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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

कू वूजी · AI सृजन · 9161 अक्षर · लगभग 12 मिनट

सत्ताईस तारीख को दोपहर बाद आझाओ उत्तर से आई यात्री नाव से उतरी। पहले थोंगश्यू में एक छोटा कटोरा गरम दलिया लिया और दिंग छ्वान के पश्चिमी किनारे से आने का इंतज़ार किया। कल रात वह सांगछ्याओ में ठहरी थी। आज सुबह फिर झंग छिन की नाव में बैठी। कुछ महीनों में बहुत-सी सवारियाँ बदल गई थीं, मगर घर लौटने की उसकी जल्दी से दो दिन के सफ़र की एक रात कम नहीं हुई। पूरबी घाट के एक सब्ज़ी वाले ने उसे पहचानकर पूछा कि ह परिवार की नाव आखिर बिक गई क्या। उसने सिर हिलाया और कहा कि किराया आगे बढ़ाने आई है।

नाव पर अब ज़्यादा लोग नहीं थे। दिंग छ्युआन ने आख़िरी पुराने ग्राहक की टोकरी थामी, पैसे रखे, तब उससे बात की और पूछा, शरद का प्रदर्शन कैसा रहा। आ झाओ ने कहा, हो गया, दोनों रातें पूरी नहीं भरीं, मगर घाटा भी नहीं हुआ। घाटा नहीं हुआ सुनकर दिंग छ्युआन ने सिर हिलाया। वह नाट्यशाला वालों जैसा नहीं था, जो हमेशा और पूछना चाहते हैं कि सबसे अधिक वाहवाही किसे मिली। उसे अब भी यही याद रखना था कि आज रात कितने लोग घाट पार करने की जल्दी में हैं और शरद में पानी उतरने के बाद पूर्वी घाट का कौन-सा कीचड़ वाला हिस्सा फिसलेगा।

आझाओ नाव के भीतर की बग़ल में बैठी थी। उसने देखा कि छठे महीने में बदले गए नए तख़्त पर जगह-जगह जूतों के निशान पड़ गए हैं। रोगन पर एक बारीक खरोंच थी। उसने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाया तो दिंग छ्वान ने कहा कि परसों बाँस की टोकरियों का एक गट्ठर आया था, नीचे कुछ बिछाए बिना उसे ज़रा खींच दिया गया। उसने मरम्मत कर दी है, कल पूरी तरह सूखने पर फिर देखेंगे। उसे पल भर के लिए अब भी कसक हुई, मगर उसने उसे आगे से टोकरियाँ ढोने से मना नहीं किया। नाव को लोग सिर्फ़ आँखों से देखें तो वह बेशक धीरे-धीरे पुरानी होगी, मगर इस नाव के चलते रहने का काम वह नहीं था।

किनारे पर लुओ येन प्रतीक्षा कर रही थी, हाथ में पिछले छह महीनों के किराये का हिसाब दबाए। आठवें महीने की सत्ताईस तारीख़ के दो सौ साठ सिक्के एक गुज़रती नाव लांतिंग पहुँचा चुकी थी; उसने आ झाओ से फिर मिलान करने को कहा। छठे महीने वाले भुगतान में छब्बीस घटाए गए थे, वह भी मूल पंक्ति के पास लिखा था। छह महीनों का वास्तविक किराया कुल एक हज़ार पाँच सौ चौंतीस था, जमा राशि अलग दो सौ साठ थी और कभी इन भुगतानों में नहीं मिलाई गई थी। आ झाओ ने अपनी कुछ रसीदें एक साथ रखीं; दोनों ओर लिखने का ढंग अलग था, मगर सभी रकम सही थीं।

