प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
टाँके खोलने वाली
कू वूजी · AI सृजन · 8781 अक्षर · लगभग 12 मिनट
नानथांग आझाओ की कल्पना से पुराना था। बाहर धूसर लकड़ी के दो पल्ले थे। एक पर नाटक का इश्तहार चिपका था और दूसरे को पैरों की ठोकरों ने चमका दिया था। आँगन में कोई गा नहीं रहा था। बाँस पर सूखती आस्तीनें ही एक साथ पलटकर रस्सी के किनारे से सरसराती थीं, जैसे नंगे पाँव लोगों का कोई झुंड सिर के ऊपर से जल्दी-जल्दी गुज़र रहा हो। वह लालटेन लिए कुछ देर खड़ी रही, फिर पानी लेकर बाहर आ रही युवती से पहले सिलाई के काम की पूछी।
युवती ने उसके पाँव के पास बाँस का संदूक देखा। उसे फ़ौरन अंदर नहीं बुलाया, उलटे पूछा, किसने भेजा है? आझाओ ने कहा, नाव में सवार एक वाद्य मरम्मत करने वाले ने कहा था कि छुनह मंडली को एक आदमी की ज़रूरत है, इसलिए वह पूछने चली आई। युवती ने कहा, पहले छिन जी से मिलो। फिर यह भी कहा कि अगर सिर्फ़ रोज़मर्रा के कपड़े ठीक करने आते हैं, तो शायद यहाँ उनकी ज़रूरत न पड़े। आझाओ पूछने ही वाली थी कि छिन जी का पूरा नाम क्या है कि अंदर से कोई पुकारा, काओ मान, सारा पानी रास्ते में मत छोड़ देना। युवती ने जवाब दिया और एक तरफ़ होकर उसके लिए आधा दरवाज़ा खोल दिया।
नाटक की मंडली दो दिन की जलयात्रा पर बसे एक छोटे क़स्बे में थी। आ झाओ लालटेन और बाँस का संदूक लेकर वहाँ पहुँची और छिन श्याओमान को एक रंगमंच की पोशाक उधेड़ते पाया। वह औरत उसकी कल्पना से कम उम्र की थी। हाथ के पास एक बच्चे के लिए सिले जा रहे जूतों की जोड़ी रखी थी। माँ का नाम सुनकर वह रोई नहीं और उसने यह भी नहीं पूछा कि अब तक आने में इतनी देर क्यों लगी।

उसने बस सिर उठाया, एक नज़र दीप के लपेटे हुए काग़ज़ पर डाली, फिर आज़ाओ को देखकर पूछा, “क्या वह अब भी मेरे लिए वह रिश्ता सँजोकर बैठी हैं?”
आ झाओ इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी। उसने सोचा था पहले ह हुऐझोउ की बात करेगी, फिर बताएगी कि दीया कहाँ से आया और आख़िर में छिन दादी का संदेश देगी। अब सबसे कम मालूम बात ही पहले पूछ ली गई थी, तो उसे कहना पड़ा कि उसने पूछा नहीं। छिन श्याओमान एक बार हँसी। उसने न अच्छा कहा, न बुरा। सिर झुकाकर सुई की नोक से बगल की सिलाई का एक हिस्सा खोलने लगी। धागा जैसे कपड़े में धँस गया था। दो बार कुरेदने के बाद ही वह उसका एक छोटा सिरा उँगलियों में पकड़ सकी।
आझाओ ने लालटेन दरवाज़े के पास सूखे तख्ते पर रख दी, मगर बाँस का संदूक हाथ में ही थामे रही। वह जानती थी कि श्याओमान उससे बस बारह साल बड़ी है, पर उसे सामने देखकर समझी कि रास्ते भर उसके मन में ल्योवान की वही दबी ज़बान वाली बातें घूमती रही थीं, मानो बेटी एक बार घर से निकली तो उस साल के झगड़े की सूरत लिए ही आगे बढ़ती जाएगी। सामने खड़ी औरत के बालों की जड़ों में पसीना था, आस्तीनें चढ़ी हुई थीं, मगर उसके होंठों के कोने हर वक्त नीचे नहीं झुके रहते थे। उसके हाथ के पास मिट्टी का एक छोटा कुत्ता भी रखा था, जिसका एक कान टूटा था।
