प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
उस नाव का टिकट न लेना
कू वूजी · AI सृजन · 9323 अक्षर · लगभग 12 मिनट
छिन दादी ने वापसी के दो टिकट ख़रीदे तो उन्हें नहीं लगा कि वे फिर किसी और की ओर से फ़ैसला कर रही हैं। बेटी ने कहा था कि गर्मियों का सफ़र बाद में तय करेंगे। इसका मतलब था कि अभी कुछ तय करने की गुंजाइश है। उन्होंने पहले सवारी की नाव के बारे में सब पूछ लिया। लौटते वक़्त बच्चे को ख़ुद साथ ले आएँगी, ताकि श्याओमान को फिर आना-जाना न पड़े। सांगछ्याओ में कौन-सा सूखा कमरा लेना है, यह भी पूछ चुकी थीं। इस बार यह कोई ऐसा इंतज़ाम नहीं था जो सिर्फ़ घर बैठे उन्हें हर तरह से दुरुस्त लगा हो।
लालटेन की दुकान पाँच दिन के लिए आछ्याओ के हवाले की गई। लड़की तेईस की थी। अक्सर कागज़ की दुकान से सामान पहुँचाती और थोड़ी देर का काम मिलता तो लालटेन के आवरण भी चिपका देती। छिन दादी ने पहले उससे बस कागज़ पकड़वाया था, अलमारी में रखी रेज़गारी कभी सचमुच उसके हाथ नहीं सौंपी थी। इस बार जाना ही था, सो आम दाम कागज़ पर लिखे, एक चाबी दी और ताकीद की कि अभी कोई नया दाम न लगाए। किसी ग्राहक को जल्दी हो तो उनके लौटने तक ठहरे। आछ्याओ ने सुनकर पूछा, अगर ग्राहक ठहरने को राज़ी न हो तो? उन्होंने बस कहा, ठीक से बात करोगी तो ठहर ही जाएगा।
सातवें महीने की तेरह तारीख को जब वह लांतिंग पहुँचीं, तो खाने की दो पोटलियाँ नहीं लाई थीं। बस जूते के नाप का काग़ज़ और बच्चे के अभ्यास के लिए बाँस की बारीक पट्टियों की एक छोटी गट्ठी लाई थीं। माँ को फिर आया देख श्याओमान ने पहले उनके पीछे देखा और पूछा कि इस बार आने से पहले ख़बर दी थी क्या। उन्होंने कहा कि चिट्ठी में फिर देखने को ही तो कहा था। नाव के बारे में वे पूछ चुकी हैं। बच्चा चाहे तो परसों साथ लौट सकता है। बगल की गली के अध्यापक के यहाँ गर्मियों के लिए अभी जगह है, अब और टालने की ज़रूरत नहीं।
श्याओमान का चेहरा धीरे-धीरे उतर गया। छिन दादी को उसका यह चेहरा अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने फिर से बेटी की शादी तय करने को तो नहीं कहा था, न नाटक मंडली छोड़ने को। बस बच्चे के लिए पढ़ने की एक मेज़ का इंतज़ाम किया था। फिर क्यों उनके पास आते ही लगता था कि उनसे कोई ग़लती हो गई है? उन्होंने आस्तीन से टिकट निकाला, ताकि सारी तैयारियाँ समझा सकें, पर बेटी ने पहले ही काग़ज़ पर हाथ रखकर पूछा कि इस बार भी पहले से टिकट क्यों ख़रीद लिया।
“ताकि तुम्हें दौड़-धूप न करनी पड़े।” उन्होंने जवाब दिया।
“मैंने उसे जाने देने को नहीं कहा।”
बूढ़ी छिन एकाएक निरुत्तर हो गईं। आ शंग दरवाज़े के पास बाँस की पतली पट्टियाँ देख रहा था। जाने की बात सुनकर फ़ौरन सिर उठाया और पूछा कि क्या नानी की दुकान में उस नए तरह के दीये को देखने जाना है। श्याओमान ने उससे कहा कि पहले इन दस दिनों की लिखाई ले आओ। बच्चा लिखाई लाते हुए दोनों को देखता रहा, साफ़ था कि उसे अभी नहीं मालूम कि उसे किस ओर रख दिया गया है। वह जाना भी चाहता था और डरता भी था कि यह कह देने से माँ नाराज़ हो जाएगी। उसकी उँगलियाँ काग़ज़ का किनारा बार-बार टटोलती रहीं और एक पल को लिखाई उससे ठीक से थामी तक नहीं गई।