लुओ यान ने उससे घर से ज़मानत की संदूकची लाने को कहा। वह बात आगे बढ़ाने से पहले रकम अपनी आँखों से देखना चाहती थी। आ झाओ ने इसे अविश्वास मानकर बुरा नहीं माना। उसने संदूकची खोलकर पूरी पोटली मेज़ पर रख दी। डोरी के सिरे पर अब भी वही गाँठ थी जो लुओ यान ने मार्च में लगाई थी। उसने इस रकम को कभी अपना नहीं समझा। जून में तख्ता ठीक कराने के लिए जो अस्सी वेन कम पड़े थे, वे अपनी मज़दूरी से दिए थे। आज किसी को दिखाने के लिए रकम फिर से नहीं जुटाई गई थी। लुओ यान ने गिनकर अपनी लाई हुई नई डोरी से पोटली फिर बाँध दी।

दिंग छ्वान छह महीने और किराए पर लेना चाहता था। मगर सर्दी में सवारियाँ कम होती हैं, इसलिए पूछा कि पहले तीन महीने बीस वन कम हो सकते हैं क्या। उसने बहुत धीरे कहा, जैसे डरता हो कि आझाओ सुनते ही सोचेगी कि उसे दूर रहता देखकर वह जान-बूझकर दाम दबा रहा है। लुओ येन ने पहले ही अपनी बात साफ़ कर दी। सर्दियों में कुछ लोग घर से नहीं निकलते, अँधेरा भी जल्दी होता है। एक फेरा और लगा देने से कम हुई सारी सवारियाँ नहीं मिल जाएँगी। उसे अपने बाँस के काम के लिए नया सामान लेने को पैसे बचाने हैं। हर बार पारघाट की कमाई कम पड़े तो घर के दूसरे काम की रकम से नहीं भर सकते।

आझाओ पहले ही महीने के दो सौ साठ वन को पक्की रकम मान चुकी थी। बीस कम होने से उसका खाना फौरन बंद नहीं हो जाता, मगर शरद के बाद जो मेज़ लेना चाहती थी, उसमें देर होती। उसने फौरन हामी नहीं भरी। पहले पूछा कि सर्दियों में कोई पूरी नाव किराए पर ले तो उसका हिसाब कैसे होगा। फिर दिंग छ्वान के साथ नया ठहराव देखने गई। आझाओ नाव चलाना जानती थी। जानती थी कि वह मन से हिसाब लगाकर खाली नाव को भरी नहीं गिन सकता। दिंग छ्वान भी समझता था कि तख्ता बदलने का पैसा उसने नदी की तह से नहीं बटोरा। उसने यह नहीं कहा कि मालिक खुद पतवार नहीं चलाती तो उसे बस नाम भर का किराया मिलना चाहिए।

आख़िर तय हुआ कि किराए की मियाद फिर छह महीने रहेगी, आज से बारहवें महीने की सत्ताईस तारीख़ तक तीन महीने, हर महीने दो सौ चालीस वन। उसके बाद के तीन महीने दो सौ साठ वन, और अगले साल तीसरे महीने की सत्ताईस तारीख़ को फिर बात होगी। ढाँचे की बड़ी मरम्मत आज़ाओ के ज़िम्मे होगी, रोज़मर्रा की छोटी चीज़ें दिंग परिवार के। मरम्मत में नाव बंद रहे तो जितने दिन सचमुच बंद रहे, उतने का किराया घटे। तीन दिन की मरम्मत का बहाना लेकर किराए की मियाद आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। तीनों ने ये बातें नए काग़ज़ पर जोड़ दीं। लुओ येन ने दो सौ साठ वन की ज़मानत वापस डिब्बे में रखी और अपने मुँह से कहा कि ज़मानत इतनी ही रहेगी। मियाद पूरी होने पर किराया आगे नहीं बढ़ा तो पैसे सीधे उसे लौटेंगे। किसी और के हाथ में देकर हिसाब चुकता नहीं माना जाएगा।

पहले महीने के नए किराये के दो सौ चालीस वेन सामने ही चुका दिए गए। आ झाओ ने पैसे लिए और दोनों पट्टिकाओं को फिर देखा। पुरानी पीतल की पट्टिका अंदर की ओर थी, लकड़ी की बगल में, और दिंग सुई के नए बनाए फुँदने का रंग बदल गया था। उसने पूछा कि क्या सर्दियों में सीलन से बचाने के लिए फिर उतारना होगा। लुओ येन ने कहा कि फुँदना उतार लेंगे, पट्टिकाएँ नहीं। ‘नाव चलाते हैं दिंग छ्वान’ के अक्षर वहीं रहे। कल भी उसे सुबह जल्दी उठना था। आ झाओ के आज लौट आने से वह फिर ह हुऐझोउ की नाव की एक रात रखवाली करने वाला पड़ोसी नहीं बन गया था।