“उस्ताद ह ने तुम्हें यहाँ कैसे भेजा?” श्याओमान ने पूछा।
आ झाओ ने बताया कि पिछली सर्दी उसके पिता बीमारी से चल बसे। हिसाब समेटते वक़्त उसे इस लालटेन का पता चला, तभी वह लालटेन की दुकान पर गई। श्याओमान के हाथ में अभी-अभी निकाला धागा फिर टूट गया। वह एक साँस भर रुकी, फिर पूछा कि क्या नए साल के ठीक पहले की बात है। आ झाओ ने सिर हिलाया। श्याओमान ने सुई रख दी और कहा कि पहले वह अक्सर उनकी नाव से पार जाती थी। उसे गीत-पुस्तिका सीने से लगाए देखकर वह हमेशा पूछते कि किताब उलटी तो नहीं पकड़ रखी है। हर बार उसे घुमाकर दिखाना पड़ता था। कहकर वह जैसे आ झाओ के हँसने का इंतज़ार करने लगी। आ झाओ को बस यही लगा कि उस समय पिता जवान थे और श्याओमान को उनकी कुछ ऐसी बातें याद थीं जो वह ख़ुद नहीं जानती थी।
आँगन में अचानक किसी ने लंबी, दर्दभरी चीख खींची। आझाओ चौंककर मुड़ी, पर छिन श्याओमान ने आह भरी और बाहर वालों से ज़रा धीरे करने को कहा, दिन के दर्शक अभी पूरे बैठे भी नहीं और तुम पहले ही चिल्लाकर गला खराब कर लोगे। पता चला कि एक अभिनेता ज़मीन पर गिरने का अभ्यास कर रहा था। दूसरे हँस रहे थे कि वह ऐसे गिरा जैसे मछलियों की टोकरी उतारकर पटकी हो। उसने हार नहीं मानी और इस बार एक खाली तसला भी गिरा दिया। इतनी आवाज़ हुई कि मेज़ पर रखा मिट्टी का नन्हा कुत्ता तक काँप गया। श्याओमान ने उसे सरकाकर भीतर कर दिया, मानो इस घड़ी सबसे ज़रूरी काम यही हो।
आज़ाओ ने पूछा कि क्या वह ग़लत वक़्त पर आ गई। श्याओमान ने कहा कि कोई भी वक़्त सही नहीं होता, बैठो। अगर बात करने के लिए काम ख़त्म होने का इंतज़ार किया तो साल भर में भी दो-चार बातें नहीं हो पाएँगी। उसका इशारा बग़ल के एक छोटे स्टूल की ओर था। उस पर उधेड़कर निकाली गई डोरियाँ पड़ी थीं। आज़ाओ ने पहले उन्हें समेटकर बाँस की तश्तरी में रख दिया। श्याओमान ने उसे रोका नहीं। उसके बैठने के बाद पूछा कि दीप वापस ले जाना है या मैं ख़ुद ल्युवान ले जाऊँ।
“मैं इसे वापस ले जाऊँगी।” आ झाओ ने कहा, “मैं कपड़े बनाने का काम पूछने भी आई हूँ।”
उसे लगा था कि पहले पुरानी बात छेड़कर फिर काम पूछना किसी के एहसान का फ़ायदा उठाने जैसा लगेगा। अब कह दिया तो उतना बुरा नहीं लगा जितना सोचा था। श्याओमान ने नज़र उठाकर उसे फिर देखा और पूछा कि वह रोज़ क्या करती है। आझाओ ने कहा कि स्कर्ट, अस्तरदार कपड़े और बच्चों की पतलून ठीक करती है। माँ ने सिखाया था, और वह लोगों को नाव से पार भी लगाती है। श्याओमान ने कहा कि तब तो उसके हाथों में ताक़त होगी। फिर पूछा कि सिलाई उधेड़ सकती है क्या। आझाओ ने कहा, हाँ। श्याओमान ने सुइयों की नली उसकी ओर सरका दी और ख़ुद जूता उठा लिया। अकड़ी उँगलियों को कुछ दूसरा काम देने का अच्छा मौक़ा था।
