प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
लोगों को थामे रखने वाले टाँके
कू वूजी · AI सृजन · 9146 अक्षर · लगभग 12 मिनट
आहंग की नई पोशाक शुरू में एक ही परत की बनाई गई। आझाओ ने बचे टुकड़े जोड़कर एक लंबी पट्टी बनाई और लू हन्यांग से पहनकर चलने को कहा। घेरे पर मनकों की सजावट नहीं थी, पोशाक बहुत सादी दिख रही थी। लू हन्यांग ने आईना देखा और पहली बात यही कही कि हौह में खेल नहीं हो पाया तो मुझे ऐसी पड़ोसन मत बना दो जो गाँव में किसी से पीढ़ा उधार माँगने आई हो। आझाओ का चेहरा गरम हो गया। उसने जल्दी से कहा कि यह अस्तर है। बाहरी परत अभी बनी नहीं है, तुम्हें ऐसे ही बाहर भेजने की तैयारी नहीं है।
सुनकर भी लू हन्यांग ने सिर्फ़ उसके कहे मुताबिक बाँह उठाने से इनकार किया। वह पहले मंच की बगल से घूमकर आना चाहती थी, फिर नाव के तख़्ते पर चढ़ना और उस कोण तक मुड़ने के बाद ही लग्गी बदलना चाहती थी जहाँ से चाल सबसे कम सुंदर दिखती थी। आझाओ उसके साथ देखकर चलती रही। कागज़ पर निशान कपड़ा नापने से भी ज़्यादा हो गए। आख़िर उसने कागज़ एक ओर रखा और जहाँ भारी गहने लगाने थे, वहाँ एक धागा ढीला रखकर देखा। औरत जैसे ही घूमी, कोहनी ने पहले धागा उठा दिया। जिस जगह को वह अब तक बेअड़चन समझती थी, वह सामने आ गई।
इस बार आ झाओ ने फ़ौरन कैंची नहीं चलाई। उसने एक बार फिर वही चाल चलने को कहा और दूसरी तरफ़ से देखने लगी। तीसरी बार तक लू हेनियांग ऊब गई। बोली, आज तुम बस देख रही हो, बना कुछ नहीं रही, कल इसे फिर भी पहनना है। आ झाओ ने माना कि शायद आज सब पूरा न हो। पहले वह इस हिस्से को ठीक से देख लेना चाहती थी, ताकि परदे के भीतर आने पर उसे यह न कहना पड़े कि ज़रा धीरे उतारो। लू हेनियांग ने उसकी ओर देखा। पिछली बार के नीले चोगे को लेकर फिर हँसी नहीं उड़ाई, मगर बस दो बार और चलने को तैयार हुई। उसे गाने का अभ्यास भी करना था।
श्याओमान बगल से देख रही थी। उसने कहा कि भारी सजावट अभी बाहरी परत पर रखो और हर टुकड़े को पहले अलग फीते से बाँधो, सीधे पक्का मत सी देना। आझाओ ने वैसा ही किया। पाया कि फीते बहुत अंदर छिपे हों तो पोशाक उतारते वक्त उन्हें टटोलना पड़ेगा। उसने उन्हें ऐसी जगह किया जहाँ आस्तीन के मुँह से हाथ बढ़ाते ही पकड़ में आ जाएँ। आईने में एक छोटी गाँठ ज़्यादा दिखी। लू हन्यांग को वह बेढंगी लगी, मगर वह पहले वाले मुश्किल से उतरने वाले ढंग पर भी नहीं लौटना चाहती थी। तीनों ने बार-बार जगह बदली। आखिर गाँठ उस चुन्नट में बैठ गई जिसे वैसे भी समेटना था।
नए तरीक़े में कोई जादू नहीं था। सारे उपाय पुरानी चीज़ों में ही मिल सकते थे। मुश्किल यह थी कि इसी पोशाक में, इसी इंसान के इसी क़दम पर, उसे ठीक जगह रखा जाए। बस यह कह देने से काम नहीं चलता कि दुनिया की हर मंचीय पोशाक ऐसी ही होनी चाहिए। आ झाओ अपने हाथों से आज़मा चुकी थी, फिर भी लू हेनियांग के पसीना आने के बाद दोबारा आज़माना था। सूखा कपड़ा पहनकर जो हरकत सहज है, वह गीले कपड़े में भी वैसी रहे, ज़रूरी नहीं। गाओ मान तक़ाज़ा करने आई तो इस बार उसने यह वादा नहीं किया कि आज हर हाल में दे देगी। बस साफ़ बताया कि क्या आज़माना अभी बाक़ी है।
