प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
एक बार फिर नदी पार
कू वूजी · AI सृजन · 9002 अक्षर · लगभग 12 मिनट
नौवें महीने की बारह तारीख को श्याओमान ने थोंगश्यू में पारघाट की नाव पर दो पट्टिकाएँ देखीं। पहले पुरानी पीतल की रंगत पहचानी, फिर देखा कि नाव दिंग छ्वान चला रहा था। आझाओ दूसरे सिरे पर बैठी थी। घुटनों पर नए तख्ते की बची हुई कतरन दबाए वह उसके साथ रंग मिलाकर देख रही थी। आशंग किताबों का थैला लिए छलाँग लगाना चाहता था। दिंग छ्वान ने बाँस का डंडा आड़ा करके कहा कि नाव पहले किनारे पर टिक जाए। इस बार बच्चे ने यह कहकर बहस नहीं की कि उसे नाव में चढ़ना आता है। रस्सी कसने के बाद ही उसने तख्ते पर पाँव रखा।
छोटे पार का किराया अब भी आठ वेन था। श्याओमान ने सिक्के दिंग छ्वान की बढ़ी हथेली पर रख दिए। आ झाओ ने माँ-बेटे को देखा तो मुस्कराकर तख्ते की कतरन सरका दी और बैठने की जगह बना दी। वह परसों लानतिंग से निकली थी, कल पहले ल्योउवान पहुँची और आज दिंग छ्वान के साथ पूर्वी घाट पर ज्वार के बाद नाव लगाने की जगह देखने आई थी। वह किसी का ख़ास तौर पर इंतज़ार नहीं कर रही थी। श्याओमान ने देखा कि उसकी उँगलियों पर फिर नाव का रंग लगा है। अचानक लगा कि नाट्यशाला से इस नाव पर लौट आने भर से वह फिर वही पुरानी आ झाओ नहीं हो गई थी।
नदी की हवा ठंडी हो चली थी। आ शंग ने नानी के ठीक किए जूते पहन रखे थे और उनका ऊपरी कपड़ा अब खिंचता नहीं था। श्याओमान माँ के लिए बहुत कुछ नहीं लाई थी। लानतिंग में आम तौर पर खाए जाने वाले केक का एक पैकेट और लालटेन के नए काग़ज़ के दो रोल, अपने सिले पुराने कपड़े के थैले में रखे थे। निकलने से पहले उसने एक नई पोशाक लाने की सोची थी। आधा पल्ला काटकर रुक गई थी। डर था कि ठीक न बैठी तो फिर बहस करनी पड़ेगी कि किसकी नज़र बेहतर है। वह आधा कपड़ा अब भी कमरे में था। जो कुछ देना चाहती थी, वह सारा इसी फेरे में जल्दी-जल्दी पूरा करना ज़रूरी नहीं था।
किनारे उतरकर आ झाओ ह परिवार के घर गई और माँ-बेटा दीयों की दुकान की ओर चले। बाहर एक युवती ग्राहक से कह रही थी कि पुराने दीये का ढाँचा चटक गया है। बस काग़ज़ चिपकाया तो दो दिन उठाकर ले जाने में फिर टूट जाएगा, इसलिए पहले ढाँचा बदलना बेहतर होगा। श्याओमान ने पहचान लिया कि यही आ छ्याओ है, जिसका चिट्ठी में ज़िक्र था। वह वहीं खड़ी उसके बात पूरी करने का इंतज़ार करती रही, तब भीतर गई। आ छ्याओ ने उसे देखकर छिन दादी को तुरंत आवाज़ नहीं लगाई। पहले ग्राहक का दीया ठीक से टिकाया, एक छोटी पर्ची पर निशान लिखा और फिर मुड़कर उसे अंदर बुलाया।