कपड़े का धागा इतना महीन था कि सफेद पड़ गया था। आ झाओ को गाँठ दिखी; लगभग बीच से काट देती, फिर याद आया कि अभी नहीं जानती कपड़ा कहाँ तक बदलना है, इसलिए पुरानी सिलाई के साथ बाहर निकालने लगी। श्याओ मान देखती रही, सही नहीं कहा; बस एक पैबंद दिखाकर बोली, उधर मत छेड़ना, मंच की रोशनी में नीचे तक दिखेगा। आ झाओ ने हामी भरी और अपना बक्सा पैरों के पास रख दिया; अब उसे ऐसे थामे नहीं थी जैसे किसी भी क्षण चली जाएगी।
भीतरी कमरे से एक लड़का निकल आया। उसने पहले पुरानी लालटेन देखी, फिर आझाओ को। वह कोई आठ साल का था। सोने से उसके आधे बाल बिखरे थे और उसने सीने से बाँस का छोटा टुकड़ा लगा रखा था। उसके छेद तक ठीक से नहीं बने थे, फिर भी वह उसे होंठों पर आड़ा रखकर फूँकने पर तुला था। श्याओमान ने पहले मुँह पोंछने को कहा। बच्चे ने मुँह से हाँ की, मगर हाथ फलियों की टिकियों की पुड़िया तक पहुँच गया। आझाओ ने उसे पुड़िया देकर कहा कि रास्ते में एक कोना भीग गया, एक टिकिया अब भी ठीक है। ठीक वाली की बात सुनते ही बच्चे ने उसे पहले चुना, तोड़कर उसका आधा हिस्सा माँ को थमा दिया।
“आशंग।” श्याओमान ने उसे टोका, “चीज़ ले लेने के बाद पूछने की याद नहीं करते।”
तब बच्चे ने सिर उठाकर शुक्रिया कहा और पूछा कि क्या ये दीदी लालटेन बेचने वाले घर में रहती हैं। आझाओ के जवाब देने से पहले ही श्याओमान ने कहा, नहीं, ये घाट की हैं। आशंग ने ‘ओह’ कहा, मानो दोनों जगहों के बीच बड़ी दूरी हो। फिर उसने पूछा कि क्या उस घर की लालटेनें सचमुच पानी पर तैर सकती हैं। श्याओमान ने कहा कि जो उसने देखी थीं वे शांगयुआन उत्सव में पानी पर छोड़ी गई थीं, दुकान की सारी लालटेनें पानी में नहीं डाल दी जातीं। यह सुनकर आझाओ को पता चला कि बच्चा जानता है कि उसकी नानी लालटेन बेचती हैं, मगर उसने उनका काउंटर कभी नहीं देखा।
बच्चे के चले जाने पर श्याओमान ने बताया कि उसके पति मंडली के ढोलिए थे, उनका कुलनाम लू था और परसों के साल बीमारी से गुज़र गए। उसने साधारण ढंग से कहा, मगर हाथ की टिकिया फिर कागज़ पर रख दी और खाई नहीं। आझाओ को समझ नहीं आया कि क्या कहे। उसने पहले जूते के किनारे पर उलझा पुराना धागा काट दिया। श्याओमान ने देखकर जूता उसके हाथ में दे दिया और कहा, यहाँ का टाँका थोड़ा कस दो। लड़के का पाँव तेज़ी से बढ़ता है। पिछली जोड़ी साल ख़त्म होने से पहले ही पहनते-पहनते उसने तले उखाड़ दिए थे।
