प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
कू वूजी · AI सृजन · 9044 अक्षर · लगभग 12 मिनट
सातवें महीने के सबसे गर्म दिनों में गाओ शोउछंग ने नाटक का अभ्यास दिन निकलते ही शुरू करवा दिया। जब आझाओ आई तो सभागार की झाड़ू भी पूरी नहीं हुई थी। गु मिंग दो छोटे तख़्तों पर खड़ा था और बिना लटकन वाली लकड़ी की तलवार से सामने तनी रस्सी को एक ओर कर रहा था। अब वह रोज़ छांगछिंग मंडली के नाटक का एक अलग अंश भी साधता था। उसकी कनपटियों पर हमेशा पसीना रहता। आझाओ को पोशाकों की पोटली उठाए देखकर उसने पहले रास्ता दिया, उसे लेने को हाथ नहीं बढ़ाया। दोनों ने दस-बारह दिनों से अकेले में कोई ख़ास बात नहीं की थी।
सभागार में एक चाय की कटोरी स्टूल पर उलटी रखी थी। छाई हंग ने ढोल पर तीन थाप दीं और श्याओमान के गाने का इंतज़ार किया। वह एक मात्रा पीछे रह गई, इसलिए गू मिंग मुड़ नहीं पाया। उसकी लकड़ी की तलवार हवा में ठिठक गई, जैसे कपड़े सुखाने की डंडी उठाए हो और उसे टिकाने की जगह अभी मिली न हो। लू हेन्यांग हँसते-हँसते मंच के घाट पर बैठ गई और बोली, “यह नाव अब भी नहीं चली तो मैं पहले ही बूढ़ी हो जाऊँगी।” श्याओमान नहीं हँसी। उसने छाई हंग से फिर पुरानी ताल-लिपि के हिसाब से बजाने को कहा।
दूसरी बार भी ताल ठीक नहीं बैठी। त्साई हंग ने ढोल की छड़ियाँ रख दीं और कहा कि दोनों चोटें एक ही साँस में इतनी पास पड़ती हैं कि उसकी कलाई घूम नहीं पाती। श्याओमान ने कहा, “पहले हमेशा ऐसे ही चलता था।” बात निकलते ही सभागार अचानक चुप हो गया। आ झाओ ने सिर झुकाकर बटन ढूँढ़ना शुरू किया, मगर आँखें श्याओमान के हाथ के पुराने स्वरलेख पर जा पड़ीं। काग़ज़ पर लू झंग के लगाए स्याही के मोटे बिंदु थे। जून में ढोल का ढाँचा खोलते समय श्याओमान का मन उसे फेंकने का नहीं हुआ था। वह उसे पुस्तिका में दबाकर ले आई थी।
त्साई हंग ने पहले काग़ज़ थोड़ा आगे सरकाया। “मुझे मालूम है, उस्ताद लू वैसे बजा लेते थे। मैं ऐसे ही बजा सकता हूँ।” उसने अपना ढंग दिखाया। आधी ताल बढ़ने से नाव ऐसी लगी जैसे किसी लहर ने उसे पल भर रोक लिया हो। श्याओमान ने भौंहें सिकोड़कर कहा कि इससे दृश्य खिंचता है। मगर लू हेनियांग तख्ते से उठी, उसी गति में बाँस का डंडा अपनी पीठ के पीछे टिकाया और एक बार आँख उठाकर गू मिंग को देखा। अब तक सीधी-सादी रही विदाई में अचानक ऐसा लगा जैसे वह उसे जाने देने को तैयार न हो।
गु मिंग ने लकड़ी की तलवार कमर में वापस रखी और हल्के से छुड़ाते हुए ठीक अगली ढोल की थाप पर रस्सी पार कर ली। लू हे न्यांग का बढ़ा हाथ ख़ाली रह गया। वह एक क़दम पीछे हटी और उसे “薄情”—बेदर्द—कहा, जो नाटक के संवाद में नहीं था। तभी सभागार के लोग हँस पड़े। गाओ शोउचेंग ने कहा, यह पंक्ति नहीं रख सकते, आगे विदाई भी है। लू हे न्यांग बोली, तो सच में छुड़ाओ मत, विद्वान अभिनय तो कर ही सकता है। गु मिंग ने उसी समय उसके सामने कुछ ज़्यादा ही झुककर अभिवादन किया। टोपी का पंख उसकी नाक की नोक से छू गया और उसे लग्गी की एक और चोट मिली।