छिन दादी पीछे से निकलीं। उनकी आस्तीन के सिरों पर लेई लगी थी। पहले फिर यही पूछा कि नाव में ठंड तो नहीं लगी, फिर पूछा कि इस बार भी काग़ज़ क्यों ले आई। श्याओमान का मन कस गया। वह थैला लगभग अपने पैरों के पास वापस रख चुकी थी कि माँ ने एक रोल उठाकर छुआ और कहा कि इसकी मोटाई ठीक है। कुछ दिन पहले दाम पूछा था, पर ख़रीदने को जी नहीं माना। श्याओमान ने हाथ हटाने में ज़रा देर की और माँ ने भी जल्दी नहीं मचाई। दोनों ने उस काग़ज़ के रोल को कुछ देर साथ थामे रखा। यह पूछने से कहीं आसान था कि घर की याद आई या नहीं।
आशंग पहले ही मेज़ की ओर जा चुका था। उसने एक नज़र में पहचान लिया कि काग़ज़ दबाने को नया छोटा पत्थर रखा है, वह नहीं जो पिछली बार वह छोड़ गया था। छिन दादी ने कहा कि वह वाला कुछ ज़्यादा ही गोल था, लुढ़ककर अलमारी के नीचे चला गया और उन्होंने अभी अलमारी खिसकाकर ढूँढ़ा नहीं। वह फ़ौरन पेट के बल लेटकर झाँकने लगा। कमरे में सब हँस पड़े। श्याओमान उसे उठाना चाहती थी कि कपड़े गंदे न हों। फिर देखा कि माँ पहले ही उसे पत्थर तक पहुँचने के लिए बाँस की लंबी पट्टी दे रही हैं। होंठों तक आई बात वहीं रुक गई। दोनों अलमारी के नीचे इधर-उधर टटोलते रहे। पत्थर से पहले ताँबे के दो पुराने सिक्के निकल आए।
दोपहर के खाने में बसंत की तरह मेज़ भर व्यंजन नहीं थे। एक थाली फलियाँ थीं, एक मछली और शोरबे में डालने की हरी प्याज़ अलग छोटी तश्तरी में थी। बच्चा तश्तरी देखकर हँसा। उसने दो डंठल ख़ुद उठाकर कटोरे में डाले और कहा कि गुरु शन के घर हरी प्याज़ की रोटी बड़ी स्वादिष्ट होती है। छिन दादी कहने वाली थीं, अच्छा, तो तुम प्याज़ खाते हो। उन्होंने श्याओमान की ओर देखा और उसकी जगह पूछा कि अगली बार वे भी सेंक दें क्या। आशंग ने कहा कि यह तो देखना होगा कि रोटी पतली है या नहीं। माँ ने हुँह किया, मगर हाथ से तश्तरी उसके और पास खिसका दी।
खाने के बाद आ-छ्याओ पिछवाड़े के दरवाज़े पर एक रंग पूछने आई। दादी छिन उठकर जाने लगीं तो श्याओ म्येन को अजीब असुविधा हुई। बड़ी मुश्किल से लौटी थी, मगर माँ ने पूरा दिन उसके लिए नहीं रखा। फिर उसे याद आया कि मई में वह ख़ुद लानतिंग में मंच पर पहुँचने की जल्दी में थी। मन में इस समझदारी से ही चिढ़ हुई: कारण समझ आने पर भी थोड़ी ठेस क्यों रह जाती है; क्या हर दुख को रहने देने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि किसका पक्ष ज़्यादा सही है।
वह खाली थालियाँ धोने ले गई। आछ्याओ ने दरवाज़े पर रास्ता दिया और उसे ‘मान दीदी’ कहा। संबोधन इतना सहज था कि उसमें किसी बात की होड़ नहीं लगी। श्याओमान ने माँ को उससे कहते सुना कि बाहरी घेरा मेरे पुराने नमूने से बनेगा, अंदर वाले पर तुम्हारा तरीका आज़मा सकते हैं। इसके बाद भी दोनों देर तक अपनी-अपनी बात पर अड़ी रहीं। श्याओमान ने अचानक सोचा कि आछ्याओ रोज़ माँ का यह चेहरा देखती है। उसे पता है कि किस अलमारी में नमक है और कौन-सी खपच्ची मरोड़ी नहीं जा सकती। वह खुद उनकी बेटी है, फिर भी अब कितनी ही बातें हैं जो उसे किसी और से कम मालूम हैं।
