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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे

कू वूजी · AI सृजन · 9097 अक्षर · लगभग 12 मिनट

आच्याओ की बनाई पहली चौकोर लालटेन अलमारी पर रखते ही दादी छिन ने उसका मुँह दूसरी तरफ़ घुमा दिया। उन्हें लगा, उस तरफ़ बाँस की गाँठ बहुत उभरती है, पीछे छिपी रहे तो अच्छा है। आच्याओ ने फिर उसे पहले जैसा घुमा दिया। कहा, ग्राहक ने गाँठ दिखने वाला रूप ही माँगा है, और बगल में रखा यह रेखाचित्र उसे पहले दिखाया जा चुका है। दादी छिन की पकड़ लालटेन के हत्थे पर बनी रही। वे कहने वाली थीं कि ग्राहक को क्या समझ, तभी बाहर से किसी ने पूछा, क्या यह वही गाँठ वाली लालटेन है जो उसने मँगवाई थी?

आए हुए ग्राहक ने दीया धूप में उठाकर देखा, कई बार कहा कि बहुत अच्छा है, फिर पूरे पैसे देकर चला गया। आ छ्याओ ने कुछ नहीं कहा, बस खाली अलमारी पोंछ दी। छिन दादी ने उस छोटी-सी मुट्ठी भर रकम में से उसकी मज़दूरी अलग की। आज उनके हाथ रोज़ से धीमे चले। सातवें महीने में लौटने के बाद उन्होंने आ छ्याओ को हर दूसरे दिन आधे दिन की मदद के लिए बुलाने की हामी भरी थी, मगर अब भी हर चीज़ पर एक बार अपना हाथ लगाना ज़रूरी समझती थीं। आ छ्याओ नहीं आती तो लगता दुकान में हाथ बँटाने वाला हो तो कितना अच्छा है। वह आती तो शक होता कि उसके हाथ उनके बताए रास्ते पर नहीं चल रहे।

दादी छिन को दूसरों को अपने ढंग से काम न करने देने का खमियाज़ा पहले भी भुगतना पड़ा था। सातवें महीने के आखिर में आ छ्याओ ने नए दाम पर एक लालटेन ठीक की थी। दादी ने उसे फिर खोल डाला। अगले दिन आधा दिन ढूँढ़ने पर ग्राहक की पुरानी कुंडी मिली। बाद में आ छ्याओ ने साफ़ कह दिया कि अगर उसे बस दरवाज़ा देखने देना है तो वह उसी की मज़दूरी लेगी, जल्दी में खड़े ग्राहकों की डाँट उनके बदले नहीं सुनेगी। अब गाँठदार लालटेन का नाम सुनते ही दादी छिन का चेहरा गरम हो गया। उन्होंने पूछा कि उस चौकोर ढंग की कितनी लालटेनें एक रात में बन सकती हैं। इस बार वे सच में उसका तरीका सुनना चाहती थीं।

आच्याओ ने कहा, इन्हें जल्दी नहीं बनाया जा सकता। चारों कोनों की तह में वक्त लगता है। अभी माँग कम है, एक साँस में दर्जनों तैयार मत कर लेना। दादी छिन को लगा था कि जवान लोग पुराने ढंग को धीमा कहेंगे। क्या पता था कि आच्याओ ख़ुद ही ज़्यादा बनाने से रोकेगी। कागज़ की शिल्पकारी के उसके दूसरे ग्राहक भी थे। वह सारा दिन लालटेन की दुकान में नहीं रह सकती थी। दादी छिन ने पूछा कि क्या वह रोज़ आने को तैयार होगी। बात निकलते ही जोड़ दिया, “आगे चलकर इस दुकान को सँभालने के लिए कोई तो चाहिए।” आच्याओ ने आँखें उठाईं और बड़ी सावधानी से उस “आगे” पर कोई जवाब नहीं दिया।

