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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

देख लेने के बाद ही जवाब

कू वूजी · AI सृजन · 9282 अक्षर · लगभग 12 मिनट

छिंगशिंग मंच के पिछले दरवाज़े पर मंडली का नाम नहीं टँगा था। वहाँ बस एक लंबी सीढ़ी उलटी खड़ी थी। आ झाओ उसके पायों के पास से घूमी तो गीले कपड़े लिए एक औरत से लगभग टकरा गई। औरत ने पहले अपना टब सँभाला, फिर हँसकर कहा, “नाटक देखने आगे से जाओ, इधर तो बस भाप है।” आ झाओ ने कहा कि वह ल्यांग छ्योउ को ढूँढ़ रही है। औरत ने परदे के भीतर आवाज़ लगाई और टब उठाकर चली गई। आँगन में कपड़े सुखाने के दो कतार डंडे थे। नीली पोशाकें, अंदर पहनने के कपड़े और पसीना पोंछने के अंगोछे अलग-अलग टँगे थे। सचमुच, छुनहे की एक ही रस्सी पर सब कुछ ठुँसे होने जैसा हाल नहीं था।

आझाओ ने पहले से सोच रखा था कि वह अपने किए हुए काम के बारे में क्या-क्या बताएगी, पर अंदर जाकर बोलने का मौक़ा ही नहीं मिला। ल्यांग छ्यो किसी की ऐसी पोशाक उधेड़ रही थी जो कंधे पर बहुत तंग थी। साथ काम कर रहे दो लोगों ने उसे दोनों तरफ़ से पकड़ रखा था और किसी को सिर उठाने की फ़ुरसत नहीं थी। उसने आझाओ से हाथ धोने को कहा, एक उथली तश्तरी थमाई और कहा कि पहले उधेड़कर निकाले गए छोटे धागे इसमें समेट दो। आझाओ ने सिर झुकाकर वैसा ही किया। उसने देखा कि ल्यांग छ्यो ने पहले कपड़े की तहों के बीच टटोला, फिर सबसे अंदर की सिलाई खोली। इससे कंधे का टुकड़ा अलग हो गया और पूरी आस्तीन उतारने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

पोशाक का मालिक बगल में खड़ा जम्हाई ले रहा था। वह गू मिंग से भी कम उम्र का अभिनेता था। आझाओ ने परसों के नाटक के इश्तहार से उसका नाम पहचान लिया। उसके हाथ कुछ अकड़ गए। उसे डर था कि उसकी गोद पर गिरे धागे के टुकड़े भी कहीं वह देख न ले। उसने ल्यांग छ्यो से पूछा कि काम कब होगा। ल्यांग छ्यो ने कहा, पहले खाना खाओ, फिर लौट आना। दूसरों की ओर से यहाँ तीसरी बार पूछने की ज़रूरत नहीं है। वह हँसता हुआ चला गया और वहाँ के युवाओं ने उसकी अभी की जम्हाई पर दो-एक मज़ाक किए।

“उससे डरती हो?” ल्यांग छ्योउ ने अचानक पूछा। आज़ाओ ने कहा नहीं, कुछ ज़्यादा ही जल्दी। ल्यांग छ्योउ ने बस उसे पास बैठकर कंधे का टुकड़ा छूने को कहा। नया कपड़ा चिकना और मोटा था। उँगलियाँ फेरते ही उसे पता चल गया कि यह उस अस्तर से अच्छा है जिसे उसने छठे महीने में बचा-बचाकर इस्तेमाल किया था। ल्यांग छ्योउ ने कहा कि अच्छे कपड़े से भी ख़राब पोशाक बन सकती है। मंच पर जिसे बदन घुमाना है, उसके लिए मुख्य कलाकार और उसकी जगह उतरने वाले कलाकार में कोई फ़र्क़ नहीं। कपड़ा दोनों को बराबर चुभेगा। जो भी आए, पहले बताए कहाँ अटकता है। ख़ुद को साबित करने के लिए पोशाक वाले कमरे में गाकर दिखाने की ज़रूरत नहीं।

