प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
दीप फिर दुकान के काउंटर पर
कू वूजी · AI सृजन · 9315 अक्षर · लगभग 12 मिनट
ल्योउवान लौटने वाली यात्री नाव भी सांगछ्याओ में एक रात रुकी। इस बार आ झाओ ने नहीं पूछा कि कोई दूसरी नाव मिल सकती है या नहीं। उसने पहले संदूक लकड़ी की पट्टियों पर टिकाया और दीया पैरों के पास रखा। जब सब ठीक से बैठ गए, तब एक छोटे पुराने कपड़े से लपेटने वाले काग़ज़ की फटी जगह ढकी। काग़ज़ पर 春和班 (छुनहे मंडली) के तीन अक्षर खुले रह गए। बगल के यात्री ने पूछा कि क्या वह नाटक देखकर लौटी है। उसने कहा कि अभी बाक़ायदा नाटक नहीं देखा, बस कुछ अंशों का अभ्यास देखा है।
उस आदमी ने ईर्ष्या से कहा कि अभ्यास भी अच्छा लगता होगा, देखने के पैसे भी नहीं देने पड़ते। आझाओ को अपने उधेड़कर वापस किए आस्तीन के चुन्नट याद आए। उस दोपहर को फ़ायदा उठा लेना कहना मुश्किल था, इसलिए बस मुसकरा दी। आज़माइशी काम से कमाए बारह वेन उसने बाक़ी राह-ख़र्च से अलग रखे थे। नाव का भाड़ा गिनते समय कई बार अनजाने उस छोटी लड़ी को छू लिया, मानो अब वे उसी तरह के ताँबे के सिक्के न रहे हों। वापसी का रास्ता सचमुच आते समय से थोड़ा परिचित था, मगर इससे यात्रा की एक रात कम नहीं हुई।
सत्रह तारीख की दोपहर थोंगश्यू के घाट पर नाव अभी ढंग से लगी भी नहीं थी कि आझाओ को सामने लिउवान की पुरानी नाव खड़ी दिखी। दिंग छ्वान चप्पू चला रहा था। उसके पास मुर्गियाँ पहुँचाने वाला एक बूढ़ा बैठा था, जो पिंजरे के आर-पार हाथ से इधर-उधर इशारे कर रहा था। दूर से देखते हुए उसे अचानक एक ऐसी खीझ हुई जिसे वह बयान नहीं कर सकती थी। समझ नहीं आया कि उसे इस बात पर ग़ुस्सा था कि वह उसकी नाव इतने सधे ढंग से चला रहा है, या इस पर कि उसने उसकी जगह ऐसे यात्री को भी पार उतार दिया। जब वह सचमुच नाव पर चढ़ी तो दिंग छ्वान ने सबसे पहले पूछा कि उसने खाना खाया है या नहीं। तभी वह अपनी उस छोटी-सी खीझ को चेहरे से हटा पाई।
दिंग छ्वान ने कहा कि इन दिनों कुछ बड़ा नहीं हुआ। उसके रहते जितना पानी उलीचना पड़ता था, उससे भी कम निकालना पड़ा। जोड़ पर लगाया कामचलाऊ पैबंद काम का लग रहा था। उसने उसकी जगह कुछ फेरे लगाए थे। अपनी मज़दूरी का हिस्सा रखकर बाक़ी दस-बारह वन घर में बाँधकर रख दिए थे, वह बाद में ले जाए। आज़ाओ ने सिर हिलाया। उसने इन कुछ दिनों के अपने फेरों का इतना साफ़ हिसाब दिया कि आज़ाओ को उस छोटी पोटली को भी पिता के नाम खाते में डालने में संकोच हुआ। उसने पूछा कि चप्पू की आज़माइश कैसी रही। वह ख़ुश हो गया और फ़ौरन खुलकर बोलने लगा।
नदी पार करके उसने पहले संदूक घर पहुँचाया, फिर दीया बाँहों में लेकर छिन परिवार के घर गई। घर जाते समय से भी ठंडा था। सिलाई की मेज़ पर ख़ाली कटोरा अब भी उलटा रखा था; किसी ने उसके लिए एक भी बेतरतीब चीज़ नहीं बढ़ाई थी। उसे पहले पल सचमुच निराशा हुई, मानो बाहर से लौटने पर घर में उसके इंतज़ार का कुछ निशान दिखना चाहिए था। आख़िर उसने मेज़ भी नहीं पोंछी, बस बारह वेन छोटी डिब्बी में रखे, सुइयों की नली निकाली और आस्तीन में रखकर साथ ले गई।
दादी छिन लालटेन का ढाँचा ठीक कर रही थीं। उसे भीतर आते देखा तो चाकू चलाना बंद कर दिया। आझाओ ने लालटेन अलमारी पर रखी और बताया कि लानथिंग में छिन श्याओमान से मिली। बुज़ुर्ग ने सवालों की झड़ी नहीं लगाई, जैसा आझाओ ने नाव पर सोचा था। उन्होंने पहले लालटेन पर लगा कपड़े का टुकड़ा देखा, उँगली उसके किनारे पर फेरी और पूछा, क्या यह वहाँ नया लपेटा गया था?
