प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
बच्चा साथ जाए या नहीं?
कू वूजी · AI सृजन · 8954 अक्षर · लगभग 12 मिनट
सातवें महीने के शुरू में आ शंग ने ढोल की ताल ऐसी बजाई मानो कोई मुर्गी अपनी ही चाल का पीछा नहीं कर पा रही हो। छाई हंग ने सिखाया, बाईं ओर एक चोट, दाईं ओर दो। सुनते-सुनते उसके हाथ उस छोटी बाँसुरी की धुन के पीछे भाग गए और उसने लगातार कई बेमेल हल्की-भारी चोटें लगा दीं। ढोल के उस्ताद ने ढोल का किनारा दबाकर पूछा कि आख़िर वह सीखना क्या चाहता है। बच्चे ने ग़लत जवाब देने के डर से पहले कहा, सब सीखना है, मगर आँखें अब भी खिड़की की चौखट की ओर थीं।
छिन श्याओमान पास बैठी अस्तर की डोरी सिल रही थी। उसने फ़ौरन बच्चे से ध्यान लगाने को कहा। उसने हाँ की, मगर थोड़ी देर में फिर ताल बिगाड़ दी। श्याओमान देखती गई और उसकी बेचैनी बढ़ती गई। उसे लगा कि उसके पास ख़ुद शुरू से कोई ऐसा हुनर नहीं था जिसके बल पर वह टिक सके, तभी नाटक की नाव पर हर तरह का काम करना पड़ा। बेटे को इतना अच्छा ढोल-गुरु मिला है, वह इसे जब जी चाहे ढोल पीट लेने का खेल कैसे समझ सकता है? मगर छाई हंग ने ढोल की छड़ियाँ वापस ले लीं और कहा कि आज के लिए इतना ही। उसे अपना अभ्यास भी करना है, वह बैठकर किसी का ध्यान लौटने का इंतज़ार नहीं करेगा।
श्याओमान ने माफ़ी माँगी। कमरे में लौटकर वह पहले बच्चे को डाँटना चाहती थी। आ शंग ने कुछ नहीं कहा। वह ख़ुद नीची मेज़ के पास जाकर लिखने लगा और रोज़ से इतना ज़ोर लगाया कि काग़ज़ लगभग छिद गया। मेज़ की बग़ल में वह पुरानी खाँच अब भी थी जो लू झंग ने छोड़ी थी। श्याओमान कहने जा रही थी कि तुम्हारे पिता बचपन से कैसे थे, पर अचानक रुक गई। बच्चा अपने काग़ज़ पर नज़र गड़ाए था और वह पहले ही उसके सामने किसी और को खड़ा कर चुकी थी, ताकि वह उसके पीछे दौड़े।
माँ की चिट्ठी उसी दिन आ पहुँची। लिखा था कि गर्मियों में काम ज़्यादा हो तो आशंग कुछ दिन ल्योवान में रह सकता है। पड़ोस की गली के गुरुजी बच्चों को अक्षर सिखाते हैं और लालटेन की दुकान की पिछली कोठरी में भी जगह है। उसे हर बार मंच के किनारे झुककर लिखना नहीं पड़ेगा। श्याओमान ने ‘गुरुजी’ पढ़ा तो मन ललचा उठा, ‘पिछली कोठरी’ पढ़ी तो फिर बैठ गया। इंतज़ाम पूरी तरह बेतुका नहीं था। उसके मंच के पीछे गर्मी, शोर और भागदौड़ रहती थी। बच्चा कई बार आधे गीत के बीच जगाया गया था। अगर सच में एक शांत मेज़ मिल जाए तो उसमें बुरा क्या है।
मगर माँ ने इस राह के लिए लोग और जगह पहले ही जुटा लिए थे और उससे अब पूछ रही थीं। वह कल्पना तक कर सकती थी कि आशंग वहाँ रहने चला गया है, दिन में कोई उसकी देखभाल करता है, रात में गरम खाना मिलता है और उसे मंच पर जाते हुए यह चिंता नहीं करनी पड़ती कि बच्चा कहाँ है। इस राहत के ख़याल से पहले उसकी साँस खुली, फिर वही ख़याल किसी विश्वासघात जैसा लगा। जैसे तब उसने गाने के लिए घर तक छोड़ देना मंज़ूर किया था, और अब आख़िरकार उसे अपने बच्चे को उसी ज़्यादा महफ़ूज़ जगह वापस भेजकर एक बार मानना पड़ेगा कि माँ सही थीं।
