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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा

कू वूजी · AI सृजन · 9171 अक्षर · लगभग 12 मिनट

नौवें महीने की तेईस तारीख़ की साँझ नानथांग की पहली कतार में एक दर्शक मुर्गे का पिंजरा लिए आ बैठा। काओ मान ने कहा कि पिंजरा दरवाज़े के पास छोड़ दें। उसने मना कर दिया। बोला, नाटक देखने के बीस वेन दिए हैं, ऐसा न हो कि जब तक मैं नाटक देखूँ, कोई मेरा मुर्गा ही ले उड़े। मुर्गे ने पिंजरे में पंख फड़फड़ाए। मंच के पीछे मुकुट पहनकर देख रहा हान रोंग चौंककर सिमट गया और मुकुट एक तरफ़ टेढ़ा हो गया। लू हन्यांग ने परदे के उस पार से हँसकर कहा, आज ल्यूशंग ने नदी भी पार नहीं की और उसे भोर की आवाज़ पहले ही सुनाई दे गई।

आख़िर मुर्गे का पिंजरा टिकट के पैसे लेने वाली मेज़ के नीचे रखा गया। गाओ मान ने उस पर नज़र रखने की हामी भरी, तभी दर्शक बैठने को राज़ी हुआ। परदे के पीछे आ झाओ ने सारी बातचीत सुनी तो उसके कंधे, जो आधे दिन से तने थे, अचानक ढीले पड़ गए। खेल शुरू होने से पहले उसने कितनी ही गड़बड़ियाँ सोची थीं: फीते का सिरा गिर जाएगा, लू हेनियांग का गला जकड़ जाएगा, हान रोंग का दायाँ पैर तख्तों की दरार में अटक जाएगा। उसने सोचा ही नहीं था कि सबसे पहले एक ऐसा मुर्गा आएगा जो बाहर रहने को तैयार नहीं होगा। लोग जब सभागार में आते हैं, तो हर कोई कहीं और की अपनी ज़िंदगी साथ लाता है।

हान रोंग के नए गले के किनारे पर आधा छुन धागा बाकी था। आझाओ ने आखिरी टाँका लगाया, सिरा काटा और बही के मुताबिक हर जगह देखी। आखिर पूछा कि कहीं और कुछ असहज तो नहीं लग रहा। उसने कहा, मन असहज है। आझाओ ने सिर उठाया तो वह हँस पड़ा। बोला, अगर पता होता कि इस घड़ी इतना डर लगेगा तो अकड़कर विद्वान युवक की भूमिका करने न आता। आझाओ श्याओमान का दिया गुनगुना पानी ले आई। उसने यह दावा नहीं किया कि वह उसकी यह जगह भी सिलकर ठीक कर देगी। पी चुकने पर उससे कहा कि जेब में पड़े फ़ालतू ताँबे के सिक्के पहले निकाल ले, कहीं आधे अंक में खनकने न लगें।

उसने नीचे हाथ डाला तो सचमुच दो सिक्के मिले। लू हे न्यांग तुरंत बोली कि उसने अभी उनकी आवाज़ सुनी थी, उसे लगा विद्वान के लिए नया संगत-संगीत जोड़ा गया है। सभागार की हँसी हल्की-सी भीतर आई। ढोल बजने से पहले लोगों को हमेशा ऐसी थोड़ी-सी बातचीत चाहिए होती थी जो नाटक का हिस्सा न हो, तभी भीतर का डर सँभल पाता था। श्याओमान बगल में खड़ी थी। उसने एक बार आँखें मूँदीं और त्साई हंग के ढोल की पहली थाप का इंतज़ार किया। अब उसने अपने पैर से लू झंग की लय निकालकर उसे जल्दी नहीं कराई।

