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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

दीयों की दुकान की वह खिड़की

कू वूजी · AI सृजन · 8990 अक्षर · लगभग 12 मिनट

छिन परिवार की दीपों की दुकान का दरवाज़ा आज़ाओ की याद से भी सँकरा था। पहले वह हमेशा पिता के पीछे आती थी और उनके कंधों के ऊपर झूलते दीप देखती थी। इस बार ख़ुद बही लेकर आई तो देखा कि दरवाज़े के दाहिने तीन छाजन के ढाँचे रखे थे जिन पर अभी काग़ज़ नहीं चिपका था, और बाईं ओर ऊँचा स्टूल था। करवट लिए बग़ैर निकलती तो घाघरे का किनारा बाँस की पट्टी में अटक जाता।

काउंटर के पीछे से किसी ने जवाब नहीं दिया। भीतर से हल्की खुरचने की आवाज़ आ रही थी। छिन दादी छोटे चाकू से एक बाँस की तीली का सिरा तराश रही थीं। गोद में पुराना एप्रन पड़ा था और उँगलियों के बीच सूखी लेई लगी थी। आ झाओ की आवाज़ सुनकर उन्होंने पहले चाकू ठीक से रखा, फिर काउंटर का सहारा लेकर बाहर आईं। आ झाओ दरवाज़े के पास की चीज़ें उनके लिए हटाना चाहती थी। छिन दादी ने कहा कि मत छुओ, ढाँचे नाप के क्रम में रखे हैं। बिखर गए तो दोपहर को फिर ढूँढ़ने पड़ेंगे।

आझाओ ने बहीखाता उनकी ओर सरकाया। उसने उधार वसूलने की बात नहीं की, बस कहा कि पिताजी ने आख़िरी पन्ने पर एक लालटेन दर्ज की है, पर वह कहाँ गई, यह नहीं लिखा। दादी छिन ने बही फ़ौरन नहीं ली। पहले हाथ बढ़ाकर जिल्द छुई और पूछा, क्या यह वही है जिसे जाड़े में बीमार पड़ने पर भी वे तकिए के पास रखते थे? आझाओ ने सिर हिलाया। वे अब भी सिर झुकाए थीं, इसलिए उसने लिखा हुआ पन्ना खोल दिया ताकि उन्हें शुरू से ढूँढ़ना न पड़े।

बूढ़ी छिन ने पढ़कर कहा, “मुझे उधार दिया था।”

उन्होंने इतना धीरे कहा, जैसे वाक्य का पहले से अभ्यास किया हो, पर जब सच में कोई पूछने आया तो उसे कहने भर की ताक़त जुटाना मुश्किल पड़ गया हो। आज़ाओ की नज़र अपने आप दुकान में चारों ओर गई। कड़ियों पर दस से ज़्यादा छोटे-बड़े दीप लटके थे। कुछ के सादे छाजन पर काग़ज़ अभी-अभी चिपका था, कुछ पर हल्के रंग के फूल बने थे। दरवाज़े के पास काटे जाने वाले काग़ज़ों की एक गड्डी भी रखी थी। जो ख़ुद दीप बनाती हैं, वह हर साल घाट से दीप उधार क्यों लेंगी। उसने सवाल मुँह से नहीं निकाला, मगर आँखों में उठी बात छिपा नहीं पाई।

दादी छिन ने अलमारी के नीचे से बाँस की एक पुरानी लालटेन निकाली। उसके हत्थे की बाँस की पट्टी नए ढाँचे से कहीं गहरे रंग की थी। पीतल की कुंडी घिसकर ख़ूब चमकाई गई थी। आवरण के किनारे की एक दरार बारीक बाँस से जोड़ी गई थी। उजाले के पास देखने पर जोड़ किसी और सघन गाँठ जैसा लगता था। आझाओ ने पहचाना कि पिता पहले ऐसे ही ऊँचे आवरण वाली लालटेन इस्तेमाल करते थे। बाद में नाव पर कुछ हल्की लालटेन टाँगने लगे तो पुरानी कम ही दिखी। उसने लेने को हाथ बढ़ाया, मगर दादी छिन ने हत्था थामे रखा। पहले कहा, पिछले साल आवरण ठीक करके लौटाने का सोचा था। तुम्हारे पिता ने कहा, इस्तेमाल को दूसरी हैं, आराम से करना। फिर बात टलती चली गई।