गाओ मान ख़ुश नहीं थी। उसने कहा कि छोटी प्रस्तुति की तारीख़ भी तय है। बड़ा मंच न होने का मतलब यह नहीं कि काम आराम से खींचा जा सकता है। आ झाओ बाक़ी सारी रातें भी काम में लगाने की हामी भरने ही वाली थी कि श्याओमान ने अपनी उँगली की जड़ दबाई। हाथ से सुई छूटकर कपड़े पर लुढ़क गई। आ झाओ ने देखा, उसका चेहरा पल भर को सफ़ेद पड़ गया था। उसने पूछा कि क्या फिर दर्द हो रहा है। श्याओमान ने कहा, कोई बड़ी बात नहीं, दूसरी उँगली से कर लूँगी। उसने यह इतनी सहजता से कहा कि साफ़ था, वह पहले भी कई बार उँगली बदल चुकी है।
आज़ाओ ने वह आधा काम ले लिया और कहा कि आज रात वह करेगी। शुरू में वह सचमुच चाहती थी कि श्याओमान थोड़ा आराम कर ले। मगर सारा कपड़ा बाँहों में आते ही मन में यह उत्साह भी जागा कि आख़िर एक पूरी पोशाक उसके अपने ज़िम्मे होगी। अगर यह बन गई तो सब जान जाएँगे कि उसे बस उधेड़ना नहीं आता और लू हेन्यांग को भी हर बार पलटकर श्याओमान से नहीं पूछना पड़ेगा। पिछली बार की ठोकर से यह ख़याल पूरी तरह गया नहीं था। वह और तेज़ काम करने लगी, जैसे ख़याल को पीछे छोड़ देगी तो उसे मानना नहीं पड़ेगा।
दूसरी रात उसकी अपनी उँगलियाँ भी दुखने लगीं। अँगूठे से सुई को धकेलते वक्त वह बार-बार सुन्न पड़ जाता। बाहर सब सो चुके थे। उसके सामने अब भी दो हिस्सों की सिलाई बाकी थी और अगली सुबह पहनाकर देखने वाला अस्तर अभी धुलकर सूखा भी नहीं था। अब उसे एहसास हुआ कि काम सँभालने में केवल पूरी पोशाक अपने नाम होने की बात नहीं थी। उसमें वे तमाम छोटे काम भी थे जिन्हें पहले वाली कारीगर रोज़ करती थी और जिनका कभी ज़िक्र नहीं करती थी। अगर श्याओमान की जगह बस वह खुद बैठ जाए तो पोशाक शायद बन जाएगी, मगर कारीगर पहले की तरह ही घिसकर टूटेगी।
उसने श्याओमान को जगाकर अपनी मेहनत की दाद नहीं माँगी। पहले वे चीज़ें अलग कीं जो कल ज़रूर चाहिए थीं और वे भी जो रुक सकती थीं। सुबह वह हाट में ये झन के पास गई। पूछा कि सिर्फ़ दो अस्तर और इतना उधेड़ने-धोने का काम तीन दिन के भीतर दे सकती है क्या, रात में वह जल्दी नहीं मचाएगी। ये झन ने देखकर छत्तीस वेन बताए। वह अपने समय से आएगी-जाएगी और ख़राब किनारों की बात पहले बताएगी। मंडली के सिर पर अचानक आ पड़ा सारा अतिरिक्त काम वह आ झाओ के साथ नहीं उठाएगी।
