प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
रात को खिड़की कौन बंद करता है
कू वूजी · AI सृजन · 8813 अक्षर · लगभग 12 मिनट
रात को दादी छिन बाहर वाले कमरे में लालटेनें समेट रही थीं कि पीछे के कमरे से आशंग की दर्द भरी आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने हाथ का बाँस का ढाँचा फ़ौरन रखा और भीतर गईं। श्याओमान बच्चे के उलझे बाल सुलझा रही थी। एक हाथ से उसका सिर थामे थी और दूसरे में कंघी थी। बाल पानी से भीगे थे, कुछ लटें बुरी तरह उलझी थीं और बच्चा जितना चिल्लाता, उतना ही हिलता। दादी छिन ने लकड़ी का छोटा स्टूल खींच लिया और नाती से उस पर टिककर बैठने को कहा, ताकि अब वे सँभालें।
श्याओमान ने कंघी नहीं थमाई। कहा कि वह हिलता है तो बाल खिंचते हैं, ज़रा ठहरो। बूढ़ी छिन का बढ़ा हुआ हाथ हवा में रुक गया। अचानक कुछ ग़ुस्सा आया। आख़िर उन्होंने भी एक बच्ची पाली थी, ऐसा भी नहीं कि बाल सँवारना तक न आता हो। मगर नीचे देखा तो आशंग ने माँ के कपड़े का कोना पकड़ रखा था और उसकी उँगलियों ने कपड़े को मरोड़कर गोला बना दिया था। आख़िर उन्होंने पहले पाँव से चौकी का पाया थाम लिया, ताकि श्याओमान के दोनों हाथ खाली रहें।
बाल सुलझते ही आ शंग का सिर एक ओर ढलका और उसे नींद आने लगी। दिन में नाव पर वह ख़ुद को जगाए रहा था, फिर नई जगह पर उसने ढेर सारी बातें की थीं। आख़िर उसके शरीर पर सारी थकान एक साथ उतर आई। दादी छिन उसे सुलाने से पहले रोटी का एक छोटा टुकड़ा खिलाना चाहती थीं। श्याओ मान ने कहा कि अभी का खाना काफ़ी था, उनींदा हो तो फिर मत खिलाओ। उन्होंने देखा कि बच्चे के मुँह के पास चावल का एक दाना लगा है। सोचा, रोटी का एक टुकड़ा ही तो है। आख़िर उन्होंने बस गीले कपड़े से वह दाना हल्के से उठा लिया।
यह श्याओमान का पुराना पलंग था। बगल में एक नया सँकरा तख़्ता जोड़ दिया गया था ताकि माँ-बेटे को सोते वक्त तंगी न हो। दादी छिन ने इसके लिए कई बार इधर-उधर करके देखा था और नीचे लगाने को एक ही ऊँचाई के लकड़ी के गुटके चुने थे। फिर भी बेटी ने उस पर अपना वज़न डाला तो पूछे बिना नहीं रह सकीं कि टिकाऊ है क्या। श्याओमान ने बैठकर देखा और कहा, टिका हुआ है। यह एक जवाब उन्हें दिन में सुनी बाहर की पूरी कहानी से ज़्यादा ठोस लगा। उन्होंने जल्दी से अपना बिस्तर उठाया और बाहर के कमरे में ले गईं।