वह पलटकर नमक ढूँढ़ने गई और सचमुच ग़लत अलमारी खोल बैठी। माँ अंदर आईं और हँसे बिना बताया कि नमक चूल्हे के बाईं तरफ़ रख दिया है, वहाँ सील कम है। उसने मछली पर कुछ ज़्यादा ही नमक झाड़ दिया। माँ से रहा नहीं गया और बोल पड़ीं कि इतनी मुट्ठी भर नमक डालोगी तो खाएगा कौन। श्याओमान का हाथ ठिठका और कलछी से बगल में रखा सूप का कटोरा लगभग उलट गया। दोनों ने कटोरा बचाने को एक-एक हाथ बढ़ाया, कलाइयाँ टकराईं और दर्द से दोनों ने एक साथ साँस खींची। पीछे आशंग हँसते-हँसते दोहरा हो गया।
“तुम हँसो मत।” दोनों ने फिर लगभग एक साथ कहा। मुँह से निकलते ही वे ख़ुद भी हँसी नहीं रोक सकीं। थाली की मछली अब भी नमकीन थी। हँस लेने से दूसरी मछली तो आने वाली नहीं थी। माँ ने आधी कटोरी से कुछ कम गरम पानी भर दिया कि जिसका मन हो, अपना टुकड़ा उसमें धो ले। श्याओमान ने अच्छी नीयत से खाना बनाने की दुहाई देकर किसी का मुँह बंद नहीं किया, न माँ के कड़े बोल के कारण कटोरी उठाकर किसी को खाने से रोका। रात का खाना दोपहर के खाने से देर तक चला। मेज़ पर इधर-उधर मछली के काँटे पड़े रहे और किसी ने उसे फ़ौरन किसी सजी हुई तस्वीर जैसा बना देने की जल्दी नहीं की।
रात में उसने देखा कि लौटाए गए पुराने परदे का आधा हिस्सा पिछले दरवाज़े पर टँगा है। किनारे पर नीले धागे की नई सिलाई थी। माँ ने कहा कि पहले यह परदा लंबा था और बार-बार पैरों के नीचे आ जाता था। छोटा करने के बाद आना-जाना आसान है। श्याओमान ने उसे छुआ। उसने न पूछा कि क्या माँ का मन पुरानी पोशाक से लगा है, न उस पल के लिए कोई ममता भरा कारण ढूँढ़ा जब सोलह साल पहले उसकी पोशाक काटी गई थी। उस वक़्त कैंची की वह काट दुखी कर गई थी, और आज की यह किनारी सचमुच अच्छी सिली थी। दोनों बातें अपनी जगह थीं। एक को जगह देने के लिए दूसरी को मिटाना ज़रूरी नहीं था।
तेरह तारीख़ को आ झाओ नाश्ता करने आई। खाने के बाद उसे दिंग छ्वान के साथ किराए की मियाद के आख़िर में तख्तों के जोड़ देखने जाना था। श्याओमान उससे अकेले में पूछना चाहती थी कि माँ उससे ज़्यादा तो आ छ्याओ को देखती हैं, आगे उसे क्या करना चाहिए। मगर तभी लुओ यान ने आ झाओ को रस्सी की पकड़ देखने के लिए पुकारा और वह कटोरा रखते ही निकल गई। उसकी पीठ देखते हुए श्याओमान को अपने पर हँसी आई। वह अब भी इस लड़की को पकड़कर बिठाना चाहती थी, जैसे दोनों पक्षों का मन जानने वाले किसी दुकानदार से कहे कि उसके लिए नज़दीकी और दूरी का हिसाब लगा दे।