आझाओ पोशाक बदलने की जगह तक पीछे हट गई, जहाँ से पूरा मंच नहीं दिखता था। पहले अंक में आहंग पिता की जगह नाव खे रही थी। एक मुसाफ़िर को हवा बहुत तेज़ लग रही थी और ल्यु शंग को डर था कि उसकी किताबों की थैली भीग जाएगी। हान रोंग ने पुराने निबंधों की गठरी इतने कसकर पकड़ रखी थी कि लग्गी लेने को हाथ ही नहीं बचा। लू हन्यांग ने उसकी परेशानी देखकर लग्गी जान-बूझकर कुछ दूर बढ़ाई, ताकि वह ख़ुद तय करे क्या करना है। नीचे से किसी ने पुकारा कि पहले किताबें रख दो। दूसरे ने कहा, किताबें भीग गईं तो इम्तिहान कैसे दोगे? हान रोंग ने सिर उठाकर देखा। दोनों बातें सुनीं, मगर सिर झुकाकर नाववाली से बस इतनी गुज़ारिश की कि नाव एक इंच और किनारे कर दे।

आख़िर वह हिस्सा कू मिंग की ऊँची चाल में नहीं खेला गया। नए ल्योउ शंग ने पहले किताबें बचाईं, फिर हाथ बढ़ाया। उसकी बेचारगी में थोड़ा-सा आत्मसम्मान था, जिसे मानने को वह तैयार नहीं था। आ चाओ ने हँसी सुनी और उस पल के ठहराव पर अब उसे उसके घुटनों की चिंता नहीं हुई। उसका शरीर जवान नहीं हुआ था, फिर भी नाटक महज़ किसी तरह निभाया गया काम बनकर नहीं रह गया था। लू हन्यांग की बाँह बाँस के पास से घूमी और सहज हल्केपन के साथ ठीक अपनी जगह आ गिरी। उसने यह नहीं देखा कि किसी ने उस बाँह को पहचाना या नहीं। बस देखा कि अगली पंक्ति बोलने वाला समय पर बोल पाएगा या नहीं।

पहली बार पोशाक जल्दी बदल गई। गाओ मान दूसरी ओर तैयार खड़ी थी। हाथ बढ़ाकर उसने एकहरी डोरी का लंबा सिरा ढूँढ़ लिया और खोल दिया। आझाओ के इशारे का इंतज़ार नहीं किया। आझाओ ने सिरपोश की पट्टी सँभाली, लू हन्यांग ने मुड़कर ऊपरी परत उतारी, पसीना पोंछने का कपड़ा उसे थमाया गया और उतरी पोशाक अपने खाने में रख दी गई। बस बाईं ओर की एक डोरी पसीने से गर्दन के पीछे चिपक गई थी। गाओ मान ने दो बार टटोला, पर वह हाथ नहीं आई। आझाओ ने हाथ उठाकर कपड़ा थोड़ा ढीला किया तो डोरी का सिरा अपने आप नीचे लटक आया। उन्होंने इस ज़रा-सी देरी की भनक मंच तक नहीं पहुँचने दी।

दूसरे अंक में श्याओमान आहंग की माँ बनकर मंच पर आई। उसे बेटी को समझाना था कि अब ल्यूशंग को छोड़ने मत जा। किनारे की राह ऐसी नहीं जिस पर अपने घर की नाव की तरह मनमाने ढंग से आ-जा सको। पुराने बोलों में एक पंक्ति थी कि बेटी नहीं सुनेगी तो देर-सबेर दर्द जान जाएगी। उसने उसे कई बार बदला। आख़िर दर्द वाली बात रखी, मगर पहले बेटी से पूछा, क्या इस बार चाहती हो कि मैं भी साथ चलूँ? लू हन्यांग ने कहा, नहीं। आवाज़ हल्की थी, हठ भरी ऊँची तान नहीं। श्याओमान एक कदम आगे बढ़कर फिर पीछे हट गई। उसके हाथ में मरम्मत किया हुआ चोगा उसकी हथेली पर ही रह गया।

आझाओ को श्याओमान से पहली मुलाक़ात याद आई। उसके हाथ के पास बच्चे के लिए बनाए जा रहे जूते रखे थे। तब आझाओ ने बस एक ऐसी बेटी देखी थी जो रोती नहीं थी। उसे नहीं दिखा था कि उसे भी सबसे उजली जगह पर खड़े किसी और से ईर्ष्या हो सकती है, आहंग गाने की ललक हो सकती है और अपने बच्चे से वह भी अपनी माँ जैसी बातें कह सकती है। सामने की स्त्री ने गाकर यह सब मिटा नहीं दिया था। मगर दर्शक शांत हो चुके थे और मेज़ के नीचे की मुर्गी ने भी आख़िर सिर समेट लिया था।