श्याओमान भी हँस पड़ी। उसने काग़ज़ के किनारे कलम से एक छोटा घेरा बनाया और स्याही का पुराना बिंदु रहने दिया। तीसरी बार आज़माते हुए उसने गाने के लिए साँस ढोल की थाप के बाद ली। आख़िर इस बार उसने छाई हंग पर किसी ऐसे आदमी की तरह कलाई घुमाने का ज़ोर नहीं डाला जो वहाँ था ही नहीं। आज़ाओ ने लू हेन्यांग को पसीना पोंछने का कपड़ा थमाया। उसने देखा कि श्याओमान कलम की डंडी दाँतों में हल्के से दबाए अब भी उसी छोटे अंश को देख रही थी। उसका मन अभी हल्का नहीं हुआ था, मगर वह फिर आज़माने को तैयार थी।
आधे अंक के अभ्यास के बाद लू हेन्यांग ने चौकी पर पोशाक झाड़कर फैलाई। इसे छोटे मंचन में दो बार पहना जा चुका था। अस्तर अब भी एक जगह कंधे से चिपकता था और उतारे गए मनकों की एक लड़ी बिखर गई थी। उन्होंने पहले पूछा कि अगले मंचन से पहले मरम्मत हो जाएगी क्या, फिर आस्तीन से सिक्कों की एक छोटी लड़ी निकाली। “पिछली बार के बचे सौ, आज मंडली ने हिसाब कर दिया। तुम्हारे हैं।” आझाओ ने गिनकर अपनी थैली में रख लिए। यह दो सौ वन के मेहनताने का दूसरा आधा था। ये झन के छत्तीस वन पहले ही चुकाए जा चुके थे। किसी और की उधेड़ाई और धुलाई को वह अपनी अतिरिक्त कमाई नहीं गिन सकती थी।
पैसे सचमुच के थे और यहाँ रहकर पोशाकें बनाने की ख़ुशी भी सचमुच की थी। उसने पसीने के निशान वाली जगह की सिलाई उठाई और उसे अब भी थोड़ा गर्व था। लू हेन्यांग अब पोशाक उतारते ही पहले उसे ढूँढ़ती थीं, पोटली बस श्याओमान के हाथ में नहीं थमा देती थीं। मगर छठे महीने में मंडली का जो एक मंचन कम हुआ था, उसकी कमाई नई पोशाक के दम पर वापस नहीं आई। दीवार के पास दिहाड़ी मज़दूरों के दो बिछावन कम थे और गाओ मान की कपड़ों वाली अलमारी का एक खाना भी खाली हो गया था।
गाओ शोउछंग आँगन में लोगों से नौवें महीने के खेलों पर बात कर रहा था। किसी ने गु मिंग का ज़िक्र किया तो उसने खिड़की के पार से कहा, “ल्यु शंग का किरदार सँभालने वाला है, खेल नहीं रुकेगा।” गु मिंग पानी पी रहा था। सुनकर कटोरा होंठों पर रोक लिया, फिर पीता रहा। आझाओ लू हन्यांग के कंधे के भीतर से मोटा धागा खींच रही थी। उसका हाथ एकाएक कस गया और पतले धागे के दबाव से उँगली का जोड़ सफ़ेद पड़ गया। उसने समझा था कि गु मिंग शरद ऋतु के बाद जाने की बात कर रहा है और नौवें महीने का खेल अभी कर सकेगा।