वह तेईस साल की थी और कागज़ के फूलों की अपनी छोटी दुकान लगाना चाहती थी। ब्याह करेगी या नहीं, यह भी तय नहीं किया था। अभी से छिन परिवार की अगली पीढ़ी की जगह उसके नाम तय हो जाए, यह उसे मंज़ूर नहीं था। दादी छिन ने उसकी पूरी बात सुनी। तब तक हाथ की बाँस की पट्टी कुछ ज़्यादा ही मोड़ चुकी थीं। छोड़ते ही वह उछलकर उँगलियों की पीठ पर लगी। उन्होंने आने वाले दिनों के कितने फ़ायदे पहले ही गिना दिए थे, मगर सुनने वाले को लगा होगा जैसे आज ही उसका पूरा जीवन अपने हाथ में लेना चाहती हैं। पहले उन्हें यह बात कभी सुनाई क्यों नहीं देती थी?

दोपहर बाद चाची शू तेल के पैसे लौटाने आईं। साथ में एक बहुत पतली मछली लाई थीं। हँसकर बोलीं कि बूढ़ी छिन के पास अब चेली है, ज़रा फ़ुरसत मिल सकती है। आछ्याओ उसी वक़्त काग़ज़ का पुलिंदा उठाए बाहर जा रही थी। उसने फ़ौरन कहा कि वह बस कुछ काम करने आती है, चेली नहीं है। चाची शू के मुँह से ‘अच्छा’ निकला। उन्होंने आगे कुछ नहीं पूछा। दरवाज़े का परदा गिर गया तो बोलीं कि आजकल के जवानों की नाक पर बड़ा ग़ुस्सा रहता है। बूढ़ी छिन का भी कुछ कहने को जी हुआ। आख़िर बस इतना कहा कि उसे काम पहले से आता है, वह मेरी शागिर्द कभी बनी ही नहीं। उस रिश्ते के सारे फ़ायदे उसकी तरफ़ से पहले ही स्वीकार नहीं कर सकती।

मछली इतनी पतली थी कि शल्क उतारने पर भी ज़्यादा गोश्त नहीं बचता। चाची शू ने कहा कि यह सस्ती वाली है, बस अपने खाने में थोड़ा ताज़ा स्वाद जोड़ने को, किसी पूरी मंडली की दावत के लिए नहीं। दादी छिन ने मछली रख दी। उन्हें अचानक लानथिंग की उस रात का सूप याद आया। बेटी ने उनके लिए बस एक कटोरी भरी थी, स्वागत साबित करने के लिए बारह और पकवान नहीं सजाए थे। उन्हें अब भी अखरता था कि श्याओमान ने उन्हें कुछ और रुकने को नहीं कहा, मगर यह भी याद था कि जब उन्होंने कहा था कि ठहरने में क्या मुश्किल है, तब देखा तक नहीं था कि कमरे में दोनों बिस्तर कैसे बिछेंगे।

शाम को वह ह परिवार का दरवाज़ा देखने गईं। आझाओ ने दिंग परिवार से कहा था कि कुछ-कुछ दिनों में खिड़की खोल दें। लुओ येन उसी वक्त आँगन से धूप में सुखाई रज़ाई लिए निकल रही थी। छिन दादी ने दरवाज़े के पास खड़े होकर देखा कि वह ऊँची बाँस की लालटेन लकड़ी की टेक पर रखी है। उसके आवरण पर तीसरे महीने में उनके हाथ का लगाया नया कागज़ था। अब वह किसी की रोज़ रोशन रहने वाली खिड़की की चीज़ नहीं थी। उन्होंने पूछा कि आझाओ कब लौटेगी। लुओ येन ने कहा कि चिट्ठी में लिखा है, नौवें महीने में पहले एक बार तख्ता देखेगी, मियाद पूरी होने पर किराया आगे बढ़ाने की बात होगी। सब कुछ एक ही फेरे में निपटाने की जल्दी नहीं है।