श्याओमान ने उन्हें रोककर कहा कि पूरी अंदर की कोठरी छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। छिन दादी ने कहा, बाहर भी सो सकती हूँ, मैं हमेशा जल्दी उठती हूँ, किसी की नींद भी नहीं टूटेगी। असल में उन्होंने कभी अलमारी के पास रात की बिछावन नहीं डाली थी। ज़मीन से ठंड उठती थी और आधी रात को कपड़े बदलना भी मुश्किल था। वह बेटी को यह दिखाना नहीं चाहती थीं। पहले रज़ाई झटकी, जैसे यह जगह उनके लिए हमेशा से जानी-पहचानी हो। श्याओमान फौरन उठी और तख्ता दरवाज़े से दूर वाले कोने में सरकाने में हाथ बँटाया।
दोनों तख़्ते के दो सिरों से ज़ोर लगा रही थीं। पहली बार वे साथ काम कर रहे दो आम लोगों जैसी लग रही थीं। ऐन आख़िर में बूढ़ी छिन ने बेटी से हाथ ऊपर उठाने को कहा, मगर श्याओमान ने तख़्ता पहले अपनी ओर मोड़ लिया। कोना अलमारी से जा टकराया। दोनों एक साथ रुक गईं। बूढ़ी छिन ने कहा कि तुम्हें पहले भी कहती थी, मेरी बात सुनकर हाथ चलाया करो। श्याओमान के चेहरे के भाव उसी पल सिमट गए। माँ समझ गईं कि ग़लत कह दिया। वह जोड़ना चाहती थीं कि तख़्ते को कुछ नहीं हुआ, मगर वह पल बीत चुका था जब एक और वाक्य जोड़कर बात वहीं से सँभाली जा सकती थी।
बिस्तर जम जाने पर बेटी परदे के नीचे खड़ी रही। दादी छिन को लगा शायद वह अभी बात करना चाहती है, इसलिए पूछा कि आशंग का पिता कहाँ का था और उसके घर में अब भी कोई है या नहीं। श्याओमान ने बताया, तानशी की ओर का था, उसका एक बड़ा भाई है और त्योहारों पर वह बच्चे को लेकर उसका हाल पूछने जाती है। माँ ने पूछा कि बड़े भाई ने कोई देखभाल की थी क्या। श्याओमान ने कहा, हर घर की अपनी ज़िंदगी है, हालचाल पूछ सकें, यही बहुत है। दादी छिन को लगा, जैसे इस बात ने कुछ कह सकने का पूरा दरवाज़ा पहले ही बंद कर दिया हो।
“उस वक़्त अगर पता होता कि बीमार की देखभाल में तुम्हें इतनी मुश्किल है, तो मेरे यहाँ से कुछ तो…” उनकी बात पूरी होने से पहले ही श्याओमान ने उनकी ओर देखा।
“तुम्हें कैसे मालूम कि उसे बस थोड़े पैसों की कमी थी?”
दादी छिन ठिठक गईं। बोलीं, उनका वह मतलब नहीं था। पति की मौत की बात सुनकर उन्हें बस वह समय याद आया जब उनके पति बीमार थे और वे दरवाज़ा खोलने से डरती थीं कि कहीं कोई दवा के पैसे माँगने न आ गया हो। उन्होंने सोचा, शायद बेटी के साथ भी ऐसा हुआ हो। मगर मुँह से बात ऐसी निकली मानो जल्दी लौट आती तो इस पूरे दुख से बच जाती। श्याओमान ने परदे के किनारे से निकला धागा उँगली पर लपेट लिया। आवाज़ ऊँची किए बिना उसने पूछा, क्या उन्हें भी लगता है कि उसने ग़लत राह चुनी थी, इसीलिए उसे ऐसी ज़िंदगी मिली?
