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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

चौथे महीने का ज्वार

कू वूजी · AI सृजन · 9399 अक्षर · लगभग 13 मिनट

चौथे महीने की बारह तारीख़ की चिट्ठी चंग छिन लाई थी। काग़ज़ मोड़कर बाँस की एक छोटी पट्टी में खोंसा गया था। बाहर कोई सुंदर मुहर नहीं थी। आज़ाओ ने लेते ही पूछा कि नाव ख़राब हो गई क्या। चंग छिन ने कहा कि उसे नहीं मालूम, वह बस किसी का संदेश लाई है। पानी का हाल पूछना है तो पहले काग़ज़ खोलो। जो ख़राबी किसी ने बताई ही नहीं, उसे पहले से किसी के सिर मत मढ़ो।

तिंग छ्वान ने धीरे-धीरे लिखा था। अक्षर छोटे-बड़े थे और दो जगह लुओ येन ने बात पूरी की थी। उसने लिखा, पश्चिमी घाट पर दोपहर बाद जलावन के काँवर ज़्यादा आते हैं। पुरानी छोटी खाड़ी में नाव की राह देखने वालों के लिए जगह कम पड़ गई है। वह नाव लगाने की जगह दो झांग नीचे ले जाना चाहता है और पानी की ऊँचाई नापने का खूँटा भी कहीं और देखेगा। नाव में बड़ा रिसाव नहीं था और कामचलाऊ मरम्मत अब भी मज़बूत थी। बस वसंत की चढ़ती धार में पुरानी रस्सी किनारे से घिसने लगी थी, इसलिए उसने नई लगा दी थी और रोज़ के इस्तेमाल का ख़र्च ख़ुद दिया था। आख़िर में पूछा, बाहरी तख़्तों की बड़ी मरम्मत गर्मी आने तक टली तो क्या आझाओ पहले लकड़ी देखने जाना चाहेगी?

बाँस की पट्टियों के बीच दिंग सुई की बनाई एक नई झालर की नोक का चित्र भी खोंसा था। अब वह आझाओ से उसे ढूँढ़ लाने को नहीं कह रही थी। बस पूछ रही थी कि बाँस की पट्टी पर इस तरह लपेटने से कहीं बहुत भारी तो नहीं हो जाएगी। उन उलझे गोलों के पास लुओ यान का सुधारा हुआ एक छोटा निशान था। साफ़ था कि माँ-बेटी इस पर बहस कर चुकी थीं और अपने हाथ से बनाना भी शुरू कर चुकी थीं। आझाओ ने काग़ज़ सपाट किया। अभी जवाब नहीं सूझा, इसलिए पहले उसे नाव वाली चिट्ठी से अलग रख दिया।

आझाओ की नज़र सबसे पहले दो झांग खिसकाने की बात पर पड़ी। उस जगह से कुछ नीचे पानी में एक छिपा मोड़ था। पिता ने कहा था कि वहाँ नाव नहीं लगानी चाहिए और उसे भी याद था। उसने काग़ज़ उलट-पलटकर देखा, मानो पीछे एक और पंक्ति लिखी मिल जाए कि अभी बस बात हुई है, सचमुच जगह नहीं बदली। वह जानती थी कि वह ल्युवान में नहीं है और उसके जाने के बाद कुछ भी पहले जैसा रहने की ज़रूरत नहीं। मगर किसी ने सच में उस जाने-पहचाने पानी पर ज़रा-सा बदलाव कर दिया था और उसे अपनी ग़लती से मंच की पोशाक उलटी सिल देने से भी ज़्यादा तकलीफ़ हुई।

वह काग़ज़ लेकर श्याओमान के पास आख़िरी दो अक्षर पूछने गई। श्याओमान ने पढ़कर बताया कि ‘लकड़ी का सामान’ लिखा है, फिर पूछा कि क्या वह वापस जाएगी। आ झाओ ने कहा कि शायद एक बार देखना पड़े। नाव को पानी में कुछ हो गया तो वह यहाँ बैठकर बस टाँके नहीं उधेड़ सकती। श्याओमान के हाथ में नीले चोगे से निकाली हुई अस्तर अभी थी। उसने कहा कि देखना ज़रूरी है तो ज़रूर जाओ, मगर जो काम ले चुकी हो उन्हें पहले किसी के हवाले करो। मेरे ‘जाओ’ कहने का मतलब यह मत समझ लेना कि मैं शुरू से आख़िर तक तुम्हारा सारा काम समेट दूँगी।

