प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
कू वूजी · AI सृजन · 9074 अक्षर · लगभग 12 मिनट
जिस दिन आ झाओ लियूवान नाव देखने पहुँची, पहले किनारे से किसी को चिल्लाते सुना कि डिंग परिवार की आ गई। उसने लकड़ियों के काँवर के पार देखा। नाव वही थी, मगर आगे नई लकड़ी की तख्ती जुड़ी थी। अक्षर गहरे काले थे और दूर से बगल के काँसे के अक्षरों से भी अधिक स्पष्ट। रास्ते भर वह सोच रही थी कि बाहरी तख्ता कितना खोलना पड़ेगा। अब वह बात बिल्कुल भूल गई; आँखों में बस नया-सा डिंग अक्षर रह गया।
तिंग छ्वान किराया ले रहा था। उसे आते देखकर पहले बोला कि ठीक समय पर लौटी हो, लकड़ी कल आ जाएगी। आझाओ ने उस बात का जवाब नहीं दिया। उसने नाव के अगले सिरे की ओर इशारा करके पूछा कि वह कब टाँगी गई। सवाल इतनी जल्दी निकला कि पार जाने का इंतज़ार कर रहे कुछ लोग मुड़कर देखने लगे। तिंग छ्वान ने उधर देखा और कहा, महीने के पहले दस दिनों में। कभी-कभी सवारियों को पता नहीं चलता कि नाव कौन चलाता है, सो एक और पट्टी लगा दी। पीतल वाली अब भी वहीं है, उतारी नहीं। आझाओ ने फिर देखा, तब साफ़ पढ़ पाई कि नई लकड़ी पर “丁全撑渡” यानी “तिंग छ्वान नाव चलाते हैं” लिखा था, “丁家渡” यानी “तिंग परिवार का घाट” नहीं।
मगर बात उसके मुँह से निकल चुकी थी। अब अक्षर साफ़ पढ़ लेने के बाद वह यूँ नहीं दिखा सकती थी कि बस यूँ ही पूछ रही थी। उसने कहा कि पहले तय हुआ था कि पीतल की पट्टिका रहेगी। दिंग छ्वान ने जवाब दिया, वह तो है ही, दोनों एक-दूसरे के आड़े नहीं आतीं। उसने फिर पूछा कि अगर सब इसे तुम्हारी नाव कहेंगे तो किसे याद रहेगा कि पहले यह किसकी थी। कहते ही उसे भी समझ आया कि यह बात ठीक नहीं है। जब नाव किसी और को चलाने दी है, तो सवारियाँ पहले उसे नहीं ढूँढ़ेंगी तो दो दिन का जलमार्ग तय करके आख़िर किसे ढूँढ़ने जाएँगी?
दिंग छ्वान का चेहरा उतर गया। हाथ की रेज़गारी अब भी उसने बाँस की नली में नहीं डाली थी। उसने कहा कि वह हमेशा से अपनी नाव चाहता था। अभी खरीद नहीं सकता, इसलिए तुम्हारी किराए पर ली है। वह कारीगर ह की ख़ातिर रोज़ एक पुराने नाम की रखवाली करने नहीं आया। आझाओ ने पिता का ज़िक्र इस तरह होते सुना तो उसका सीना कस गया। वह लगभग कह बैठी कि फिर जाकर खरीद लो। बात पूरी करती, उससे पहले ही पास खड़ी लुओ येन बोल पड़ी। पूछा, आज उसे लकड़ी देखने बुलाया था, फिर क्यों लग रहा है जैसे किसी का नाम बदलने को बुलाया हो।
उस बात में कोई नरमी नहीं थी। लुओ यान उसकी यात्री रह चुकी थी और संदूक के नीचे बिछाने को बाँस की चटाई भी दे चुकी थी। अब भी वह अपने पति के पक्ष में खड़ी थी। आझाओ ने सोचा था कि लौटकर वह ऐसी नाव की मालकिन होगी जिसका दोनों तरफ़ मान रखा जाएगा। अब समझ आया कि कभी साथ टिकिया का एक टुकड़ा खा लेने से हर कोई उसकी हर छोटी ठेस को सँभालकर नहीं रखेगा। उसने जो कहना चाहा उसे दबा लिया और पहले इंतज़ार कर रहे यात्रियों से नाव पर चढ़ने को कहा, ताकि इस छोटी-सी बहस के कारण उनका बाज़ार न छूट जाए।
