प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
नन्हे जूतों की क़ीमत
कू वूजी · AI सृजन · 9185 अक्षर · लगभग 12 मिनट
आशंग ने नए जूते पहनकर यह नहीं कहा कि छोटे हैं। पहले कमरे में दो कदम चला और तारीफ़ की कि नानी ने माँ से ज़्यादा चमकीले जूते बनाए हैं। सुनते ही श्याओमान की भौंहें सिकुड़ गईं। बच्चे को आम तौर पर नए जूतों की आवाज़ सबसे ज़्यादा खलती थी, आज उसे तारीफ़ की उतावली थी। वह उकड़ूँ बैठी, जूते की नोक दबाई और उससे पैर की उँगलियाँ ढीली छोड़ने को कहा। वह ढीली नहीं छोड़ पाया। चेहरे की ज़रा-सी मुस्कान धीरे-धीरे ऐसी विनती में बदल गई कि अब और मत पूछो।
छिन दादी ने हाथ बढ़ाकर कहा कि कुछ देर पहनने से जूते नरम हो जाएँगे। श्याओमान ने पहले बहस नहीं की। बेटे से जूते उतरवाए तो पैर की बग़ल में दबाव की हल्की लकीर सचमुच पड़ गई थी। वह आराम से समझाना चाहती थी, मगर देखा कि बच्चा अब भी नानी की ओर देख रहा है, जैसे डर रहा हो कि ‘पसंद नहीं’ कहते ही बड़े नाराज़ हो जाएँगे। उसकी आवाज़ एकाएक सख़्त हो गई। उसने कहा कि जूता पैर दबाता है तो बोलो। किसी को ख़ुश रखने के लिए अपने पैर में दर्द नहीं सहना पड़ता। आशंग ने सिर झुका लिया। उसी वक़्त छिन दादी का बढ़ा हुआ हाथ भी थम गया।
बूढ़ी ने कहा कि पिछली बार जब वह आया था, उसके पैर देखकर कुछ गुंजाइश छोड़ी थी। अभी दो ही महीने हुए हैं, इतना फ़र्क कैसे आ गया। श्याओमान ने अंदर की तरफ़ पलटकर देखा। जूते का ऊपरी कपड़ा तना था और पैर आगे की ओर बढ़ रहा था। कई जगहों का फ़र्क मिलाकर बात ऐसी हो गई थी कि एक दिन और पहन लेने से ठीक नहीं होती। उसने माँ को दिखाया, मगर माँ ने पहले यही पूछा कि पहले सही नाप लेकर क्यों नहीं लौटी। मैं वहाँ बच्चे के पाँव के पास थोड़े ही थी कि नाप लेती।
“मैंने भी तुमसे यह नहीं कहा था कि ज़रूर बनाओ।” श्याओ मान ने कहा।
कहने के बाद उसे लगा कि बात भारी पड़ गई। जूते किसी ज़बरदस्ती तय किए गए ब्याह का काग़ज़ नहीं थे। माँ उन्हें दो दिन के जलमार्ग से लेकर आई थीं और बच्चे के लिए एक-एक टाँका ख़ुद लगाया था। मगर अगर इस सद्भावना का नतीजा यह हो कि उसे जूते पहनकर तकलीफ़ सहनी पड़े, तो श्याओमान के कानों में फिर बरसों पुरानी ‘सुरक्षा’ की बात गूँजती थी। चाहे कितनी भी तकलीफ़ हो, पहले दूसरे की मेहनत का मान रखना होगा। उसने जूते मेज़ पर रखे और भरसक कोशिश की कि उसके हाथ उसकी आवाज़ जितने सख़्त न हों।
छिन दादी ने कहा कि नहीं पहनना तो मत पहनो। स्वर भी कठोर था, जैसे किसी को किसी के स्वीकार करने की परवाह नहीं। आ शंग दोनों के बीच खड़ा था, सिर्फ़ मोज़े पहने, पाँव ठंडे हो रहे थे। पहले माँ के पास खिसका, आधे में फिर रुक गया। श्याओ मान ने देखा तो उसे गाओ मान के पास जाकर कल के अक्षर लिखने को कहा, पहले पुराने जूते पहन ले, खड़े होकर सुनने की ज़रूरत नहीं। बच्चा दौड़कर बाहर गया, तभी उसे लगा कि कमरे से वे दो आँखें कम हुई हैं जो दोनों के लिए दुखी होतीं।