“रास्ते में कागज़ फट गया था, मैंने अपने कपड़े से ढक दिया।”
बूढ़ी छिन का हाथ धीरे से नीचे आ गया। वह हरकत देखकर आज़ाओ को लगा कि शायद वह कपड़े के बारे में पूछना ही नहीं चाहती थीं। उसने काग़ज़ ढीला किया। बाँस की पुरानी पट्टियाँ सलामत थीं, पीतल का बकसुआ टकराकर पिचका नहीं था। दीप दो दिन जाने और दो दिन लौटने की जलयात्रा के बाद उसी काउंटर पर वापस आ गया, जैसे कुछ बदला ही न हो। मगर अब आज़ाओ बस इतना कहकर बात ख़त्म नहीं कर सकती थी कि यह दीप आपको उधार दिया था, लो वापस आ गया।
उसने पहले बताया कि श्याओमान सचमुच छुनह मंडली में है। नाटक में गाने के साथ कपड़े भी सँभालती है, उसका बेटा आठ साल का है और पति दो साल पहले बीमारी से गुज़र गया। पति का ज़िक्र हुआ तो दादी छिन ने आँखें उठाकर पूछा, घर कब बसाया था? आझाओ ने वही साल बताया जो श्याओमान ने कहा था। बुज़ुर्ग जैसे मन में हिसाब करने लगीं। आझाओ से धीमे हिसाब लगाया और कुछ देर बाद फिर पूछा, वह आदमी उसके साथ कैसा बर्ताव करता था?
आ झाओ ने कहा कि उसे मालूम नहीं। उसने सिर्फ़ बच्चा और कपड़ों के संदूक देखे थे, उस आदमी को कभी नहीं देखा। छिन दादी जैसे इस जवाब से कुछ असंतुष्ट हुईं। उन्होंने सिर झुकाकर बाँस का एक रेशा उठाया। फिर पूछा कि क्या श्याओमान अब नाटक में नहीं गाती। आ झाओ ने कहा कि अब भी गाती है, एक अंश में नाव चलाने वाली युवती की माँ बनी है। बात कहते ही उसे पछतावा हुआ कि इतना खुलकर क्यों बताया। मगर छिन दादी ने उसमें और कोई मतलब नहीं सुना। उन्होंने बस धीरे से ‘माँ’ शब्द दोहराया, जैसे उस किरदार ने अचानक बेटी को उनकी अपनी उम्र के क़रीब ला खड़ा किया हो।
बूढ़ी छिन ने पूछा कि वह वहाँ कितने दिन रही, ठीक से खाती है या नहीं, दुबली तो नहीं हो गई। आज़ाओ ने जितना जानती थी, उतना बताया। आख़िर में वह लगभग श्याओमान की ओर से कह ही बैठती कि वह बहुत अच्छी तरह रह रही है, ताकि काउंटर पर पसरी चुप्पी और भारी न हो। मगर उसे याद आया कि श्याओमान ने आधी टिकिया एक ओर रख दी थी और सुई बदलते वक़्त उसकी उँगलियाँ पल भर को अकड़ गई थीं। आख़िर उसने इतना कहा कि दिन आसान नहीं हैं, मगर अपने ढंग से सँभाल लेती है और हर वक़्त घर से किसी के आकर ले जाने की राह नहीं देख रही।
आख़िरी बात सुनकर छिन दादी का चेहरा थोड़ा तन गया। आ झाओ का इरादा किसी पर उँगली उठाने का नहीं था, मगर बात मुँह से निकली तो कुछ ऐसी ही लगी। उसने आस्तीन से सुइयों की डिबिया निकाली। कहना चाहती थी कि सुइयाँ इस्तेमाल कर ली हैं, दुकान के लिए उनकी जगह नई दे सकती है। फिर लगा कि सब वापस कर देगी तो जैसे जान-बूझकर हिसाब चुकता कर रही हो। उसने बस सबसे महीन सुई निकाली और कहा कि यह बड़े काम की है। बुज़ुर्ग ने एक नज़र देखकर कहा कि ख़रीदते समय उन्होंने चुनकर ली थी।
