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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

बाँस की संदूक में रखी राह

कू वूजी · AI सृजन · 9125 अक्षर · लगभग 12 मिनट

दीपक लपेटने के कागज़ पर “春和班” के तीन अक्षर छपे थे, चुनह मंडली का वही नाम जो आचाओ ने पिछले महीने देखा था। गली के मुहाने पर उसने कागज़ को आधा घुमाया। नीचे की पंक्ति “兰汀南堂”, यानी लानथिंग का दक्षिणी नाट्यगृह, की कुछ लकीरें लेई में उखड़ गई थीं। बस “兰” साफ़ दिखता था। कोने पर जहाँ कागज़ ने बाँस की खपच्चियों को लपेट रखा था, वह पहले ही नरम पड़ गया था। उसने और खींचने की हिम्मत नहीं की। पहले दीपक को सब्ज़ी की एक खाली टोकरी पर रखा, फिर उन तीन साबुत अक्षरों पर से सिलवटें हटाईं।

पिछले महीने तारवाद्य की मरम्मत करने वाला एक मुसाफ़िर उसकी नाव पर चढ़ा था। वाद्य बड़ा नहीं था, पर उसके खोल को नमी से बचाना था। उसने उसे गोद में थामा और नीचे रखने को तैयार नहीं हुआ। उस दिन हवा अनुकूल थी। नाव के पिछले सिरे पर आ झाओ ने उसे किसी और से बात करते सुना कि लानतिंग में नए नाटकों का एक दौर होने वाला है। छुनहे मंडली के संदूकों में रखी पुरानी पोशाकें कलाकारों को नहीं बैठतीं और पोशाकें सँभालने वाली औरत दोनों ओर दौड़ते-दौड़ते बेहाल है। वह पूछ रही है कि किस घर में कोई काटना और फेर-बदल करना जानता है। मुसाफ़िर ने आ झाओ से पूछा कि क्या वह ऐसे किसी को जानती है। उसने बस कहा कि ल्योउवान में सुई-धागे का काम जानने वाले कम नहीं हैं, फिर एक और मुर्गे का पिंजरा सँभालने चली गई जिसे किसी ने धकेलकर नाव पर चढ़ा दिया था।

पहले उसने बस यह बात मन में रखी थी कि उन्हें सिलाई करने वाले की कमी है। लानथिंग में काम नानथांग में था या पेइथांग में, इस पर भी उसने ध्यान नहीं दिया था। अब कागज़ पर छपी वह पंक्ति बहुत सधी हुई नहीं थी, फिर भी किसी और की तारीफ़ से कहीं ज़्यादा ऐसी राह लग रही थी जिस पर चला जा सके। छिन दादी की बताई छिन नाम की महिला लानथिंग में थी, साज़ की मरम्मत वाले यात्री का बताया काम भी लानथिंग में था। किसी का पता पूछने के लिए उसे घर से निकलने का अलग बहाना गढ़ने की ज़रूरत नहीं थी।

आझाओ घाट पर लौटी तो तिंग छ्वान घिसाई के पत्थर से पतवार की धुरी घिस रहा था। लालटेन देखकर उसने पहले कहा, सचमुच छिन परिवार के यहाँ थी। फिर पूछा, इतनी ऊँची लालटेन वापस लाई हो तो नाव पर कहाँ टाँगोगी? आझाओ ने कहा, अभी नहीं टाँगेगी, उसे लानथिंग ले जाना चाहती है। तिंग छ्वान का हाथ धीमा पड़ा और पानी उसकी पतलून पर पड़ते-पड़ते बचा। आझाओ को लगा था वह उसके उत्साह की तारीफ़ करेगा। उसने बस पूछा कि क्या अपनी नाव भी खेकर वहाँ ले जाना चाहती हो।