छत्तीस वन आझाओ की इस पोशाक की मज़दूरी में से जाने थे। हिसाब लगाकर उसका मन थोड़ा अटका। य जेन की मज़दूरी ज़्यादा नहीं थी। आझाओ ने पहले समझा था कि जितना ज़्यादा काम ख़ुद करेगी, उतनी पूरी रक़म उसके हाथ आएगी। अब उसे पहले किसी और को हिस्सा देना था, तभी अपनी ज़रूरत भर सो सकती थी, काम को ठीक से देख सकती थी और अपने हिस्से का काम पूरा कर सकती थी। उसने सिर हिलाया और सामान लेने का समय तय किया। एक ही मंडली के लोग होने का वास्ता देकर दाम कम करने को फिर नहीं कहा।
ये झन ने टोकरी ली, ठीक तभी श्याओमान ने देख लिया। उसने पूछा कि क्या अपने हिस्से का आधा काम वह पूरा नहीं कर पाई। आझाओ ने कहा कि ऐसी बात नहीं, एक हाथ से कोई एक साथ तीन काम नहीं कर सकता। बात सुनने में जैसे किसी को झेंप से बचाने के लिए कही गई थी। मगर कहते ही आझाओ को मालूम था कि उसमें उसकी अपनी ज़रूरत भी है। इसलिए उसने जोड़ा कि इस बार वह पहनने वाले से पूरा अंश करवाकर देखना चाहती है, सारा वक़्त फिर पानी की बाल्टी के पास खप नहीं सकती। श्याओमान ने पल भर उसे देखा, फिर कपड़ा वापस नहीं छीना। बस जाकर गीतों की पोथी खोल ली।
छठे महीने के बीच की गर्मी कमरे के भीतर आ चुकी थी। कपड़ा जल्दी सूखता था और लोगों को पसीना भी ख़ूब आता था। लू हन्यांग नई पोशाक पहनकर शुरू से आख़िर तक एक पूरा अंक करके आई। परदे के भीतर आते समय उसने आझाओ से कहा कि उसी तरह पोशाक थामो जैसे असली खेल में थामोगी। यह नहीं कि मेरे सँभलकर खड़े होने और ख़ुद डोरियाँ खोल लेने का इंतज़ार करो। आझाओ के हाथ अभी इतने तेज़ नहीं थे। एक डोरी का सिरा ग़लत जगह छिप गया था और फिर रुकना पड़ा। दोनों ने उस रुकावट को पूरे काम की नाकामी नहीं माना। ग़लत जगह की डोरी ठीक की और एक बार फिर शुरू से किया।
भारी सजावट उतरने पर भीतर का वस्त्र पहने हुए भी घूमा जा सकता था। पास देख रहे गु मिंग ने पूछा कि क्या अगली पोशाक में लिउ शंग की आधी ताल की अटकन भी घट सकती है। आ झाओ ने कहा, पहले सामने वाली पोशाक सौंप दें; तुम्हें कैसे बदलना है, पहले सब बताओ। गु मिंग ने हाथ उठाकर हामी भरी और जानबूझकर लकड़ी की तलवार उसके सामने रखी, ताकि वह देखे कि लटकन की सबसे अधिक अटकने वाली दो लड़ियाँ हटा दी गई हैं। वह उस जगह को छुए बिना न रह सकी। किसी ने उसकी बात याद रखी, इसकी छोटी-सी खुशी अब भी थी, मगर उस खुशी में उसने नया कपड़े का थान नहीं उठा लिया।
नई पोशाक की बाहरी परत अब भी चमकती थी। लू हेनियांग की चुनी मोतियों की छोटी लड़ी आगे एक तरफ़ तिरछी रखी गई। मुड़ने पर वह झूलती थी। सारी सजावट उतारकर सिर्फ़ काम की चीज़ें नहीं छोड़ी गई थीं और हर सुंदर चीज़ का बोझ भी उन्हीं दो कंधों पर नहीं था। लू हेनियांग देर तक आईने के सामने रही, फिर बोली कि यह जगह उसे पसंद है, मगर दाहिनी आस्तीन कुछ लंबी है। आ झाओ ने उसके सामने ही उसे मोड़ा और फिर बाँस का डंडा पकड़ने को कहा। हाथ नीचे लाने पर जब सचमुच कहीं नहीं अटका, तब उसने दर्ज किया कि कितना छोटा करना है।