आझाओ का चेहरा गरम हो उठा। उसने सचमुच मान लिया था कि श्याओमान घर की नाव के बारे में जानती है तो अगले दो दिन के कपड़ों का काम उठाने को पहले ही राज़ी हो जाएगी। उसके टोकने पर लगा कि दूसरों की तरफ़ से फ़ैसला कर देने की अपनी आदत भी वह लांतिंग ले आई थी। फिर भी उस वक़्त यह मानने का मन नहीं हुआ। उसने कहा कि वह किसी को ढूँढ़ लेगी। कपड़ों का ढेर उठाकर वापस लाई और बैठी ही थी कि गु मिंग फिर आ गया, पूछने कि पिछले अंक की डोरी कब बदली जा सकती है।

कू मिंग ने ज़ोर देकर जल्दी नहीं की थी, बल्कि पहले पूछा था कि उसका हाथ अब ठीक है या नहीं, मगर आ चाओ को हर किसी की बात तकादा लग रही थी। उसने कहा, ठीक है, गले की पट्टी आज दे देगी; आगे कुछ दिन वह न रहे तो फिर ऐन मंच पर उसे खींच न देना। कू मिंग पलभर ठिठका, फिर हँसकर बोला, तब उसे डाँटेगा कौन। लेकिन उसे न हँसते देख उसने नाटक वाला लहजा छोड़ दिया और पूछा, क्या सचमुच कोई ज़रूरी बात आ पड़ी है।

उसने नाव की ख़बर थोड़े में बताई। गु मिंग ने वे कुछ अक्षर देखे और ‘दो झांग’ पर उँगली रखकर पूछा कि क्या यह बहुत दूर है। आ झाओ ने कहा कि दूर नहीं, पर नाव के मामले में दूरी ही सब कुछ नहीं होती। उसे जैसे कुछ समझ आया, कुछ नहीं। बस कहा कि ऐसा है तो एक बार लौट जाओ, दो ही दिन का तो पानी का रास्ता है। आ झाओ को अचानक उस पर खीझ आई कि उसने आने-जाने को मंच पर चढ़ने-उतरने जितना आसान कह दिया। उसे दोनों तरफ़ की नाव का टिकट लेना था, सांगछ्याओ से होकर जाना था और हाथ का काम किसी को सौंपना था। मगर उसे घुमाव आज़माने के लिए बुला लिया गया था। आ झाओ की बात का बाकी हिस्सा वह सुन ही नहीं पाया।

गाओ मान ने सुना कि उसे अपनी जगह काम करने वाला कोई चाहिए, तो हाट की ये झन का नाम लिया। कहा कि वह दिन में कपड़े उधेड़ती और धोती है। अगर बस इतनी ही पोशाकें तय गिनती के मुताबिक़ सौंपनी हैं तो उससे पूछ सकती हो। ये झन आई तो आस्तीनें कोहनियों तक चढ़ी थीं और हाथ में आ झाओ की टोकरी से भी पुरानी बाँस की टोकरी थी। उसने पहले काम देखा, यह नहीं पूछा कि आ झाओ किस घर से आई है। कौन-सी पोशाक रफ़ू होनी है, कौन-सी धुलनी है और कौन-सी पहनकर देखनी है, उसने सब अलग किया। बोली कि आने-जाने के चार दिन उसका काम सँभाले तो कुल छत्तीस वेन। रात में नहीं आएगी, अपनी दुकान पर सूखने के लिए डाली चीज़ें भी समेटनी होती हैं।

आझाओ ने छत्तीस वन की रकम पर नज़र डाली और पल भर ऐसी झेंप हुई जिसे वह कह नहीं पाई। उसे नहीं लगा कि सामने वाली ज़्यादा ले रही है। बात यह थी कि पहले ख़ुद बीस-इक्कीस वन का कोई काम लेती तो उसे लगता कि ठीक से निभाने के लिए ख़ूब शुक्रिया भी अदा करना पड़ेगा। अब कोई दूसरा एक नज़र में उसी काम की क़ीमत बता सकता था और उसे यह नहीं लगता था कि नाटक से लगाव न होने पर कम पैसे लेने चाहिए। आझाओ ने पूछा कि वह कलाकार को पहनाकर देखेगी या नहीं। ये झन ने कहा कि पहनाकर देखना होगा तो उसे बुलाएँगे, आने को राज़ी न हो तो अभी काम नहीं करेंगे। अपनी सारी रात पहले से उसमें लगाने की ज़रूरत नहीं है।