इस एक ठोस चीज़ से दोनों फिर बात कर पाईं। छिन दादी ने पूछा कि नाटक की पोशाक में भी ऐसी बारीक सुई लगती है क्या। आझाओ ने कहा, कपड़े पर निर्भर है। उसने अभी सीखा है कि जिन चुन्नटों में गुंजाइश चाहिए, उन्हें पूरा बंद नहीं सीना चाहिए। उसने उस दिन की अपनी फ़ज़ीहत का थोड़ा हिस्सा सुनाया, गू मिंग का ज़िक्र नहीं किया। बूढ़ी के होंठों के कोने हिले। बोलीं, मेरी बेटी भी पहले मेरे छोड़े धागे की लकीर पर नहीं चलती थी। मैं कहती थी उधेड़ दो, तो उलटे कहती थी दूसरों को समझ नहीं है। आधी बात पर जैसे याद आया कि सोलह साल से वह वहाँ रही ही नहीं। आगे का वाक्य उन्होंने रोक लिया।
आझाओ ने इसी मौक़े पर कहा कि श्याओमान नाटकों का यह दौर पूरा होने पर बच्चे को लेकर एक बार नदी पार आना चाहती है। उसने “चाहती है” साफ़-साफ़ कहा और यह भी बताया कि अभी कोई दिन तय नहीं है। दादी छिन ने नहीं पूछा कि तय क्यों नहीं कर सकती। उलटे उठकर पीछे का कमरा देखने चलीं, मानो देग अभी धोनी हो और पलंग के तख़्ते फिर सरकाने हों। दो कदम चलकर लौट आईं और पूछा, बच्चे को पानी से डर लगता है क्या? आझाओ ने कहा कि मंडली के साथ सफ़र करते बड़ा हुआ है, शायद नहीं, मगर उसने ख़ुद कभी उसे नाव पर नहीं बिठाया।
छिन दादी ने कहा कि पानी से नहीं डरता तो अच्छा है, फिर उन्हें लेने के लिए किसी को अलग से बुलाना नहीं पड़ेगा। फ़ौरन फिर पूछा कि घर की ओर जाने वाले रास्ते पर अब पत्थर बिछ गए हैं, उन्हें मालूम है किधर से आना है? आ झाओ ने देखा कि वह मन ही मन पूरी यात्रा तय कर चुकी हैं। उसने जल्दी से कहा कि लानतिंग लौटकर पूछेगी, अभी तो दिन भी मालूम नहीं। तब जाकर बुज़ुर्ग बैठीं। उनकी उँगलियों के पोर दुकान के काउंटर पर धीरे से खटके, जैसे कोई उन्हें अचानक एक ऐसी गाड़ी के पास छोड़ गया हो जो अभी चली ही नहीं।
“जो बात मैंने भिजवाई थी, क्या उसने उसके बारे में कुछ कहा?” छिन दादी ने पूछा।
आ झाओ ने कहा कि उसने संदेश पहुँचा दिया था और श्याओमान ने उस पुराने शादी के रिश्ते के बारे में भी पूछा था। उसने नहीं बताया कि तब श्याओमान कैसे हँसी थी। बस सवाल दोनों के बीच रख दिया। छिन दादी का हाथ एकाएक थम गया। दुकान के बाहर से कोई ठेला धकेलता हुआ गुज़रा। उसका लकड़ी का पहिया दहलीज़ से रगड़ा और देर तक आवाज़ करता रहा। आवाज़ थम गई, तब भी आ झाओ को जवाब नहीं मिला।
आखिर बूढ़ी बोलीं, कितने बरस पुरानी बात है, अब भी क्यों पूछती हो। आझाओ को वह बात याद आई जिसे वह सबसे कम सुनना चाहती थी कि पुरानी नाव सुधर सकती है, मगर सवारी कम हो तो क्या होगा। उसे अचानक समझ आया कि कितने बरस बीत गए, इससे किसी एक ठोस सवाल का जवाब नहीं मिलता। उसने फिर पूछा, तो अब आखिर बात क्या है। छिन दादी ने उसे देखा। पल भर को उनकी आँखें ऐसी लगीं जैसे वह अपनी बेटी की उस ज़माने की ज़िद भी इस युवती के सिर मढ़ देना चाहती हों।