आझाओ को याद आया कि कभी गू मिंग के उसे ‘कारीगर ह’ कह भर देने से उसका मन कैसे खिल उठा था। उसे झेंप भी आई और हँसी भी। ल्यांग छ्यो ने उपदेश जारी नहीं रखा। उसने आझाओ से उधेड़ा हुआ छिपा बटन पुराने छेदों में फिर टाँककर देखने को कहा। पहला टाँका ही तिरछा पड़ा। उसे डर लगा कि टाँका निकालने से कपड़ा बिगड़ जाएगा, और उसका हाथ हवा में ठिठक गया। पास बैठी गोल चेहरे वाली एक लड़की ने पतली पट्टी पकड़ाई कि उसे नीचे रखकर धागा निकाले। फिर खुद एक तरफ़ का काम सँभाल लिया और करते-करते पूछने लगी कि लानथिंग में कौन-सी दुकान खट्टे आलूबुखारे के शरबत में दिल खोलकर फल डालती है।

इन लोगों के हाथ तेज़ चलते थे, फिर भी हर कोई ल्यांग छ्योउ जितना तेज़ नहीं था। गोल चेहरे वाली लड़की तो अक्सर तश्तरी दूर सरकाना भूल जाती थी। उसकी कोहनी से लगभग सारे बकसुए नीचे जा गिरते। आचाओ ने उथली तश्तरी थाम ली। लड़की ने झट उससे ज़रा आड़ करने को कहा और चुपके से सबसे छोटा बकसुआ ढूँढ़ निकाला। आचाओ के मन में जो सख़्त चेहरे वाली, हमेशा तरतीब में रहने वाली बड़ी कार्यशाला थी, उसका एक कोना झट टूट गया और भीतर से उसके जैसे लोग दिखने लगे।

दोपहर में कार्यशाला को एक पहर का चौथाई भर विराम मिला। आँगन में लोगों की गिनती के हिसाब से खाना आया। कारीगरों को अलग-अलग चूल्हा नहीं सँभालना पड़ता था। ल्यांग छ्यो ने उसे दीवार के पास कपड़ों की अलमारियाँ दिखाईं और साफ़ बताया कि महीने का मेहनताना छह सौ वन है, महीने में चार दिन छुट्टी, साथ में दो वक़्त का खाना और साझा बिछावन। रात की जल्दी वाली मज़दूरी हर बार अलग चुकाई जाएगी। पहले एक महीना काम करके देखो, फिर दोनों पक्ष राज़ी हों तो आगे बढ़ाएँगे। शुनछंग जाने का नाव-भाड़ा मंडली देगी। केवल दो दिन देखने आना भी ठीक है, मगर सर्दी तक वही जगह खाली पड़ी रहे, ऐसा नहीं हो सकता।

छह सौ सुनते ही आ झाओ ने मन में तेज़ी से हिसाब लगाया। वह दो महीने के नाव-किराए से भी ज़्यादा था और ऐसी मज़दूरी थी जिसमें से तख्ते की मरम्मत के पैसे नहीं काटने पड़ते। वह यह दिखावा नहीं करना चाहती थी कि इन अंकों में उसके लिए कोई खिंचाव नहीं है। ल्यांग छ्योउ ने भी कार्यशाला को एक ही छलाँग में आसमान पर पहुँचाने वाली जगह नहीं बताया: पहले कुछ महीनों में ज़्यादातर अंदर के कपड़ों और पुरानी पोशाकों को उधेड़ने-बदलने का काम होगा। सीखना होगा कि किस अलमारी में कौन-सा कपड़ा है। जिसने कपड़ा पहले हाथ में लेकर परखा न हो, वह कैंची नहीं चला सकता। हाथ जम जाए तो पूरी पोशाक बनाने में साथ लग सकती है। जल्दी या देर आदमी पर है। किसी ने वादा नहीं किया कि एक शरद बीतते ही उसका ओहदा बदल जाएगा।