गाओ मान ने मंडली के कपड़े की बची कतरनें जाँचीं और पूछा कि आज़ाओ ने शुरू में जो नमूने ख़रीदे थे, उनमें से कितना अब भी काम आ सकता है। आज़ाओ ने समझा था कि वह सारा ख़र्च उसके अपने अभ्यास का था। जब सुना कि उसमें से इस्तेमाल हुआ कपड़ा इस पोशाक के खाते में लिखा जाएगा तो पल भर को ठिठक गई। गाओ मान ने कहा कि जो सच में लगा है, वही लिखेंगे। जिसका इस्तेमाल नहीं हुआ, वह सारा मंडली के सिर नहीं जाएगा। अपने भीतर बस यही ग़ुस्सा मत पालो कि सब मेरा फ़ायदा उठाते हैं, और फिर कोई तुम्हारी चीज़ का दाम देने लगे तो फ़ौरन कह दो कि रहने दो। आज़ाओ का चेहरा लाल पड़ गया, फिर भी उसने कपड़े का वह छोटा टुकड़ा आगे कर दिया।
इस पूरी पोशाक का मेहनताना पहले से दो सौ वन तय हुआ था। सौ पहले मिलेंगे और बाकी सौ अगले दौर के छोटे मंचन की रकम आने पर चुकेंगे। तारीख उस लकड़ी की पट्टी के पीछे लिखी गई जिस पर कपड़ा लेने और लौटाने का हिसाब था, ताकि कुछ दिनों बाद सिर्फ़ यह याद न रह जाए कि आज किसने एक बार ‘ठीक है’ कहा था। आझाओ ने तारीख साफ़-साफ़ पूछ ली। पहली बार की तरह झेंप से बचने के लिए बस हामी नहीं भरी और न छत्तीस वन को छिपाकर मन ही मन उसे ऐसी कुर्बानी माना जिसका किसी को पता नहीं। उसने ये झन का हिस्सा अलग किया और बाकी अपने पास रख लिया। पहली बार वह साथ काम करने को इस काम की असली ज़रूरत कह सकी। उसे किसी की ख़ातिर अपनी तरफ़ से एक और रात जोड़ देने की नेकी नहीं समझा।
गाओ शोउछंग ने देखा कि पोशाक बदली जा सकती है तो एक और खेल रखने की सोची। कहा कि पोशाक तैयार है, अगर दर्शक पूरे नहीं हुए तो एक बार फिर बुला लेंगे। लू हन्यांग ने पहले सिर हिलाकर मना किया। लगातार दो रातों से उसका गला बैठने लगा था। आझाओ ने भी कहा कि कल रात तक अस्तर सूखेगा, इसका भरोसा नहीं है और अतिरिक्त अस्तर की सिलाई अभी पूरी नहीं हुई। अचानक खेल जोड़ना हो तो पुराने ढंग की पोशाक पहननी पड़ेगी। मंडली का मालिक कुछ देर झुँझलाया। पूछा कि अभी तो बनकर तैयार हुई है, अब फिर कैसे नहीं चलेगी? उसने एक सूखा और एक गीला टुकड़ा उसकी हथेली के पास रख दिया ताकि वह ख़ुद छूकर देखे। उसे चुप कराने के लिए लंबी दलील नहीं दी।
उसने दोनों को छूकर देखा। उसका मन अब भी नहीं माना, फिर भी उसने किसी से गीली पोशाक को सूखी समझकर पहनने को नहीं कहा। आख़िर तय हुआ कि अतिरिक्त मंचन अभी सूची में नहीं लिखेंगे। यह दौर सचमुच पूरा हो जाए, तब देखेंगे। आझाओ जानती थी कि टिकट फिर कम बिके तो वह दोबारा पूछेगा और वह भी हर बार केवल ‘नहीं हो सकता’ नहीं कह सकती। उसने अतिरिक्त अस्तर को अलग काम के तौर पर लिख लिया, ताकि सच में ज़रूरत पड़ने पर मेहनताना तय हो। आज ही आने वाली हर रात को उसकी सिलाई में नहीं पिरोया।