उसे अपने ऐसे ख़याल पर बड़ी खीझ हुई। बच्चा कोई काग़ज़ का परचा नहीं था जिस पर लिखा हो कि बरसों पहले की लड़ाई कौन जीता था। और ज़रूरी नहीं कि माँ बस कुछ वापस पाना चाहती हों। लेकिन अगर वह मना कर दे, तो क्या इसलिए कि बच्चे का भला मंडली में है, या इसलिए कि उसे डर है कि वहाँ भेजते ही बेटा नानी के पास रहना ज़्यादा पसंद करेगा? इस वक़्त वह भी आसानी से दोनों बातों में फ़र्क़ नहीं कर पा रही थी। उसने चिट्ठी तह कर दी। फ़ौरन जवाब में ‘हरगिज़ नहीं’ नहीं लिखा।
आज़ाओ ने उसे ख़यालों में डूबा देखा तो पूछा कि ल्युवान में कुछ हुआ है क्या। श्याओमान ने उसे चिट्ठी दी और ख़ुद आशंग के लिए पानी लेने चली गई। पढ़कर आज़ाओ ने कहा कि वहाँ अक्षर सीखने की जगह होना सच में अच्छी बात है। बस पहले बच्चे से पूछना चाहिए और देखना चाहिए कि गुरु कैसे हैं। यह सुनकर जाने क्यों श्याओमान को अच्छा नहीं लगा। उसने पूछा कि क्या तुम्हें भी लगता है कि मैं मंडली में उसे ठीक से नहीं पाल रही। आज़ाओ ने सिर उठाकर उसे देखा। उसकी आँखों में पल भर को कटघरे में खड़े किए जाने की झुँझलाहट थी। तब श्याओमान को एहसास हुआ कि चिट्ठी पर आया ग़ुस्सा उसने सबसे पहले पास खड़े इंसान पर उतार दिया था।
उसने सफ़ाई का इंतज़ार नहीं किया। पहले ही कह दिया कि मेरा ग़ुस्सा तुम पर नहीं था। आज़ाओ के चेहरे का तनाव पूरी तरह नहीं गया। उसने बस चिट्ठी वापस रख दी और अपने हाथ की पोशाक देखने लगी। श्याओमान ने उसकी पीठ देखते हुए अचानक सोचा कि लानतिंग में जब माँ ने नीले कपड़े का एक टुकड़ा तह करना चाहा था और किसी ने ‘मत छुओ’ कहकर रोक दिया था, तब उन्हें भी शायद लगा होगा कि लोग उनसे चिढ़ते हैं। कभी-कभी सामने वाला सच में दोष नहीं दे रहा होता। अपने ही मन में कोई जगह पहले से ऐसी होती है जिसे छूने देने को जी नहीं चाहता, और जो पास आता है, पहली चोट उसी को पड़ती है।
दोपहर बाद बच्चे ने कपड़ा लेने की ग़लत लकड़ी की पट्टी उठा ली। दो छी को तीन छी पढ़ बैठा। गाओ मान ने डाँटा नहीं, उससे ख़ुद अक्षर मिलाने को कहा। वह जितना देखता, उतना उलझता गया। आख़िर मान लिया कि उसे बस पट्टी की लंबाई याद थी, सारे अक्षर पहचानता नहीं था। श्याओमान ने दरवाज़े के पास खड़े-खड़े सुना तो उसका चेहरा गरम हो गया। फिर अपने पर झुँझलाई कि बच्चे को अक्षर आते हैं या नहीं, इसे वह हर बार अपनी ज़िंदगी की कामयाबी की परीक्षा क्यों बना लेती है। गाओ मान ने छोटा-सा लेख फिर से लिख दिया और कहा कि हर दिन पहले कुछ ऐसे शब्द पहचानो जो सच में काम आएँगे। बस अपना नाम लिखना आ गया तो यह मत समझो कि सारी किताबें पढ़नी आ गईं।