आझाओ ने उनसे कहा कि सर्दियों के महीने की चिट्ठी अब भी लानथिंग भेजें। श्याओमान के यहाँ मिल जाएगी। वह ठिकाना बदलेगी तो पहले लिख देगी। लुओ येन ने पूछा कि आगे कभी सीधे गू मिंग की मंडली में ही चली जाएगी क्या। वह थोड़ा हँसी। बोली, अभी तो नहीं, आगे का पता नहीं। लेकिन गई भी तो नाव की मरम्मत की बात मुझसे ही करनी होगी। ऐसा नहीं कि कहीं एक नई ह परिवार की लड़की निकल आए जिसे कोई ज़िम्मेदारी न उठानी पड़े। यह कहकर उसने कागज़ समेट लिया। बाकी ज़िंदगी कहाँ जाएगी, उस पर साथ ही दस्तख़त नहीं किए।

रात में उसने अकेले ह परिवार का घर बुहारा। माँ का सुई-धागे का खाना अब भी वहीं था। पिता की तिनकों की बरसाती पहले ऊँची टँगी रहती थी, अब दिंग छ्वान ने उसे कहीं और सँभालकर रख दिया था। उसमें से अब हर समय पानी नहीं टपकता था। उसने दीयों का पुराना बहीखाता निकाला और तीसरे महीने वाली पंक्ति खोली। उसके हाथ का लिखा “दीया लौटा दिया” अब भी पिता की आख़िरी लिखत से सटा था। दूसरे महीने की सत्रहवीं की तारीख़ कुछ धुँधली हो चुकी थी। उसने उसे गहरा नहीं किया और न आगे यह जोड़ा कि बेटी कितनी बार घर लौटी, जैसे उससे वह पिता का हिसाब और पूरा कर सकती हो।

जो नाव तीन बार बिकने से रह गई, उसकी अब भी मरम्मत करनी थी। और बीते दिनों की जो देनदारियाँ कभी पूरी नहीं चुक पाईं, नए सिरे से शुरू करने के लिए उनमें से हर एक को काट देना ज़रूरी नहीं था। उसने यह ख़याल अपने मन में रखा, बही के आख़िर में नहीं लिखा। आगे नया पन्ना खोला और बस इतना दर्ज किया कि आज मासिक किराया दो सौ चालीस है और दो सौ साठ की ज़मानत अब भी जमा है। लिखावट पिता जैसी रवाँ नहीं थी, मगर आँकड़े उसके अपने थे। हर पंक्ति के पीछे अब भी जीते-जागते लोग थे, जो खाने के पैसे, मज़दूरी या तख़्तों की जोड़ के बारे में पूछने आएँगे।

अट्ठाईस तारीख़ को दादी छिन ने उसे दोपहर के खाने पर बुलाया। आच्याओ अलमारी के पास चौकोर लालटेन बना रही थी। आझाओ आई तो उसने एक उठाकर दिखाई। दादी छिन ने पहले कहा कि कोने थोड़ा और बारीकी से बनाए जा सकते हैं, फिर ख़ुद ही हँसकर बाँस की गाँठ की ओर इशारा किया। आझाओ ने तारीफ़ की कि गाँठ छोड़ने से लालटेन सुंदर लग रही है। दादी छिन ने कहा, ग्राहक ख़ास तौर पर यही पसंद करते हैं। मिलने से पहले उन्हें अपनी पुरानी आदत की हर झलक छिपा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ी, और आच्याओ के हाथ में चाबी आने से ऐसा भी नहीं हुआ कि उसके काम में कोई छोटी कमी न बता सके।