बूढ़ी छिन ने कहा, नहीं। यह ‘नहीं’ इतनी जल्दी निकला कि ख़ुद उन्हें भी इस पर पूरा यक़ीन नहीं हुआ। वह भला बेटी को दुखी कैसे देखना चाहतीं। मगर जब से सुना था कि श्याओमान ने घर बसा लिया है, उसका एक बेटा है और उसका पति भी चल बसा है, तब से उनके भीतर एक ख़याल था जिससे वह आँख नहीं मिला पाती थीं। उस वक़्त मेरी बात मानी होती तो कम से कम नाटक की नाव पर दिन काटने की नौबत न आती। आज बेटी ने एक ही सवाल में उस जगह हाथ रख दिया। तभी बूढ़ी छिन को पता चला कि शादी की लाल पर्ची जला देने पर वह ख़याल उसके साथ राख नहीं हुआ था।
वह अपनी मुश्किलें भी बताना चाहती थीं, कि रात में अकेले दरवाज़ा सँभालती रहीं, सगाई की भेंट लौटाने में तीन बरस लगे, लोगों की बातें सुननी पड़ीं। मगर एक बार ये बातें गिनाने लगतीं तो बेटी को सब सुनना पड़ता और फिर कहना भी पड़ता कि माँ के लिए भी आसान नहीं था। उन्होंने देखा कि श्याओमान परदे का किनारा अपनी उँगलियों पर कसकर लपेट चुकी थी। अचानक याद आया कि बरसों पहले झगड़े के अंत में भी उसके हाथ ऐसे ही थे। उसे दोनों हाथ रखने की कोई जगह नहीं मिली थी, तभी उसने एक झटके में दरवाज़ा धकेलकर खोल दिया था।
“उस वक्त तुम कुछ दिन और रुकने को क्यों राज़ी नहीं हुईं?” दादी छिन ने पूछा।
श्याओमान ने उनकी ओर देखा। थोड़ी देर बाद बोली कि उसने इंतज़ार किया था, यहाँ तक कि उस आदमी से किस दिन मिलना है, यह भी उसे पड़ोसियों से पता चला। माँ हमेशा कहती थीं कि फिर बात करेंगे। एक बार बात नहीं बनती, तो अगली बार घर में कोई नई चीज़ पहले ही आ चुकी होती। माँ इस पर बात करने को तैयार नहीं थीं कि उसकी ज़िंदगी का फ़ैसला पहले करने का हक़ किसे है। आख़िर में बेटी के हाथ में बस एक काम रह गया था जिसे वह खुद कर सकती थी। घर से निकल जाना।
सुनते ही बूढ़ी छिन ने मन में प्रतिवाद किया कि मैंने कब सुनने से इनकार किया था। बस उसे किसी अनिश्चित जगह की ओर जाते अपनी आँखों से नहीं देख सकती थी। उन्होंने मुँह खोला, फिर श्याओमान के बदन पर धुल-धुलकर मुलायम हुआ धूसर कपड़ा देखा। तब ख़याल आया कि बेटी उस राह पर सोलह साल से चल रही थी, आज वह ख़ुद उसे सुरक्षित कहने को राज़ी हों या न हों। सामने वह औरत थी जो माँ बन चुकी थी और अपने पति को अंतिम विदा दे चुकी थी। उसे जवाब देते समय बूढ़ी छिन अब उस लड़की को सामने नहीं रख सकती थीं जिसने तब ससुराल की देहरी भी नहीं लाँघी थी।
उन्होंने सिर झुकाकर कहा कि उस वक्त डरती थीं। श्याओमान ने कहा, मैं भी डरती थी। उसने आगे ‘मैं समझती हूँ’ नहीं जोड़ा। दोनों वहीं रुक गईं, जैसे दरवाज़े का एक-एक सिरा उठाए हों और किसी का ज़रा-सा हिलना भी दूसरी की उँगलियाँ दबा सकता हो। बाहर हवा में लालटेन का कागज़ लगातार हल्की सरसराहट कर रहा था। आशंग ने पलंग पर करवट ली। श्याओमान ने फौरन कान उधर किया और आवाज़ थमने पर ही फिर माँ की ओर देखा।