लुओ येन ने कहा कि दिंग सुई ने कुछ नए फुँदने बनाए हैं। रोज़ कहती है कि माँ के रंग मिलाने का ढंग पुराना पड़ गया है, फिर शिकायत के बाद उनकी तेज़ उँगलियों की तारीफ़ भी करती है। छिन दादी हँस पड़ीं। दुकान लौटते ही उन्होंने अलमारी से लालटेन के दो पुराने हत्थे सरका दिए, जिन्हें कोई लेने नहीं आया था, और आछ्याओ के बनाए जा रहे कागज़ के फूलों के लिए जगह छोड़ दी। फिर सोचा, कहीं कुछ ज़्यादा ही जगह तो नहीं दे रही हूँ। डर हुआ कि कल वह गोल लालटेनें भी चौकोर कर देगी। सो सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला गोल ढाँचे का साँचा अलग सँभालकर रख लिया। अपने पुराने हुनर को एक ही झटके में रास्ते की रुकावट नहीं मान लिया।

अगले दिन उन्होंने आछ्याओ से बात की। अब से वह हर दिन आधा दिन आएगी। महीने के एक सौ अस्सी वन मिलेंगे, काग़ज़ के फूलों की मज़दूरी प्रति फूल अलग होगी, और किसी ज़रूरी काम के लिए देर शाम तक रुकना पड़ा तो आमने-सामने बात करके तय करेंगे। रोज़मर्रा की लालटेन ठीक करते वक़्त ग्राहक जो बदलाव चाहें, उनमें से कौन-से किए जा सकते हैं, वह ख़ुद तय कर ले। महँगी सामग्री और नई लालटेनों की पूरी खेप के लिए पहले पूछे। सुनकर आछ्याओ ने पहले पूछा कि ग्राहक का पिछला उधार बाक़ी हो तो क्या वह कह सकती है कि आज उधार नहीं मिलेगा। छिन दादी को बरसों के कुछ परिचित याद आए और उनकी जीभ ज़रा अटकी। फिर भी उन्होंने कहा कि दो बार का उधार हो गया तो पहले पुराना पैसा लो। अपने परिचितों पर भी यही बात लागू होगी।

मज़दूरी तय हो गई तो छिन दादी ने नई दर से आधे महीने के पैसे पहले दे दिए। आ छ्याओ ने उन्हें सँभालकर रखा, पहले काग़ज़ ख़रीदा और फिर घर के लिए नमक की एक छोटी पोटली पहुँचाने गई। छिन दादी ने उसे इस तरह साफ़-साफ़ हिस्सा लगाते देखा तो समझ आया कि एक सौ अस्सी वेन किसी और की ज़िंदगी की राह भी बना रहे हैं। वह जवान है और घर पास में है, इसलिए हमेशा यह कहना ठीक नहीं कि बस ज़रा-सा हाथ बँटा रही है।

उन्होंने अलमारी की एक चाबी आ छ्याओ को सौंप दी। आ छ्याओ ने उसे डोरी से कमर में बाँध लिया। काम करते-करते वह अचानक उनकी बेटी जैसी नहीं हो गई, न उन्हें माँ कहने लगी। विदा लेते वक़्त बस बताया कि कल सुबह चौथाई पहर देर होगी, पहले किसी और घर में काग़ज़ पहुँचाने हैं। छिन दादी के मन में कुछ खाली-सा लगा। फिर सोचा कि अगर रोज़ कोई उनकी यह कमी भरने आए तो वह चाहे जितनी मेहनत कर ले, शायद इसे पूरा न भर पाए। उन्होंने बही का पन्ना दबाकर रखा और पहली बार आ छ्याओ से आधे दिन दुकान देखने को कहा। वह ख़ुद थोड़ी देर नदी किनारे बैठने चली गईं।

नदी में फलियों की टोकरियों से लदी नाव जा रही थी। युवा नाविक पानी के पार किनारे वालों से तकरार करता, कुछ बोलकर हँस पड़ता। छिन दादी ने गरम रोटी खाई; खाली हाथ पहले बड़ी बेचैनी हुई। कई बार लौटकर देखना चाहा कि लालटेन का कागज टेढ़ा तो नहीं चिपका। फिर दूर एक बढ़ई खिड़की सुधार रहा था। कुछ देर खड़ी देखती रही, कहा आड़ी पट्टी और सँकरी होनी चाहिए। उसने पूरी बात नहीं मानी, आरी चला दी। आश्चर्य, वह इस पर पूरे दिन नाराज नहीं रही।