कहकर ये चन आज़ाओ के फ़ौरन जवाब का इंतज़ार नहीं करने लगी। तय कर गई कि दोपहर बाद आकर फिर पूछेगी। आज़ाओ उसे जाते देखती रही। पहले लगा कि यह तरीक़ा कुछ ज़्यादा सख़्त है। पल भर बाद सोचा कि अगर वह भी इतनी सख़्त हो पाती तो शायद नीले चोगे के लिए उस दोपहर अँधेरा होने तक बैठी न रहती। उसने उस ख़याल को दबाया और काग़ज़ लेकर चंग छिन से उत्तर जाने वाली नाव का पता करने चली गई। कम से कम पहले यह तो जान ले कि नाव किस दिन है। उसे उसी वक़्त निकलना नहीं था।

झंग छिन घाट पर नाव की छत का कपड़ा रफ़ू कर रही थी। उसने आ झाओ को एक सिरा थामने को कहा और खुद पुराने छेद से लंबी सुई पार की। आ झाओ कपड़े को जानती थी, इसलिए अनायास बोल पड़ी कि यहाँ बुनावट की दिशा में सीने से सिलाई फिर आसानी से खुल जाएगी। झंग छिन ने पूछा कि फिर कैसे करना चाहिए और उसके बताए ढंग से एक बार सिलाई बदलकर देखी। तब कहा कि उत्तर जाने वाली नाव कल सुबह है और परसों दोपहर थोंगवेई पहुँचेगी। अगर वापस भी आना है तो कम से कम चार दिन लगेंगे। उसने यह नहीं पूछा कि काम किसी और को सौंपने के छत्तीस वेन में घाटा है या फ़ायदा। बस बताया कि एक तरफ़ का किराया पहले की तरह बयालीस वेन है।

नाव की छतरी का किनारा थामे हुए आझाओ ने अचानक हिसाब लगाया। आने-जाने और अपनी जगह काम करने वाला ढूँढ़ने के एक सौ बीस वन सिर्फ़ उस जलस्तर के खूँटे को एक नज़र देखने के लिए लगेंगे जिसे दूसरे पहले ही देख चुके थे। बड़ी मरम्मत की लकड़ी देखने कभी न कभी जाना ही था, इसलिए इस पूरे ख़र्च को बेकार नहीं कह सकती थी। मगर अभी तो दिंग छ्वान ने सिर्फ़ नाव लगाने की जगह दो झांग खिसकाई थी और चिट्ठी में रिसाव का ज़िक्र तक नहीं था। उसके मन की सबसे बड़ी बेचैनी शायद यह नहीं थी कि नाव सचमुच चल पाएगी या नहीं।

उसने यह सब चंग छिन से नहीं कहा। छाजन ढीली पड़ी तो पहले उसका धागा समेटने में मदद की। नाव चलाने वाली ने एक नज़र देखकर उसकी सधी हुई सिलाई की तारीफ़ की। आज़ाओ का मन उलटे थोड़ा बुझ गया, जैसे जिस नाव पर वह सारी उम्र नहीं बिताना चाहती, उस पर उसके हाथों को रंगमंच की पोशाक पर काम करने से कहीं ज़्यादा भरोसा रहता हो। चंग छिन तब तक लोगों से माल उतरवाने में लग चुकी थी। वह रुकी नहीं कि आज़ाओ इस तारीफ़ में घर लौटने की एक और वजह ढूँढ़े।

जब वह नानथांग लौटी, आशंग लिख रहा था। वह नानी का लिखा 笙 पुराने कागज़ पर उतार रहा था। अक्षर के ऊपर का बाँस वाला हिस्सा अब भी एक ओर बड़ा, दूसरी ओर छोटा था। जब उसने सुना कि आझाओ ल्योवान लौटने वाली है, तो फौरन अपनी बाँस की पट्टी साथ ले जाने को कहा। बोला, पिछली बार नानी को जो पट्टी दी थी उसमें छेद नहीं था, उन्हें बता देना कि अभी उसमें फूँक न मारें। आझाओ हँस पड़ी। पूछा, छेद वाली अब ठीक बजती है? बच्चे ने बड़ी गंभीरता से कहा, थोड़ी कसर है, मगर बिना छेद वाली से तो अच्छी है।