छिन दादी ने फिर नहीं पूछा कि दोनों संदेश और लोगों के हाथ क्यों नहीं भिजवाए। यह भी नहीं पूछा कि इतनी पास थी तो सोलह बरस में एक बार भी क्यों नहीं आई। वह जानती थीं कि ख़ुद भी चलकर उसके पास नहीं गईं। मगर इस वक़्त सीधे कहना कि ‘तब मुझे तुम्हारा रिश्ता तुम्हारी जगह तय नहीं करना चाहिए था’, अब भी सीने में अटकता था। मानो वह इससे उस बात को झुठला देंगी कि इस घर के लिए कोई राह ढूँढ़ने में उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई उपाय नहीं छोड़ा था। उन्हें लगा कि बेटी भी शायद उसी बात की राह देख रही है। आख़िर उन्होंने नज़र हटा ली।
श्याओमान ने कहा कि चौदह तारीख को सुबह कुछ जल्दी निकलेगी। वाद्य ठीक हो गया तो ले जाएगी, नहीं हुआ तो भी पहले मंडली में लौटना होगा। बूढ़ी छिन को याद था कि आझाओ यह बता चुकी है, फिर भी पूछा कि दो दिन और नहीं रुक सकती? उन्होंने इतने धीरे पूछा कि जैसे बस यूँ ही पूछ रही हों, मगर श्याओमान का चेहरा फिर तन गया। बेटी ने कहा कि हाथ में जो काम है उसे छोड़कर बेफ़िक्र नहीं बैठ सकती। लोगों को कपड़े पहनने हैं और उसे अपनी मज़दूरी भी लेनी है। बूढ़ी छिन ने सिर हिलाया, पर नाख़ून से आस्तीन की उसी जगह के धागे को एक बार दबोच लिया।
वह कहना चाहती थीं कि यहाँ भी काम है। दुकान हर बसंत में व्यस्त रहती है और ग्राहकों के आने पर किसी का होना ज़रूरी है। बात होंठों तक आई तो दिन का अपना ही सवाल याद आ गया, ‘अब भी गाती हो?’ अगर वह सब कुछ ठीक से तय कर सकती थीं, तो बेटी को इन दो दिनों से आगे अपनी ज़िंदगी नए सिरे से सँवारने की क्या ज़रूरत पड़ती। आख़िर उन्होंने बस इतना कहा कि कल मो उस्ताद के यहाँ जल्दी जाना। दोपहर बाद उन्हें धारा के ऊपर वाले घाट पर एक तारवाद्य देखने जाना है, कहीं मुलाक़ात चूक न जाए।
श्याओमान के कंधे कुछ ढीले पड़े जान पड़े। उसने कहा, समझ गई। वह बेटे को रजाई ओढ़ाने पलंग के पास लौटी। दादी छिन भी पीछे गईं और बाहर निकला कोना पायताने की ओर मोड़ दिया। श्याओमान ने देखकर कहा, पूरा मत दबा देना, रात को वह पैर हिलाता है। दादी छिन लगभग कहने ही वाली थीं कि कितनी बार उन्होंने उसे ओढ़ाया है, मगर उनका हाथ पहले ही ढीला पड़ गया और कोना खुला रह गया। बच्चे ने सचमुच एक बार पैर झटका। रजाई गिरी नहीं, बस पैर की उँगलियाँ बाहर आ गईं।
खिड़की अब भी खुली थी। छिन दादी ने शाम को उसे बंद नहीं किया था। नदी के पार इक्का-दुक्का रोशनियाँ जल चुकी थीं। उन्हें काउंटर के पास से उस ओर देखने की आदत थी। हमेशा लगता कि खिड़की बंद होते ही दूर की बची-खुची हलचल भी सुनाई नहीं देगी। श्याओमान उसे बंद करने गई। लकड़ी की कुंडी छूते ही पल भर रुकी, फिर मुड़कर पूछा कि इसमें से अब भी हवा आती है क्या। छिन दादी को याद आया कि पति ने जीते-जी इसे दो बार सुधारा था। उन्होंने कहा कि उत्तर की हवा तेज़ हो तो यह खड़कती है। आज हवा इतनी तेज़ नहीं है।
