प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
परदे के पीछे से गुज़रती हवा
कू वूजी · AI सृजन · 9070 अक्षर · लगभग 12 मिनट
छिन परिवार का भेजा पार्सल पहुँचा तो श्याओमान गा रही थी। आझाओ ने उसकी ओर से ले लिया। ऊपर की लपेट मज़बूत देखकर उसने उसे सिरहाने रख दिया। पता नहीं अंदर खाने का कुछ था या फिर एक जोड़ी जूते। शाम को खोलने पर जब नीला कपड़ा और गहरे लाल रंग की किनारी साथ दिखे, तब उसने पहचाना कि यह लिउवान के पिछले कमरे का पुराना परदा था। उसे धोकर सुखाया गया था, मगर कोनों पर अब भी दिखता था कि कपड़े के टुकड़े किस ज़माने में जोड़े गए थे।
छिन दादी ने साथ जो पर्ची रखी थी, वह बहुत छोटी थी। उसमें लिखा था कि दुकान में और कपड़ा है। यह पहले उसी का था, इसलिए मन हो तो इस्तेमाल करे। इसे हमेशा अपनी आँखों के सामने टाँगकर रखने की ज़रूरत नहीं है। लिखे हुए शब्दों में लौट आने को नहीं कहा गया था, मगर भेजी हुई चीज़ ने कमरे में किसी वाक्य से कहीं ज़्यादा जगह घेर ली। श्याओमान बैठी कुछ देर उसे छूती रही। पिछली बार एक छोटी किनारी लेने में जैसी निश्चिंत थी, अब वैसी नहीं थी। जैसे माँ ने सचमुच पूरा परदा उसके हाथ में दे दिया हो और अब उसे समझ न आए कि कहाँ से काटे ताकि पुरानी बात पर फिर एक बार कैंची चलाना न हो जाए।
आ शंग ने पहले उसे बिस्तर पर तानना चाहा, ताकि उसका मिट्टी का कुत्ता परदे के पीछे रहे। श्याओमान ने मना किया। बोली, कपड़ा पुराना है, फिर भी जूतों के नीचे बिछाकर रौंदने की चीज़ नहीं है। बच्चे ने पूछा कि उससे उसके लिए बस्ता बनाने की बात नहीं हुई थी क्या। तब उसे याद आया कि उसने सचमुच ऐसा कहा था। उसने आ झाओ से पूछा कि इसे बदलकर कुछ बनाएँ तो कौन-सी तरफ़ भीतर रहे। आ झाओ की उँगली एक ऐसी जगह पर पड़ी जो धुल-धुलकर पतली हो गई थी। उसने कहा कि इस हिस्से को बचाकर काटना होगा और जहाँ भार पड़े वहाँ अलग से तह लगानी होगी, वरना कुछ ही काग़ज़ डालने पर फट जाएगा।
‘फट जाएगा’ सुनकर श्याओमान के चेहरे का भाव बदला। उसने कहा कि पुराना कपड़ा देखते ही मेरी तरफ़ से बचत करने की ज़रूरत नहीं। आझाओ समझाने वाली थी कि वह बता रही है इसे कैसे इस्तेमाल करें, इसे छोड़ देने को नहीं कह रही। तभी श्याओमान फिर बोली कि माँ तो हमेशा उसकी सिलाई की तारीफ़ करती थीं, अब यह ज़रा-सा कपड़ा भी उससे नहीं बनता। बात में तुक नहीं थी। आझाओ पल भर में समझ भी गई कि सारा ग़ुस्सा उसी पर नहीं था। फिर भी बात चुभ गई और उसने सुइयों की डिबिया पट से चौकी पर रख दी।
“अगर तुम्हें बस मुझसे ‘ठीक है’ सुनना है, तो मैं वह भी कह सकती हूँ।” उसने जवाब दिया।