श्याओमान ने बच्चे के सामने बहस आगे नहीं बढ़ाई। पहले उसे गाओ मान के साथ सामने भेज दिया। मगर बूढ़ी छिन को लगा जैसे नाती को भी उनकी आँखों के सामने से हटा दिया गया हो। उनसे रहा नहीं गया। बोलीं कि बस कुछ दिन की तो बात है, तुम काम में उलझी रहो तो मैं उसे देख लूँगी, हमेशा के लिए थोड़े रख लूँगी। उनके कहते ही बेटी ने सिर उठाकर पूछा कि उस ज़माने में जब तुम मेरे लिए सब तय कर रही थीं, तब भी बस मेरी भलाई चाहती थीं, इसीलिए मेरी पूरी बात सुनना ज़रूरी नहीं समझा था क्या।
उन्हें सबसे ज़्यादा डर इसी बात का था कि कोई उन दोनों बातों को एक कर दे। जूते अपनी जगह थे, पढ़ाई अपनी जगह। अब वे बेटी को गाने से भी नहीं रोकती थीं, फिर सोलह साल पीछे जाने की क्या ज़रूरत थी? वे यही सफ़ाई देने वाली थीं कि उन्होंने श्याओमान की मुट्ठी में टिकट कसते देखा। तब समझीं कि बेटी के लिए समानता सिर्फ़ बातों में नहीं थी। वे ख़ुद हमेशा पहले सब कुछ कर डालती थीं और दूसरे की मर्ज़ी आख़िर में पूछती थीं, मानो उसे बस हाँ कहनी हो और सारे फ़ायदे उसके हो जाएँ।
उन्हें अब भी ग़ुस्सा था। बोलीं कि इस उम्र में इतनी दूर बेटी से झगड़ने नहीं आई हैं। बोलते ही अचानक याद आया कि यात्री नाव पर उन्होंने झंग छिन को ख़ास तौर पर अपना हाथ पकड़ने नहीं दिया था, इस डर से कि लोग उन्हें बूढ़ी समझेंगे। पैरों में उम्र का असर मानने को तैयार नहीं थीं, मगर मना किए जाने पर उसी उम्र की दुहाई देने की जल्दी थी, मानो उनके थक जाने से ही बेटी को अपनी अगली बात पहले निगल लेनी चाहिए। उन्होंने टिकट वापस ले लिया, मगर हाथ अब भी कुछ काँप रहा था।
कोई पीछे के कमरे से कपड़े लेने आया। उसने सुना कि नानी बच्चे को पढ़ाने के लिए अपने साथ ले जाना चाहती हैं, तो सहज ही बोल पड़ा कि कितना अच्छा है, घर में कोई बुज़ुर्ग देखभाल करने वाला हो तो बच्चे के पिता के न रहने पर भी उसकी चिंता नहीं रहती। छिन दादी ने फ़ौरन सिर उठाया और कहा, मेरी बेटी अपने बच्चे को खुद अच्छी तरह सँभालती है, उसका गुज़ारा मेरे भरोसे नहीं है। उस आदमी को समझ नहीं आया कि उसने क्या ग़लत कह दिया। वह झेंपकर हँसा और चला गया। छिन दादी ने सच्चे मन से बेटी का पक्ष लिया था, लेकिन यह सुनकर भी बेटी उस टिकट के लिए हामी नहीं भर सकती थी। कमरे में एक ऐसा मौन रह गया जिसे अब समेटा नहीं जा सकता था।