बीच के छोटे विराम में एक पुराने दर्शक ने आकर पूछा कि ल्यु शंग अभी तक आहंग को साथ क्यों नहीं ले गया। पिछली बार उसने जो सुना था, वह ऐसा नहीं था। गाओ शोउछंग ने दरवाज़े पर मुस्कराकर कहा कि अभी एक अंक बाक़ी है, पहले वह देख लीजिए। उसे ख़ुद पूरा भरोसा नहीं था। उसने मुड़कर परदे के भीतर देखा। आझाओ से नज़र मिली तो उसकी अपनी मुट्ठी में सुइयों की थैली कस गई। उसने गाओ शोउछंग से नहीं कहा कि नया अंत ज़रूर बेहतर होगा। आज उन्होंने बस वह अंत मंच तक पहुँचाया था जिसे वे फिर से खेलना चाहते थे। दर्शकों को वह अब भी नापसंद आ सकता था।

गू मिंग की चिट्ठी तीन दिन पहले ही किसी के हाथ आ गई थी। आझाओ ने सुबह पढ़ी थी। अब रोज़ के कपड़ों की आस्तीन में रखी थी, पोशाक बदलने की मेज़ तक नहीं लाई थी। उसने शुनछंग में एक बार बीमार कलाकार की जगह ली थी। उसके अपने मुताबिक दो पंक्तियाँ जल्दी में गा गया, फिर भी अगली बार बाक़ायदा मंच पर उतरने की तारीख़ मिल गई। ल्यांग छ्यो ने पूछा था कि क्या वह सर्दियों में लानथिंग की ओर से भेजे गए कुछ पुराने कपड़ों का काम लेगी। बात काम के हिसाब से तय करेंगे। चिट्ठी के आख़िर में उसने हँसकर उस गले का ज़िक्र किया जिसे आझाओ ने उसके लिए बदला था। अब वह इतना ढीला है कि डाँट खाते वक्त भी सिर झुकाना आसान है।

गु मिंग की चिट्ठी तीन दिन पहले ही किसी के हाथ आ गई थी। आझाओ ने सुबह पढ़ी थी। अब वह उसके रोज़ के कपड़े की आस्तीन में थी, पोशाक बदलने की चौकी पर नहीं लाई गई थी। उसने शुनछंग में एक बीमार अभिनेता की जगह ली थी। अपने मुताबिक़ दो पंक्तियाँ जल्दी में गा गया था, फिर भी उसे अगली नियमित प्रस्तुति की तारीख मिल गई थी। ल्यांग छ्यो ने पूछा था कि क्या वह सर्दियों में लांतिंग की ओर से भेजे जाने वाले कुछ पुराने कपड़ों का काम लेगी। मेहनताना काम देखकर तय होगा। आख़िर में उसने उस गले की सिलाई पर हँसी की जो आझाओ ने उसके लिए बदली थी। अब वह ढीला है, तो डाँट खाते वक़्त भी सिर झुकाना आसान है।

आख़िरी अंक में रोशनी धीमी कर दी गई। कुछ ही जगहें उजली रहीं जहाँ तख्ते और रस्सियाँ साफ़ दिख सकें। ल्योउ शंग पुराने घाट पर लौटा। न ऊँची टोपी, न साथ में बड़ा जत्था। पीठ पर अब भी किताबों का एक बस्ता था। हान रोंग ने बस्ता नीचे रखा। उस पल का ठहराव पहले से लंबा था, जैसे उसे दिख रहा हो कि आ हंग की नाव कुछ बदल चुकी है और उसके जाने वाले दिन में ही उसकी राह नहीं देखती रही। लू हेनियांग ने तख्ते के किनारे लग्गी हल्के से टिकाई। वह फ़ौरन नहीं पलटी। अपनी पंक्ति पूरी गाकर ही उसने उसे पहचाना।