आज़ाओ को लगा था कि अब श्याओमान बस पोशाकों की संदूक सँभालती है। मगर श्याओमान ने कहा कि शाम को एक अंक में उसे सहायक भूमिका भी गानी है, सिलाई के लिए दिन में ही वक़्त निकालना पड़ता है। नाटक गाना वैसा नहीं जैसा ल्युवान के लोग सोचते हैं कि गाते ही कोई इनाम दे देगा। सुनने वाला न हो तो भी रियाज़ करना पड़ता है। और जैसा उसकी माँ सोचती थी, वैसा तो और भी नहीं कि नाटक की नाव के साथ निकल जाओ तो घर की सारी मुश्किलों से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाए। यहाँ पहुँचकर वह अचानक हँसी और पूछने लगी कि आज उसकी बातें सुनकर क्या वह अपनी उस ज़माने की माँ जैसी लगती है।
आ झाओ हाँ कहने की हिम्मत नहीं कर सकी, और झूठ भी नहीं बोलना चाहती थी। बस बोली कि उसने उस समय की उस स्त्री को नहीं देखा है। श्याओ मान ने उसे एक नज़र देखा; मुस्कान कुछ सच्ची हो गई। कहा कि इतना सँभलकर रहने की ज़रूरत नहीं, वह ऐसी भी नहीं कि एक अप्रिय बात पर किसी को निकाल दे। फिर भी आ झाओ ने आखिरी कुछ शब्दों की कठोरता सुनी, जैसे अपने ही कहे उस ‘नहीं निकालूँगी’ पर उसे पूरा विश्वास न हो।
बाद में श्याओमान ने पूछा कि क्या बूढ़ी छिन ने और कुछ कहा था। आझाओ ने हर साल शांगसी पर्व पर दीप उधार लेने, कुछ देर खिड़की के पास जलाने और घर लौटकर खाना खाने की सारी बातें ज्यों की त्यों पहुँचा दीं। अपनी ओर से यह नहीं जोड़ा कि बूढ़ी छिन हमेशा इंतज़ार करती रही हैं। श्याओमान ने जूता दबाते हुए पूछा कि क्या उन्होंने कहा था कि पुरानी बात नहीं छेड़ेंगी। आझाओ ने सिर हिलाया। श्याओमान ने जूता वापस मेज़ पर रखा और कहा कि बाहर रहते हुए उसने भी दो बार संदेश भिजवाया था। पहली बार जलमार्ग से जा रहे एक मुसाफ़िर के हाथ, दूसरी बार मंडली के साथ चल रहे अपने इलाके के एक आदमी के हाथ। किसी का भी फिर कोई जवाब नहीं आया।
“शायद रास्ते में बात पहुँची ही नहीं।” आझाओ ने कहा।
श्याओमान ने नज़र उठाई। आझाओ को फ़ौरन लगा कि उसने कितनी आसानी से बात कह दी थी, जैसे एक बार रास्ते को दोष दे देने से माँ और बेटी दोनों को फिर कुछ सोचने की ज़रूरत न रहे। उसने मान लिया कि उसे मालूम नहीं। उसने उस रिश्ते के बारे में भी अब तक नहीं पूछा था। श्याओमान ने उसके पीछे पड़कर ज़ोर नहीं दिया। बस कहा कि दीप को फिर खिड़की तक उठाकर मत ले जाना, यहाँ लोग नाटक का अभ्यास करते हैं और उससे टकरा जाएँगे। थोड़ी देर में उसे पोशाकों के संदूक के पास रख देना।
आशंग फिर लौट आया। इस बार मुँह धोया था, मगर सिर्फ़ आधा। वह माँ को बाँस का टुकड़ा दिखाना चाहता था और कह रहा था कि कल किसी से उसमें एक और छेद करवाएगा। श्याओमान ने कहा पहले लिखाई पूरी करो। बच्चे ने फ़ौरन बूढ़ी छिन की आड़ ली और पूछा कि दीप बेचने वाली नानी भी अक्षर पहचानती हैं क्या। श्याओमान पल भर ठिठकी, फिर बोली, तुमसे ज़्यादा पहचानती हैं। बच्चा इस जवाब से संतुष्ट लगा और बाँस को सीने से लगाए चला गया। उसे पता तक नहीं था कि अभी-अभी किसका हाथ जूते की ऊपरी सिलाई पर रुक गया था।