तभी आझाओ लौटी, गोद में अभी-अभी सुखाया हुआ अस्तर लिए। बूढ़ी छिन ने उसे देखा तो जैसे अचानक कोई मिल गया हो जो दोनों तरफ़ के रास्ते जानता हो। पूछा कि तुम्हीं बताओ, उधर ज़्यादा चैन से पढ़ना नहीं हो पाएगा क्या? आझाओ ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया। पहले कपड़ा सूखी जगह रखा, फिर कहा कि वहाँ की अपनी अच्छाइयाँ हैं और यहाँ भी पढ़ाई चल रही है। वह श्याओमान की तरफ़ से बच्चे को उनके हाथ नहीं सौंप सकती। ‘नहीं कर सकती’ सुनकर बूढ़ी छिन को लगा जैसे किसी ने उन्हें एक बार फिर रोक दिया हो।
वह लगभग कह ही देतीं कि अब तुम लोग एक जगह रहते हो, इसलिए सब एक ही तरफ़ हो। आज़ाओ ने उनका चेहरा पढ़ लिया। पहली बार की तरह सँभल-सँभलकर घुमा-फिराकर बोलने के बजाय उसने बस कहा कि टिकट उसने नहीं ख़रीदा और किसी ने उसे अपनी ओर से जवाब देने को भी नहीं कहा। फिर वह पलटकर वह डोरी समेटने चली गई जिसे देना बाक़ी था। बूढ़ी छिन की झेंप मिटाने के लिए उसने ऐसे किसी भविष्य का वादा नहीं किया जिसे पूरा करना उसके अपने बस में भी नहीं था।
छिन दादी कमरे में खड़ी सोच रही थीं कि दो दिन का रास्ता बेकार तय किया, और यह भी कि अगर अब ऐसे ही चली गईं तो आगे के दिनों में बात छेड़ना और मुश्किल होगा। आख़िर श्याओमान ने कहा कि बच्चे की पढ़ाई वह ख़ुद देखेगी। आगे ल्योउवान जाना हुआ तो पहले पूछेगी और उसे ख़ुद छोड़ने जाएगी; इस बार टिकट ख़रीद लेने भर से बात तय नहीं हो सकती। उसने कड़े स्वर में कहा, मगर अंत में फिर जोड़ा कि माँ आई हैं तो खाना खाएँ, ग़ुस्से में भूखी न रहें।
उनका सचमुच मन था कि रूठकर खाना छोड़ दें। मगर पेट खाली था, रास्ते में भी ढंग से नहीं खाया था। अब न खातीं तो बेटी को फिर उनकी एक अनकही चोट सँभालनी पड़ती। वह बैठ गईं। कटोरा उठाते समय हाथ में अब भी ज़ोर था। उसका तला लकड़ी से टकराया तो बाहर खड़े आशंग ने चुपके से झाँका। उन्होंने हाथ हल्का किया और बच्चे को भीतर बुलाकर कहा कि जो नए अक्षर सीखे हैं, उन्हें दिखाए। इस बार आते ही यह नहीं पूछा कि वह उनके साथ जाना चाहता है या नहीं।
उस पन्ने पर पानी का 水 था, लकड़ी का 木 था और नाव का 舟 भी, जो टेढ़ा लिखा था। बच्चे ने कहा कि गुरु शन एक ही साँस में बड़ी देर तक बाँसुरी बजा लेते हैं, वह अभी नहीं बजा पाता। पहले गुरु के साथ सारे अक्षर पढ़ने होते हैं, तब कहीं वे दो सुर सुनने को मिलते हैं। छिन दादी को लगता था कि यहाँ मंच पर हो या नीचे, हर समय अफरा-तफरी रहती है। बैठकर पूरी बात सुनने पर उन्हें दिखा कि बेटी ने सचमुच उसके लिए एक ऐसी जगह ढूँढ़ी है जहाँ वह तय समय पर जा सके। सिर्फ़ इसलिए कि यह बात पहले उन्होंने नहीं सुझाई थी, वे इसे ल्युवान की उस मेज़ से कमतर नहीं मान सकती थीं जिसे वे अपनी आँखों के सामने देख सकती थीं।
चौदह तारीख़ को वह बच्चे के बताए रास्ते से शिक्षक शन की गली में गई। पहले पीछे वाले कमरे में जाकर किसी को नहीं बुलाया। दरवाज़े के भीतर कुछ बच्चे अलग-अलग जगह बैठे थे। आ शंग काग़ज़ पर लिखे 水 (‘पानी’) अक्षर की ओर इशारा कर रहा था। उसने एक रेखा ग़लत बताई, तो शिक्षक ने उसकी जगह अक्षर नहीं पढ़ा। उन्होंने उसे खुद दोबारा देखने दिया। खिड़की के पास बाँसुरी थी, मगर भीतर आते ही किसी को उसे खेलने के लिए नहीं दिया गया। छिन दादी दरवाज़े के बाहर कुछ देर देखती रहीं। उन्होंने न इशारा करके नाती को बुलाया, न अंदर जाकर पहले अपना परिचय उसकी नानी के रूप में दिया। बच्चे को चुपचाप पढ़ाने के बारे में वे बहुत-सी बातें लेकर आई थीं, मगर अब उन्हें कोई ऐसा नहीं दिखा जिसे वे बातें कहनी ज़रूरी हों।