दिंग छ्वान ने नाराज़गी में यात्रियों को किनारे नहीं छोड़ा। हमेशा की तरह नाव खेकर उन्हें पार ले गया। आझाओ किनारे इंतज़ार करती रही और नाव को नई जगह लगते देखा। वह सचमुच पुराने खूँटे पर नहीं लगी, उससे कुछ दूर धारा की ओर नीचे लगी। आझाओ किनारे-किनारे पास गई और जलस्तर वाले खंभे पर पुराने और नए निशानों की जगह देखी। आगे के छोटे मोड़ पर गाद पहले ही उभर आई थी और जहाँ उसे गहरा पानी याद था, वह उससे और बाहर था। काग़ज़ पर पढ़ी सफ़ाई और आँखों के सामने की बात अलग थीं। ख़ुद देखकर ही उसने जाना कि दिंग छ्वान ने उसके पिता की सारी बातें बस यूँ ही भुला नहीं दी थीं।
लौटते वक़्त दिंग छ्वान ने उसे एक फेरा लगाकर देखने दिया। आ झाओ ने चप्पू थामा। उसके हाथों के घट्टे अब पहले से अलग थे। पुरानी जगहें मुलायम थीं और उँगलियों के सिरे सख़्त। मोड़ पर पहले ही झटके में उसने उतना ही ज़ोर लगाया जितना पुराने दिनों में लगाती थी। दिंग छ्वान ने ‘देखा’ नहीं कहा। उसके सँभल जाने तक रुका, फिर एक नीचा किनारा दिखाकर बोला कि इसे अब पुराने खूँटे की जगह मानकर नहीं चल सकती। उसने पानी पर नज़र टिकाकर सिर हिलाया। अपने ही नाम की नाव पर पहली बार वह किसी और से चलाना सीख रही थी। अब तक लोग उससे बस पूछते आए थे कि वह राज़ी है या नहीं।
किनारे पर दिंग सुई ने कुछ नए फुँदने सजा रखे थे। एक की लपेट इतनी घनी थी कि टाँगते ही वह टेढ़ा हो जाता और बिकने लायक नहीं रहता। आझाओ को आते देखकर उसने पहले पूछना चाहा कि उसने ऐसे फुँदने देखे हैं या नहीं, फिर पिता का चेहरा देखने से खुद को रोक न पाई। आझाओ ने खुद टेढ़ा फुँदना उठा लिया। बोली, चित्र में यह बात दिखती नहीं, बनाकर ही पता चलता है कि कितना भारी है। लड़की ने आह भरी। माँ भी यही कहती हैं, मगर बनाकर न देखो तो सब यही कहेंगे कि पुराना ढंग सबसे अच्छा है।
सुनकर आझाओ के मन में कुछ हिला, पर उसने सत्रह बरस की इस लड़की से बड़ों के बीच सही-ग़लत का फ़ैसला नहीं करवाया। उसने लटकन लौटा दी और पूछा कि दूसरी वाली में दो फेरे कम क्यों हैं। दिंग सुई की आँखें फ़ौरन चमक उठीं और वह देर तक समझाती रही कि हाथ से बुनावट का सिरा कैसे समेटती है। लुओ यान पास ही बाँस की पट्टियाँ बनाते हुए सुनती रही और बीच-बीच में कुछ सुधार देती। बेटी नया नमूना बनाना चाहती थी, इसलिए उसने यह शर्त नहीं रखी कि उसे घर छोड़कर किसी ज़्यादा जानकार जगह ही जाना होगा।