“मैंने कहा था कि पुरानी बातें नहीं छेड़ूँगी।”
“यह वही बात है जो आपने उसके लिए भिजवाई थी।” आझाओ ने बहुत धीरे जवाब दिया, “उसने मुझसे जो पूछा, उसका जवाब मैं अभी नहीं दे पाई हूँ।”
बूढ़ी छिन ने सिर घुमाकर बाँस की उस पट्टी को देखा जिसे छीलना अभी बाक़ी था। आज़ाओ को समझ नहीं आया कि वह कहीं हद से आगे तो नहीं निकल गई। उसे तो बस श्याओमान से मिलना था और दीप वापस लाना था। सवाल भी ज्यों का त्यों उठाकर लाने की क्या ज़रूरत थी। मगर बूढ़ी छिन का मन रखने के लिए अगर वह श्याओमान का यह सवाल छोड़ देती, तो अगली बार पोशाकों की संदूक के सामने बैठी उस औरत से मिलकर बात कहाँ से शुरू करती। उसने सुइयों की डिबिया थामे रखी और फिर कुछ नहीं कहा।
कुछ देर बाद बूढ़ी छिन बोलीं कि झोउ परिवार अब कब का बदल चुका है और उन्होंने भी कोई काग़ज़ लेकर कहीं किसी से कुछ करने को नहीं कहा। आझाओ ने समझा कि कोई विवाह का पत्र लिए बेटी के लौटने का इंतज़ार नहीं कर रहा था, फिर भी उनकी तरफ़ से यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि अब वह रिश्ता ख़त्म हो गया है। उसने पूछा कि अगली बार लांतिंग जाकर क्या वह यही बात ज्यों की त्यों कह सकती है। इस बार बूढ़ी छिन ने जवाब नहीं दिया। सिर झुकाकर बाँस की पट्टी का सिरा रेशा-रेशा गोल करने लगीं, रोज़ से कहीं ज़्यादा धीरे।
आ चाओ दीयों की दुकान में इस इंतज़ार में नहीं रुकी कि बुढ़िया किसी नतीजे पर पहुँचे। उसने कहा कि दीया अभी काउंटर पर रख देती है। इन दिनों उसे नाव भी सँभालनी है और आगे फिर उधार चाहिए हुआ तो आकर बताएगी। दादी छिन ने सिर उठाया, जैसे अब जाकर ध्यान आया हो कि दीये की भी अपनी जगह है। उन्होंने हामी भरी और दीया काउंटर के भीतर की ओर सरका दिया। फिर उसका सहारा लेकर यह नहीं पूछा कि श्याओ मान उसे पहचानती है या नहीं। आ चाओ दरवाज़े से निकली तो सुइयों की नली फिर उसकी आस्तीन में थी। उसने उसे लौटाया नहीं और उसे यह भी नहीं लगा कि इस वजह से उस पर कोई मीठी बात कहने का क़र्ज़ चढ़ गया है।
घाट लौटते हुए वह पहले दिंग परिवार के घर दस-बारह वन लेने गई। लुओ येन दरवाज़े के पास बाँस चीर रही थी। लानतिंग में आज़ाओ ने जो काम किया, उसका हाल सुनकर न उसने तारीफ़ की, न हँसी। बस पूछा कि उँगलियाँ छिल तो नहीं गईं। आज़ाओ ने हाथ बढ़ाया। अँगूठे और तर्जनी के बीच का पुराना घट्टा था, उँगलियों के पोर घर से निकलने के पहले से कुछ नरम थे। लुओ येन ने एक नज़र देखकर कहा कि ऐसा ही होता है। काम बदलो तो हाथों पर नए ढंग से घट्टे पड़ते हैं। फिर उसने दिंग सुई को बुलाया कि बाँस की जिस आधी पट्टी पर काम नहीं करना चाहती थी, उसे यहाँ लाए। कोई दूर जाकर उसके लिए नए नमूने देख आए, बस इसी इंतज़ार में न बैठी रहे।