श्याओमान की चिट्ठी आ चुकी थी। दादी छिन ने कहा, चावल की लपसी के साथ नमकीन मछली की बात उसने महज़ लिहाज़ में नहीं कही थी, मगर अगली बार वही मछली खरीदना ज़रूरी नहीं। बेहतर है श्याओमान ख़ुद थोड़ा कम नमक डाले। आझाओ को लगा कि वे उसी से जवाब भिजवाएँगी, इसलिए वह थोड़ी देर रुकी। मगर दादी छिन ने अलमारी से पहले ही लिखी एक छोटी चिट्ठी निकाली और कहा, लौटती नाव से भेजेंगी, तुम्हें बार-बार बीच में पड़कर बातें याद न रखनी पड़ें। वह पर्ची आशंग की बाँसुरी वाली तस्वीर के साथ रखी गई। कम शब्दों से वह कोई कम चिट्ठी नहीं थी।

खाने पर किसी ने आझाओ से नहीं पूछा कि वह अब तक ब्याही क्यों नहीं। छिन दादी ने पूछा ज़रूर कि जब काम के मंद महीनों में सिलाईघर में काम न हो, तो पैसे पूरे पड़ेंगे क्या। पूछकर उन्हें डर लगा कि बात कहीं उसे घाट पर लौटने की सलाह जैसी न लगी हो। आझाओ ने कहा कि अभी के लिए काफ़ी हैं। जाड़े में रोज़मर्रा के कपड़ों का काम य जेन के साथ तय है। जिस महीने कम पड़ेगा, उस महीने फिर हिसाब करना होगा। बड़ी मंडली में भी छुटपुट काम के लिए पूछ सकती है। एक दरवाज़ा बंद हुआ तो बस यही नदी नहीं बचेगी। छिन दादी ने सिर हिलाया और टोफ़ू का एक टुकड़ा अपने कटोरे में रख लिया। उन्होंने आझाओ की गृहस्थी चला लेने की क़ाबिलियत का श्रेय अपनी किसी और नसीहत को नहीं दिया।

साँझ को वह ह परिवार के घर लौटी। बूढ़ी छिन भी साथ आईं और कुछ देर बैठीं। तभी दिंग छ्वान ऊँचा दीया उधार लेने आया। उसे पुराने घाट का एक रस्सी का कुंडा देखना था। उसका अपना दीया नीचा था और बाँध के पास उसे उठाकर रखना असुविधाजनक था। आ झाओ ने लकड़ी के ताक़ से दीया उतारा। बूढ़ी छिन ने उसके आवरण पर नए उभर आए काग़ज़ को हाथ से सीधा किया और दिंग छ्वान से कहा कि पानी से बचाकर रखना। तीनों के हाथ एक पल उस पर लगे और दीया दरवाज़े से बाहर चला गया। एक मामूली रस्सी का कुंडा देखने के लिए उसे उठाने से पहले किसी को यह गिनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि बरसों में उसने किन-किन चीज़ों पर रोशनी डाली थी।

दिंग छ्वान उस रात काम देखकर दीप लौटा गया। साथ में बता गया कि रस्सी बस रगड़ से रोएँदार हुई है, कल वह ख़ुद बदल देगा। बड़ी सामग्री को हाथ लगाने की नौबत नहीं आई। आज़ाओ ने दीप दरवाज़े के पास रख दिया। रात का खाना खाने के बाद पता चला कि उसमें ज़रा-सा तेल बाक़ी है। उसने तेल पूरा जल जाने तक इंतज़ार नहीं किया, लौ बुझाकर दीप सँभाल दिया। कल सुबह खिड़की खोलने कोई आएगा और उजाला होते ही दिखाई देने लगेगा। नदी पर और घरों के भी दीप थे, कहीं पास, कहीं दूर, कहीं घने, कहीं छिटके। उन सबकी देखरेख उसके अकेले दरवाज़े से नहीं होनी थी।