कुछ देर बाद वह बच्चे को शेन फ़ेंग से मिलाने ले गई। शेन फ़ेंग पहले कई नाट्यस्थलों पर बाँसुरी और तंत्री वाद्य बजाता था। पिछले दो वर्षों से वह रोज़ घाट-घाट भागना नहीं चाहता था, इसलिए लानतिंग में रहकर लोगों के छोटे वाद्य ठीक करता था और कुछ बच्चों को स्वर-लिपि पढ़ाता भी था। श्याओ मान उससे मिली थी, मगर कभी विस्तार से सीखने की बात नहीं की थी। पहले बस यही मानती थी कि आ शेंग को पहले पिता की राह पर चलना चाहिए। अब दरवाज़ा खोलकर भीतर गई तो पाया कि दूसरे पहले ही बैठकर अपनी-अपनी लिपि पढ़ रहे थे; किसी ने पहले यह नहीं पूछा कि बड़े होकर किस तरह के उस्ताद कहलाना चाहिए।
शन फंग ने बाँस का छोटा टुकड़ा देखा तो पहले हँसे। बोले, छेद तक ठीक से कहाँ हैं, और तुम अभी से लंबी धुन बजाना चाहते हो? आशंग ने कहा कि एक बार उससे आवाज़ निकली थी। वह बड़े गर्व से फिर बजाने लगा, मगर इस बार सिर्फ़ हवा निकली। गुरु ने उसकी किसी छिपी प्रतिभा की कहानी नहीं गढ़ी और बाँस भी नहीं फेंका। उन्होंने एक बनी हुई छोटी बाँसुरी निकाली, उसे दो सुर सुनाए और फिर मुँह से उन्हें दोहराने को कहा। बच्चे की नकल ठीक नहीं बैठी, मगर वह कान पास ले आया। साफ़ दिख रहा था कि ढोल के पास बैठने की तुलना में यहाँ वह इंतज़ार करने को ज़्यादा तैयार था।
श्याओमान देखती रही और मन में फिर थोड़ी कसक उठी। ढोल में भी गहराई है। उसके पति ने जिस काम में आधी ज़िंदगी लगाई, वह बच्चे की नज़र में बाँस की इस हल्की-सी नली से भी कम कैसे हो गया? शन फंग ने पूछा कि वह बच्चे को क्या सिखाना चाहती है। उसके मुँह से लगभग निकल गया कि कोई ऐसा हुनर जिससे रोटी कमा सके। फिर उसे छाई हंग का ढोल की छड़ी थामे हाथ याद आया और उसने जवाब बदल दिया। पहले अक्षर पहचाने, ताल भी पहचाने। उसके लिए यह तय करने की जल्दी नहीं कि ज़िंदगी भर किससे रोटी कमाएगा।
गुरुजी ने सिर हिलाया और बताया कि हर दस दिनों में छह कक्षाएँ होंगी, हर दस दिन के तीस वेन। रात में नहीं पढ़ाएँगे, उन्हें भी आराम चाहिए। मंडली बाहर जाए और बच्चे पूरे न आ सकें तो पहले बता दें, सारे बच्चों को एक जगह इंतज़ार में बाँधकर न रखें। श्याओ मान ने सुना तो उलटे कुछ और भरोसा हुआ। यह कोई भला आदमी नहीं था जो अचानक उसके लिए बच्चा पालने को तैयार हो गया हो, बस एक और व्यक्ति था जो अपने वश का काम करने को तैयार था और रुकना भी जानता था। उसने पहले दस दिनों का भुगतान किया; यह सोचकर हामी नहीं भरी कि आगे सब व्यस्त हो जाएँ तो गुरुजी ही सब सँभाल लेंगे।
गुरुजी ने उसे पुराने काग़ज़ का एक कोना भी दिया और कहा कि पहले 水 (‘पानी’) और 木 (‘लकड़ी’) की नकल उतारो, शुरू करते ही पूरा काग़ज़ बाँसुरियों से मत भर देना। आ शंग की मुट्ठी में काग़ज़ सिकुड़ गया। फिर उसने ख़ुद ही उसे धीरे-धीरे सपाट किया।