पास बैठी श्याओमान ने सुन लिया। पहले तो उसने कहा कि आ झाओ से हर फेरे में अपनी कोई चीज़ मत भिजवाया करो, फिर ख़ुद ही पूछ बैठी कि अगर वह सचमुच लौटे तो बातों-बातों में माँ से पूछ सकती है कि पिछली बार की खाँसी कुछ ठीक हुई या नहीं। आ झाओ ने उसकी ओर देखा। श्याओमान को भी अचानक अपनी बात का एहसास हुआ और उसने हल्की हँसी के साथ कहा, देखो, मैंने भी तुम्हें बातों-बातों में पूछने को कह दिया। दोनों हर बात का हिसाब किसी सौंपे हुए काम की तरह करने नहीं लगीं, मगर उन्हें याद आया कि बाहर जाने वाले का अपना आना-जाना भी होता है। हर बार संदूक उठाने के लिए एक ही व्यक्ति का इंतज़ार करना ठीक नहीं।

आख़िरकार आझाओ ने उत्तर जाने का वह टिकट नहीं लिया। दोपहर बाद ये झन आई तो उसने पहले ही साफ़ कर दिया कि वह जा नहीं रही, आज उसे आने की तकलीफ़ दी और आगे कभी उधेड़कर धुलवाना होगा तो फिर पूछेगी। ये झन ने मुँह नहीं बनाया। बस बाँस की टोकरी वापस ली और पूछा कि नीले-हरे चोगे से निकला पुराना अस्तर अलग धोना है क्या, अगर हाँ तो कल साथ ले जाएगी। इस बार आझाओ ने अपना इरादा बदल जाने के कारण दाम की बात नहीं टाली। उसने पूछा कि कितना काम हो सकता है और जो छोटी रकम बनती थी, दे दी।

उसका मन अब भी घबरा रहा था। शाम के अभ्यास के दौरान पिता ने जिस छिपे मोड़ की ओर इशारा किया था, वह बार-बार उसकी आँखों के आगे आ जाता। लू हेन्यांग ने पोशाक बदलते वक़्त काम आने वाला कपड़ा लाने को कहा। आज़ाओ ने ग़लत कपड़ा थमा दिया तो सुनना पड़ा, फिर ध्यान क्यों नहीं दिया। वह चौंककर सँभली और ख़ुद उसे बदलने चली गई। उसके मुँह से लगभग निकल गया कि मैंने जान-बूझकर नहीं किया। लू हेन्यांग आगे बढ़ चुकी थी। उसकी पोशाक का किनारा चौखट के खंभे पर आज़ाओ के लपेटे कपड़े से छूकर गुज़रा और इस बार अटका नहीं। उस जगह को देखते हुए वह आख़िर अपना ध्यान वापस सामने की उस छोटी-सी राह पर ला पाई।

खेल ख़त्म होने के बाद उसने गाओ मान से एक टुकड़ा काग़ज़ उधार लिया और जवाब लिखा। उसने चिंता न होने का दिखावा नहीं किया। पहले की तरह छिपे मोड़ पर पानी गहरा होने की बात लिखी, फिर दिंग छ्वान से पूछा कि क्या उसने खूँटों की नई सीध देख ली है। अगर देख ली है तो जो अभी अपनी आँखों से देखता है, उसी के मुताबिक़ करे। लकड़ी के लिए वह और लुओ यान पहले दो जगह पूछ लें और दाम भिजवा दें। जो हिस्सा उसके ज़िम्मे है उसे वह अलग रखेगी और अगली बार लौटकर सबके साथ देखेगी। बाहर होने के चलते वह सारा बोझ नाव इस्तेमाल करने वालों पर नहीं डालेगी।