बेटी ने उसकी तरह नदी की ओर नहीं देखा। बोली कि आ शंग इधर सोता है, डर है रात में उसे हवा लगेगी। छिन दादी ने ‘हूँ’ कहा, मगर खड़ी रहीं, मानो किसी के लिए जिस तरफ़ पहरा दे रही थीं, उधर अभी पूरी नज़र नहीं डाल पाई हों। खिड़की के बाहर कोई देर रात कंधे पर बोझ लादे घर लौट रहा था। रोशनी एक बार डोली और दीवार की बग़ल से ग़ायब हो गई। तभी उन्होंने ख़ुद हाथ बढ़ाकर खिड़की धीरे-धीरे बंद की और ठीक से न बैठने वाली लकड़ी की कुंडी लगा दी।
उन्होंने कमर से एक चाबी खोली और पलंग के पास की छोटी मेज़ पर रख दी। कहा कि पिछला दरवाज़ा कुएँ की ओर खुलता है। रात में उठो तो यह चाबी इस्तेमाल करना, बाहर की कोठरी में किसी को बुलाने की ज़रूरत नहीं। श्याओमान ने एक नज़र देखी। न फौरन उठाई, न वापस सरकाई। छिन दादी कहना चाहती थीं कि बाहर जाना हो तो भी इसी से जाना, मगर लगा कि यह ज़्यादा सोच-समझकर कही बात लगेगी, जैसे इंतज़ार हो कि बेटी कहे अब फिर नहीं जाऊँगी। उन्होंने बाकी बात निगल ली और बस पूछा कि थोड़ा गुनगुना पानी और चाहिए क्या।
श्याओमान ने कहा कि पानी अभी है, वह खुद ले लेगी। छिन दादी बाहर वाले कमरे में लौटीं। लेटने पर पता चला कि नया बिछाया हुआ तख्ता कितना सख़्त है। कंधा जैसे भी घुमाएँ, रोज़ वाली धँसी जगह नहीं मिलती थी। उन्हें डर था कि करवट की आवाज़ से बेटी जान जाएगी कि उसे कमरा देकर उन्हें तकलीफ़ हो रही है, इसलिए वे जस की तस पड़ी सुनती रहीं। तभी अंदर क़दमों की आहट हुई। श्याओमान कपड़ा ओढ़कर निकली और उनके कंधे के नीचे देखकर बोली कि तुम इस तख्ते पर रोज़ नहीं सोतीं। छिन दादी कहने ही वाली थीं कि सोती हूँ, मगर बेटी ने एक तह किया पुराना कुरता उनकी कोहनी के पास लगा दिया और कहा कि करवट लो तो इस पर थोड़ा टिक जाना। उन्हें सहज ही डर हुआ कि दबकर कपड़ा बिगड़ जाएगा। बोलीं कि इसकी तह कसकर दबे तो सलवट पड़ती है। श्याओमान ने कहा कि कल वैसे भी इसे धोना है। किसी ने फिर न शुक्रिया कहा, न मना किया। श्याओमान कपड़े का किनारा सीधा करके लौट गई। छिन दादी ने परदा गिरने तक इंतज़ार किया, फिर धीरे से उस तरफ़ करवट ली। कोहनी के नीचे सचमुच पहले से नरम था।
कुछ देर बाद भीतर से श्याओमान ने धीमे से पूछा, “माँ, धुएँ से लालटेन का कागज़ ख़राब तो नहीं होगा? अपनी तरफ़ का छोटा दिया थोड़ा दूर रख दो।”
“माँ” इतनी सपाट आवाज़ में कहा गया था कि उन्हें लगभग ठीक से सुनाई नहीं दिया। उन्होंने कहा, धुएँ का डर नहीं, दिया दूर कर दिया है। फिर भी उठीं और मिट्टी का छोटा दिया एक हथेली और परे खिसका दिया। मुड़ीं तो पुरानी बाँस की लालटेन अलमारी में लिपटी दिखी, उसकी पीतल की कुंडी पर रोशनी नहीं पड़ रही थी। हाथ बढ़ाकर छुआ और वहीं छोड़ दिया। बेटी कमरे में थी, इसलिए उसे निकालकर यह साबित करने की जल्दी नहीं की कि इतने साल उसकी राह देखना सही था। बाहर लकड़ी का काँटा कभी-कभार खिड़की की चौखट से हल्के से टकराता था। वे थोड़ी देर सुनती रहीं और आख़िर खिड़की तक फिर नहीं गईं।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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