दोनों ने पहले कुछ मामूली, कम दिलचस्प बातें कीं। विद्वान ने घाट का किराया पूछा। नाव चलाने वाली ने पूछा, अब भी भीगने से चिढ़ते हो? उसने कहा, अब तक अपने लेख कितनी ही बार धूप दिखा चुका हूँ। वह हँस दी। काओ शौछंग को पहले डर था कि यह हिस्सा फीका पड़ेगा, मगर दर्शकों में कोई साथ हँस पड़ा। मुर्गे का पिंजरा लाने वाले ने भी आवाज़ लगाई, भीग गया तो सुखा लो, इतना भी क्या नाज़ुक है। हान रोंग एक पल रुका, फिर उसी बात को पकड़कर बोला, सही है, अपनी घिसी झाड़ू को भी कभी न कभी हवा दिखानी पड़ती है। नीचे फिर हँसी छूट गई।

आख़िर में उसने कहा कि वह उसे किनारे पर आने को कहना चाहता है। आ हंग का हाथ लग्गी पर पल भर रुका। उसका मन साफ़ तौर पर जाने का था, फिर भी उसने नाव की ओर देखा। किसी ने दर्शकों को नहीं बताया कि ऐसा करने से ही वह हिम्मतवाली कहलाएगी। गीत में बस इतना आया कि सुबह अब भी कुछ लोगों को नदी पार करनी है, पिता की पुरानी नाव में नए तख्ते लग चुके हैं और उसका मन कुछ दिन और उसे खेने का है। ल्योउ शंग ने पूछा कि अगले साल उसकी नाव में बैठ सकता है क्या। उसने कहा कि उस दिन वह वहाँ हुई तो देखेंगे, किराया पहले की तरह लगेगा।

किताबों का थैला सचमुच नाव के पास छूट गया था। हान रोंग को किनारे पहुँचकर ध्यान आया। वह मुड़ा, तो लू हे न्यांग थैला रस्सी तक ला चुकी थी। थैले के कपड़े के आर-पार दोनों के हाथ छुए। उसने थोड़ा धीरे छोड़ा, उसने भी लेने की जल्दी नहीं की। आ झाओ ने उस क्षण भर के ठहराव को देखा, तो अचानक समझी कि अभ्यास के समय लू हे न्यांग बार-बार क्यों कहती थी कि केवल न जाने की ज़िद नहीं निभानी है: वह इस व्यक्ति को पसंद भी करती है, मगर उस पसंद ने अभी उसके बाकी सारे दिन तय नहीं कर दिए थे।

नगाड़े की ताल थमी। सभागार में कुछ लोगों ने ताली बजाई, कुछ ने पूछा कि बस ख़त्म हो गया क्या। वह पुराना ग्राहक दरवाज़े के पास से गुज़रा तो फिर काओ शोउछंग से बोला कि आख़िर में उसे किनारे चढ़ा लेते तो उसे ज़्यादा अच्छा लगता। मंडली का मुखिया पसीना पोंछकर बोला कि अगली बार फिर देखने आना। लू हन्यांग ने परदे के पीछे से सुनकर उसे नाराज़गी से घूरा। उसने झट जोड़ा कि यही नाटक फिर देखना, इसे वापस बदलने का वादा नहीं कर रहा। तब जाकर उसने हँसते हुए मुकुट उतारा। बैठी तो हाथ अब भी थोड़ा काँप रहा था।

श्याओ मान उसके लिए पानी ले आई, खुद पहले नहीं पिया। हान रोंग ने किताबों की थैली आ झाओ को सौंपी और कहा कि उसमें सिर्फ़ मुलायम कपड़ा हो तो बाँहों में उठाने पर उसमें वज़न नहीं लगता। क्या आगे से उसमें लकड़ी की एक पतली पट्टी रख सकते हैं? आ झाओ ने पहले उसे हाथ में तौला, फिर उसके कोने लपेटे और बही में दर्ज कर लिया। नाटक पूरा हो गया था, मगर पोशाकों और साज-सामान में अभी बदलाव बाकी थे। आज दरवाज़ा खोलकर टिकट बेच पाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि अब सब कुछ इसी हाल में संदूक की तह में रख दिया जाए।