दोपहर को गु मिंग उधेड़ा हुआ पोशाक का फीता लौटाने आया। उसने बताया कि छांगछिंग ने उसे छब्बीस अगस्त को मंडली के साथ लानतिंग छोड़ने को कहा है और सितंबर में उनका पहला पड़ाव शुनछंग होगा। मंडली में जाते ही उसे मुख्य भूमिका नहीं मिलने वाली थी। उसे दो भूमिकाओं के लिए तैयार रहना था और कई जगहों पर प्रस्तुतियों के लिए दौड़ना भी था। रहने की जगह, रोज़ का खाना और न्यूनतम मज़दूरी तय थे। यहाँ की तरह कमाई में हिस्सा पाने के लिए प्रस्तुति होने पर निर्भर रहने से यह ज़्यादा पक्का था। आ झाओ ने पूछा, “फिर तुम्हें किस बात की आस है?” उसने हँसकर कहा, “आस है कि जल्द कोई ऐसा अंश मिले जिसे गाने के लिए बस मुझे बुलाएँ, किसी की जगह भरने के लिए नहीं।”
वह कहना चाहती थी कि यहाँ उसके गाने के लिए ल्योउ शंग की पूरी भूमिका थी। बात होंठों तक आई और वहीं रह गई। सँकरे सभागार में पूरा नाटक और बड़े मंच पर एक अंश, किसकी क़ीमत ज़्यादा है, यह वह उसके लिए तय नहीं कर सकती थी। गु मिंग ने भी अपने आगे के मौक़ों की बात कहकर उसे तसल्ली नहीं दी। उसने कहा कि बहुत-से लोगों को छोड़ने का मन नहीं है। कहते हुए उसकी नज़र आ झाओ के हाथों पर थी। फिर फ़ौरन आँगन की लकड़ी की तलवार देखने लगा, जैसे डर हो कि मन की बात कुछ ज़्यादा कह दी तो जा ही नहीं पाएगा।
“ल्यांग छ्यो तुम्हारे बारे में पूछ रही थी।” आखिर उसने कहा। ल्यांग छ्यो छांगछिंग में पोशाकों का कमरा सँभालती थी। लू हन्यांग की वह पोशाक, जिसकी सजावट उतारकर फिर लगाई जा सकती थी, उसने छोटे मंचन में देखी थी। उसे किसी ऐसे की तलाश थी जो बताए गए नाप समझ सके और पुराने कपड़े उधेड़ने को तैयार हो। जाते ही पूरी पोशाक की ज़िम्मेदारी नहीं मिलेगी। पहले दृश्यों के बीच बदले जाने वाले अंदरूनी कपड़ों की मरम्मत करनी होगी। मज़दूरी महीने के हिसाब से मिलेगी और व्यस्त महीनों में रात का काम अलग गिना जाएगा। गू मिंग ने कहा कि दो दिन पहले उसने खुद पूछा था। आझाओ की दिलचस्पी हो तो खुद जाकर बात करे, उसे ज़ामिन बनाने की ज़रूरत नहीं।
पहला हिस्सा सुनकर आ झाओ का मन पहले चमक उठा, फिर तुरंत सतर्क हो गया:“उसने कपड़े देखे थे, या तुमसे सुना था?” गु मिंग ने माना कि पहले उसने नाम लिया था, ल्यांग छ्योउ ने कपड़े बाद में देखे। आ झाओ को अकारण खिन्नता हुई, मानो कपड़ों की अच्छाई का आधा श्रेय काट लिया गया हो। गु मिंग ने यह नहीं भाँपा और कहता रहा कि वहाँ कपड़े धोने-सुखाने का अलग आँगन है, गीले अस्तर को कल पहने जाने वाले बाहरी कपड़ों के साथ एक ही रस्सी पर नहीं ठूँसना पड़ता।
गु मिंग ने यह भी कहा कि ल्यांग छ्यो कार्यशाला में सबको मुख्य कलाकार के पीछे नहीं दौड़ने देती। कोई काम हो तो किसी को उसे पूरा करना ही होता है। यह सुनकर आझाओ को एहसास हुआ कि उसने अब तक किसी धाक वाले इंसान की कल्पना ऐसे की थी जो दूसरे के सिले कपड़े ज़मीन पर फेंक दे और दोबारा बनाने को कहे। वह ल्यांग छ्यो से मिली भी नहीं थी, मगर मन ही मन उस बड़ी कार्यशाला में कई बेरहम चेहरे पहले से बिठा चुकी थी, ताकि वहाँ न जाकर भी उसे चैन रहे। उसने पूछा कि क्या वह सिर्फ़ देखने जा सकती है, उसी वक़्त हामी भरे बिना। गु मिंग ने कहा कि उस्ताद ल्यांग व्यस्त रहती हैं और किसी ऐसे इंसान के लिए आधा साल जगह नहीं रोकेंगी जो आया ही नहीं। जल्दी जाकर ख़ुद पूछ लो। बात सुनने में मीठी नहीं थी, मगर पहली बार उस रास्ते की कोई मंज़िल और कोई तारीख हुई।