कमरा एकाएक शांत हो गया। आशंग मिट्टी के कुत्ते को सीने से लगाए बिस्तर के पायताने की ओर सिमट गया। दोनों औरतों ने एक साथ उसकी ओर देखा और पहले किसी ने आगे कुछ नहीं कहा। श्याओमान ने परदा तह किया और कहा कि वह ख़ुद कर लेगी। आझाओ ख़ाली टोकरी उठाकर बाहर चली गई। उसका इरादा अस्तर आज़माने के लिए कपड़े का छोटा टुकड़ा ख़रीदने का था, मगर गली के मुहाने पर याद आया कि कितने बड़े टुकड़े की ज़रूरत है, उसका काग़ज़ तक नहीं लाई। वह रास्ते के बीच खड़ी रही। उसे और भी लगने लगा कि वह इस बार बाहर ही इसलिए निकली है कि कमरे में बैठे लोगों को उसके नाराज़ होने का पता चले।
वह फ़ौरन नहीं लौटी, पहले कपड़े की दुकान गई। दुकानदार ने अलग-अलग रंगों के पुराने सन के कपड़े के कुछ टुकड़े निकाले और कहा कि ख़ुद चुन लो। आझाओ ने पूछा कि क्या वह एक छोटा टुकड़ा ही खरीद सकती है और दाम उसी के हिसाब से दे सकती है। दुकानदार ने कहा, हाँ, मगर ऐसे मत चुनना कि आख़िर में बेचने लायक कुछ न बचे, बस सँकरी कतरनों का ढेर रह जाए। वह उकड़ूँ बैठकर ध्यान से नापने लगी। हाथ में एक ऐसा टुकड़ा आया जो मुलायम था, पर जिसके रेशे बिखरते नहीं थे। उसने उसे नमूना बनाने के लिए खरीद लिया। गाओ मान का मंडली वाला कपड़ा उसने नहीं छुआ और छिन परिवार के पुराने कपड़े से अपना हुनर साबित करने की कोशिश भी छोड़ दी।
लौटते वक़्त हवा चल रही थी। कपड़े का कोना टोकरी के किनारे से उड़ने लगा। उसने हाथ बढ़ाकर दबाया, तो अचानक याद आया कि माँ ने भी एक बार एक पोशाक ज़रूरत से छोटी काट दी थी। यह तब की बात नहीं थी जब वह काम सीख रही थीं, बल्कि कई साल सिलाई करने के बाद की थी। एक दिन ग्राहक तक़ाज़ा करने आया, तो शन युन दो बच्चों के नापों में उलझ गईं। आस्तीन काट देने के बाद ही ग़लती पता चली। आ झाओ तब सोलह साल की थी और कहने लगी थी कि नाप के काग़ज़ पहले ही अलग कर लेने चाहिए थे। माँ को उसका खड़े-खड़े कहना बुरा लगा। उन्होंने मुड़कर खुद पुराना कपड़ा उधेड़ा और जोड़ लगाया। आधे दिन तक फिर उससे मदद माँगने को तैयार नहीं हुईं।
बाद में उसने इस घटना के बारे में शायद ही कभी सोचा था। माँ के सिखाए टाँके उसे हमेशा सधे हुए याद आते थे, जैसे उनके न रहने से उनका छोड़ा हर टाँका जीवित लोगों की बात से ज़्यादा सही हो गया हो। मगर उस दिन माँ ने सचमुच ग़लत काटा था और बेटी के सामने तुरंत मानना भी नहीं चाहा था। इससे उनका सिखाया कुछ कम नहीं हो जाता था। बस इतना था कि सुई चलाना सिखाने वाली भी अधीर हो सकती थी और अपने बच्चे की नज़रों में अपनी काबिलियत का थोड़ा-सा मान बचाए रखना चाह सकती थी।