“अगर तुम आते ही पूरी पोशाक अपने हाथ में लेना चाहती हो, तो मैं यहाँ वह नहीं दे सकती,” उसने कहा। आज़ाओ को याद आया कि लू हेन्यांग ने कैसे उसके सामने पोशाक खोलकर रखी थी। उसने सिर हिला दिया। ल्यांग छ्यो ने उसे एक पुराना चोगा भी दिखाया, जिसकी फेरबदल का मुख्य काम उस कारीगर ने किया था जो पहले बस कपड़े धोना जानती थी। अस्तर में कई जगह बड़ी बारीकी से गुंजाइश छोड़ी गई थी। अब वह कारीगर दो नए लोगों को काम सिखा सकती थी। हर बार अभिनेता का नाप आमने-सामने लेना ज़रूरी नहीं था, मगर नाप लेने वाले और पोशाक सिलने वाले भी एक-दूसरे से अनजान नहीं रहते थे। पहनाकर देखने के वक़्त सबको मौजूद रहना पड़ता था।

जिस कमी की आशंका आझाओ को पहले थी, उसकी परतें भी खुल गईं। वह यह नहीं कह सकती थी कि यहाँ इंसान को बस सुई की तरह बरतते हैं और सारा दिन कपड़े पहनने वाले की शक्ल भी देखने नहीं देते। उसने देखा कि कई लोग छोटे-मोटे काम पहले ही कर देते हैं ताकि कपड़ा बनाने वाला चैन से अपना काम पूरा कर सके। उसने पूछा कि क्या अपने लिए बाहर से लिया काम भी करती रह सकती है? ल्यांग छ्यो ने कहा, छुट्टी के दिन की सिलाई तुम्हारी है, बस कार्यशाला की सामग्री मत ले जाना। अगर बाहर का काम करते हुए इतनी थक गईं कि यहाँ का काम बिगड़े, तो यह भी नहीं कह सकते कि कार्यशाला से उसका कोई लेना-देना नहीं।

खाने के बाद उसे एक बार दृश्य बदलते समय पोशाक की अदला-बदली देखने के लिए रोक लिया गया। मंच से गाने की आवाज़ आ रही थी। पोशाक वाले कमरे में एक आदमी बता रहा था कि कितनी पंक्तियाँ बाक़ी हैं, एक गला ढीला कर रहा था, दूसरा सिरपोश सँभाल रहा था। उतरी पोशाक निशान लगे खाने वाली टोकरी में रखी गई। आझाओ की आँखें सब कुछ एक साथ देख नहीं पा रही थीं। किसने किसके बाद क्या सँभाला, वह क्रम याद न रहा। छोटी मंडली में उसने डोरियाँ खोलने का जो तरीक़ा ढूँढ़ा था, यहाँ वह कई तरीक़ों में से एक था। एक बटन भी था जो किसी तरह नहीं खुल रहा था। ल्यांग छ्योउ बड़ी देर उकड़ूँ बैठी उसे टटोलती रही, फिर एक गाली निकली तो मंच पर जाने का इंतज़ार कर रहा बदली कलाकार हँस पड़ा।

कपड़े बदलने का काम समाप्त होने पर ल्यांग छ्योउ ने पूछा कि क्या वह मंडली के साथ लांतिंग छोड़ना चाहेगी। आ झाओ ने तुरंत उत्तर नहीं दिया, बस पूछा कि आज लौटकर एक रात सोच ले तो अभी समय है क्या। ल्यांग छ्योउ ने कहा कि कुछ और लोग भी काम आज़माने आ रहे हैं, तीन दिन में उत्तर देना होगा। ये तीन दिन किसी पर अहसान करने के लिए नहीं थे; कार्यशाला को संख्या बतानी थी, जो पहले तय करे, उसी को गिना जाएगा। चलते समय उसने अपनी लगाई छिपी बटनियों की कतार फिर देखी; दो अब भी बराबर नहीं थीं। ल्यांग छ्योउ ने उससे स्वयं खोलने को कहा, यह नहीं कहा कि इतने-से काम से वह योग्य ठहर गई है।