शाम तक आझाओ उस अलग कपड़े सुखाने वाली रस्सी के बारे में सोच रही थी। उसे याद आया कि छठे महीने में वह नम पोशाकों के सूखने का इंतज़ार करती रही थी और तेल बचाने की चिंता में दीप को ज़रा और देर जलता छोड़ने की हिम्मत नहीं हुई थी। उसे यह भी याद आया कि ये झन मदद के लिए आई तो दोनों की कोहनियाँ बार-बार टकराती थीं। अगर जगह काफ़ी हो, कोई हिसाब से कपड़ा दे और हर टुकड़ा काटते वक़्त यह डर न हो कि अगले दस दिनों के पैबंद के लिए कपड़ा कम पड़ जाएगा, तो पोशाक बनाना कैसा होगा? उसने कभी गंभीरता से नहीं सोचा था कि ऐसी कार्यशाला में उसके बैठने की भी कोई जगह हो सकती है।
आझाओ को ल्यांग छ्योउ के बारे में पूछते सुना तो श्याओमान ने पहले कहा कि नाम सुना है, बड़ी काबिल स्त्री है। थोड़ी देर बाद फिर कहा:“बड़ी मंडली में नियम बहुत होते हैं।” आझाओ को अचानक थोड़ा ग़ुस्सा आ गया:“यहाँ नियम कम हैं क्या?” श्याओमान ने तह किया जा रहा गला नीचे रखा और सिर उठाकर उसे देखा। दोनों को एक साथ साझा कपड़े के वे दो थान, आस्तीनें और रहने की पहली रात का वह मंद दीया याद आया जिसके बारे में बोलने की हिम्मत नहीं हुई थी। फिर किसी ने आगे गिनती नहीं की।
“मुझे डर है कि तुम अभी थोड़ा-सा सीखकर जाओगी और वहाँ कोई तुम्हें ढंग की पोशाक छूने भी नहीं देगा।” श्याओमान को कहते ही लगा कि उसने नाइंसाफ़ी की है। उसने जोड़ा, “हो सकता है वे मुझसे अच्छा सिखाएँ।” आझाओ यह मानना नहीं चाहती थी कि उसे ठीक इसी बात का डर है। यहाँ अब लोग उसे ढूँढ़ते हैं। कभी-कभी वह ख़ुद भी भूल जाती है कि वे उसे इसलिए ढूँढ़ते हैं कि वह आसानी से मिल जाती है, या इसलिए कि उसकी जगह सचमुच कोई और नहीं ले सकता।
आशंग बाहर से दौड़ता हुआ आया। उसने हाल में सीखे कुछ अक्षर दिखाए और बताया कि गुरु शन ने उसे किसी ऐसी जगह का नाम लिखने को कहा जहाँ वह अक्सर जाता है। उसने “戏堂” यानी नाट्यशाला लिखा था, पर एक लकीर छूट गई थी। कू मिंग ने देखा तो हँसकर कहा, ठीक है, वह कोना खाली रहने दो जो मेरे जाने से खाली होगा। बच्चे को मज़ाक समझ में नहीं आया और उसने ध्यान से लकीर जोड़ दी। श्याओमान ने अक्षरों वाला कागज़ उड़ते हुए स्वरपत्र के कोने पर दबाकर रख दिया और कू मिंग से नई ताल फिर आज़माने को कहा। जाने की बात साफ़ हो चुकी थी, फिर भी नाट्यशाला को उससे आज रात यह अंक पूरा गवाना था।
