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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन

कू वूजी · AI सृजन · 9257 अक्षर · लगभग 12 मिनट

श्याओमान और उसके बेटे के जाने के बाद ल्योउवान में भोर की नाव पहले की तरह चलती रही। आ झाओ कुछ फेरे सब्ज़ियों के बोझ पार ले गई और एक पड़ोसी का पतलून ठीक करने का काम भी ले लिया। हिसाब से एक लालटेन की मद कट जाने पर दिन अचानक खाली नहीं हो गए थे। अब वह लानतिंग जाने की बात ज़बान पर ला सकती थी, पर हर बार नाव के पिछले सिरे पर मुड़ती तो मरम्मत माँगती पानी की वह लकीर अब भी वहीं थी। संदूक उठाकर सब कुछ दूसरों पर छोड़ देना उसके बस की बात नहीं थी।

दिंग छ्वान ने किराए की बात पहली बार पश्चिमी घाट पर दो दिन सवारियाँ ढोकर देखने के बाद उठाई। उधर के लोगों को सचमुच कुछ कम पैदल चलना पड़ता था और वे नाव का किराया देने को तैयार थे। मगर ईंधन की लकड़ी के बोझ बहुत आते थे और उनसे नाव के किनारे जल्दी घिसते थे। आ झाओ ने पूछा कि कितनी कमाई हुई। उसने पैसों की पूरी नली उलटकर उसे नहीं दिखाई। बस कहा कि अगर वह नाव किराए पर देना चाहे तो वह हर महीने दो सौ चालीस वेन दे सकता है। अगर अब भी पूरी नाव के किसी ख़रीदार की आस है तो उसके पैसे अभी न ले, ताकि कुछ दिन बाद दोनों को एक-दूसरे के सामने झेंपना न पड़े।

आ झाओ ने मन में तीन सौ का हिसाब लगाया था। दो सौ चालीस सुनकर उसे लगा कि जब उसने सवारियाँ मिलने की जगह ढूँढ़ ही ली है, तो उलटे उसका किराया क्यों दबा रहा है। वह कहने ही वाली थी कि दिंग छ्वान ने घिसकर बेकार हुई पुरानी रस्सी का एक टुकड़ा किनारे पर फेंका। उसे समझ आया कि नाव वहाँ लगा देने भर से वे सवारियाँ खुद नहीं चली आई थीं। उसने कीचड़ में चलकर लोगों से पूछा था, और जब पूरी खेप नहीं जुटती थी तो इंतज़ार भी करना पड़ता था। आ झाओ ने उसके साथ वह दौड़-धूप नहीं की थी, फिर भी पहले से हिसाब लगा रही थी कि उससे कितना ज़्यादा लेना चाहिए।

उसने तब भी हामी नहीं भरी। तय हुआ कि नाव उथले किनारे पर खींचकर फिर देखेंगे। दस से कुछ ज़्यादा दिनों और रातों में वह जाने का इरादा बार-बार बदल चुकी थी: नाव न बेचे तो डर था कि हमेशा पीछे मुड़ती रहेगी, बेच दे तो डर था कि बाहर कुछ होने पर लौटने की कोई जगह नहीं बचेगी। जब सचमुच नाव रखकर किराया लेने का रास्ता दिखा, तब फिर सोचा कि नाव अपनी है तो कहाँ ख़राब है और कहाँ लगेगी, इस पर आख़िरी बात उसी की होनी चाहिए। वह जानती थी कि ये सारे ख़याल एक छोटी नाव में साथ नहीं समा सकते, मगर उस वक़्त किसी एक को भी छोड़ने को तैयार नहीं थी।

नाव खींचने वाले दिन लुओ यान भी आई, हाथ में नई बाँस की पतली पट्टियों का एक गट्ठर और लकड़ी के दो छोटे टुकड़े लिए। उसने जल्दी से दाम नहीं माने; पहले पैर से तट की कीचड़ परखी और तिंग छ्वान से कहा कि केवल नाव का ध्यान न रखे, नीचे की लकड़ियाँ भी मज़बूती से जमाए। दोनों ने नाव का एक किनारा थोड़ा उठाया। तिंग छ्वान ने आ झाओ को बाहरी तख़्ता दिखाया। ख़राबी अभी भीतर की पसलियों तक नहीं पहुँची थी, अभी पैबंद लग सकता था। पानी का ज़ोर बढ़ने के बाद फिर एक बार बाहर खींचना होगा; सुरक्षित ढंग से आगे चलाना हो तो आख़िर यह हिस्सा बदलना ही पड़ेगा।