माँ ने नए जूते उठाए और कैंची ढूँढ़ने लगीं। श्याओ मान समझ गई कि शायद एक ही काट में बात ख़त्म कर देना चाहती हैं। उसने जूते फिर ले लिए और कहा कि ऐसा नहीं है कि इन्हें बिलकुल बदला नहीं जा सकता। पहले अंदर की सिलाई खोलो, ऊपर का कपड़ा भी मत बिगाड़ दो। दोनों की उँगलियाँ एक जगह छुईं और दोनों रुक गईं। दादी छिन ने धीमी आवाज़ में कहा कि पहले भी तुम हमेशा ऐसी ही थीं। पहले भलाई चुपचाप ले लेने को तैयार नहीं होती थीं। हर बात ऐसे कहनी होती थी कि आगे सुनने का मन ही न रहे।
श्याओमान की छाती अचानक कस गई। वह कहने वाली थी कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम वही सुनती हो जो सुनना चाहती हो। तभी उसकी नज़र खिड़की के पास मरम्मत के लिए रखे साझा दीये पर पड़ी। माँ ने सुबह ही बाँस की नई पट्टी घिसकर तैयार कर ली थी। कारीगरी में ज़रा भी चूक नहीं थी। उसे समझ आया कि अगर वह भी सारी बातों को एक ही वाक्य में यह कहकर टाल दे कि माँ उम्र भर ऐसी ही रही हैं, तो यह अपने लिए काम आसान करना ही होगा। उसने उस बात का जवाब नहीं दिया। पहले सुइयों की डिबिया माँ की ओर सरका दी, ताकि उनके हाथ में करने को कुछ रहे।
मगर छिन दादी हिलीं नहीं। बैठी-बैठी बोलीं कि उन्हें भी हर वक्त पता नहीं होता कि अब तुम्हारी ज़िंदगी कैसी है। जूते बनाने का मन इसलिए हुआ कि जब आशंग घर आया था, दो कदम चलते ही पुराना जूता खींचकर चढ़ाता था। लानथिंग आने का मन इसलिए हुआ कि सुना, बेटी अब भी पूछ रही है कि खाँसी ठीक हुई या नहीं। कभी पहले कुछ कर देने का मन होता है, डर रहता है कि पूछकर जवाब आने तक फिर कई दिन निकल जाएँगे। कहते-कहते आखिर पुरानी बात निकल आई। बोलीं, तुम्हारे जाने के बाद तुमने ठीक से किसी के हाथ यह एक बात तक भेजनी नहीं चाही कि तुम सही-सलामत हो।
श्याओमान ने सिर उठाकर पूछा कि पहली बार नाव से संदेश लाने वाला पहुँचा था क्या। माँ के हाथ में जूता हिला। उन्होंने फ़ौरन जवाब नहीं दिया। उनका यह ठहराव साफ़ इनकार से भी ज़्यादा तकलीफ़देह था। श्याओमान समझ गई कि उसका कुछ अंदाज़ा सही था। मगर अब वह उस हिस्से को जानना नहीं चाहती थी जिसमें बस उसका अपना बेकार का इंतज़ार बाक़ी रह गया था। वह माँ को देखती रही और इंतज़ार करती रही कि वह ‘पहुँचा था’ उनके अपने मुँह से सुने।
छिन दादी ने जवाब दिया कि संदेश पहुँचा था। श्याओमान के घर छोड़ने के दो साल बाद, गर्मियों में, तेल पहुँचाने आया एक नाविक लाया था। श्याओमान ने उससे कहलवाया था कि वह अब भी मंडली में है, अपना पेट पाल सकती है और माँ चिंता न करें। बुज़ुर्ग को एक-एक शब्द याद था, इतना साफ़ कि बरसों से कही अपनी बात ‘कोई ख़बर नहीं आई’ से उसका मेल ही नहीं था। श्याओमान ने पूछा, तो फिर उसे लौटकर बस यही क्यों सुनने को मिला कि ‘तुम्हारी माँ तुम्हें अपनी बेटी मानने को तैयार नहीं हैं’? उसे तो यह तक समझ नहीं आया था कि अगला संदेश किस बात से शुरू करे।