“मैं इसे नाव पर ले जाऊँगी।” आ चाओ ने कहा। फिर उसे लगा जैसे वह बुज़ुर्ग से हैंडल छोड़ने की जल्दी करवा रही हो, तो फ़ौरन जोड़ा, “इस्तेमाल की कोई जल्दी नहीं है।”

तब दादी छिन ने लालटेन अलमारी के ऊपर रख दी, उसके हाथ में नहीं। बोलीं, इसका आवरण ऊँचा है। नदी की तरफ़ की खिड़की में रखो तो दूसरे किनारे से दिखती है। दुकान की अपनी लालटेनें भी उजाला देती हैं, मगर उस समय इसकी आदत पड़ गई थी। जैसे-जैसे वसंत आता, उन्हें यही वाली ज़्यादा ठीक लगती। उन्होंने गोद का कपड़ा पलटा और हाथों से सूखी लेई के कण झाड़े। बारीक धूल आस्तीन पर जा गिरी। उसे उन्होंने फिर नहीं झाड़ा।

आझाओ जानती थी कि छिन परिवार की कभी एक बेटी थी। उसका नाम ऋतु-पर्व जैसा था, श्याओमान। बचपन में कुछ ही बार उसका ज़िक्र सुना था। कुछ कहते थे कि श्याओमान नाटक सीखने घर से निकली, कुछ कहते थे किसी के साथ भाग गई। बातें अलग थीं, मगर आखिर में हर किसी की आवाज़ दब जाती, जैसे बच्चों को आगे सवाल करने की मनाही हो। वह अब बाईस साल की थी। ये बातें सुनते ही खाने की मेज़ पर छा जाने वाली उस अचानक चुप्पी को अब भी याद कर सकती थी, मगर उसे याद नहीं था कि उस लड़की को सचमुच किसने देखा था।

“जिस साल वह गई, तुम बस इतनी ऊँची थीं।” दादी छिन ने अलमारी के कोने तक हाथ उठाकर दिखाया, फिर नीचे कर लिया। “मुझे तो हमेशा यही याद रहा कि वह तुमसे कुछ ही बड़ी थी।”

असल में दोनों की उम्र में बारह साल का फ़र्क था। आझाओ ने मन ही मन हिसाब लगाया, मगर उन्हें टोका नहीं। दादी छिन ने कहा कि सोलह साल पहले श्याओमान एक नाव पर घूमने वाली नाट्य मंडली के साथ जाना चाहती थी। उन्होंने बेटी के लिए एक घराना तय कर रखा था। लड़का छोटा-मोटा कारोबार करता था, खेतों में भी उसका हिस्सा था और कम-से-कम ज़िंदगी नाव पर भटकते नहीं कटती। पति को गुज़रे थोड़ा ही वक्त हुआ था, दुकान पर कागज़ का उधार था, और बेटी ने मुँह खोला भी तो बस कहने को कि उसे गाना है। माँ को ऐसी खीझ हुई, मानो बेटी ने उनकी बची हुई ज़िंदगी को भी हेय समझकर ठुकरा दिया हो।

“मैंने कहा था, अगर यहाँ से गई तो फिर इसे अपना घर मत कहना।” छिन दादी की उँगलियाँ लालटेन की कुंडी पर दबी थीं, “तब सोचा था कि ऐसा कहूँगी तो वह डर ही जाएगी।”

आज़ाओ ने श्याओमान की ओर से जवाब नहीं दिया। उसे यह भी नहीं मालूम था कि श्याओमान की जगह उसे डरना चाहिए या नहीं। तभी दरवाज़े के बाहर काँवर उठाए एक औरत गुज़री। दोनों को काउंटर के पास खड़ा देखकर उसने आवाज़ दी कि नया छाजन कब ले जाए। बूढ़ी छिन ने फ़ौरन लहजा बदला और कहा कि दोपहर बाद, काग़ज़ अभी सूखा नहीं है। औरत को यक़ीन नहीं हुआ। उसने आधा बदन भीतर डालकर देखा और छाजन को सच में सूखते पाया, तब गई। उसके जाते ही दुकान में पुरानी बात के लिए जगह फिर तंग लगने लगी। आज़ाओ का मन हुआ कोई स्टूल ढूँढ़कर बैठ जाए, मगर डर था कि बैठने से लगेगा जैसे वह पूरी कहानी सुनने को तैयार है।