लौटते रास्ते में आशंग ने पूछा, तो क्या वह अब भी ढोल सीखेगा? श्याओमान ने कहा, सीख सकता है। न भी सीखे तो पहचानना होगा कि दूसरे कब ताल उठाते हैं। मंच के पास बैठकर हर बार अपना फैलाया सामान दूसरों से नहीं समेटवा सकता। बच्चे ने सिर हिलाया। कुछ देर बाद फिर पूछा कि नानी के वहाँ वाले गुरुजी क्या ज़्यादा सख़्त हैं। श्याओमान ने उसकी ओर देखा। तब पता चला कि पूरे रास्ते वह सिर्फ़ बाँसुरी के बारे में नहीं सोच रहा था। ल्युवान की उस लालटेन की दुकान ने भी उसके मन में जगह बना ली थी।
उसने पूछा कि क्या उसका वहाँ जाने का मन है। बच्चे ने पहले कहा कि है, फिर जल्दी से जोड़ा कि दक्षिणी सभागार भी लौटना चाहता है, जैसे एक जगह का नाम लेते ही दूसरी हाथ से निकल जाएगी। उसने कहा कि ल्योउवान में खाने की मेज़ हिलती नहीं और नानी बता सकती हैं कि बाँस का ढाँचा कैसे बनता है। मगर दक्षिणी सभागार में मिट्टी का कुत्ता है, गु चाचा हैं, और माँ भी हैं। आख़िरी बात कहते समय उसके स्वर में कोई ख़ास भावुकता नहीं थी। जैसे रोज़ की सबसे ज़रूरी चीज़ छूट न जाए, इसलिए उसे भी जोड़ दिया हो। श्याओमान ने सुना तो उसकी आँखें उस दिन से भी जल्दी भर आईं जब बेटे की बाँसुरी से पहली आवाज़ निकली थी।
“आज कुछ चुन लेने से ऐसा नहीं हो जाता कि आगे उसे बदल ही न सको,” उसने कहा।
कहने के बाद उसे ख़ुद ही अपनी बात कुछ अनजानी लगी। बचपन में एक बार ग़लत चुनाव कर लिया तो लगता था कि आगे जाने कितने दिनों तक लोग उसी की पूछताछ करते रहेंगे। मंडली के साथ जाना, लू चंग से शादी करना, आशंग को जन्म देना। हर बात ऐसी थी जैसे एक बार चुन लिया तो फिर कभी थकने का हक़ नहीं रहा। मगर उसका बेटा अभी आठ साल का था। अगर कुछ अक्षर कहाँ सीखे, इसे भी वह उम्र भर किस तरफ़ खड़ा रहेगा का सवाल बना दे, तो अपनी माँ को उसके लिए फ़ैसला करने से रोककर आख़िर उसने क्या बचाया।
उसने बच्चे से यह सब नहीं कहा। बस इतना कहा कि पहले गुरु शन के यहाँ दस दिन पढ़ लो, फिर जब मंडली का आगे का सफ़र तय होगा, साथ बैठकर देखेंगे कि गर्मियों में क्या करना है। आशंग को यह जवाब उतना सीधा और अच्छा नहीं लगा जितना ल्युवान जाने की इजाज़त होती, मगर वह पूरी तरह नाख़ुश भी नहीं था। वह दौड़कर अपना छोटा बाँस उठा लाया और अभी सुने दो सुरों की नकल बड़ी देर तक मन लगाकर करता रहा। आख़िर इस बार उसने ऐसी थाप नहीं दी जैसे मुर्गी के पीछे भाग रहा हो।
कोठरी में आझाओ गू मिंग का नया फीता तैयार कर रही थी। छांगछिंग मंडली छिंगशिंग मंच पर आ चुकी थी और प्रबंधक उसे एक पूरा अंश करते देखना चाहता था। उसने छुनह मंडली की पूरी नई पोशाक उधार नहीं ली। बस गाओ मान से बही में दर्ज वह पुरानी पोशाक माँगी। कब लेगा और कब लौटाएगा, साफ़ लिख दिया गया। आझाओ को सिर झुकाकर बारीकी से काम करते देख श्याओमान के मन में पहले यही आया कि किसी मर्द को दो पंक्तियाँ गाते सुनकर अपनी पूरी राह उसके पीछे मत लगा देना। बात मुँह से निकली भी नहीं थी कि उसके जाने-पहचाने लहजे ने खुद उसे चुभो दिया।