छोटा खेल शुरू होने के दिन आझाओ कपड़े बदलने के दरवाज़े के पास खड़ी रही, सबसे उजली जगह पर नहीं बैठी। सामने उतने दर्शक नहीं थे जितने बड़े खेल के लिए सोचे गए थे। बाहर कुछ देर पैसे लेने की आवाज़ आई और थम गई। उसने किसी को कहते सुना कि यह तो वही पुराना रंग है, क्या बदलने के पैसे नहीं हैं? उसका मन सिकुड़ गया। वह लगभग परदा उठाकर बताने ही वाली थी कि नया काम कहाँ किया गया है कि लू हन्यांग ठीक उसी वक़्त भीतर आई। उसने हाथ समेटा तो नई डोरी का सिरा आझाओ की हथेली में आ गिरा। उसकी साँस और ढोल की थाप दोनों इंतज़ार में थीं।
अब उसके पास समझाने की फ़ुर्सत नहीं थी। भारी सजावट उतरी, उसकी जगह सूखी अस्तर आई। लू हेनियांग फिर निकलते समय बस उसकी ओर सिर हिलाकर गई। इस बार उसका दायाँ कंधा पहले की तरह नहीं अटका। आ झाओ को आख़िर समझ आया कि इस पल जिसे इसका इस्तेमाल करना है, उसे काम की बात मालूम हो तो इतना काफ़ी है। नीचे से आई उस टिप्पणी पर बहस करने के लिए ख़ुद पीछे दौड़ना ज़रूरी नहीं। जब बाद के अंक में गु मिंग परदे के भीतर आया, नई हिदायत के मुताबिक़ एक रास्ता खाली रखा गया। आ शंग भी समझ गया था कि वहाँ बाँस का टुकड़ा लिए बैठकर रास्ता नहीं रोकना है।
खेल के बाद लू हन्यांग ने पोशाक लौटाई। उसने दो जगहें दिखाईं जिन पर कल काम करना था और कहा कि आज की इस पोशाक में वह निश्चिंत होकर अपनी चालें कर सकती है। उसने आझाओ की तारीफ़ में यह नहीं कहा कि उसमें जन्मजात हुनर है, न यह कि आगे से सारे पोशाक-संदूक उसी के हवाले होंगे। बस पूछा कि डोरियाँ कैसे टाँगें कि उलझें नहीं। आझाओ ने अपने लगाए छोटे निशान निकाले और गाओ मान के साथ उतरे हुए टुकड़े अलग किए। अगली बार दूसरे हाथों को सौंपे जाएँ तो वे भी काम सँभाल सकें, हर बार आझाओ को पास खड़ा न रहना पड़े।
ये झेन पैसे लेने आई तो आझाओ ने गिनकर छत्तीस वेन दिए। ये झेन ने गिनकर रख लिए और कहा कि अगली बार अगर इसी तरह धोना हो तो अंदर की यह सिलाई बाद में जोड़ सकती हो, इससे मुझे इसे दो बार उधेड़ना नहीं पड़ेगा। आझाओ ने यह बात याद रख ली, उसे नहीं लगा कि इस सुझाव से उसका काम कोई और ले रहा है। ये झेन के जाने के बाद उसने बचे हुए पैसे अपनी छोटी थैली में वापस रखे, उसने यह नहीं सोचा कि पोशाक पूरी बनाने का नाम उसका है, इसलिए काम तभी सफल माना जाएगा जब कमाई का वह हिस्सा भी पूरा उसी के पास रहे।
रात में पलंग के नीचे से अब आवाज़ नहीं आती थी, मगर आझाओ को उत्साह के मारे देर तक नींद नहीं आई। श्याओमान गहरी नींद में थी। उसका हाथ रज़ाई के बाहर खुला पड़ा था। आज उसने दीप बुझने की घड़ी में सुई नहीं ढूँढ़ी थी। आझाओ ने चौकी के कोने तक लुढ़की सुइयों की डिबिया उसकी ओर से वापस सूखी जगह सरकाई और ख़ुद भी लेट गई। आँगन से गु मिंग के तलवार चलाने के कदम धीरे-धीरे गिनने की आवाज़ अब भी आ रही थी। वे कदम शायद हमेशा इसी मंच पर न रहें। उसने करवट ली और उनके लिए ऐसी नई पोशाक तैयार करने फिर नहीं उठी जिसकी किसी ने माँग ही नहीं की थी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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