सुबह आच्याओ का काम पूरा हुआ तो श्याओमान ने सचमुच उससे पूछा कि आजकल लालटेन की दुकान में आम तौर पर कौन-से कागज़ लगते हैं। उसने बारीकी से बताया। कुछ जान-बूझकर छिपाया नहीं और दादी छिन की हर बात को अच्छा भी नहीं बताया। कहा, बुज़ुर्ग कभी-कभी कागज़ ख़र्च होने से इतना बचती हैं कि नमूना बहुत छोटा बना देती हैं, उससे पता नहीं चलता कि उजाला बाहर कैसे फैलेगा। श्याओमान ने हँसकर कहा, किसी के जूते का नाप भी ऐसे ही लेती हैं। आच्याओ को साथ में ज़ोर से हँसने की हिम्मत नहीं हुई, फिर भी आख़िर हँस दी। दोनों ने मिलकर एक छोटा नमूना काटा। दादी छिन ने दरवाज़े पर सुन लिया और बस कहा, कागज़ बचाने में भी कोई बुराई नहीं है।
दोपहर को नदी किनारे कोई जाल सुखा रहा था। आ शंग देखने जाना चाहता था। छिन दादी ने श्याओ मान को दरवाज़े की चाबी दी और कहा कि बच्चे को लेकर आराम से जाए। उन्हें वह लालटेन पूरी करनी है जिसका ग्राहक इंतज़ार कर रहा है। श्याओ मान ने चाबी हाथ में ली। उसे मालूम था कि माँ भूली नहीं हैं कि पिछली बार रात को उसने पूछा था, खिड़की कौन बंद करेगा। फिर भी वह दरवाज़े पर ठहरकर कुछ देर माँ को देखती रही। माँ ने आख़िर सिर उठाकर उसे देखा तो उसने हाथ हिलाया और बच्चे को लेकर निकल गई। उसने एक बार और देखे जाने की अपनी चाह को ज़बरदस्ती बेमतलब नहीं कहा।
पानी के किनारे की चमक से उसकी आँखें सिकुड़ गईं। आशंग उकड़ूँ बैठकर देख रहा था कि फटा जाल कैसे रफ़ू करते हैं। उसने पूछा, क्या बाबा को भी आता था? उसने कहा, थोड़ा आता था, अच्छा रफ़ू नहीं करते थे, पर अपनी फुर्ती की डींग खूब मारते थे। वह हँस पड़ा और पूछा, बाँसुरी बजा लेते थे? उसने कहा, नहीं, मगर दूसरों के साथ बेसुरा फूँकना पसंद था। पहले लू झंग की बात करते हुए उसे अक्सर डर रहता कि एक अच्छाई कम गिनाई तो लगेगा उसने उन्हें थोड़ा कम याद किया। अब बच्चा एक ऐसे आदमी के बारे में सुनकर, जो जाल टेढ़ा रफ़ू कर देता था, किसी बहादुर ढोलिए की कहानी सुनने से ज़्यादा सवाल पूछना चाहता था।
वे दुकान लौटीं तो माँ लालटेन जलाकर परख रही थीं। श्याओमान लालटेन के पीछे खड़ी हुई, काग़ज़ पर अपनी परछाईं देखी और अचानक नाटक की एक मुद्रा बना ली। आ शंग ने सबसे पहले पहचान लिया कि वह ‘सरकंडों के फूलों वाला घाट’ की विदाई है। वह दौड़कर बाँस की तीली को लग्गी की तरह उठा लाया। छिन दादी को डर था कि वह काग़ज़ छेद देगा। उन्होंने हाथ बढ़ाकर एक बार रोका, पर उसे तीली रख देने को नहीं कहा। आ छ्याओ जा चुकी थी। दुकान में बस तीन लोग थे। माँ ने श्याओमान को एक बार घूमते देखा और देर बाद कहा कि अब उसकी आस्तीनें बसंत वाली आस्तीनों से ज़्यादा सुघड़ बनी हैं।
श्याओमान कहना चाहती थी कि यह रोज़ पहनने का कपड़ा है, नाटक का नहीं, मगर बात बीच में ही रोक ली। माँ शायद उसकी तारीफ़ कर रही थीं, शायद सच में बस आस्तीन देख पाई थीं। उसने माँ को बताया कि शरद की प्रस्तुति में आहंग अब भी लू हेन्यांग ही बनेगी और वह ख़ुद माँ का किरदार गाएगी। बोल भी फिर बदले गए हैं। माँ पूछें कि मुख्य भूमिका है या नहीं, उससे पहले ही उसने नई ताल वाला वह ठहराव गाकर सुना दिया। बोल भूली तो बात छिपाई नहीं। कहा कि इस हिस्से का और अभ्यास करना है। माँ सुनती रहीं। उन्होंने यह पूछकर पूरे नाटक की बात नहीं समेट दी कि इतना काम करके थकती तो नहीं।