माँ ने कहा कि उसने ऐसा नहीं कहा था। उसने कहलवाया था कि अगर उसमें दम है तो ख़ुद लौट आए, इस तरह किसी के हाथ अधूरी-अस्पष्ट बात भेजने की ज़रूरत नहीं। आख़िरी शब्दों पर वह ख़ुद भी रुक गई। उस समय वह चोउ परिवार के दिए उपहारों का बदला चुका रही थी। हर दीया बनाते हुए उसे लगता था कि वह बेटी की वजह से लोगों के सामने उठाई शर्म का एक हिस्सा चुका रही है। यह सुनकर कि बेटी का गुज़ारा हो रहा है, उसे पहले तसल्ली नहीं हुई। उसके मन में पहला सवाल यही उठा कि फिर तू लौटकर मुझे अपनी माँ मानने को तैयार क्यों नहीं है।
“मैंने यह नहीं कहा कि तुम्हें अपनी नहीं मानती।” उन्होंने फिर दोहराया। इस बार आवाज़ पहले जैसी स्थिर नहीं थी।
श्याओमान ने जवाब दिया कि उस बात का मतलब ही काफ़ी था। उस साल वह बस बीस की थी। उसे डर था कि लोग सुन लेंगे कि वह बार-बार घर से जवाब पूछती है। जानी-पहचानी राह की कोई नाव आती तो वह पूछने का बहाना करती कि माल कहाँ से लाए हो। जब पानी के रास्ते आने वाले उस मुसाफ़िर ने कहा कि माँ ने उसे लौटकर बात करने को कहा है, तो उसे लगा कि लौटने पर वही रिश्ता होगा, वही बंद दरवाज़ा। पहले हाँ न कहे तो उसके पास ‘माँ’ कहने की जगह भी नहीं बचेगी।
बुज़ुर्ग छिन ने सिर झुका लिया, आख़िर कहा कि बात उसी ने इतनी सख़्ती से कही थी, संदेश लाने वाले ने अपनी ओर से उसे सख़्त नहीं बनाया था। यह सुनकर श्याओमान की आँखों में एक पल को गरमी उतर आई, पर आँसू फ़ौरन नहीं गिरे। उसने इतनी देर इंतज़ार किया था कि जब आख़िर यह बात उसके सामने आई, तब वह पहले वाली श्याओमान नहीं रह गई थी, जिसके लिए दौड़कर लौट जाने को एक वाक्य ही काफ़ी होता। उसका बच्चा आँगन के बाहर अक्षर सीख रहा था, उसका पति अब दुनिया में नहीं था, आज माँ के मान लेने भर से उस बीते समय का एक दिन भी कम नहीं होने वाला था।
दूसरी बार की बात छिन दादी तक सचमुच नहीं पहुँची थी। श्याओमान ने कहा कि वह आशंग के जन्म के बाद की बात थी। लू झंग ने उसके लिए संदेश लिखा था और मंडली से जुड़े एक रिश्तेदार के हाथ भिजवाया था, जो अपने गाँव लौट रहा था। उसे लगा था कि माँ ने इस बार भी संदेश एक तरफ़ रख दिया होगा। बूढ़ी ने बहुत धीरे सिर हिलाया। अब उनमें पहले जैसी खुद को निर्दोष साबित करने की उतावली नहीं थी। उन्होंने कहा कि अगर बच्चे की खबर मिली होती, तो चाहे कितनी भी ज़िद्दी होतीं, सोलह साल बाद यह न पूछतीं कि तुमने घर कब बसाया।
इस एक बात के भरोसे श्याओमान उस रास्ते में पड़े हर आदमी से पूछताछ करके सच नहीं जान सकती थी। वह बरसों की सारी कहानी को एक गुमशुदा संदेश से समझाना भी नहीं चाहती थी। उसने कहा कि दूसरी बार बात तुम तक नहीं पहुँची, पर उससे यह बात नहीं मिटती कि पहली बार तुमने सुना था। माँ ने ‘हूँ’ कहा और जवाब में फिर से अपने उन दिनों के अकेलेपन की मुश्किलें नहीं गिनाईं। कमरे में बस बाहर से बाँसुरी के अभ्यास की धीमी आवाज़ आ रही थी। आशंग से सुर बिगड़ता तो ख़ुद हँस पड़ता। हँसी एक बार रुकती, फिर लौट आती।
