गाए गए हैं।

गीत की वह पंक्ति

सुनहरी शरद-पवन और मोती-सी ओस में एक बार मिलना

तो वह संसार के अनगिनत मिलनों से बढ़कर है

प्रेरणा देने वाली मूल कविता छिन गुआन ·《मैगपाई-पुल की परी》
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शब्दों में गीत बसे हैं

गीत के बोल

[प्रस्तावना]

[अंतरा 1]

बादल आकाश में फूलों के नमूने बुनते हैं

पूरी रात बुनते रहे, फिर भी कोई आकृति दोहराई नहीं

टूटता तारा लंबी पूँछ खींचता है

धरती के अधूरे अरमानों की ख़ातिर तेज़ी से सफ़र करता है

सातवें चंद्र मास के सातवें दिन की रात

आकाशगंगा दोनों किनारों को अलग कर अकेलेपन में डाल देती है

[मुखड़े से पहले]

मैगपाई पक्षियों ने पुल बनाना शुरू कर दिया

साल में एक बार का यह मिलन देर सह नहीं सकता

[मुखड़ा]

सुनहरी शरद-पवन और मोती-सी ओस में एक बार मिलना

तो वह संसार के अनगिनत मिलनों से बढ़कर है

जल-सा कोमल प्रेम सारी रात मन की बातें कहता है

मिलन की बेला सपने जैसी,पीछे देखने का साहस नहीं

बस दोनों का प्रेम सदा वैसा ही बना रहे

又岂在朝朝暮暮 — फिर हर सुबह और हर शाम साथ होना क्यों ज़रूरी हो

[अंतरा 2]

मैं अपनी पोशाक का घेरा उठाए पुल पार करती हूँ

दिल इतनी तेजी से धड़कता है जैसे छोटी ढोलकी बज रही हो

साल भर सँजोई हुई बातें

मिलने पर उलटे कुछ कह ही न सका

तुम बस मेरे लिए झाड़ देते हो

कनपटियों के पास की ओस और धूल

[मुखड़े से पहले]

आज रात की हवा सुनहरा रंग लिए है

ओस जेड की मणियों जैसी गोल है

[मुखड़ा]

सुनहरी शरद-पवन और मोती-सी ओस में एक बार मिलना

तो वह संसार के अनगिनत मिलनों से बढ़कर है

जल-सा कोमल प्रेम सारी रात मन की बातें कहता है

मिलन की बेला सपने जैसी,पीछे देखने का साहस नहीं

बस दोनों का प्रेम सदा वैसा ही बना रहे

又岂在朝朝暮暮 — फिर हर सुबह और हर शाम साथ होना क्यों ज़रूरी हो

[वाद्य-संगीत]

[अंतरा 3]

पुल पर समय तेज़ी से चलता है

इतना तेज़, मानो कोई जल्दी मचा रहा हो

क्षितिज पर अभी-अभी मछली के पेट जैसी सफ़ेदी उभरी है

पुल अब एक-एक कड़ी करके खुलने वाला है

मिलन की घड़ी सपने जितनी छोटी है

सपना टूटे तो बस सुबह का कोहरा बचता है

[सेतु]

पलटकर पुल को एक बार फिर देखूँ

डर है फिर कदम ही आगे न बढ़ सकें

लौटने की राह फिर भी लौटने की राह है

स्वर्ग के नियम किसी को ठहरने नहीं देते

पर फिर सोचने पर

कितनी सुबहें और शामें, यूँ ही व्यर्थ बीत गईं

हमने एक वर्ष को अनंत बना लिया

एक रात को ही अपना सब कुछ बना लिया

[अंतरा 4]

इसलिए मत कहो कि हम दया के पात्र हैं

हमारे लिए अफ़सोस में फूटकर रोने की भी ज़रूरत नहीं

आकाशगंगा कितनी भी चौड़ी और ठंडी हो

वह धधकते अंतरमन को जमा नहीं सकती

अगले साल जब मैगपाई फिर आएँगी

हम अब भी एक-दूसरे का वही पुराना आश्रय हैं

[अंतिम मुखड़ा]

सुनहरी शरद-पवन और मोती-सी ओस में एक बार मिलना

तो वह संसार के अनगिनत मिलनों से बढ़कर है

जल-सा कोमल प्रेम सारी रात मन की बातें कहता है

मिलन की बेला सपने जैसी,पीछे देखने का साहस नहीं

बस दोनों का प्रेम सदा वैसा ही बना रहे

又岂在朝朝暮暮 — फिर हर सुबह और हर शाम साथ होना क्यों ज़रूरी हो

[समापन]

आकाशगंगा दूर-दूर तक फैली है, तारों की चमक पहले जैसी है

दो दिलों का प्रेम चिरस्थायी हो तो हर सुबह-शाम साथ होना ज़रूरी नहीं

शास्त्रीय काव्य का भावलोक और मौलिक गीत-बोल · AI संगीत सृजन

नीचे गीत के बोलों का अनुवाद है; रिकॉर्डिंग में मूल गायन ही है, ऑडियो दोबारा तैयार नहीं किया गया है।

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प्रस्तुति एक · पुरुष स्वर

4:27

प्रस्तुति एक · स्त्री स्वर

4:32

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