उसने बात बदलकर आझाओ से पूछा कि कल सुबह उसके पास फ़ुर्सत है क्या। लड़की ने कहा कि पहले अस्तर का एक टुकड़ा लू हन्यांग के हाथ में देना है, दोपहर से पहले शायद निकल सके। श्याओमान उससे बच्चे को गुरु के यहाँ छोड़ आने को कहने वाली थी। सुनकर बोली कि वह ख़ुद भी जा सकती है। मदद को तैयार किसी के हर ख़ाली पल को भर देने की जल्दी नहीं थी। आझाओ ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा और ज़रा मुस्कराई। फिर गु मिंग से कहने लगी कि डोरी का सिरा दोबारा तलवार के नीचे मत दबाना। एक काम कम दिए जाने पर उसने हाथ रोककर एहसान नहीं माना।
रात में उसने माँ को जवाब भेजा। जवाब में बस ‘व्यस्त हूँ’ या ‘ज़रूरत नहीं’ नहीं लिखा। उसने बताया कि आशंग ने अध्यापक शन के यहाँ दस दिन अक्षर और ताल सीखकर देख लिए हैं। लिउवान के अध्यापक भी जानना चाहते हैं कि उसे कौन-सी पंक्तियों तक पढ़ाया गया है। गर्मियों का कार्यक्रम तय होने पर आगे की बात होगी, तब तक बच्चे को इधर-उधर नहीं दौड़ाएँगे। चिट्ठी में उसने बच्चे के पैरों का नाप भी दिया। दो बार नापा था, ताकि माँ पिछली बार की याद के भरोसे फिर तंग जूते न बना दें। लिख चुकने पर उसने आशंग से काग़ज़ के कोने में अपना नाम ख़ुद लिखवाया। उसमें बाँस वाले दोनों शीर्ष उसने बराबर करके नहीं दिए।
सोने के वक़्त बच्चे ने अचानक पूछा कि अगर वह पहले ढोल बजाना न सीखे तो क्या पिता को बुरा लगेगा। श्याओमान ने रज़ाई के कोने से हाथ हटा लिया और कहा कि पिता होते तो पहले क्या कहते, यह उसे भी नहीं मालूम। मगर आज यहाँ वे दोनों हैं। हर बात के लिए किसी ऐसे आदमी की हामी नहीं ली जा सकती जो यहाँ है ही नहीं। उसकी आवाज़ उतनी नरम नहीं थी, फिर भी बच्चे ने ध्यान से सुना। फिर छोटा बाँस नीची चौकी पर पुराने ढोल के खोल के बगल में रख दिया। दोनों में से किसी को ऐसी जगह नहीं छिपाया जहाँ वह दिखे नहीं।
दीप बुझाते हुए उसने उन दोनों चीज़ों को देखा। एक भारी, एक हल्की, एक पुरानी, एक नई। मेज़ की उसी छोटी-सी सतह पर सिमटी दोनों के लिए जगह थी। श्याओमान ने दरवाज़े के पास आने-जाने की जगह ख़ाली कर दी। कल उसे सुबह जल्दी उठकर बच्चे को उसकी पहली कक्षा में ले जाना था और मंच पर माँ की भूमिका भी रोज़ की तरह गानी थी। उसने दोनों के अलग-अलग वक़्त याद रखे और उन्हें उस सुबह के लिए छोड़ दिया जिसे वह अपने हाथों से जगा सकती थी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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