दोपहर के खाने पर भी दिंग सुई उस टेढ़ी लटकन को पकड़े रही। लुओ यान ने कहा कि पहले खा लो। उसने हामी भरते-भरते सबसे बाहर के दोनों फेरे पूरे खोल दिए। आझाओ को देखकर अफ़सोस हुआ और उसने बिखरती पतली बाँस की पट्टियाँ थामने को हाथ बढ़ाया। लड़की ने कहा, रहने दो, पहले तीन बार लपेट चुकी हूँ, इस बार तो सीधी टिकनी चाहिए। खाने के बाद उसने सचमुच एक और बना ली। कटोरे के पास रखकर ख़ुद उस पर फूँक मारी। लटकन बस हल्के से झूली और फिर एक ओर नहीं गिरी।
उसने पुरानी लकड़ी का छोटा टुकड़ा लिया और पीछे “丁穗制”—डिंग सुई द्वारा निर्मित—लिखा। 穗 दो बार बिगड़ा, पर आ झाओ से नहीं लिखवाया; चाकू से समतल खुरचकर फिर लिखा। डिंग छुआन ने देखकर कहना चाहा, अच्छी लकड़ी बरबाद मत करो, मगर लुओ यान ने “यह तुम्हारी फेंकी हुई है” कहकर रोक दिया। लड़की ने छोटी तख्ती टोकरी में रखी, आँखें चमक रही थीं। दोपहर में छोड़ा आधा कटोरा भात अब याद आया और उसने चूल्हे के पास जाकर बाकी सब परोस लिया। आ झाओ ने उसकी धकेली टेढ़ी टोकरी संभाली, मगर अब भी सुंदर न दिखती लिखावट वाली तख्ती नहीं बदली।
दोपहर में नाव खींचकर तख़्ते की जाँच की तो आज़ाओ को फिर याद आया कि वह लौटी किसलिए थी। बाहर का बड़ा तख़्ता हटाया गया तो ख़राब हिस्सा सतह से दिखने के मुक़ाबले थोड़ा चौड़ा निकला। गनीमत थी कि भीतर की पसलियाँ अब भी ठोस थीं। लकड़ी और मज़दूरी मिलाकर चार सौ अस्सी वन में काम हो सकता था, आधी नाव उधेड़ने की ज़रूरत नहीं थी। दिंग छ्वान ने एक और जगह दिखाई जहाँ रस्सी रगड़ खाती थी। वहाँ की सामग्री वह ख़ुद बदलकर मरम्मत कर देगा। मालकिन के सामने होने भर से उसने सारी पुरानी टूट-फूट उसके सिर नहीं डाल दी। आज़ाओ ने नरम पड़ी लकड़ी छुई तो हथेली पर नम बुरादे की एक परत रह गई। अब उसके लिए यह कहना और मुश्किल था कि नाव सँभालने के लिए बस पीतल की पट्टी अपनी जगह बनी रहनी चाहिए।
उसने नाव की मरम्मत के लिए बचाए पैसों में से चार सौ निकाले और सिलाई वाली छोटी थैली से अस्सी और मिलाए। लुओ येन की ज़मानत को हाथ नहीं लगाया। पैसे तख्ते पर रखे गए। लकड़ी रंदने वाले कारीगर ने गिने, पहले सामान की देय रकम ली, बाकी काम पूरा होने पर मिलनी थी। आझाओ ने छोटी थैली को हल्का होते देखा तो याद आया कि पोशाक के लिए वह भी आधा पैसा पहले लेती है। नाव की मालिक हो या पोशाक की कारीगर, किसी का अभी बाकी काम वह पहले से अपने हिस्से का इत्मीनान मानकर नहीं चल सकती थी।
मरम्मत के लिए नाव तीन दिन बंद रहनी थी। इस बार का किराया पहले की तरह दो सौ साठ वेन था। दोनों ने बात करके छब्बीस कम किए, इसलिए तिंग छ्वान ने दो सौ चौंतीस दिए। नौवें महीने की सत्ताईस तारीख़ को मियाद पूरी होने की बात ज्यों की त्यों रही। इन दिनों वह पश्चिमी घाट पर माल उतरवाने में हाथ बँटाने जाएगा। नाव से जितनी कमाई नहीं हुई, वह सारी आझाओ के खाते में भी नहीं डाल सकता था। हिसाब की बात पूरी हुई तो हर बात से ख़ुशी नहीं मिली, मगर एक-दूसरे को ज़बानी अच्छा पड़ोसी कह देने की अपेक्षा इससे अगली बार बात करने की गुंजाइश ज़्यादा बची।