दोपहर बाद गाओ मान दो थान कपड़ा लाई। वे आ झाओ के लिए नहीं, अगली खेप की नई पोशाकों में साझा इस्तेमाल के लिए थे। उसने तहों की गिनती लकड़ी की छोटी पट्टी पर दर्ज की और श्याओमान से कहा कि लौटाने का कपड़ा और बेकार कतरनें फिर एक ढेर में न मिला दे। श्याओमान ने कहा कि उसे मालूम है। गाओ मान ने फिर भी एक जगह दिखाकर उसके हामी भरने तक इंतज़ार किया, तभी गई। आ झाओ ने कपड़ा छूने को हाथ बढ़ाया। नाव पर जो छूने की इच्छा अधूरी रह गई थी, वह फिर जागी। श्याओमान को अपनी ओर देखते पाया तो झट हाथ पीछे खींच लिया।
“छूना है तो छू लो।” श्याओमान ने कहा, “पर देखते ही मत कह देना कि कपड़ा अच्छा है। इनमें से एक थान इतना पुराना है कि भुरभुरा गया है। पहले खोलकर आज़माना होगा।”
आझाओ समझ गई कि यह काम का प्रस्ताव है, महज़ शिष्टाचार नहीं। श्याओमान ने धूसर-नीली पुरानी पोशाक निकाली और कहा कि कल सुबह पहले इसकी एक छोटी जगह बदलकर देखो, कुछ टाँके और डोरियाँ जाँचो, फिर आगे की बात करेंगे। आझाओ ने पूछा कि आज ही शुरू कर सकती है क्या। श्याओमान ने बाहर से तिरछी आती रोशनी देखी और कहा कि आज पहले ठिकाना ढूँढ़ो और पेट भरकर खाना खाओ। आते ही रात भर जागने लगीं तो तीन दिन में यहाँ बस ऐसे थके लोग रह जाएँगे जिनसे ठीक से बोला भी नहीं जाएगा।
यह कहने के बाद उसने ख़ुद बिना खाई आधी रोटी हटा दी और आधी उधेड़ी नाट्य-पोशाक फिर उठा ली। आ झाओ देखती रही। उसने इस कथनी-करनी के फ़र्क़ की ओर ध्यान नहीं दिलाया, बस अभी निकाला पुराना धागा काग़ज़ पर लपेट दिया, ताकि मेज़ पर बिखरा न रहे। बगल के कमरे में बच्चे ने पाठ याद करते हुए एक अक्षर ग़लत बोला। माँ ने आवाज़ देकर सुधारा, लेकिन हाथ की सुई नहीं रुकी।
आज़ाओ नानथांग से निकली तो दीप पोशाकों की संदूक के पास छोड़ गई। सराय में बस अपनी बाँस की संदूक ले गई। उसने बूढ़ी छिन जिस बात का इंतज़ार कर रही थीं, उसका जवाब आने की गारंटी नहीं दी। एक छोटी-सी फेरबदल आज़माने का मौक़ा मिलने को भी उसने मंडली में अपने पाँव जम जाना नहीं समझा। काउंटर के पीछे सराय के मालिक ने सोने का एक तख़्ता दिखाया। इस बार उसने पहले पूछा कि क्या शाम को सुई में धागा डालने के लिए थोड़ी जगह मिल सकती है। फिर संदूक धीरे से नीचे रख दी। आधी टिकिया के बदले मिला ताँबे का सिक्का अब भी उसने ख़र्च नहीं किया था।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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