आझाओ कुछ धीमे चली। वह इस पुरानी बात को लेकर श्याओमान को समझाने भीतर नहीं गई। दूसरी औरत अपने पुराने कपड़े को हाथ से टटोल रही थी, उसे शायद यह सुनने की ज़रूरत नहीं थी कि सबकी माँ ऐसी ही होती है। आझाओ ने नया खरीदा नमूना अपने संदूक में रखा और पहले वह काम पूरा करने बैठी जो अभी सौंपा नहीं था। श्याओमान ने भी नहीं पूछा कि वह कहाँ गई थी। सिर झुकाकर पर्दे का कपड़ा समतल किया और आशंग के कागज़ों की गड्डी से नाप मिलाया। आखिर उसके हाथों में एक थैले का ठोस आकार बनने लगा था।
आधा कपड़ा काटकर वह रुक गई और बाक़ी आधा अलग तह कर दिया। बोली कि इतना काफ़ी है, बाक़ी माँ के लिए हवा रोकने को छोड़ दो; दुकान में सिर्फ़ बेटी की चीज़ें ही काम की नहीं हैं। आझाओ समझ गई कि इस बार बात रूठकर लौटा देने वाली नहीं है। उसने सूखा कागज़ ढूँढ़कर लपेट दिया, अपनी ओर से यह नहीं जोड़ा कि अब माफ़ कर दिया है। श्याओमान ने कुछ छोटी पंक्तियाँ लिखीं और ल्योउवान जाने वाली सवारी नाव से भिजवाईं। तारीख़ और ख़ुद काटे नाप एक साथ लिखे; अक्षरों पर कपड़ा काटते समय लगी माँड़ की धूल का एक छोटा धब्बा अब भी था।
उस दोपहर आझाओ को चौथे महीने में कपड़े बनाने की थोड़ी-सी मज़दूरी मिली। पूरी नई पोशाक की रक़म नहीं मिली, मगर उधेड़कर बचाई गई काम की सामग्री, मरम्मत और डोरियों का हिसाब हो चुका था। गाओ मान ने पूरे हुए काम को अधूरे काम से अलग किया और कहा कि आगे का नया काम अलग गिना जाएगा। एक नाकामी से पहले का सारा काम नहीं मिटेगा और सिर्फ़ मेहनत लग जाने से किसी चीज़ को पूरा सौंपा हुआ भी नहीं मान सकते। आझाओ सुनते हुए सिर हिलाती रही। हाथ में सिक्कों की लड़ी बड़ी नहीं थी, मगर यहाँ उसके रहने का ख़र्च उठाने के लिए अब सिर्फ़ नाव का किराया नहीं था।
उसने पहले मई का किराया अलग किया, फिर नाव की मरम्मत के लिए एक हिस्सा रखा। बचा कम था, फिर भी अभी देखा हुआ नमूने का टुकड़ा खरीदने को काफी था। इस थोड़ी गुंजाइश को उसने सिर्फ अपनी अच्छी सिलाई का फल नहीं माना। पिता की छोड़ी नाव न होती, तो शुरू के उन बारह ताँबे के सिक्कों के सहारे यहाँ इतने दिन रहना बहुत पहले असंभव हो गया होता। ये चन कपड़े धोने के लिए लेने आई तो उसने खास तौर पर पूछा कि अगली बार पुराने कपड़े के कुछ टुकड़े आज़माकर धोने का हिसाब कैसे होगा। अब वह यह नहीं मान रही थी कि चूँकि वह सीख रही है, इसलिए दूसरों की मेहनत भी उसके साथ मुफ्त आज़माइश में लगनी चाहिए।
गू मिंग ने नया कपड़ा देखकर पूछा कि आखिर ल्योशंग के लिए फिर एक पोशाक बनने वाली है क्या। आझाओ ने कहा, पहले एक अस्तर बनेगा, पूरे आँगन में ऐलान करने की जल्दी मत करो। उसके लिए अब भी आझाओ का दिल धड़कता था। वह अब भी चाहती थी कि वह उसके हाथ की अच्छी पोशाक पहने, मगर उसके मुँह से ‘नया’ सुनते ही बाँह भर कपड़ा उठा लेने का मन अब नहीं करता था। गू मिंग ने हँसकर हामी भरी। फिर उसका हाथ श्याओमान के आधे बने थैले की ओर गया। पूछा, इसे कमर से बाँधें तो इसमें भी नदी का-सा रंग आएगा, है न?