आज़ाओ देहरी के पास बैठकर सुन रही थी। गू मिंग ने मंच पर आने से पहले कमर के बग़ल में हाथ फेरा और पाया कि लकड़ी की तलवार थामने वाली डोरी ग़लत छेद में बाँध ली है। उसने आज़ाओ की ओर देखा। आज़ाओ उसके पास जाकर डोरी बाँधने नहीं लगी, बस दूसरा छेद दिखा दिया। उसने सिर झुकाकर फिर से बाँधी, आज़ाओ की ओर मुस्कराया और मंच पर आते ही तख़्ते के आधे हिस्से पर टेढ़ा पाँव रख बैठा। उसी झोंक में घुटनों पर आकर विदाई की मुद्रा बना ली। लू हेन्यांग ने हँसकर उसे डाँटा कि फिर एक दृश्य हथिया लिया। आज़ाओ भी हँसी, मगर उसके सीने की वह हल्की कसक गई नहीं।
काम समाप्त होने पर गाओ शोउचेंग ने पुराना चोगा देकर कहा, गू मिंग के नाप के अनुसार बदलने की तैयारी करो। उसने पूछा, पहनेगा कौन। मंडली प्रमुख बोला, हान रोंग, आठवें महीने आएगा, कुछ अधिक उम्र का है, वर्षों से युवा विद्वान नहीं बना। आ झाओ ने कपड़ा मेज़ पर रखकर कहा, उसके आने पर आस्तीन तय करें। उसे यह धीमापन अखरा, लेकिन अंत में सिर ही हिलाया; गू मिंग की नाप का कागज़ नहीं दिया।
कमरे में लौटकर उसने अपनी बही खोली। शुरू के बहुत-से शब्द अब भी माँ के पुराने काग़ज़ों की तरह लिखे थे, कमर, कंधे और आस्तीन के पास छोटे-छोटे अक्षर ठुँसे हुए थे। पर आगे उसने पसीना आने के बाद की हालत, ढोल की ताल पकड़ने, पीछे कदम लेने और कपड़े उतारने का क्रम भी दर्ज किया था। इनमें से बहुत-सी बातों से उसकी माँ का भी कभी वास्ता नहीं पड़ा था। उसने पैमाने से एक नया काग़ज़ सीधा किया, ल्यांग छ्यो का नाम लिखा, फिर छिंगशिंग रंगमंच का पिछला अहाता। अक्षर ऐसे सधे हुए थे, मानो उसने उस काम की जगह पहले ही नाप ली हो जिसे अभी स्वीकार भी नहीं किया था।
श्याओमान पलंग के दूसरे सिरे पर पुराने स्वरलेख की सिलाई खोल रही थी ताकि बिखरे पन्ने फिर सी सके। आ झाओ ने हाथ बढ़ाकर उसके लिए उन्हें थाम लिया। दोनों में से किसी ने नहीं कहा कि कौन जा रहा है और कौन रुकेगा। खिड़की से गरम हवा आई तो सारे पन्ने एक साथ सिर उठाने लगे। श्याओमान ने अचानक कहा कि पुरानी विदाई बहुत जल्दी हो जाती थी। आ हंग को झुँझलाने की मोहलत भी नहीं मिलती थी कि ल्योउ शंग किनारे पहुँच जाता था। आ झाओ ने कहा, “आज खाली हाथ वाला वह पल साफ़ दिखा।” श्याओमान ने सुनकर नई ताल के पास एक और छोटा घेरा बना दिया।
उन्होंने फिर भी पुरानी स्वर-पुस्तिका को सिलकर एक जिल्द में बाँध दिया। स्याही की मोटी बिंदियाँ और नए गोले, दोनों उसमें रहे। आ चाओ को अगले दिन कारख़ाना देखने जाना था। आज रात उसने पहले श्याओ मान के लिए सुई में धागा डाला। सुई का छेद बहुत छोटा था और बत्ती की लौ एक ओर झुकी थी। उसने एक बार दीपक खिसकाया और धागा पार हो गया। इस छोटी-सी बात को उसने रुक जाने की वजह नहीं बनाया।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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