उसने कहा कि वह सवारी की नाव से जाएगी। ह घराने की नाव ल्युवान के दो किनारों के बीच ही चलती थी। रात में बाँधने, पानी बदलने और लंबी यात्रा में घाट लगाने के लिए अलग-अलग ठिकाने ढूँढ़ने पड़ते। उसे साथ ले जाने पर काम पूछने की फुर्सत ही नहीं मिलती। तब दिंग छ्वान ने सिर हिलाया। उसने कहा कि कल सांगछ्याओ से पड़ावों में चलने वाली सवारी की नाव थोंगवेई पहुँचेगी, वह पहले नाव चलाने वाली से पूछ सकती है। अगर उसे सचमुच कुछ दिन रुकना हो, तो नाव उसी पुरानी छोटी खाड़ी में छोड़ दे। वह सुबह-शाम आते-जाते पानी देख लेगा। बस फिर घर से निकलते समय रस्सी खुली न छोड़ जाए।

आ झाओ समझ गई कि आख़िरी बात उसी के लिए थी। पिता के बीमार पड़ने के बाद दो बार वह दवा पहुँचाने की जल्दी में नाव लगते ही किनारे पर कूद गई थी और रस्सी पानी में घिसटती रह गई थी। तब दिंग छ्वान ने उसके लिए रस्सी समेटी थी और कभी किसी के सामने ज़िक्र नहीं किया। उसने सिर झुकाकर पैरों के पास की गाँठ देखी। अचानक उसका मन एहसान चुकाने की कोई बात कहने का नहीं हुआ। उसने धार लगाने के पत्थर के पास से कपड़ा उठाया और चप्पू की धुरी पर बचा पानी पोंछ दिया।

यात्री नाव का पता करने जाते हुए आज़ाओ की मुलाक़ात लुओ येन की बेटी दिंग सुई से हुई। वह सत्रह बरस की थी, बाँहों में बाँस की महीन पट्टियों का गट्ठर और सिर पर इतना ऊँचा जूड़ा कि दूर से आधे आदमी जितनी और लंबी दिखती थी। आज़ाओ के लानतिंग जाने की बात सुनकर उसने फ़ौरन पूछा कि क्या वह शहर में दीपों की झालर बाँधने का नया ढंग देख सकती है। आज़ाओ ने कहा कि वह काम ढूँढ़ने जा रही है, दुकानें देखने का मौक़ा मिले, ज़रूरी नहीं। दिंग सुई ने आह भरी और कहा कि वह भी खेल-खेल में नहीं पूछ रही। माँ कहती रहती है कि पुराने ढंग का माल अच्छा बिकता है, मगर जो अच्छा बिके वह देखने में भी अच्छा हो, यह ज़रूरी तो नहीं।

लुओ यान पीछे से आई। उसने फिसलकर नीचे आ गई दो बाँस की तीलियाँ बेटी की बाँह में वापस खोंसीं और कहा, सुंदर लगता है तो ख़ुद एक बना लो। बिके नहीं तो चूल्हे पर रोशनी करने के काम आएगा। दिंग सुई ने ग़ुस्से में मुँह फेर लिया। माँ दूर गई तो आ झाओ से धीमे से फिर पूछा कि वह याद रखेगी न। सामने ज़रा भी नरम न पड़ने वाला उसका चेहरा देखकर आ झाओ का अचानक हँसने का मन हुआ। उसने बस कहा कि दिख गया तो याद रखूँगी, नहीं दिखा तो हवा से उसका नक़्शा बनाकर नहीं दे सकती।

नाव चलाने वाली झंग छिन पूरबी किनारे के यात्री घाट पर रुकी थी। उसने किसी को नाव पर चढ़ाकर इत्मीनान से बात नहीं की। वह तल से मिट्टी मिली फलियों की एक बोरी निकाल रही थी। आझाओ से कहा कि सूखी जगह खड़ी रहे, कहीं पाँव से फलियाँ बिखेर न दे। जब पता चला कि लानथिंग जाना है, तो बताया कि ग्यारह को सुबह नाव है। पहले दिन सांगछ्याओ पहुँचकर रात बितानी है। अगले दिन पूरबी धारा की छोटी नाव पकड़नी है, दोपहर बाद ही पहुँचेंगे। एक तरफ़ का किराया अड़तीस वन, संदूक का चार वन। रास्ते में तीन जगह माल चढ़ाना-उतारना है। पैसे देकर बैठ जाने भर से नाव तुम्हारे कहने पर नहीं चल देगी।