आ झाओ ने पूछा कि लगभग कितना लगेगा। दिंग छ्वान ने लकड़ी और मज़दूरी का हिसाब बताया। मिलाकर क़रीब चार सौ अस्सी वेन। खोलने पर कहीं और लकड़ी नरम निकली तो उसका अलग हिसाब होगा। उसका सीना कस गया। लगभग मन हुआ कि अभी मालिक श्ये को बेच दे और फिर उसकी चिंता ही न करे। लुओ यान ने पहले पूछा कि पैसे कौन देगा और किस महीने देगा। ऐसा न हो कि आज कहो किराया दे सकते हैं और कल नाव ठीक कराने के लिए मेरे बाँस के काम के सारे पैसे उठा लो। दिंग छ्वान ने उसकी ओर देखकर कहा कि वह इसी पर साथ बैठकर बात करने वाला था।

तीनों सूखी रेती के किनारे बैठ गए और काग़ज़ एक सपाट तख्ती पर दबाया। आ झाओ ने पहले ह हुऐझोउ लिखा, फिर कलम रोकी, उन तीन अक्षरों पर हल्की लकीर खींचकर उनकी जगह ह झाओ लिखा। यह पिता का पुराना हिसाब नहीं था और वह भी बस कुछ दिनों के लिए उनकी ओर से नाव देखने वाली बेटी नहीं थी। अगर नाव आगे भी किसी को देनी है, तो आज कही बातों की ज़िम्मेदारी उसे खुद उठानी होगी। लुओ येन ने देखा, मगर तारीफ़ नहीं की। बस काग़ज़ दबाने वाला पत्थर थोड़ा सरका दिया ताकि लिखने में आड़े न आए।

बाहरी बड़े तख्तों, नाव के ढाँचे और मुख्य धरन की मरम्मत अब भी मालिक के ज़िम्मे रहेगी। रोज़मर्रा के सन, घिसी रस्सियों और छोटी-मोटी मरम्मत का ख़र्च नाव चलाने वाला देगा। दिंग छ्वान को कोई बड़ी ख़राबी दिखे तो पहले ख़बर भिजवाएगा, उसे अनदेखा नहीं करेगा। और आ झाओ भी लानथिंग में बैठे-बैठे नाव में रिसाव की ख़बर सुनकर किसी को अपने बताए ढंग से मरम्मत करने का हुक्म नहीं देगी, जब उसने ख़ुद ख़राबी देखी तक न हो। यह आख़िरी बात सुनकर वह कहे बिना नहीं रह सकी कि नदी का यह हिस्सा वह अच्छी तरह जानती है। दिंग छ्वान ने जवाब दिया, मैंने भी आज ही चप्पू पकड़ना नहीं सीखा है।

आझाओ ने होंठ भींचे। पास खड़ी लुओ यान ने कहा, दोनों इस पानी को जानते हैं, इसीलिए जिसकी आवाज़ ऊँची हो उसे ज़्यादा जानकार मत मान लेना। कहकर उसने ख़ुद पैर से ज़रा खिसकी हुई लकड़ी की पच्ची वापस जमा दी। साफ़ था कि वह केवल बीच-बचाव करने नहीं आई थी। नाव को सचमुच कुछ हुआ तो उसे भी आस्तीन चढ़ानी पड़ेगी। आझाओ ने यह देखा और धीरे-धीरे अपनी लिखी शर्त काट दी कि नाव जहाँ भी लगाई जाए, पहले उससे पूछा जाए। बस यह रहने दिया कि नाव अपनी मर्ज़ी से किसी तीसरे को नहीं सौंपी जा सकती।

