कमल-नाव में रात का पारावार
शरद की बारिश के बाद, यू छंग कपड़े धोने की आवाज का पीछा करते बाँस के वन में गया। वह अवैध नदी-पार कराने के एक मामले से जिले की कचहरी में अपनी जगह पक्की करना चाहता था, मगर टोकरी में छिपी घायल स्त्री ने पहले ही उसे काट लिया। कमल-पत्तों की गहराई में चलने वाली छोटी नाव किसी का मूल नहीं पूछती थी, और बूढ़ी स्त्री भी उसके कचहरी के पहचान-चिह्न पर आसानी से भरोसा करने को तैयार नहीं थी। उसे वह अर्जी याद आई जिसे घरेलू मामला कहकर लौटा दिया गया था, फिर उसने नाव के पास उस बच्चे को देखा, जिसका सिर दबाकर उसे बोलने से रोका जा रहा था।
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