श्याओमान ने नए जूते वापस माँ की गोद में रखे और कहा, पहले भीतर का किनारा उधेड़ो, यहाँ थोड़ी और गुंजाइश बच सकती है। वह अधूरी बात की जगह जूते ठीक करने को नहीं रख रही थी। बस दोपहर में उसे मंच पर भी जाना था और अँधेरा होने तक बैठी रहती तो भी बीस साल की उम्र वाला वह संदेश लौटकर नहीं आता। दादी छिन ने सुई ली। पहले उँगलियाँ काँपीं, कुछ साँसों बाद थमीं। उन्होंने टाँके की रेखा पर बहुत बारीकी से धागा निकाला, कैंची से एक झटके में नहीं काट दिया।
सभागार में लालटेन सँभालने वाला आदमी सुधारी हुई लालटेन लेने आया। देखा कि नया कागज़ ठीक चढ़ा है तो मेहनताने के कुछ वन बढ़ाए। छिन दादी लौटाना चाहती थीं, मगर श्याओमान ने पहले ही कह दिया, यह काम इन्होंने किया है, इन्हीं को दो। बूढ़ी ने बेटी की ओर देखा और आखिर पैसे ले लिए। फिर आदमी को समझाया कि उठाते वक्त सिर्फ़ एक ओर से न पकड़ना, वरना टेक वाली खपच्ची फिर टेढ़ी हो जाएगी। हुनरमंद कारीगर वाला लहजा लौटा तो उनकी पीठ भी कुछ सीधी लगी। अब उनमें उस माँ से कहीं ज़्यादा दिख रहा था जिसने ग़लत बात कही थी और ग़लत नाप के जूते बनाए थे।
श्याओमान यह देखती रही। पल भर को उसका मन पसीजा भी और कसैला भी हुआ। बचपन में उसे माँ को लालटेन बनाते देखना अच्छा लगता था। वे कुछ सीधी-सी दिखने वाली बाँस की पट्टियाँ माँ के हाथ में मुड़कर ऐसी चीज़ बन जाती थीं जो रोशनी दे सके। बाद में नाटक सीखने के झगड़े में उसने कहा था, सारी उम्र ज़रा-से लालटेन के कागज़ की रखवाली करने का क्या मतलब है। वह बात यूँ ही आसमान से नहीं गिरी थी। वह सचमुच अलग तरह की ज़िंदगी चाहती थी, मगर उसने माँ के सबसे हुनरमंद काम को भी ज़रूरत से ज़्यादा हल्का कह दिया था।
उसने उस बात को इस वक़्त नहीं उठाया कि दोनों अपने-अपने हिस्से की एक बात कबूल करें और हिसाब बराबर हो जाए। उसने बस माँ के एक जूते की मरम्मत पूरी करने का इंतज़ार किया। फिर उनके हाथ के पास रखी ठंडी चाय की जगह गुनगुनी चाय रख दी और अपनी बिखरी गीत-पुस्तिकाएँ समेट लीं, ताकि नई जगह काम कर रहे उन हाथों के लिए मेज़ का थोड़ा और हिस्सा खाली हो जाए। छिन दादी सिर झुकाए काम करती रहीं। उन्होंने उसका चेहरा देखा ही नहीं, या देखा तो कुछ कहा नहीं।
दोपहर बाद श्याओमान मंच पर गई। माँ की भूमिका में जब उसने ‘रोक नहीं सकती’ वाली पंक्ति गाई, तो अचानक आधी ताल धीमी पड़ गई। छाई हंग ने उसकी ओर देखा और उसने झट ताल पकड़ ली। आज घर में क्या कहा गया, उसे मन में सुलझाने के लिए पूरे मंच को इंतज़ार नहीं करा सकती थी। सामने लू हन्यांग थोड़ा बगल हुई और उसे एक साँस की गुंजाइश दी। मंचन के बाद पूछा, क्या बात है, यह पंक्ति बदलें? उसने कहा कि आज यह उसकी अपनी बात है, अभी संवाद से उसे सँभालने की कोशिश मत करो।