चौदह तारीख़ को विदा के वक़्त छिन दादी ने पूछा कि जाड़े में लौटोगी क्या। श्याओमान ने कहा कि खेल अभी तय नहीं हैं, तय होते ही पहले लिखूँगी, आप पहले से टिकट मत ख़रीदना। माँ के मुँह से अपने आप निकला, अब कौन ख़रीदेगा? उनकी आवाज़ चढ़ गई, दोनों ने सुना। वे कुछ पल रुकीं, फिर कहा, समझ गई। बच्चे ने आख़िरकार मिला गोल पत्थर फिर थैली में रखा और बाँसुरी की अपनी तस्वीर मेज़ पर छोड़ दी। उसने नानी से कहा कि लिखने में ग़लती हो तो चित्र बना सकती हैं। छिन दादी ने कहा कि चित्र भी ज़रूरी नहीं अक्षरों से सुंदर हो, फिर भी उन्होंने काग़ज़ अलमारी के ऊपर रख लिया।
निकलने से पहले श्याओमान ने काउंटर के पास वही दो छी नीला कपड़ा देखा जो पिछली बार नहीं ले गई थी। माँ ने पूछा कि साथ ले जाना है क्या। उसने कहा कि इस बार संदूक में जगह है, ले सकती है। दोनों ने मिलकर उसे तह किया। फिर काटकर कोई और चीज़ नहीं बनाई। श्याओमान आशंग के लिए हल्की बंडी बनाना चाहती थी। अगले साल वह और बढ़ेगा। किनारे पर कितनी गुंजाइश छोड़ी जाए, यह लौटकर नाप लेने के बाद ही तय होगा।
छोटी-सी पार उतराई में नाव फिर दिंग छ्वान ने ही खेई। आ-झाओ उसे किनारे तक छोड़ने आया। तय हुआ कि अगली बार पतझड़ के मेले में मिलेंगे। वह खुद भी आज ही रवाना होगा और लानतिंग कल ही पहुँच पाएगा। चंद बातों के लिए एक और रात नहीं गँवाएगा। श्याओमान ने पलटकर दीयों की दुकान की ओर देखा। दरवाज़े पर माँ दिखाई नहीं दीं, बस सूखने को रखा थोड़ा-सा नया काग़ज़ दिखा। उसने पुकारकर नहीं कहा, माँ, अब घर जाओ। आज पानी के पार वह बात चाहे जितनी ज़ोर से कहती, किनारे से दुकान के दरवाज़े तक का रास्ता दूसरे की जगह तय नहीं कर सकती थी।
उस रात सांगछ्याओ की सराय में आ शंग ने पेट के बल लेटकर छोटी-सी पर्ची लिखी। वह नानी को बताना चाहता था कि गोल पत्थर सांगछ्याओ पहुँच गया है। श्याओमान ने हँसकर यह नहीं कहा कि इतनी छोटी बात भेजने की ज़रूरत नहीं है। उसने उसके लिए पाने वाले का नाम लिख दिया। फिर बगल में खुद कुछ पंक्तियाँ जोड़ीं। पहले लिखा कि नमकीन मछली चावल की लपसी के साथ सचमुच अच्छी लगती है, फिर जोड़ा कि अगली बार मुझे खुद थोड़ा कम नमक डालने देना। अगले दिन लानथिंग पहुँचने पर ही वह पर्ची लौटती नाव के हाथ भेजी गई। आने-जाने में अब भी दिन लगते थे, मगर अब हर बात इस इंतज़ार में नहीं रहती थी कि आ झाओ एक दीया लेकर उन दोनों के बीच आ खड़ी हो।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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