वापसी का टिकट उसके घुटने के नीचे दबा था। वह झेंग छिन के पास गई और पूछा कि एक बच्चा कम हो जाए तो क्या टिकट बदला जा सकता है। नाव चलाने वाली ने कहा कि कल नाव पर चढ़ने से पहले फिर गिनती होगी, सफ़र के जिस हिस्से पर अभी गई नहीं हैं उसका कुछ पैसा नियम के मुताबिक़ वापस मिल सकता है, लेकिन सांगछ्याओ के उस कमरे का अग्रिम लौटाने की बात उन्हें खुद करनी होगी। एक और जगह दौड़ना पड़ेगा, यह सुनकर उसके मन में फिर खीझ उठी, पर तभी उसे ख़याल आया कि ये सारे इंतज़ाम उसने खुद ही पहले से किए थे, अब इन्हीं का वास्ता देकर घर में बेटी को कैसे झेंप में डाल सकती है।
उसने झंग छिन से पूछा कि क्या वह श्याओमान को जानती है। नाविक ने कहा कि हाँ, कुछ सफ़रों में देखा है। बूढ़ी छिन ने मानो यूँ ही बातचीत में कहा कि बच्चा यहाँ नाव के साथ बहुत घूमता है, कभी-कभार किसी ठिकाने पर टिककर रहना भी अच्छा होगा क्या। झंग छिन ने किसी के पक्ष में फ़ैसला नहीं सुनाया। उसने बस इस्तेमाल न हुई छोटी टिकट निकाली और कहा कि बच्चा तुम्हारे हाथ में आया ही नहीं, नाववाले भी उसे गली से खींचकर तुम्हारे पास नहीं ला सकते। वह तो रोज़ माल लेते समय भी चाहती थी कि भेजने वाला ख़ुद ठीक से सौंपे। फिर यह तो एक बच्चा था जो अभी अपनी माँ के पास था।
सातवें महीने की पंद्रह तारीख़ को बूढ़ी छिन रवाना हुईं। श्याओमान उन्हें घाट तक छोड़ने आई। वह एक छोटी गठरी लाई थी जिसमें आशंग का अपनी नानी के लिए लिखा काग़ज़ था। बच्चे को वह साथ नहीं लाई। गठरी लेते हुए बूढ़ी छिन का अब भी बहुत मन था पूछें कि अगली बार किस दिन आओगी। आख़िर उन्होंने बस इतना कहा कि रास्ता मुझे मालूम है, नाव तक छोड़ने की ज़रूरत नहीं। बेटी ने उनकी बात पूरी तरह नहीं मानी। उसने गठरी के कोने को थामे रखा और माँ का पाँव नाव पर जम जाने के बाद ही हाथ हटाया।
इस बार ल्युवान लौटते हुए सांगच्याओ के कमरे में वह अकेली थी। लौटाए गए किराये के थोड़े से पैसे उसने पलंग के कोने पर रख दिए और फ़ौरन गिने नहीं। पहले छोटी पोटली खोली और लिखावट देखी। आशंग ने लिखा था, आज मैं “舟” पहचानता हूँ, यानी नाव का अक्षर। नीचे उसने एक नाव भी बनाई थी जो नाव जैसी कम ही लगती थी, और बगल में दो छोटी लालटेनें थीं। वह देर तक देखती रही। समझ गई कि इस बार साथ न आने के कारण बच्चे ने उसे भुला नहीं दिया है। फिर भी बेटी पर ग़ुस्सा था कि वह ऐसे बोलती है जैसे ज़रा भी गुंजाइश छोड़ने को तैयार न हो।