बूढ़ी छिन ने दरवाज़े के पास का ऊँचा स्टूल खींचकर उसे दे दिया और ख़ुद खड़ी रहीं। उन्होंने कहा कि श्याओमान के जाने के बाद घर में छूटा उसका कपड़ा उधेड़कर उन्होंने पिछले कमरे का परदा बना दिया था। काटते-काटते आख़िर में पता चला कि आस्तीनें छोटी थीं, उनसे पूरा परदा नहीं जुड़ पाया। आज़ाओ ने उनकी नज़र का पीछा किया। भीतर के दरवाज़े पर नीले कपड़े के एक कोने के नीचे दो और रंगों की पट्टियाँ जुड़ी थीं। कपड़ा इतना पुराना हो गया था कि पहचानना मुश्किल था कि वह कभी कोई पोशाक भी रहा होगा। उसने नहीं पूछा कि उस वक़्त उसे उधेड़ने में दर्द हुआ था या नहीं। बूढ़ी छिन ने भी आगे कुछ नहीं कहा।

ठीक तभी पड़ोस की श्यू चाची आईं। उनके हाथ में आधी खाली तेल की सुराही थी और उन्हें तीन दिन के उधार पर दीये का तेल चाहिए था। आ झाओ को देखकर पहले पूछा कि नाव बिकी या नहीं। आ झाओ ने सिर हिलाया। श्यू चाची बोलीं कि उन्हें तो अब भी उसी से पार जाना है। नाव बिक गई तो डर है कि नया नाव वाला उनकी मछली की टोकरी साथ न ले जाए। छिन दादी ने सुराही लेकर तेल तौलना शुरू किया और कहा कि पिछली बार का थोड़ा-सा हिसाब भी अभी बाकी है, हर बार तीन दिन को आधा महीना मत बनाया करो। श्यू चाची ने कहा कि मछलियाँ भी किसी के कह देने पर तीन दिन में बड़ी हो जातीं तो वह ज़रूर जल्दी चुका देतीं।

आझाओ ज़रा हँसी और बूढ़ी छिन के लिए सुराही का मुँह थाम लिया। तेल पतली धार में बहने लगा। श्यू चाची ने अपनी लाज रखते हुए पहले पिछली बार की आधी रकम काउंटर पर रखी, फिर पुराने दीप पर नज़र डाली और कहा कि आझाओ तो इस बार इसे कितनी आसानी से उठा रही है। उसके पिता हर बार डरते थे कि दीप पर धूल न लग जाए और उसे बगल में दबाए बड़े बेढंगे ढंग से चलते थे। इतना कहकर वे सुराही उठाकर बाहर गईं और पलटकर बूढ़ी छिन से कहा कि कल देर रात तक मत जागना, दीवार के उस पार मछली काटते हुए भी सुनाई दिया कि तुम्हें फिर खाँसी उठी है।

दुकान का दरवाज़ा शांत हुआ, तभी आ झाओ को पता चला कि पिता सिर्फ हिसाब लिखने वाले उस एक अवसर पर ही यह दीपक लेने लौटाने नहीं आए थे। छिन पोपो ने केतली के किनारे का बचा तेल पोंछा और कहा, हर वर्ष शांगसी पर्व के आसपास नदी पर लोगों की आवाजाही बढ़ती है। श्याओ मान अब भी नावों के साथ चलती हो तो शायद किसी दिन इधर आए। उसने हे हुआईझोउ से व्यापार रोककर ढूँढ़ने को नहीं कहा था, बस ध्यान रखने को कहा था; सच में मिल जाए तो कहना, घर आकर खाना खा लो, पुरानी बात मत उठाना।