उनतीस तारीख़ को उसने घर की एक चाबी हमेशा की तरह लुओ येन के पास छोड़ी और अपनी चाबी बाँस की संदूक में रख ली। पीतल की पुरानी पट्टी अपने साथ नहीं ली, न माँ का खाना एक ही बार में पूरा ख़ाली किया। बस दो अच्छी सुइयाँ और अपनी रोज़ की कैंची साथ रख ली। नाव पर चढ़ने से पहले दिंग सुई पीछे से दौड़ी आई। उसने बेचने के लिए बनाई नई झालर का नमूना दिखाकर पूछा कि लानतिंग में ऐसी पतली पूँछ वाली झालर कोई लेगा क्या। आज़ाओ ने देखकर कहा कि एक साथ ले जाकर पूछ सकती है, मगर वह यह न समझे कि जगह बड़ी है तो हर किसी को चाहिए होगी।

इस बार संदूक दूसरे महीने की तुलना में हल्का था। फिर भी उसने अपने और संदूक के नाव-भाड़े के वही बयालीस वन दिए और सांगछ्याओ में एक रात रुकी। पड़ोस की दुकान की औरत ने गला टाँकने के लिए उसकी सुई उधार ली, शुक्रिया कहकर लौटा दी और यह नहीं पूछा कि वह किसी नामी उस्ताद की शागिर्द है क्या। आझाओ को दो टाँके लगाने पर पता चला कि धागे का रंग नहीं मिल रहा। उसने दूसरा धागा उधार लेकर ही मरम्मत पूरी की। हाथ पहले से सध गए थे, मगर वह तेज़ी से काम करके गड़बड़ी ढकना नहीं चाहती थी। खिड़की के नीचे अँधेरे में पानी बह रहा था। उसे याद आया कि पहली बार लालटेन बचाने में वह दूसरों को रास्ता देना भूल गई थी। वह उठी और पहले संदूक अपने पैरों के पास खींच लिया।

तीस तारीख़ को वह लानथिंग लौटी तो श्याओमान आँगन में दो छी नीला कपड़ा सुखा रही थी और आशंग अपने पहचाने हुए नए अक्षरों के बारे में बताने को उतावला था। आझाओ ने बाँस का संदूक नीचे रखा और पहले नए महीने के बिस्तर के पैंतालीस वन चुकाए। छब्बीस को निकलने से पहले उसने तय किया था कि तीस को लौटकर देगी। श्याओमान ने बिस्तर उसके लिए बचाकर रखा था, सफ़र पर जाने से उन कुछ दिनों का किराया माफ़ नहीं हो गया था। दोनों ने खाने का छोटा हिसाब मिलाया। बच्चा अब भी खड़ा था, इंतज़ार में कि आख़िर उसे उसके अक्षर देखने की फ़ुर्सत मिले।

दोपहर में गाओ मान बदलाव के लिए एक अस्तरदार कपड़ा लाई। साथ में लू हेन्यांग का संदेश था कि केवल हान रोंग को ही इतना चुस्त-दुरुस्त मत बना देना, मेरे पुराने गले की किनारी भी एक बार उधेड़नी है। आझाओ हँस पड़ी और सुइयों की पोटली उठाकर सभागार गई। कपड़े सुखाने की रस्सी पर कुछ जगह खाली हो चुकी थी। नए लिए गए रोज़मर्रा के कपड़े अभी वहाँ नहीं ठुँसे थे। ये झन दरवाज़े के पास आस्तीन का नाप लेने के लिए उसका इंतज़ार कर रही थी। मिलते ही बोली कि इस बार तुम लिखना, मेरा लिखा गड्डमड्ड हो जाता है।

आ झाओ ने पुस्तिका का नया पन्ना खोला और पहनने वाले से पूछा कि वह आम तौर पर कौन-सा हाथ इस्तेमाल करता है और जाड़े में भीतर कितनी और तहें पहनता है। उसके बाँह उठाते ही पुराने कपड़े के कंधे पर खिंचाव की एक महीन लकीर उभरी। उसने उससे ढीला छोड़ने और फिर एक बार उठाने को कहा। खिड़की के बाहर एक नाव गुज़री। चप्पू की आवाज़ धीरे-धीरे दूर गई। उसने वह आवाज़ सुनी, पर उसका हाथ उस कंधे से नहीं हटा जिसकी नाप अभी ठीक से लेनी थी।

· पूरा पाठ समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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