माँ तब जूते लिए मंच के पास इंतज़ार कर रही थीं। दर्शक जा चुके थे और नाव बनी लकड़ी की दो पट्टियाँ ही बची थीं। उन्होंने पूछा, अभी की वह पंक्ति पहले से थी क्या? श्याओमान ने कहा, हाँ। पहली बार अभ्यास करते हुए उसकी साँस भी वहाँ अटकी थी, मगर वह सदा एक ही इंसान के लिए तो नहीं गा सकती थी। दादी छिन ने सिर झुकाया और पैर की नोक से पट्टी का किनारा छूकर कहा, दूर से सचमुच लगता है डोलेगी, पास से बस लकड़ी के दो टुकड़े हैं। श्याओमान ने लग्गी ली और सबसे धीमा कदम उठाकर माँ को दिखाया कि हाथ पहले कहाँ पड़ता है। बुज़ुर्ग ने उसी तरह हाथ एक बार उठाया, धड़ हिला तक नहीं और पहले ख़ुद ही हँस दीं। बोलीं, वे बस बाँस की पट्टी मोड़ना जानती हैं, ऐसा पानी नहीं बना सकतीं। श्याओमान ने लग्गी रोक ली और कुछ समझाया नहीं। माँ-बेटी दर्शकों से खाली मंच के मुहाने पर साथ खड़ी उन दो पुरानी पट्टियों को देखती रहीं, जिन्हें पैरों ने घिसकर चमका दिया था।
पिछली कोठरी में लौटे तो आशंग उधेड़कर ढीले किए जूतों में चल रहा था। अब भी थोड़ी तकलीफ़ थी, मगर इस बार उसने खुद कह दिया कि बायाँ जूता अब भी कसता है। छिन दादी ने जूता लेकर कहा कि फिर थोड़ा और उधेड़ देंगे, ज़बरदस्ती सहने की ज़रूरत नहीं। बच्चा एकदम सहज हो गया। उसने अपनी बाँस की पट्टी दिखाते हुए कहा कि नानी ने लालटेन सुधारते वक्त जो खपच्ची लगाई थी, वह इससे कहीं अच्छी मुड़ी थी। उन्होंने कहा, हर बाँस अलग होता है, हर चीज़ मोड़ी नहीं जा सकती। उसके फिर से शिकायत करने पर उनका चेहरा बुझ नहीं गया था।
साँझ को माँ को सराय छोड़ने जाते हुए श्याओमान ने उनका थैला उठा लिया। माँ ने कई बार लेना चाहा और हर बार उसने दूसरे हाथ से उन्हें थैले तक पहुँचने से रोक दिया। रास्ते में उन्होंने बस यही बात की कि सुबह कौन-सी नाव लेनी है और सांगच्याओ में किस सराय का कमरा ज़्यादा सूखा है। उन्होंने फिर यह नहीं पूछा कि तब वैसा हुआ होता तो आज कैसा होता। दरवाज़े पर दादी छिन ने थैले से आझाओ के लिए लाई तेल की शीशी निकाली। कहा, इसे फिर टिकियों के साथ मत रखना। नाव में उन्हें लगा था सब सोच-समझकर रखा है, फिर भी दोनों में गंध लग गई।
श्याओमान ने बोतल ली और हल्का-सा मुस्कराई। उसने यह नहीं कहा कि आख़िर समझ गई, माँ ने भी यह नहीं कहा कि अब तो मेरा मन समझना चाहिए। तेल की वह बोतल एक हाथ से दूसरे हाथ में गई तो सचमुच थोड़ी फिसलन भरी थी, लगभग छूट ही गई। माँ-बेटी ने एक साथ उसे थामने को हाथ बढ़ाए। उनके हाथ टकराए, फिर दोनों ने अपनी पकड़ ज़रा ढीली की, तब बोतल थैले के कोने में ठीक से जा टिकी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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