बाहर निकली तो दीवारों की जड़ से गर्मी भाप की तरह उठ रही थी। आझाओ सड़क किनारे कुछ देर बैठी और खट्टे आलूबुखारे के शरबत का एक कटोरा ख़रीदा। उसे गोल चेहरे वाली लड़की का सवाल याद आया। पीने पर पता चला कि इस दुकान का शरबत सचमुच बहुत मीठा था। उसका मन नहीं हुआ कि फ़ौरन लौटकर श्याओमान से कहे कि वह देखकर आ गई है। उसे लगा, श्याओमान ने बस इतना पूछा कि कैसा लगा, तो उसका दिल रखने के लिए वह कुछ अच्छी बातें गिनाने से रह जाएगी। वह यह भी नहीं चाहती थी कि गु मिंग समझे, उसी की वजह से उसका मन उधर खिंचा है। मगर अगर वह सचमुच ऐसा समझे, तो जाने क्यों उसे उम्मीद थी कि उसे थोड़ी ख़ुशी होगी।

ठीक उसी समय गू मिंग छिंगशिंग रंगमंच के बग़ल वाले दरवाज़े से निकला। बाँहों में वह पोशाक थी जो नई मंडली ने उसे आज़माने के लिए उधार दी थी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और कुछ असहज-से होकर मुस्कराए। उसने पूछा कैसा लगा। आज़ाओ ने मेहनताने, कपड़े सुखाने की डंडियों और टूटे हुए छिपे बकसुए तक की बात बता दी। गू मिंग ने उससे भी ज़्यादा ध्यान से सुना जितना तब सुना था जब उसने उसकी अपनी पोशाक तैयार होने की ख़बर दी थी। आख़िर में उसने पूछा, “तो क्या सर्दियों में भी हम साथ रह पाएँगे?” आज़ाओ ने उस एक सवाल के दो मतलब सुने और उसके सीने में धक-सा हुआ।

“मैं शरद के मंचन का काम पूरा करना चाहती हूँ।” उसने कहा। उसने सर्दियों के बारे में फिर नहीं पूछा। आझाओ को अचानक समझ आया कि अगर वह साथ चलने को कह दे तो आगे कुछ उजले दिन मिल सकते हैं। काम होगा, खाना होगा, शायद कोई उसके आखिरी टाँके तक उसका इंतज़ार भी करे। यह सब सच हो सकता था, इसे बस किसी जवान की लुभाने वाली बात कहकर टाला नहीं जा सकता था। फिर भी वह अपनी आँखों से लू हन्यांग को वह पोशाक पहनकर पूरा नाटक गाते देखना चाहती थी। वह जानना चाहती थी कि किसी और कद-काठी के व्यक्ति के लिए भी क्या वह ठीक से नाप ले पाएगी।

गू मिंग ने पोशाकों की गठरी दूसरे हाथ में ली और कहा, तो शरद के मंचन के बाद देखेंगे। दोनों दोराहे तक साथ चले। वह सामने के दरवाज़े की तरफ़ गया और आझाओ छोटे सभागार की ओर। मुड़ते समय गठरी से उसका आधा चेहरा ढका था। उसने आवाज़ दी कि किसी दिन उसके गले की सिलाई देख दे, और फौरन जोड़ दिया कि मेहनताना देगा। आझाओ ने हँसकर हामी भरी। सड़क पर किसी ने आने वाले बरसों का वादा नहीं किया, फिर भी बिछड़ते वक्त दोनों की चाल रोज़ से एक कदम धीमी थी।

उस रात उसे जल्दी नींद नहीं आई। श्याओमान पहले सो गई। आशंग ने सपने में करवट ली और पैर मेज़ के नीचे फैला दिए। आझाओ ने अँधेरे में टटोलकर बिस्तर के पास गिरा एक जूता उठा दिया। फिर भी यह सोचे बिना नहीं रह पाई कि साझा बिछावन कहीं इस छोटे पलंग से चौड़ा तो नहीं होगा। उसने इन कुछ कम शोभनीय ख़यालों को भी अपने मन में रहने दिया और ख़ुद को केवल यहाँ की अच्छी बातें सोचने के लिए मजबूर नहीं किया।

अगले दिन वह छिंगशिंग मंच लौटी और ल्यांग छ्यो से ख़ुद कहा कि वह इस बार उनके साथ नहीं जाएगी। ल्यांग छ्यो को कुछ अफ़सोस हुआ, मगर उसने आझाओ को दिन भर चाय पर नहीं बिठाया। उसने काम की सूची में किसी और का नाम भर दिया। उस जगह पर सचमुच किसी और का नाम देखकर ही आझाओ को लगा कि उसने जो छह सौ वन छोड़े थे, वे अब काग़ज़ पर लिखी तुलना भर नहीं थे। उसने पूछा कि आगे भी आकर काम के बारे में पूछ सकती है क्या। ल्यांग छ्यो ने कहा कि हाँ, तब काम हुआ तो आज़माकर देखेंगे, न हुआ तो साफ़ कह देगी। गु मिंग से अपनी तरफ़ से वादा मत करवाना।