“अगर आधे रास्ते से लौटने का मन हुआ तो?” आझाओ ने पूछा।

“सामने से लौटने वाली नाव की राह देखना, उस हिस्से का टिकट अलग लेना।”

झंग छिन ने बात पूरी की और देखा कि आझाओ अब भी नाव के भीतर रखे सेम देख रही है। हँसकर पूछा, क्या तुमने भी घाट की नाव चलाई है? आझाओ ने सिर हिलाया। झंग छिन ने कहा, देखते ही लगता है। तुम बस यह नहीं पूछतीं कि कब पहुँचोगी, पहले पूछती हो कि कब लौट सकती हो। उसने सेम का बोरा फिर बाँधा और कहा कि कल सुबह बिछाने के लिए ऐसा कपड़ा लाना जिसे भीगने का डर न हो। बाँस का संदूक भी नाव के तख़्तों से सटाकर मत रखना। उसके भीतर सुइयाँ हैं, इस वजह से पानी रास्ता बदलकर नहीं जाएगा।

जब वह पश्चिमी किनारे लौटी, अभी दिन काफ़ी बचा था, मगर आचाओ को ग्यारहवीं बहुत पास लगने लगी थी। उसने घर में दो सौ चालीस वन गिने और अलग डोरी में पिरोए। दवा के लिए जो हिस्सा पहले अलग रखा था, वह पहले ही चुकाया जा चुका था। बचे पैसों का ज़्यादातर हिस्सा वापस अलमारी के तले दबा दिया। रास्ते में ठहरना, खाना और लौटना था, ख़र्च सिर्फ़ जाने की राह के मुताबिक नहीं गिना जा सकता था। उसने दो कपड़ों की जगह बदली और मोटा कपड़ा नीचे दबा दिया। बारिश पड़ने पर ठंड लगने का डर था, फिर संदूक भारी लगा, तो दो बार इधर-उधर उठाकर देखा।

मेज़ पर पड़ी कैंची की नोक में पहले जैसी धार नहीं थी। जब माँ उसे छोड़ गई थीं तभी धार का थोड़ा हिस्सा टूट चुका था। आझाओ ने उसे पत्थर पर घिसा था। अब भी उससे काटा जा सकता था, बस मोटी जगह पर कोण बदलना पड़ता था। उसने उसे उठाकर सोचा कि जब काम ढूँढ़ने जा ही रही है, तो क्या एक सही-सलामत कैंची ले लेनी चाहिए। फिर ग़ौर किया कि अभी उसके हाथ में एक भी काम नहीं है। पहले ही सुंदर औज़ार पर पैसे फूँक दिए और किसी दूसरे की कार्यशाला में जाकर यह भी न सूझा कि पहला टाँका कहाँ लगाए, तो और भद्दा लगेगा। आख़िर उसने बस एक फटा कपड़ा ढूँढ़कर कैंची की धार लपेट दी।

दसवीं की सुबह दादी छिन एक बार आई थीं। न खाना लाईं, न सफ़र का ख़र्च। हाथ में छोटी-सी डिबिया थी, जिसमें अलग-अलग लंबाई की सुइयाँ थीं। बोलीं, दुकान के लिए हर साल खरीदती हैं, कुछ उसे इस्तेमाल करने को दे देंगी। आझाओ ने लौटाना चाहा, मगर बुज़ुर्ग ने डिबिया खिड़की की चौखट पर रख दी और पहले देखने लगीं कि लालटेन लपेटने का कागज़ दबकर ख़राब तो नहीं हुआ। फिर पूछा कि पीतल की कुंडी के नीचे थोड़ा और मुलायम कपड़ा रखना चाहिए क्या। आझाओ उन्हें इधर-उधर होते देखती रही, फिर बोली कि कल जाएगी और वहाँ पहले सिलाई के काम की पूछेगी, फिर छिन श्याओमान के बारे में।