आशंग दरवाज़े से दौड़ता आया, थैला छीनकर वापस लिया और ऐलान किया कि यह उसका है। इसमें अक्षर रखे जाएँगे, कोई विद्वान युवक नहीं। गू मिंग जान-बूझकर एक क़दम पीछे हटा और बोला कि तो इंसान की क़ीमत अक्षरों से कम है। आज़ाओ अपनी हँसी नहीं रोक पाई। श्याओमान भी ज़रा-सी हँसी। कमरे में बची खीझ को आख़िर सीधे भिड़े बग़ैर निकलने की एक झिरी मिल गई। मगर बच्चे को सच में डर था कि थैला कोई ले जाएगा। वह उसे खाट पर ले गया और ऊपर से रज़ाई का कोना डाल दिया। किसी को पहले देखने की इजाज़त नहीं थी।
शाम को गू मिंग अगले अंक का कमरबंद लेने आया तो गाओ मान ने यूँ ही पूछ लिया कि श्युनछंग से जवाब आया या नहीं। उसने कहा कि छांगछिंग मंडली शरद से पहले लानथिंग के छिंगशिंग मंच पर आकर टिकेगी। प्रबंधक ने कहा है कि वह अपनी पकड़ का एक अंश तैयार रखे, तब देखेंगे। धागा पकड़े आझाओ का हाथ पल भर रुक गया। तो इन दिनों तलवार जोड़ना और मंच की चाल साधना सिर्फ़ इस आँगन के लोगों से दो-चार हँसी की बातें सुनने के लिए नहीं था। वह अपने लिए बड़ा मंच खोज रहा था। और आझाओ ने शरद के उत्सव की नई पोशाकों की कल्पना ऐसे की थी जैसे सब लोग हमेशा यहीं रहेंगे।
उसने पूछा, फिर ल्यूशंग कौन गाएगा? उसकी आवाज़ उसके मन से ज़्यादा समतल थी। गू मिंग ने कहा, अभी तय नहीं। वह तो बस अपने लिए ऐसी जगह पाने की कोशिश कर रहा है जहाँ लोग उसे देख सकें। ऐसा नहीं कि कल ही चला जाएगा। कहते हुए उसे कोई झेंप नहीं थी। वह कुछ उत्साहित भी था। उसने लकड़ी की तलवार से नए नाटक के लिए घूमकर उठाया जाने वाला एक कदम दिखाया। आझाओ जानती थी कि उसका रुकना उस पर कोई उधार नहीं था। फिर भी उसे वह रात याद आई जब नीला-हरा चोगा फट गया था। लगा, जिस काम को अभी-अभी पकड़ पाई थी, वह भी उसी आदमी के साथ पहले ही दूर निकल चला है।
गाओ मान ने पट्टियाँ समेटते हुए पूछा कि क्या गू मिंग की अगली प्रस्तुति की सामग्री का हिसाब फिर लिखना है। तभी आझाओ का ध्यान लौटा। बोली कि पहले सामने का काम करें, सचमुच कलाकार बदला तो फिर नाप लेना होगा। वह असल में पूछना चाहती थी कि क्या वह यहाँ की सब चीज़ें भी भूल जाएगा, मगर आख़िर कपड़ों का नाप ही पूछ पाई। गू मिंग ने कहा कि बेशक, उसके कंधे दूसरों जैसे थोड़े हैं। फिर पट्टी लेकर चला गया। आँगन में तलवार की आवाज़ पहले से और तेज़ हो गई।
रात को श्याओ मान ने थैले की तली का सबसे अधिक भार सहने वाला हिस्सा आ झाओ को दिखाया और पूछा कि एक और तह लगाने से काम चलेगा क्या। पूछते समय वह बहुत सहज नहीं थी। आ झाओ ने कहा कि यह इस पर निर्भर है कि भरना क्या है; अगर सिर्फ़ पत्थर भरोगी तो काफ़ी नहीं होगा। श्याओ मान ने बेटे की ओर देखा। आ शेंग ने तुरंत कहा, नहीं हैं, इतनी जल्दी कि संदेह हो। आ झाओ ने काग़ज़ लगाकर नाप लिया, सिलने वाला कोना दिखाया और बस टाँके लगाने का तरीक़ा बताया। पहले कह चुकी बात फिर नहीं दोहराई।