छोटे सभागार में लौटने पर गाओ शोउछंग शरद ऋतु के लिए दो छोटे अंक और लगाने की चिंता में था। आझाओ के न जाने की बात सुनकर उसने फ़ौरन राहत की साँस ली और कहा कि वह चारों पुराने कपड़ों का काम पहले अपने हाथ में ले ले। आझाओ ने दो ही लिए और बाकी दो के लिए उससे ये झन से बात करने को कहा। उसने कहा कि शरद के मंचन की पूरी पोशाकें पहनकर देखने की तारीखें तय करनी होंगी और बीच में अचानक आने वाले छोटे कामों के लिए भी हाथ खाली रखने होंगे। सर्दियों में वह कुछ रोज़मर्रा के कपड़ों का काम लेना चाहती थी। जिन नाटकों का मंचन तय ही नहीं था, उन सबका बोझ वह अभी से अपनी सुई पर नहीं डाल सकती थी। मंडली के मुखिया को कुछ बुरा लगा, फिर भी उसने पोशाकें पहनकर देखने की तारीखें लिख दीं।

शाम को ये चन वे दो पोशाकें लेने आई। सुनते ही कि आज़ाओ ने छह सौ वन का काम ठुकरा दिया, उसने अपनी जाँघ पर हाथ मारा। “मैं होती तो चली जाती।” उसने साफ़-साफ़ कहा। आज़ाओ को पहले थोड़ी मायूसी हुई, फिर वह भी हँस पड़ी। ये चन के पास दुकान का किराया भरने के लिए नाव की आमदनी नहीं थी। उसके लिए फ़ैसला अलग होना स्वाभाविक था। दोनों ने आस्तीन के टुकड़े मिलाकर देखे, फिर तय किया कि मंदी के महीनों में रोज़मर्रा के कपड़ों का काम आया तो एक-दूसरे के पास प्रति कपड़ा भेज सकती हैं। किसी के लिए उम्र भर मेज़ ख़ाली रखने की बात नहीं हुई।

आझाओ ने नई पुस्तिका निकाली और आज कार्यशाला में कपड़े सँभालने का जो क्रम देखा था, उसका खाका पहले बगल के पन्ने पर बनाया। वह किसी और के नमूने उठाकर अपने नाम से नहीं लाई थी। मुख्य हिस्से के पहले पन्ने पर उसने हान रोंग के लिए काफ़ी जगह खाली छोड़ी। अभी उसे पता भी नहीं था कि उसका कौन-सा कंधा नीचे झुकता है। श्याओमान ने उसे मेज़ पर झुके देखा तो सूप की एक कटोरी दे गई। कटोरी कागज़ से बहुत दूर रखी और यह नहीं पूछा कि वह यहाँ से मोह के कारण नहीं गई।

खिड़की के नीचे कपड़े सुखाने की रस्सी पर पहले जैसी भीड़ थी। आ झाओ ने दो बार उधर देखा और गाओ मान से कहा कि कल उसके साथ एक और रस्सी बाँध दे। अगर यहाँ रहने का मतलब यह भी था कि उसे उस ठसाठस भरी रस्सी से प्यार करना पड़े, तो वह उससे नहीं होगा। गाओ मान ने कहा कि ठीक है, मगर पहले दीवार के पीछे रहने वाले से पूछना होगा कि उसकी कील इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं। फिर किसी छोटे काम को ऐसा मत समझना कि उसमें कोई मेहनत ही नहीं लगेगी। आ झाओ ने कलम से यह बात दर्ज कर ली। उसके मन की वह खुली-खुली कार्यशाला धुँधली नहीं पड़ी, मगर अब उसकी अपनी छोटी मेज़ की पूरी जगह भी रोशनी में दिखने लगी थी।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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