घर पहुँचकर उसने काग़ज़ निकाला और श्याओमान को चिट्ठी लिखी। पहली दो पंक्तियाँ दुकान की नई बातों से भरी थीं। आ-छ्याओ का ज़िक्र आया तो पहले लिखा कि यह बच्ची समझदार है। फिर ठहरी और उसे काटकर लिखा कि उसका हाथ बारीक है और वह सुंदर चौकोर दीये बनाती है। कोई उसके यहाँ काम करने को तैयार है तो उसकी पहली परख इस बात से नहीं होनी चाहिए कि वह कहना मानती है या नहीं। लिखावट अनगढ़ थी और कटी हुई जगह राख की छोटी-सी ढेरी जैसी लग रही थी। उसने काग़ज़ बदलने की सोची, फिर याद आया कि आ-शंग के ग़लत लिखे अक्षर भी अब तक उसके अपने काग़ज़ पर हैं। वह उसी पर आगे लिखती गई।

उन्होंने पूछा कि सितंबर में फ़ुर्सत मिले तो क्या वह दो रात ठहरने आना चाहेगी। कौन-सा दिन ठीक रहेगा, श्याओमान तय करे, वह दुकान का काम आगे-पीछे कर सकती हैं। उन्होंने यह नहीं लिखा कि बुढ़ापे में पता नहीं ऐसे कितने मौके और मिलेंगे, यह भी नहीं कि नहीं आना तो रहने दो। ये बातें उन्हें इतनी रटी थीं कि कलम उठाने से पहले ही मन में पूरा वाक्य बन गया था। लिख चुकने पर उन्होंने जोड़ा: अगर आ शंग की कक्षा हो तो उसे लाना ज़रूरी नहीं। वह आना चाहे तो उसके लिए मेज़ रखूँगी, उसकी किताबें दुकान की दहलीज़ पर नहीं फेंकूँगी।

चिट्ठी भेजने के बाद फ़ौरन कोई जवाब नहीं आया। पहले दो दिन वह हर गुज़रती नाव वालों से पूछती रही। तीसरे दिन लुओ यान से पूछा तो उसने कहा कि उधर आने-जाने में भी दिन लगते हैं। आ झाओ की चिट्ठी भी कभी इतनी जल्दी नहीं आई। छिन दादी कुछ झेंप गईं। फिर भी दुकान लौटकर दरवाज़े के आगे पानी की ओर मुँह किए रखी चौकी आधा कदम दूर खिसका दी, ताकि बैठते ही फिर नावें गिनने न लगें। चिट्ठी चली गई तो दुकान का काम उसके साथ नहीं रुक गया। दो बार उधार ले चुका एक पुराना ग्राहक सचमुच उनसे फिर कुछ रियायत माँगने आया।

आ छ्याओ पहले ही बोल चुकी थी, तो ग्राहक छिन दादी की तरफ़ मुड़ा। बोला कि इतने सालों की जान-पहचान है, क्या एक दीया भी पहले नहीं देंगी? छिन दादी ने पुराना हिसाब हाथ में दबाया। उनका सिर लगभग हामी में हिल गया था, ताकि वे अपनी मददगार से ज़्यादा उदार दिखें। आ छ्याओ पास में चुप रही, मगर उसका चेहरा तना हुआ था। आख़िर छिन दादी ने ग्राहक से पहले पिछली दो बार का हिसाब चुकाने को कहा। उनकी आवाज़ रोज़ से कुछ सख़्त थी। इसमें रौब ही नहीं था, उन्हें परिचितों के सामने यह मानने की आदत भी नहीं थी कि यह नियम उन्होंने ख़ुद तय किया है।