उसने अपना नमूना भी निकाला और श्याओमान की मदद से उसे कंधे पर चढ़ाकर खुद फीते खोले। श्याओमान ने कपड़े की दो जगहों की दिशा देखकर कहा कि अभी पूरा मत जोड़ना, सुबह लू हन्यांग को पहनाकर देखेंगे। दोनों अपना-अपना काम करती रहीं और कभी-कभार दूसरी के लिए कपड़े का एक हिस्सा थाम देतीं। किसने किसके लिए कितनी गुंजाइश छोड़ी, इसका हिसाब नहीं किया। दोपहर की बात बीत गई थी, फिर भी आगे से हर बात मीठे लहजे में ही हो, ऐसा नहीं था। आझाओ ने धागे का एक छोटा हिस्सा ग़लत काट दिया तो श्याओमान अब भी भौंहें चढ़ाती थी, और आझाओ को अब भी बुरा लगता था।
दिंग छ्वान के लिए जवाब दो दिन बाद लिखा गया। पाँचवें महीने का किराया अभी देना नहीं था, इसलिए आ झाओ ने पहले लकड़ी के बारे में लिखा और उनसे कहा कि ग्राहकों को ख़ास तौर पर सिर्फ़ ह परिवार का नाम पहचानने को कहने की ज़रूरत नहीं। उसने लिखा कि दिंग छ्वान कुमारी ह की ओर से नाव पार लगाता है, फिर उसे काटकर लिखा कि दिंग छ्वान नाव पार लगाता है। काग़ज़ पर बात कुछ छोटी हो गई। उसने ख़ुद अभी नया घाट नहीं देखा था। कलम उठाते समय थोड़ी बेचैनी अब भी थी, लेकिन हर फेरे पर लोगों का परिचय देने के लिए पिता का नाम लेना ज़रूरी नहीं था।
उसने नए लकड़ी के नामपट्ट का ज़िक्र नहीं किया था, इसलिए आगे सचमुच एक और पट्ट दिखा तो उसे अब भी बुरा लग सकता था। अभी उसने बात बस उस तरह लिखी थी जिसे वह आज़माने को तैयार थी। उसे नहीं लगा कि कुछ शब्द लिख देने से मन फिर कभी पीछे नहीं हटेगा। काग़ज़ बाँस की पट्टियों के बीच दबा दिया गया और पुराने परदे के लौटाए जा रहे आधे हिस्से के साथ उसी रास्ते भेजा गया। पाने वाले अलग थे, इसलिए पुड़ियाँ भी अलग होनी थीं। उसने ख़ुद ध्यान से उन्हें अलग किया, फिर उधर से गुज़रती एक जानी-पहचानी नाव के हवाले किया।
कुछ दिन बाद छिन दादी ने बस इतना कहलवाया कि कपड़ा मिल गया है और वह उसे पिछले दरवाज़े का परदा बनाने के लिए रख लेंगी। उन्होंने यह नहीं पूछा कि पूरा क्यों नहीं रखा, न बचे आधे को फिर ‘बेटी के लौटने का इंतज़ार’ जैसा कोई नाम दिया। आ शंग का नया बस्ता तैयार था। माँ और आ झाओ, दोनों ने यह नहीं टटोला कि उसने पहली बार उसमें क्या रखा। बच्चे ने नज़र बचाकर एक चपटा पत्थर डाल लिया। बोला कि वह काग़ज़ दबाए रखेगा, ताकि हवा उन्हें उड़ा न ले जाए। बस्ते का तला सचमुच भारी हो गया। श्याओमान ने दूर से देखा और पत्थर निकालने को कहा। वह बस्ता सीने से लगाकर भाग गया।
आज़ाओ दो क़दम उसके पीछे दौड़ी, फिर इतनी हँसी कि दौड़ नहीं पाई। हवा ने खिड़की का पुराना सादा परदा उठा दिया। मेज़ पर पड़ा आधा पुराना नीला कपड़ा अब थैला बन चुका था और भागते बच्चे की टाँग पर बार-बार थपकी दे रहा था। वह मेज़ के पास लौटी और अपना नमूना फिर फैलाया। एक धागे पर उँगली रखी और हवा को बग़ल से गुज़रने दिया। उसे हर ढीली जगह की सिलाई कसकर बंद करने की जल्दी नहीं थी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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