बीच में एक दिन छोड़कर दूसरी रात भी तय समय पर मंचन हुआ। बीच वाले दिन उन्होंने किसी मदिरालय का काम नहीं लिया। लू हेन्यांग ने आराम किया था। उनकी आवाज़ में अब भी वसंत के दिनों वाली सबसे उजली खनक नहीं थी, फिर भी उन्होंने पूरा गाया। चालीस आसनों में पहली रात छत्तीस और दूसरी रात अड़तीस बिके। दोनों रातों के टिकटों से कुल एक हज़ार चार सौ अस्सी वन आए। छठे महीने में प्रायोगिक अंक के आठ टिकटों के अस्सी वन बहुत पहले एक-एक करके लौटा दिए गए थे। वह रकम इस बार के पूरे नाटक की कमाई में नहीं जोड़ी गई। जगह का किराया, दीपों का तेल, मज़दूरों की मज़दूरी और पोशाकों का तय मेहनताना पहले चुका दिया गया। सात सौ निकल गए। बचे हुए सात सौ अस्सी मंच पर और उसके पीछे काम करने वाले कई लोगों में बँटने थे। इतने से आगे की सर्दियों की चिंता दूर नहीं हो सकती थी।

आझाओ को हान रोंग की पोशाक में फेरबदल के पूरे एक सौ चालीस वन मिले और दो रात पोशाकें सँभालने के चालीस अलग से। ये एक सौ अस्सी पहले गिने गए सात सौ में शामिल थे, इसलिए बची रकम से दोबारा नहीं निकाले गए। उसने मरम्मत के लिए रखे धागे और कपड़े के टुकड़े गिनकर गाओ मान को सौंपे और अपनी सुइयों की पोटली अलग रखी। ये झन दूसरी रात का नाटक देखने आई थी। जाते हुए बोली कि अगर ऐसी कमाई के लिए हर साल शरद के मंचन का इंतज़ार करना पड़े, तो बाकी दिनों में रोज़मर्रा के कपड़े भी सिलने होंगे। आझाओ ने सिर हिलाया। दोनों ने तय किया कि दसवें महीने में पहले दो अस्तर वाली जैकेटें मिलकर ठीक करेंगी।

खेल ख़त्म हुआ तो श्याओमान पहले गुरु शन के घर आराम कर रहे आशंग को लेने गई। लू हन्यांग रोज़ के कपड़े पहनकर भी देर रात के खाने के लिए कुछ ख़रीदना चाहती थी। हान रोंग ने कहा कि उसके घुटने दुख रहे हैं, उसके लिए भी लेते आएँ। पूरा नाटक हो जाने भर से किसी में अचानक अथाह ताक़त नहीं आ गई थी। मेज़ समेटते हुए आझाओ के हाथ आस्तीन में सांगछ्याओ का एक वन का सिक्का लगा, वही जो गु मिंग ने आधी टिकिया के लिए दिया था। उसने उसे बाक़ी पैसों में मिला लिया और गली के मुहाने से मिठाई ख़रीदते समय दाम में जोड़ दिया। जो लोग सभागार में रह गए थे, उनके लिए भी एक पुड़िया ले आई।

लौटी तो आधी से ज़्यादा बत्तियाँ हट चुकी थीं। आझाओ अपनी नई लगाई रस्सी के नीचे बैठकर मिठाई का छोटा-सा कौर खाने लगी। कपड़े अभी नम थे, काओ मान सुबह उन्हें पलटेगी, और कल उसे उत्तर जाना था। सवारी की नाव से ल्युवान लौटने में दो दिन लगेंगे ताकि सत्ताईस को तिंग परिवार के साथ किराये की मियाद का हिसाब पूरा कर सके। उसने ये बातें कागज़ के किनारे लिखीं। मुँह की मिठास धीरे-धीरे फीकी पड़ी तो सुनाई दिया कि हान रोंग खाली सभागार में समापन गीत गुनगुना रहा है और फिर एक पंक्ति ग़लत गा गया है। उसने परदे के उस पार से सुधार दिया। दोनों हँसे और सारी बत्तियाँ फिर से नहीं जलाईं।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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