दादी छिन ने यह नहीं कहा कि पहले कोई भी बात पूछ ले। होंठ हिले, अंत में बस पूछा कि वहाँ इस दौर का प्रदर्शन ख़त्म होने के बाद भी वे रहेंगे या नहीं। आ-झाओ ने कहा कि वह भी नहीं जानती। दोनों बाँस के संदूक के सामने खड़ी थीं; दो दिन बाद की बात का कोई भी भरोसेमंद उत्तर नहीं दे सकती थी। बूढ़ी ने सुइयों की डिबिया संदूक के कोने में और भीतर सरकाई, मानो इस धक्के से वह रास्ते में लुढ़ककर बिखरेगी नहीं। फिर कहा, जो भी बात वापस लाओ, जैसी सुनी हो वैसी ही कहना।

आज़ाओ ने हामी भरी। उसे अचानक डर लगा कि उसने कहीं ऐसा काम तो हाथ में नहीं ले लिया जो उससे हो ही न पाए। बूढ़ी छिन कहकर चली गईं। दरवाज़े के बाहर से उनकी पीठ दुकान में दिखने से छोटी लगी। आज़ाओ देहरी तक उनके पीछे गई। उसका मन हुआ सुइयाँ लौटा दे, फिर लगा कि लेने के बाद लौटाना उन्हें और संकोच में डालेगा। उसने बस पूछा कि श्याओमान को खाने में क्या पसंद है। बूढ़ी छिन पलटीं और बड़ी जल्दी बोलीं, सेंकी हुई दाल की टिकिया। फिर अपनी बात सुधारी, वह पहले की बात है, अब कौन जाने।

उस एक बात से आझाओ को कुछ राहत भी मिली और मन कुछ और भारी भी हुआ। उसने गली के मुहाने से फलियों की दो टिकियाँ ख़रीदीं और पहले ख़ुद एक कोना तोड़कर चखा। बाहर से सख़्त थीं, भीतर हल्की-सी मिठास देर तक रहती थी। उधर जिसे देना था, उसे पसंद न आएँ तो वह ख़ुद खा सकती थी। वह नहीं चाहती थी कि इस छोटी-सी पुड़िया को भी किसी के लिए लेना ज़रूरी हो जाए। इसलिए उसने नाम नहीं लिखा, बस दो बार धागा लपेटा और उसे बदलने के कपड़ों के ऊपर रख दिया।

दोपहर बाद उसने एक औरत और उसके बच्चे को नदी पार कराई। बच्चे ने सुना कि वह दूर जा रही है, तो पूछा कि क्या बाहर की नदियाँ ज़्यादा चौड़ी हैं। आ झाओ ने कहा कि कुछ चौड़ी हैं, कुछ सँकरी। औरत ने पूछा कि वह कब लौटेगी, उसे एक पतलून ठीक करवानी है। वह पहले की तरह दो-तीन दिन कहने वाली थी, फिर उसे झंग छिन की बताई नाव बदलने और माल के लिए रुकने की बातें याद आईं। उसने कहा कि अभी काम नहीं लेगी, लौटकर देखेगी। औरत थोड़ी निराश हुई। बोली कि उसे तो लगा था कि आजकल ह साहिबा के पास काम कम है, इसलिए यह जल्दी हो जाएगा। आ झाओ उसके साथ मुस्करा नहीं सकी। नाव का किराया लेते हुए भी उसका हाथ पल भर देर से बढ़ा।

उन्हें विदा कर उसने कुछ देर उस पतलून के बारे में सोचा, जिससे आठ वेन मिल सकते थे। बाँस का संदूक अभी घर से निकला भी नहीं था और वह एक छोटा काम पहले ही ठुकरा चुकी थी। बाहर कोई बड़ा काम मिलेगा, यह तय नहीं था, मगर यहाँ के आठ वेन तो सचमुच हाथ से गए थे। उसे लगा था कि उसका डर पिता के न रहने से है। जब सचमुच किसी और को अपनी रवानगी का दिन बताया, तब समझ आया कि उसे थोड़ा डर यह भी है कि कहीं वह उतनी काबिल न निकले जितनी खुद को समझती है। वह अपनी बात बदलने के लिए उस औरत के पीछे नहीं गई।