रात को लुओ येन ने ज़मानत की पेटी की बात फिर उठाई। कहा, मियाद पूरी होने पर किराया आगे न भी बढ़े तो रकम हिसाब के मुताबिक लौटेगी। मरम्मत अच्छी हो गई तो ज़मानत के पैसों को पहले ही नई लकड़ी में मत लगा देना। आझाओ ने कहा, उसे मालूम है। फिर भी यह सुनकर थोड़ा अखरा कि उस पर भरोसा नहीं है। अगले ही पल उसे याद आया, सुबह लकड़ी की पट्टी देखते ही उसने भी कहाँ तिंग छ्वान पर भरोसा किया था। आज उनमें से कोई भी पूरे वक्त शांत नहीं रह पाया था। फिर भी इन चंद रक़मों का हिसाब साफ़ करना था। जिसे ज़्यादा बुरा लगे, उसी की बात हर बार सही नहीं हो जाती।
अगले दिन नया तख्ता लगाने पर कारीगर ने किनारा मज़बूती से थामने को कहा। आझाओ ने वैसा ही किया। हरकत जानी-पहचानी थी, मगर हाथ में पहले जैसी देर तक टेक लगाए रखने की ताक़त नहीं थी। दिंग छ्वान पास आया और उसकी तरफ़ का सिरा सँभालकर कहा कि वह पहले सन पर लेप कर ले। उसने ताक़त दिखाने की ज़िद नहीं की। छोटी कूची उठाई। सन के तेल और नई लकड़ी की गंध साथ-साथ हाथ पर लग गई। लानथिंग में कपड़ा धोने की गंध से वह बिल्कुल अलग थी। पिता के जीते जी वह हमेशा चाहती थी कि नाव का काम जल्दी निपटे और वह भीतर जाकर सिलाई करे। अब सच में लौटकर सीने को कपड़े थे, तो नाव का यह थोड़ा-सा काम यूँ ही दूसरों पर छोड़ना उसके बस की बात नहीं रही।
उन्होंने पहले पीतल की पट्टिका उतार ली ताकि तख्ता बदलते हुए चोट न लगे। आ झाओ ने उसे हथेली में थामा और नीचे बाईं ओर बचपन में ठोंककर बनाया वह गड्ढा देखा। उसे खुद भी लगा कि इस तरह बचाकर रखने लायक़ क्या है, फिर भी वह उसे घिसकर समतल नहीं करना चाहती थी। दिंग छ्वान की नई पट्टिका बगल में रखी थी। लकड़ी का रंग हल्का था और किनारे पर टेढ़ी ठुकी कील का छोटा छेद था। उसे भी इस पीतल की पट्टिका से ज़्यादा बेदाग़ होने की ज़रूरत नहीं थी। आ झाओ कुछ देर देखती रही, फिर आख़िर उस्ताद से कहा कि दोनों रहने दें, कहाँ टाँगनी हैं वह खुद तय करेगी।
पहले उसने नई पट्टी काँसे की पट्टी के नीचे रखकर देखी। दिंग छ्वान कुछ नहीं बोला। आ झाओ ने ख़ुद ही उसे खिसका दिया, ताकि दोनों एक तरफ़ अगल-बगल रहें। पुराने अक्षर न ढकें और नया नाम भी ऐसी जगह न छिपे कि देखने वाले को सिर झुकाना पड़े। कील ठोकते समय हाथ में कुछ दर्द हुआ। दिंग छ्वान ने हाथ बढ़ाया तो उसने सिर हिला दिया। इतना वह ख़ुद कर सकती थी। उसने इस हरकत का सहारा लेकर उससे सुबह की बात वापस लेने को नहीं कहा। दिंग छ्वान ने भी उसके पट्टी टाँगने को राज़ी होने पर फ़ौरन यह नहीं कहा कि सारी ग़लती उसी की थी।