दिंग सुई ने सुना तो उसकी आँखें पहले आज़ाओ की ओर चमकीं। आज़ाओ ने जल्दी से कहा कि वह बस नाटक की मंडली में गई थी, दीपों की दुकानें नहीं देखीं। लड़की का चेहरा सचमुच उतर गया। उसने मुँह बिचकाया, फिर भी बाँस की पट्टी माँ को थमा दी। उसकी यह शक्ल देखकर आज़ाओ को छिन परिवार के काउंटर के पास से कहीं ज़्यादा सहज लगा। वह मान भी पाई कि राह चलते एक छोटी-सी चीज़ देख आने का जो वादा किया था, वह पूरा नहीं हुआ। उसने कहा कि अगली बार सच में दिखी तो बताऊँगी। दिंग सुई ने जवाब दिया कि पहले तुम्हें अपने लिए काम तो ढूँढ़ लेना चाहिए।
देर से तिंग छ्वान नई पतवार लेकर लौटा और पूछा कि लानथिंग वाले आख़िर उससे काम कराना चाहते हैं या नहीं। आझाओ ने कहा, बस कुछ छोटे काम आज़माने को दिए थे, उसने एक जगह ग़लत सिल भी दिया और मज़दूरी कुल बारह वेन थी। उसे लगा था कि यहाँ तक कहते-कहते उसका चेहरा लाल हो जाएगा। मगर हिलने के लिए छोड़ी उस चुन्नट का ज़िक्र आया तो लू हन्यांग कैसे कंधा घुमाती है, यह दिखाए बिना नहीं रह सकी। मेज़ के पास का पुराना कपड़ा भी उठाकर एक बार तह करके दिखाया। तिंग छ्वान बात पूरी तरह समझा नहीं, मगर इतना समझ गया कि वह लौटकर उससे यह सुनना नहीं चाहती थी कि अब फिर वहाँ मत जाना।
उसने कहा कि कल वह पश्चिमी घाट पर जलावन के गट्ठरों के बारे में पूछने जाएगा। अगर नाव अभी कुछ दिन और यहीं रहे तो वह उसकी देखभाल कर सकता है। मगर आगे यात्रियों को कौन पार लगाएगा, मरम्मत की सामग्री का ख़र्च कौन देगा, इस पर फिर बात करनी होगी। सब कुछ यूँ घालमेल में नहीं चल सकता। आझाओ ने सिर हिलाया। उसने उसी वक़्त नाव उसे किराये पर नहीं दी, न फिर यह बताया कि पिता पहले कैसे करते थे। पहले उससे नया चप्पू किसी सूखी जगह रखने को कहा और ख़ुद नाव की पिछाड़ी से पानी उलीचने चली गई।
रात में दीप के हिसाब वाला पन्ना पलटते हुए उसका हाथ कुछ देर ठहर गया। दीप वह बहुत पहले अपने हाथों में ले चुकी थी। अलमारी पर रखा दीप वही था जिसे उसने कुछ और वक़्त वहाँ रहने देने की हामी भरी थी। कोई आए या न आए, उसे उधार की चीज़ का बकाया नहीं मानना चाहिए था। वह पिता की लिखी उस मद को काट सकती थी, मगर उनकी आख़िरी पंक्ति को इतनी जल्दी छूने का मन नहीं हुआ। उसने बही बंद कर दी और नाप के एक बेकार काग़ज़ पर अलग से लिखा, डोरी का छेद, आस्तीन की चुन्नट, धूसर-नीली पोशाक। लिखावट सुंदर नहीं थी, फिर भी उसने उसे दो बार पढ़ा। तब मेज़ पर रखा मिट्टी का छोटा दीप फूँककर बुझाया, जो पुराने बाँस के दीप से अलग था।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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