ग्राहक कुछ ख़ुश होकर नहीं गया। बूढ़ी छिन का मन भारी था। उन्होंने मुड़कर आछ्याओ से पूछा कि कहीं बात ज़्यादा तीखी तो नहीं हो गई। बोलते ही समझ गईं कि वे फिर अपनी इस बेचैनी का ज़िम्मा उस पर डालना चाहती हैं। आछ्याओ ने कहा कि अगर अभी आपने उसे दीप ले जाने दिया होता, तो आगे से मैं पुराने पैसे की बात ही नहीं उठाती। बूढ़ी छिन कुछ देर चुप रहीं, फिर काग़ज़ लेकर आज वसूल हुई रकम दर्ज कर दी। अपना मान वापस पाने के लिए उन्होंने काग़ज़ चिपकाने में कोई छोटी-सी ग़लती नहीं ढूँढ़ी। शाम को ही उन्होंने माना कि उस वक़्त उन्हें कुछ बुरा लगा था, आछ्याओ ने कोई ग़लत बात नहीं कही थी।

सात दिन बाद चंग छिन की नाव श्याओमान का जवाब लाई। उसने लिखा था कि नौवें महीने की बारह तारीख़ को थोंगशू से नदी पार करेगी, चौदह को वापस निकलेगी और पंद्रह को लानतिंग पहुँच जाएगी, ताकि आगे की शरद प्रस्तुतियों के लिए समय पर लौट सके। आशंग आना चाहता है और गुरु से बात हो गई है कि छूटी हुई दो कक्षाओं की पढ़ाई अलग से पूरी करेगा। बहुत कुछ तैयार करने की ज़रूरत नहीं। दुकान में काम हुआ तो वह भी एक वक़्त का खाना बना सकती है। बूढ़ी छिन ने वे पंक्तियाँ दो बार पढ़ीं। पहले यही ख़याल आया कि दो रातें बहुत कम हैं। फिर उनकी नज़र काग़ज़ के किनारे पर गई, जहाँ बच्चे ने एक लंबी-सी बाँसुरी बना दी थी।

उन्होंने जवाब दिया कि बात समझ गईं। तीसरी रात के लिए पहले से बिछाए बिस्तर का ज़िक्र नहीं किया, और उसे फौरन लपेटकर अलमारी में भी नहीं फेंका। जब किसी के आने की आस हो तो हाथ ज़बान से थोड़ा ज़्यादा कर बैठते हैं। बस उस रज़ाई के बहाने किसी और से एक दिन और देने को नहीं कहना था। आछ्याओ ने पूछा कि बारह तारीख को क्या वह पूरे दिन आए। उन्होंने कहा, ज़रूरत नहीं, सुबह हमेशा की तरह आना, दोपहर का काम पहले बाँट देंगे। कोई ज़रूरी मरम्मत आए तो पीछे के दरवाज़े से आवाज़ देना।

बाद में श्यू चाची ने हँसकर कहा कि बेटी इतनी मुश्किल से लौट रही है और वह दुकान भी बंद नहीं करेंगी। छिन दादी बोलीं कि काम है तो करेंगी, पेट भी तो पालना है। कहते ही याद आया कि सोलह साल पहले यही बात कहकर उन्होंने श्याओमान को नाटक गाने से रोका था, जैसे उनके अपने काउंटर पर लालटेन का कागज़ चिपकाना ही काम कहलाता हो। इस बार उन्होंने श्यू चाची के पीछे जाकर सफ़ाई नहीं दी। रात में मेज़ पोंछी, लेई का वह कटोरा भीतर सरकाया जो सबसे आसानी से उलट जाता था और बच्चे के कागज़-कलम के लिए जगह छोड़ दी।

खिड़की पर इस साल नई मढ़ी गोल लालटेन लटक रही थी। थोड़ी देर जलाकर परख लेने के बाद उसे उतारा जा सकता था। छिन दादी ने बाती नीची कर दी। सड़क पर क़दमों की आवाज़ धीरे-धीरे कम होने लगी। पानी पर चप्पू की हर आवाज़ सुनकर अब वह खड़ी नहीं हुईं। कल दो चौकोर लालटेनें और बनानी थीं। चारों कोने मोड़ना आसान नहीं था। उन्होंने आ छ्याओ से वादा किया था कि पहले उनके साथ हाथ आज़मा सकती है। बेटी आएगी तो कमरे में बीते दिनों की बहुत-सी चीज़ें होंगी। कुछ ऐसी नई चीज़ें भी होनी चाहिए जिन्हें उसने अभी देखा नहीं है।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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