“पुरानी बातों का ज़िक्र न करो, तो क्या वह लौट आएगी?” आ झाओ ने पूछा।

बात मुँह से निकलते ही दोनों ठिठक गईं। आझाओ ने इतने सीधे ढंग से पूछने का इरादा नहीं किया था। बस याद आया कि बीमारी के दिनों में उसके पिता भी कहते रहते थे कि ठीक हो जाऊँ तब बात करेंगे, जैसे बात न करने भर से आगे इस्तेमाल करने को बेशुमार दिन रह जाएँगे। बूढ़ी छिन सिर झुकाकर लपेट का कपड़ा मसलने लगीं और देर बाद कहा कि उन्हें नहीं मालूम। उन्होंने न बेटी को कठोर कहा, न यह गिनाया कि उनके लिए ये बरस कितने मुश्किल थे। बस ताँबे की बकसुआ एक बार फिर छुई और आझाओ से पूछा कि क्या वह शहर जाने की सोच रही है।

“नाव बिकते ही चली जाऊँगी।” आ झाओ ने कहा। परसों ही उसने नाव का एक दाम ठुकराया था, फिर भी अभी यह बात ऐसे कही जैसे जाने की तारीख़ तय हो चुकी हो।

छिन दादी ने कहा कि सुन चुकी हैं। श्यू चाची ने गली के मुहाने पर कई बार उसकी तारीफ़ की थी कि ह परिवार की लड़की कितनी बारीक सिलाई करती है। आझाओ को जाने क्यों झेंप लगी। उसने जल्दी से कहा कि वह बस कपड़ों में फेरबदल करती है। छिन दादी ने फिर भी उसकी आस्तीन का वह किनारा उठाकर देखा जिसकी फटी सिलाई उसने पिछली रात ठीक की थी। पूछा, खुद रफ़ू किया है? आझाओ ने सिर हिलाया। बूढ़ी ने कहा, अंदर धागा अच्छी तरह छिपाया है। मेरे टाँके तो ऐसे मोटे हैं कि लेई लग जाए तो लालटेन की छाया भी उन्हें नहीं ढक पाती।

आझाओ की नज़र उनकी उँगली पर पड़े एक सख़्त घट्ठे पर गई। उसने अचानक पूछा कि क्या श्याओमान अब भी दक्षिण में है। छिन दादी ने कहा कि पिछले महीने लालटेन ख़रीदने एक ग्राहक आया था। उसने बताया कि लानथिंग में किसी छिन नाम की स्त्री को सुना है, वह गाती भी है और पोशाकों के संदूक भी सँभालती है। सिर्फ़ एक ही कुलनाम सुनकर उसे अपनी बेटी मान लेने की हिम्मत नहीं हुई, मगर उससे उसकी उम्र पूछने से ख़ुद को रोक नहीं पाईं। ग्राहक ने कहा, तीस के आसपास लगती है। इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं पूछा। डर था कि वही होगी, डर था कि कहीं वह न हो। इतना पूछने में ही एक बार दुकान के काग़ज़ का दाम ग़लत याद आ गया।

आझाओ ने कहा कि लानथिंग पानी के रास्ते दो दिन है, कोई बहुत दूर नहीं। छिन दादी ने झट कहा, हाँ, बहुत दूर नहीं। मगर कहने के बाद दोनों उसी लालटेन को देखती रहीं। दरवाज़े की ओर कोई नहीं बढ़ा। तब आझाओ समझी कि उसके लिए ‘बहुत दूर नहीं’ का मतलब था किराया देकर दो दिन में वहाँ पहुँचा जा सकता है। बूढ़ी के मुँह से वही बात ऐसी लग रही थी, जैसे पहले सोलह साल पहले कही बातों के लिए कोई ऐसी शुरुआत ढूँढ़नी पड़े जो चुभे नहीं।