सोलह तारीख को जब बूढ़ी छिन दुकान लौटीं, आछ्याओ दो पुराने दीपों की मरम्मत कर चुकी थी और उनके लिखे दाम के हिसाब से पैसे भी ले चुकी थी। बूढ़ी छिन ने सबसे पहले पूछा कि उसने उनका इंतज़ार क्यों नहीं किया। लड़की ने कहा कि ग्राहकों को जाना था और काग़ज़ और ढाँचे की मरम्मत का तरीका लिखा हुआ था, उसे सब समझ आ गया था। ‘समझ आ गया था’ सुनते ही बेटी पर उनका ग़ुस्सा इस दिहाड़ी कारीगर पर आ गया। उन्हें लगा, वे बस कुछ दिन दूर क्या रहीं, हर जगह कोई उनसे पहले फ़ैसला करने लगा।
आ छ्याओ ने पैसे और इस्तेमाल का सामान सलीके से रख दिया। बोली कि अगर उसे बस बैठे-बैठे इंतज़ार करने की इजाज़त है तो अगली बार पहले बता दें। वह लालटेन की मरम्मत का काम नहीं लेगी, बस दुकान की रखवाली करेगी। वह छिन श्याओमान नहीं थी, जो बेटी होने के कारण बात को कुछ नरम कर दे। छिन दादी ने मेज़ पर रखी दोनों सुधारी हुई लालटेनें देखीं। काग़ज़ सपाट था और ढाँचे का मुँह भी टेढ़ा नहीं था। आख़िर डाँटने की जगह उन्होंने पूछा कि पुरानी बाँस की तीली कहाँ इस्तेमाल की थी और उससे समझाने को कहा।
लड़की समझाकर अपने समय पर चली गई। उसने उस दिन की मज़दूरी रोज़ की तरह ली। बुज़ुर्ग का मन ख़राब है, इसलिए पूरी रात साथ देने को नहीं रुकी। दुकान शांत हो गई। छिन दादी ने बेटी की इस बार लिखी यात्रा की तारीख़ निकाली, फिर एक कोरा काग़ज़ लिया। लिखना चाहा कि आगे से तुम लोगों को भी तकलीफ़ उठाने की ज़रूरत नहीं। कलम उठाते ही अचानक उन्हें बरसों पहले की अपनी बात दिखाई दी, ‘अगर लौटकर नहीं आओगी तो इस घर को अपना मत कहना।’ सोलह बरस के फ़ासले पर भी दोनों बातें एक ही मन से काग़ज़ पर उतर सकती थीं।
उन्होंने कलम रख दी और खाना खाने के बाद लिखने का निश्चय किया। आख़िर में बस इतना लिखा कि वह पहुँच गई हैं। बच्चा इस दस दिन की पढ़ाई के बारे में अब भी बताना चाहे तो किसी से दो बातें कहलवा दे। आगे से वह जाने के पहले पूछ लेंगी और किसी की वापसी का टिकट पहले से नहीं लेंगी। काग़ज़ पर न रास्ते की थकान का ज़िक्र था, न टिकट पर बेकार गए पैसों का। उनका ग़ुस्सा अब भी पूरी तरह उतरा नहीं था। लिखकर काग़ज़ एक रात दबा रहने दिया, कहीं सुबह बेटी का दिल पिघलाने के लिए आधी पंक्ति और जोड़ने को जी न करे।
सोने से पहले वह पिछवाड़े के दरवाज़े पर लगा नया परदा देखने गई। लौटाए गए नीले कपड़े का आधा हिस्सा वहाँ ठीक बैठ गया था। हवा आती तो अब सीधे लालटेन के काग़ज़ पर नहीं लगती थी। उसने दरवाज़े की कुंडी चढ़ाई और काउंटर पर लौटकर आछ्याओ की इस्तेमाल की हुई बाँस की पतली पट्टियाँ उनके डिब्बे में रख दीं। तसल्ली के लिए उसने परदा उखाड़कर अपने हाथ से फिर नहीं बनाया। काग़ज़ के नीचे से बच्चे की बनाई नाव का आधा अगला सिरा झाँक रहा था। उसने उँगली से उसे सपाट किया और ख़ुद भी कुछ देर बैठी रही, फिर छोटी बत्ती फूँककर बुझा दी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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