साँझ को तिंग छ्वान उसकी नाव की रस्सियाँ देखने आया और ख़ास तौर पर उसे भी साथ रखा। दिखाया कि पानी चढ़ने पर कहाँ गाँठ घिसेगी और छोटी खाड़ी की किस जगह नाव ले जाने से पहले तैरती लकड़ी हटानी होगी। आझाओ कहे बिना नहीं रह सकी कि उसके पिता पहले उधर नाव नहीं लगाते थे। उसने सिर उठाकर कहा, वह जानता है कि ह हुआइझोउ कैसे करते थे और यह भी जानता है कि इन दिनों उत्तरी हवा का रुख़ अलग है। आझाओ एक पल रुकी। फिर आगे की बात, कि पहले तो हमेशा ऐसे ही होता था, पूरी नहीं की। उसके साथ मिलकर बची हुई रस्सी को एक खूँटा सरका दिया।

लुओ यान बाँस की तीलियों की एक पुरानी चटाई का टुकड़ा लाई। बरसों पहले काग़ज़ सुखाते हुए उसकी तह टूट गई थी, मगर संदूक के तल में बिछाने के लिए ठीक था। पहले उसने कहा कि इसके कुछ वेन लेगी। आ झाओ के जवाब देने से पहले ही उसने हाथ हिलाकर कहा कि टूटी चीज़ है, अब दो वेन इधर-उधर ढूँढ़ने मत लगना। आ झाओ को कल हरा प्याज़ ख़रीदने वाली बात पर आई हँसी याद आ गई और उसने चटाई ले ली। छिन दादी की छोड़ी सुइयों की डिबिया भी उसने ठीक से रख दी। इस बार किसकी दी हुई चीज़ पहले रखे, इस उलझन में सारा संदूक नहीं उलटा।

जूते समेटते समय उसने वह जोड़ी निकाली जो सिर्फ़ रिश्तेदारों से मिलने जाती तो पहनती थी। ऊपर कोई पैबंद नहीं था, मगर तले पतले थे। दो दिन पहले नाव देखने वाला आदमी ऐसे ही नुकीले, मुलायम जूते पहने था। चढ़ने के तख्ते पर उसका पैर फिसला था और आझाओ ने ही उसे थामा था। उसने नई जोड़ी फिर पलंग के नीचे खोंस दी और वही चुनी जो पारघाट की नाव चलाते वक्त पहनती थी। बची हुई रोशनी में फटी जगह पर पुराने कपड़े की एक कतरन टाँकी। फिर उँगलियों से टटोलकर देखा और ऊपर दिख रहे सफ़ेद धागे को गहरा रंग दिया।

रात में उसने घर के दरवाज़े की चाबी अपने बदन से लगी छोटी थैली की डोरी में पिरो ली और नाव के रोज़ के इस्तेमाल की छोटी अँकुसी अलग से दिंग छ्वान को दे दी। दोनों चीज़ें अलग हुईं तो उसे एहसास हुआ कि वह इतने समय से घर, नाव और पिता की अलमारियों के दरवाज़े एक ही गुच्छे में टाँगे चली आ रही थी। एक क़दम चलती और सब साथ खनकते। दिंग छ्वान ने अँकुसी ली और कहा कि ग्यारह की सुबह पहले फेरे में वह उसे पार छोड़ देगा। किराया हमेशा की तरह लेगा, वरना आना-जाना दोनों उसके लिए बेगार हो जाएँगे। आज़ाओ ने कहा ठीक है और ख़ुद पहले हँस पड़ी।

लालटेन संदूक के पास रखी थी। उसने उसे जलाया नहीं। उसके आवरण के काग़ज़ में तेल की दुकान की हल्की गंध थी। भीतर बाँस की तीली की सुधारी हुई दरार को काग़ज़ की बस एक तह के पार छूकर महसूस किया जा सकता था। आ झाओ ने संदूक का ढक्कन बंद किया और पहले उसे उठाकर देखा। जब पता चला कि एक हाथ अब भी लालटेन सँभालने के लिए खाली है, तभी दोनों को वापस दरवाज़े के पास रख दिया। कमरे में अचानक एक हिस्सा खाली हो गया। अलमारी में कुछ कम नहीं हुआ था। बात यह थी कि कल वह सचमुच ये चीज़ें लेकर दरवाज़े से निकल जाएगी।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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