उसने जाकर खोजने का वादा नहीं किया। दादी छिन ने भी आग्रह नहीं किया, बस पूछा कि लानथिंग पहुँचने पर, अगर सचमुच रास्ते में पड़े, तो क्या वह छिन श्याओमान के बारे में पूछ सकती है। आ झाओ ने कहा कि पूछ सकती है, लेकिन मिलना होगा या नहीं, यह सामने वाली की इच्छा पर निर्भर करेगा। वृद्धा ने सिर हिलाया, फिर मानो ख़ुद को रोक न सकी और पूछा कि अगर वह दीपक साथ ले जाए, तो क्या वह पहचान लेगी।

“मैं लालटेन लेने आई हूँ।” आ झाओ ने धीरे से कहा, “इसे लेकर मैं किसी को घर लौटने को नहीं कह सकती।”

बूढ़ी छिन ने कुछ देर उसे देखा, फिर आख़िरकार वह हाथ हटा लिया जो लगातार दीप के हत्थे पर टिका था। उन्होंने अलमारी से नाटक का एक बेकार पर्चा निकाला, उसकी पीठ पर लगी लेई झाड़ी और ऊँचा आवरण लपेट दिया। काग़ज़ के कोने पर फीकी लाल छपाई थी। आझाओ को वह जानी-पहचानी लगी। वह पास झुकने ही वाली थी कि बूढ़ी छिन ने दूसरा किनारा उस पर मोड़ दिया। उसने दोबारा खोलकर नहीं देखा। बस जब बूढ़ी छिन ने दीप थमाया, तो उसे दिखा कि काग़ज़ के नीचे कपड़े की एक छोटी कतरन भी रखी थी, ताकि पुरानी बाँस की पट्टी घिसकर फिर न फट जाए।

वह निकलने ही वाली थी कि एक और ग्राहक भीतर आया। उसके हाथ में कागज़ चिपकाकर अभी-अभी तैयार की गई छोटी लालटेन थी। बोला, कागज़ पतला है, मोटे कागज़ वाली चाहिए। छिन दादी ने ढाँचे पर उँगली से हल्की थपकी देकर दिखाया कि कहाँ से रोशनी निकलती है, कहाँ ज़ोर पड़ता है। सब तरफ़ मोटा कागज़ लगा देंगे तो आधी रोशनी ही बचेगी। आदमी ने बात नहीं सुनी और फिर हाथ से दबाने लगा। छिन दादी ने तुरंत लालटेन वापस ले ली। उनके चेहरे पर थोड़ी देर पहले वाली झिझक का नाम भी नहीं था।

“परखना है तो ढाँचा परखिए, काग़ज़ मत दबाइए। यह सतह दबाकर बिगाड़ दी तो दोबारा काग़ज़ चिपकाने के पैसे भी लूँगी।”

आझाओ बगल में खड़ी उन्हें कागज़ और मेहनत का दाम साफ़-साफ़ बताते सुन रही थी। अचानक उसने राहत की साँस ली। यह बुज़ुर्ग कागज़ की एक पतली सतह बचाने को बढ़ा हुआ हाथ रोक सकती थीं और जिस चीज़ को अपना मान बैठीं, उसे अलमारी पर मज़बूती से दबाए भी रख सकती थीं। लालटेन की दुकान में किसी की राह देखती एक खिड़की के अलावा भी बहुत कुछ था। ग्राहक ने आख़िर लालटेन नहीं बदली। दादी छिन ने उसे लपेटा, पहले वाला दाम ही लिया और दरवाज़े तक छोड़ते वक्त उस बाँस के ढाँचे की ओर इशारा करना नहीं भूलीं जिससे वह टकराने वाला था।

दरवाज़े से निकलते ही हवा में लालटेन का कागज़ फड़फड़ाया। आझाओ ने एक हाथ से लालटेन थामी, दूसरे से कागज़ का कोना दबाया। आते वक्त उसे लगा था कि जिसके पास चीज़ है उसे ढूँढ़ लेने भर से हिसाब पूरा हो जाएगा। अब लालटेन हाथ में थी, मगर बही की पंक्ति अभी काटी नहीं जा सकती थी। वह गली के मुहाने पर थोड़ी देर रुकी। सीधे पारघाट नहीं लौटी। पहले सूखी जगह जाकर लपेट का कागज़ ज़रा खोला कि देखे, आखिर वह कौन-सा नाम पहचानती है।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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