आख़िर में किराया दो सौ साठ वेन तय हुआ। छह महीने, तीसरे महीने की सत्ताईस से नौवें महीने की सत्ताईस तक। आगे हर महीने उसी तारीख़ को देना था। ज़मानत के दो सौ साठ अलग रखे जाएँगे। मियाद पूरी होने पर कोई कटौती न बनी तो लौटा दिए जाएँगे। आझाओ सफ़र में उसे ख़र्च करने की रकम नहीं मान सकती थी। लुओ येन ने ज़मानत की सिक्कों वाली लड़ी निकाली। तिंग छ्वान लेने बढ़ा, मगर उसने पहले उसे आझाओ की हथेली के पास रखकर कहा, ये पैसे मैंने बचाए हैं। लौटाने की बारी आए तो मुझे ही देना, कहीं यह पहले ही नई नाव देखने न ले जाए।

दिंग छ्वान कुछ झेंपा, फिर उसने मान लिया कि उसका मन सच में नई नाव देखने का करेगा। आ झाओ अब तक बस ऐसी बातें सुन रही थी जिनमें सावधानी चाहिए थी। इस बात पर वह हँस पड़ी और काग़ज़ के किनारे पर स्याही भी ज़रा काँप गई। उसने कलम फिर डुबोई और ज़मानत तथा किराया अलग-अलग पंक्तियों में लिखे, ताकि बराबर रकम की दोनों लड़ियाँ एक ही जगह न सिमट जाएँ। वह बाहर जाना चाहती थी, मगर कुछ समय के लिए हाथ में आए किसी और के पैसों के भरोसे यह दिखाना ठीक नहीं था कि अगले कुछ महीनों के लिए उसके पास पूरी रकम है।

पीतल की पट्टी की बात लिखते हुए वह फिर रुक गई। उसने कहा, पट्टी वहीं रहेगी। न उतारी जा सकती है, न बेची जा सकती है। तिंग छ्वान ने नाव के अगले सिरे को देखकर पूछा, कहीं इससे लोगों को पहचानने में मुश्किल तो नहीं होगी कि नाव कौन चलाता है? आझाओ ने कहा, जो तुम्हें जानते हैं, वे अपने आप पहचान लेंगे। कहते ही लगा कि बात में तुक नहीं, फिर भी उसने उसे बदला नहीं। लुओ येन ने कहा, पट्टी रह सकती है और नाव पर काम करने वाला भी कोई परछाईं नहीं है। आगे लोग उसे कैसे पहचानें, इस पर बाद में सोचेंगे। अभी पीतल के इस टुकड़े के कारण पूरा किराया फिर से तय करना ज़रूरी नहीं।

आ झाओ ने लिख दिया कि पीतल की पट्टिका नाव के अगले सिरे पर ही रहेगी। उसने यह नहीं जोड़ा कि बस यही नाम रह सकता है। बात उसे अभी पूरी तरह समझ नहीं आई थी, मगर उसने देखा कि दिंग छ्वान नाव थामने को उठा तो पहले उस दरार पर हाथ रखा जिसे उसने अभी भरा था, पट्टिका पर नहीं। उसके लिए पहले यह मायने रखता था कि नाव से क्या काम लिया जा सकता है। नाव किसकी बीती ज़िंदगी का एक हिस्सा सँभाले है, यह बात उसके बाद आती थी। अगर वह सचमुच किसी जीते-जागते इंसान को नाव इस्तेमाल करने देना चाहती थी, तो उसे बस अपनी ख़ातिर पुरानी जगह पर खड़ा नहीं रख सकती थी।

कागज़ लिखे गए तो पारघाट का काम देखने वाले बुज़ुर्ग को गवाह बनाया। गाओ मान वहाँ नहीं थी कि आझाओ के लिए साझे सामान और निजी चीज़ों को पहले ही अलग कर दे। उसने खुद एक बार पढ़कर सुनाया, फिर दिंग छ्वान और लुओ येन से कहा कि जहाँ बात साफ़ न हो, बताएँ। बुज़ुर्ग ने रिश्तेदारों और पड़ोसियों में मेल रखने पर भाषण नहीं दिया। बस याद दिलाया कि नाम ग़लत न लिखें। आगे कागज़ निकालकर इसी लिखे को मानना होगा। तब यह कहकर बात नहीं टाली जा सकेगी कि दोनों की नीयत शुरू से अच्छी थी। तीनों ने एक-एक प्रति रखी। कागज़ दबाने वाले सपाट तख्ते पर स्याही का हल्का निशान रह गया।