लुओ यान देखने आई और पूछा कि रस्सी में अड़चन तो नहीं होगी। तभी आ झाओ ने नई पट्टी आधा त्सुन और खिसकाई। इस सीधे काम की बात ने उसके मन की गंभीरता तोड़ी तो उसे उलटे कुछ हल्का लगा। पट्टियाँ लोगों के देखने के लिए थीं, नाव को अब भी बाँधना था और उसमें सवारी भी ढोनी थी। चायघर की सजावटी जलराशि के पास रख देने भर से पुराना घाट ठीक तरह बचा नहीं रहता। शाओ लाई तब जिस ज़रा-से पुराने रंग को ख़रीदना चाहता था, वह यहाँ जीता रहे तो उसकी कल्पना से कहीं ज़्यादा उलझा हुआ ही होगा।
मरम्मत के लिए पूरे तीन दिन रोकने के बाद नाव पानी में उतारकर परखी गई। पुरानी दरार पर लगा अस्थायी पैबंद नए तख़्ते से मजबूती से जुड़ा था और नाव का तल आखिरकार पिछली कुछ बार की तुलना में सूखा था। दिंग छ्वान यात्रियों की एक खेप पार ले गया। किनारे से किसी ने अब भी ‘दिंग परिवार की नाव’ पुकारा। इस बार सुनकर आझाओ के मन में हल्की-सी चुभन तो हुई, पर उसने उस आदमी को इशारे से बुलाकर उसकी बात नहीं सुधारी। उसे आज के बाज़ार पहुँचना था। चप्पू किसके हाथ में है, इतना पहचान ले तो पहले ह परिवार का बरसों का इतिहास जानने की ज़रूरत नहीं थी।
जाते वक्त उसने दो नए झालरों में से एक खरीद ली। दाम तिंग सुई ने खुद तय किया था। लड़की उसे मुफ़्त देना चाहती थी। बोली कि पिछली बार नमूना देखने में मदद नहीं कर पाई तो कोई बात नहीं। आ झाओ हँसी और बोली कि ठीक इसी वजह से इस बार को भी अपने किए काम में मत गिनो। उसने वह झालर खरीदी जो काम आ सकती थी। टेढ़ी वाली ठेले पर ही छोड़ी कि लड़की खुद ठीक करे। उसने अपनापे के नाम पर सारे नए नमूने खरीदकर लड़की की झूठी बिक्री नहीं बनाई।
छिन दादी उसे विदा करने आईं, मगर बस चौराहे तक। आ झाओ के हाथ पर लकड़ी का बुरादा देखकर उन्होंने पूछा कि क्या नई पोशाक अच्छी नहीं बन रही, जो फिर बढ़ईगिरी पर लौट आई हो। आ झाओ समझ गई कि वह छेड़ रही हैं। उसने कहा कि नाव अब भी उसकी है, वह बस किराया लेकर तो नहीं बैठ सकती। बुज़ुर्ग ने हामी भरी। उन्होंने न फिर उसे दीयों की दुकान पर लौटने को कहा, न रुआनछंग जाने को। बस इतना कहने को कहा कि आ शंग के जूते फिर छोटे पड़ें तो पहले नाप भेज देना, पहनते-पहनते दर्द होने तक इंतज़ार मत करना। कहकर वह खुद भी हँसीं, जैसे पिछली बार की वह झेंप याद हो जिसे टाला नहीं जा सका था।
लांतिंग लौटती नाव में आझाओ ने अपने नाप का काग़ज़ निकाला। उसके कोने में इस बार नाव की मरम्मत का पूरा पैसा चुकाने की छोटी रसीद लगी थी। दोनों काम साथ रखे हुए अब पहले जैसे खटकते नहीं थे। उसे एक को चुनकर यह साबित करने की भी ज़रूरत नहीं थी कि दूसरा अब उसके साथ रहने लायक नहीं है। नाव पुराने ठहराव से गुज़री तो उसने छाजन की बगल से एक बार देखा। दोनों नाम दूर हो चुके थे। पानी पर बस एक काँपती चमक रह गई थी। उसने नई लटकन ठीक से रखी, हाथ बढ़ाया और बगल के मुसाफ़िर का खाली कटोरा फिसलकर गिरने से पहले थाम लिया।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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