अंत में वह लिखना चाहती थी कि हर बात मुझसे फिर पूछ लेना। कलम पल भर रुकी, फिर उसने उसकी जगह लिखा कि बड़ी ख़राबी में देर मत करना, छोटे-मोटे ख़र्च तुम लोग खुद देख लेना। उसने एक बार पढ़ा। लहजा अपना-सा नहीं लगा। इतना छोटा, इतनी कम हिदायतें, जैसे जिस चिंता को अभी छोड़ नहीं पाई थी, उसे भी जानबूझकर लिखने से छोड़ दिया हो। मगर अगर वह सचमुच हर चिंता लिख देती, तो दिंग छ्वान के हाथ जवाब नहीं, एक और अदृश्य चप्पू लगता।

गू मिंग उधर से गुज़रा। उसे लिखते देखकर झुककर पूछा, घर की चिट्ठी है क्या? आझाओ ने कागज़ समेटने में थोड़ी देर की ताकि वह “船” यानी नाव वाला अक्षर देख ले, और कहा, कुछ वैसी ही है। उसने कहा, तुम्हारी लिखावट मेरी गीतों की पोथी से साफ़ है। कल मैंने “回舟” यानी लौटती नाव को “回周” पढ़ दिया, और श्याओमान वहीं हँस पड़ी। आख़िर आझाओ खुलकर हँसी। उसने पूछा, किसी झोउ परिवार का “周” पढ़ लेने से तुम्हें ज़्यादा नाव का किराया मिल जाता क्या? वह भी हँसा और थोड़ी देर खड़ा रहा। फिर कहा कि कपड़े बदलने वाली वह चाल कल फिर करके दिखा देगा, उसे मंच पर जाने के ठीक पहले तक इंतज़ार नहीं कराएगा।

वह जानती थी कि शायद वह आगे हर बार इस बात पर अमल न कर पाए। फिर भी उसने हामी में आवाज़ दी। उसकी ज़रा-सी सदिच्छा अभी के लिए काफ़ी थी, उससे आने वाले दो साल की सारी कमी पहले से पूरी करने की ज़रूरत नहीं थी। उसने जवाबी चिट्ठी बाँस की तीलियों के किनारे में फँसाकर रस्सी से बाँधी और आ शंग का बनाया बाँस का छोटा-सा चित्र भी साथ लपेट दिया। श्याओमान की ओर से खाँसी का पूरा हाल नहीं पूछा। बस एक अलग काग़ज़ पर जोड़ा कि माँ-बेटा दोनों ठीक हैं और दिंग छ्वान से कहा कि लालटेन की दुकान के पास से गुज़रे तो पहुँचा दे, ताकि छिन परिवार को पता चले कि लिखे हुए शब्दों को अब जवाब मिलने लगा है।

पाँच दिन बाद जो ज़बानी जवाब आया, वह छोटा था। दिंग छ्वान ने कहा कि इस साल छिपे मोड़ पर गाद भर गई है, पहले का गहरा हिस्सा अब बाहर की ओर खिसक गया है और पुराना खूँटा अब ठीक जगह पर नहीं है। उसने नई राह से तीन बार नाव लगाकर देख ली है। दिन के उजाले में ही वहाँ नाव लगाएगा, और पानी चढ़ा तो पीछे हट जाएगा। लुओ यान ने लकड़ी के बारे में भी पूछ लिया है। ख़रीदने की जल्दी नहीं है, पहले देखेंगे कौन-सा हिस्सा बच सकता है। यह सुनकर भी आझाओ नए ठिकाने को अपनी आँखों से नहीं देख पाई, मगर मन में जिस जगह का पानी इतना ख़तरनाक लग रहा था, उसे फ़िलहाल किनारे पर खड़े लोगों के हवाले करने को तैयार हो गई।

उस रात उसने चिट्ठी पिता के बहीखाते में नहीं दबाई, बस अपने नाप के कागज़ों के पीछे रख दी। उधेड़कर धुलाई से लौटी अस्तर की बुनावट मेज़ पर सूख चुकी थी। ये झन ने उसे दो टुकड़ों में तह किया था और कौन-सा कोना कम था, यह भी लिख दिया था। आझाओ ने एक टुकड़ा उठाया और देखने चली गई कि नाटक के पिछले अंक में जहाँ गू मिंग कपड़े बदलता है, वहाँ का दरवाज़ा सच में सँकरा है या नहीं। इस बार उसने कागज़ से आती पानी की आवाज़ को एक अधबना कपड़ा अपने साथ बहा ले जाने का मौका नहीं दिया।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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