नाव पानी में उतारने के बाद दोनों ने एक चक्कर और लगाया। दिंग छ्वान ने आझाओ से नया चप्पू आज़माने को कहा, उसने डंडे पर हाथ वहीं रखा जहाँ पुराने चप्पू पर रखती थी, और धक्का देते ही पानी उसके अपने जूतों पर छिटक गया। दिंग छ्वान ने उँगली से जगह दिखाकर कहा कि डंडा पुराने से थोड़ा लंबा है, हाथ को ठीक उसी पुरानी जगह मत रखो। उसने पकड़ बदली, अगला धक्का आसानी से लग गया, पहले उसका मन था कि रौब से कह दे कि उसे पहले से पता था, पर किनारे पर लुओ यान को हँसते देख आख़िर उसके अपने मुँह से भी पहले हँसी ही निकली। किनारे उतरने पर लुओ यान ने बस उन्हें काग़ज़ सँभालकर रखने को कहा, बोली कि जूते भीग गए हैं तो खुद सुखा लेना, लिखावट भीग गई तो मुझसे स्याही के धब्बे पढ़ने को मत कहना। आझाओ ने तीनों प्रतियाँ सूखे कपड़े की तहों में दबाकर रखीं, पहली बार उसने वह पूरा गट्ठर अकेले अपने पास नहीं रखा।

तीसरे महीने की सत्ताईस तारीख को सुबह-सुबह दिंग छ्वान पहले महीने का किराया और ज़मानत की रकम ले आया। दो लड़ियाँ थीं, हर एक में दो सौ साठ वन। आझाओ ने ज़मानत वाली लड़ी अलग छोटी संदूकची में रखी, उस पर लिखा कि रकम किसकी है और ताला लगा दिया। उसकी चाबी और घर के दरवाज़े की चाबी उसी के पास रहीं। बची लड़ी नई जगह ठहरने, खाने और आने-जाने की एक दूरी का खर्च उठा सकती थी, मगर रकम इतनी बड़ी नहीं थी कि वह नाव के उस बाहरी तख्ते को भूल जाए। उसने उसमें से थोड़ा अलग किया और कहा कि इसी महीने से नाव की मरम्मत के लिए बचाएगी, कहीं गर्मी की शुरुआत में पता चले कि सब सिलाई पर खर्च हो गया।

उसने दिंग छ्वान के सामने आगे के सफ़र का सारा ख़र्च फिर से नहीं गिना। बस उससे कहा कि एक बार फिर उसके लिखे रवानगी के दिन देख ले। कोई ज़रूरी बात हो तो लानथिंग जाने वाली रास्ते के अलग-अलग हिस्सों की यात्री नावों में कोई न कोई संदेश ले जाने को तैयार होगा। हर बार उसके खुद लौटने का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। दिंग छ्वान ने हामी भरी और पूछा कि क्या वह अब भी उसे पूर्वी किनारे तक छोड़ आए। आ झाओ ने कहा, हाँ, और किराया भी हमेशा की तरह लगेगा। उसने सहजता से मान लिया। दिवंगत परिचित की ख़ातिर नाव सँभालने वाली उसकी पुरानी औपचारिकता कुछ कम हो गई थी। नाव के पास दोनों अब अपने पैरों पर कुछ और मज़बूती से खड़े थे।

रवाना होने से पहले बूढ़ी छिन ख़ुद पुराना बाँस का दीप देने आईं। छाजन की एक तरफ़ नया सादा काग़ज़ लगा था। उन्होंने आज़ाओ को दिखाकर कहा कि पहले वाला काग़ज़ सील गया था, बदलना ही था। लौटाने की बारी आई तो यूँ ही हाथ थोड़े खींच लेतीं। उन्होंने दीप का हत्था आज़ाओ को थमाया और कहा कि इस बार मैं भी अपना उधार लौटा रही हूँ। दुकान में नए दीप हैं, उजाले के लिए काफ़ी हैं। आज़ाओ ने दीप लिया और पहले उस दरार को छुआ जहाँ बाँस की पट्टी जोड़ी गई थी। उसने यह नहीं पूछा कि आगे खिड़की के पास क्या करेंगी। बस इतना कहा कि किसी दिन ऊँचे छाजन की सचमुच ज़रूरत पड़े तो फिर माँग सकती हैं।

छिन दादी दरवाज़े पर खड़ी थीं। पूछना चाहती थीं कि वहाँ जाकर क्या वह रोज़ श्याओमान से मिलेगी। आख़िर पूछ बैठीं कि दक्षिणी सभागार में रात को ठंड लगती है क्या। आ झाओ ने कहा कि नाव से कुछ सूखा रहता है, फिर भी हाथों को ठंड लगती है। बुज़ुर्ग ने आस्तीन से बचे मुलायम कपड़े की एक छोटी गाँठ निकाली और उसे सुइयों की डिबिया पर लपेटने को कहा, ताकि बाँस का पुराना मुँह फिर हाथ में न चुभे। आ झाओ ने ले लिया। संदेश ढोने वाली नहीं बनना चाहती थी, तो भी कपड़े का एक टुकड़ा लौटाना ज़रूरी नहीं था।

वह दीया लानथिंग नहीं ले गई। पहले उसे अपने कमरे में लकड़ी की मज़बूत ताक पर रख दिया। कभी उस दीये ने पिता के लिए पानी पर रोशनी की थी और छिन परिवार की खिड़की उजाली थी। अब वह भी कुछ समय किसी के काम आए बिना दिन के उजाले में आराम से सूख सकता था। दरवाज़ा बंद करते हुए उसने पलटकर देखा। ताँबे की कुंडी मद्धम थी। ऐसा नहीं लगा कि एक रात कम जलने से वह पुरानी सारी बातें खो देगा।

इस बार बाँस का संदूक कुछ हल्का था। अलग से लालटेन सँभालने की ज़रूरत नहीं थी, सो हाथ से पहले चढ़ने का तख्ता पकड़ सकी। दिंग छ्वान नाव पर था। पुरानी पतवार एक तरफ़ रखी थी, नई उसके हाथ में थी। उसने पहला फेरा लगाया तो आझाओ लगभग कह बैठी, थोड़ा बाईं ओर। बात होंठों तक आई ही थी कि उसने पलटकर देख लिया। हँसकर पूछा, अभी किनारे भी नहीं पहुँची और हुक्म चलाने का मन है? वह भी हँसी। बोली, तुमने भी मुझे सुई पकड़ना नहीं सिखाया है। पहले अपना-अपना काम देखें।

नदी पार करके अगली यात्री नाव में माल लदने की प्रतीक्षा में आ झाओ लगातार पीछे नहीं देखती रही। उसने मिट्टी के कटोरों वाले यात्री का पिछली बार नीचे टेक लगाने के लिए रखा टूटी धार वाला कटोरा पहचान लिया। आज भी वह उसी जगह था। रास्ते भर सँभालकर रखे अच्छे माल से भी वह उसे ज़्यादा जाना-पहचाना लगा। उसने संदूक के नीचे लकड़ी की पट्टियाँ रखीं और आने-जाने वालों के लिए पहले जगह छोड़ी। जब पाल के किनारे की ज़रा-सी धूप नाव के भीतर सरक आई, तभी उसने अपनी आस्तीनें इतनी चढ़ाईं कि कलाइयों की हरकत में बाधा न पड़े।

उसके पीछे छूटी नाव अब भी लिउवान में थी और ताँबे की पट्टी अब भी नाव के अगले सिरे पर लगी थी। आझाओ ने सारी चाबियाँ नहीं सौंपी थीं और ख़ुद को भी उन चंद चाबियों में अटका नहीं छोड़ा था। उसने संदूक से नाप का वह काग़ज़ निकाला जिस पर लिखते-लिखते सब गड्डमड्ड हो गया था, ताकि सांगछ्याओ पहुँचकर उसे फिर देखे। नाव हिली तो काग़ज़ का किनारा हल्का-सा काँपा। उसने अपना एक ताँबे का सिक्का उस पर रख दिया और उस दीप को बचाने के लिए फिर हाथ नहीं बढ़ाया जो उसके पास था ही नहीं।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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