प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
कू वूजी · AI सृजन · 9082 अक्षर · लगभग 12 मिनट
गु मिंग का नया नीला चोगा चौथे महीने की दूसरी तारीख को सिलकर तैयार हुआ। आझाओ ने पहले किसी को उठाकर नहीं दिखाया। उसने उसे ख़ुद समतल बिछाया, गले, बगल की सिलाई और अस्तर व ऊपरी कपड़े के जोड़ एक-एक करके टटोले और पक्का किया कि पिछली बार की तरह चलने-फिरने की कोई चुन्नट अपनी मर्ज़ी से बंद नहीं कर दी गई थी। गु मिंग के चुने ताँबे के छोटे गहने भी सामने के पल्ले पर टाँक दिए गए थे। उसने हाथ में उनका वज़न तो परखा था, पर चलते-चलते उन्हें उतारकर नहीं देखा था। इस एक पोशाक के लिए उसने दो रात कम नींद ली थी और खाना तक जल्दी-जल्दी खाया था। आखिर जब उसे किसी को पहनाने की घड़ी आई, तो उलटे उसकी हथेलियाँ नम हो गईं।
गु मिंग ने चोगा पहना, पहले सिर झुकाकर सामने का पल्ला देखा, फिर दो कदम चला और रंग की तारीफ़ की। आझाओ ने बाँह उठाने को कहा, उसने उठाई। आस्तीन समेटकर कंधा घुमाने को कहा, वह भी किया। मगर उसके पैर उस सूखी जगह से ज़रा भी नहीं हटे। वह चाहती थी कि वह मंच पर जो कुछ करेगा, सब एक बार करके दिखाए। तभी परदे के बाहर लू हेन्यांग ने संवाद मिलाने के लिए पुकारा, तो उसने कहा कि लगभग ठीक है, दोपहर बाद फिर आएगा। आझाओ ने सिर झुकाकर उसके गले की एक डोरी समेटी। चेहरा इतना पास था कि उसके मुँह से बाकी बात निकल ही नहीं पाई।
उसने कंधे नापे थे और हिलने-डुलने की गुंजाइश छोड़ना भी याद रखा था। पोशाक ऐसी नहीं थी कि खड़े-खड़े ही कसने लगे। मगर नए चोगे को तना हुआ दिखाने के लिए भीतर एक पतला अस्तर लगाया गया था। बग़ल की डोरियाँ गहरे छिपी थीं, इसलिए कपड़ा सपाट दिखता था और गाँठ पहली नज़र में नहीं दिखती थी। गु मिंग ने आईने के सामने आधा चक्कर लिया और कहा कि आख़िर ल्यु शंग अब ऐसा आदमी नहीं लगता जिसे बस नाव का किराया उधार रखना आता हो। आझाओ यह सुनकर इतनी ख़ुश हुई कि उसने फिर नहीं पूछा कि अगले अंक में वह हिस्सा आख़िर कैसे करने वाला है।
काओ मान बचा हुआ कपड़ा लेने आई। उसने कटी लंबी पट्टियाँ क्रम से पुराने थैले में रखीं और पूछा, क्या परसों इसे पहना जा सकेगा? आझाओ ने कहा, हाँ। फिर जोड़ा कि अगर आज दोपहर एक बार और पहनकर देख लें तो ज़्यादा भरोसा रहेगा। काओ मान सिर हिलाकर गू मिंग को बुलाने गई, मगर वह कुछ पुरुष कलाकारों के साथ सामने के आँगन में तलवार का अभ्यास करने जा चुका था। आझाओ भी देखने गई। लकड़ी की तलवार ऊपर-नीचे होती दिखी और उसका पुराना नीला-हरा चोगा एक झटके में खुलकर लहरा गया। भीड़ से किसी ने दाद दी। ऐसे में आझाओ सुई की डिबिया उठाकर उसे कपड़े उतारने के लिए कैसे पुकारती?
दोपहर में वह नहीं आया। शाम को एक दर्शक की माँग पर अचानक एक छोटा अंक जोड़ दिया गया और आँगन में अफरा-तफरी मच गई। श्याओमान ने पूछा कि नई पोशाक का क्या हुआ। आझाओ ने कहा कि पहनकर देख ली गई है, मगर यह साफ़ कहने की हिम्मत नहीं हुई कि पूरी चाल आज़माई नहीं गई। उसे डर था कि कहते ही पोशाक फिर दबाकर रख दी जाएगी और लोगों को बस यही याद रहेगा कि वह उधेड़ने और धोने के काम की है। उसने गले की डोरी फिर सपाट की और सोचा, पुरानी पोशाक में चाल हो जाती है, नई भी उसी नाप से बनी है, ज़्यादा से ज़्यादा नीचे का घेरा थोड़ा चौड़ा है, फिर क्यों नहीं हो पाएगी?
चौथी तारीख़ को मंच पर जाने से ऐन पहले गु मिंग ने बताया कि इस बार आख़िरी हिस्से में तलवार के तीन घुमाव और जोड़ने हैं। फिर पुरानी पोशाक पहनकर अगले अंक में जाना होगा, ताकि मंच पर ज़्यादा इंतज़ार न हो। आझाओ के हाथ में डोरी एकाएक रुक गई। उसने पूछा, अब क्यों बता रहे हो? उसने कहा, परसों सबने देखा था, मैं छिपकर तो अभ्यास नहीं कर रहा था। उसने सचमुच देखा था, मगर तलवार की चाल देखना और यह जानना दो अलग बातें थीं कि वह इसी नई पोशाक में उसे करेगा और पसीने से भीगते ही उसे उतारकर दूसरी पहनेगा। उसके मुँह से बस इतना निकला कि डोरी धीरे से खोलना, ज़ोर से मत खींचना।
गु मिंग हँसा और बोला कि मंच पर भला धीरे कैसे हो सकता है। फिर उसने हाथ बढ़ाकर गले का फीता ख़ुद बाँध लिया। आ झाओ ने देखा कि उसने गाँठ उससे भी गहरे छिपा दी है। वह उसे बदलना चाहती थी, पर सामने से ढोल की ताल आ चुकी थी। उसने परदा हटाया। मंच के मुँह की रोशनी में नीला रंग एक बार चमका, जैसे पूरे सभागार ने उसे देख लिया हो। पल भर को आ झाओ अपना डर भूल गई। उसने यह तक सोचा कि क्या परदे के बाहर के लोग पूछेंगे कि पोशाक किसने बनाई है।
तलवार-नृत्य के पहले दो घुमाव सुंदर थे। चोगे का घेरा आदमी के पीछे लहराता चला। तीसरे घुमाव में गु मिंग ने जल्दी पैर रखा। उसकी डग पोशाक आज़माते वक़्त से बड़ी पड़ गई और बग़ल की पट लकड़ी की तलवार के सिरे की सजावट में फँस गई। उसने अपनी मुद्रा के सहारे उसे छुड़ा लिया और कोई बड़ी चूक दिखने नहीं दी। नीचे से किसी ने दाद दी। आ झाओ को पीछे से साफ़ नहीं दिखा। बस दाद सुनकर उसकी साँस कुछ खुली। जब गु मिंग परदे के भीतर आया, सीने की पतली अस्तर पसीने से भीगकर बदन से चिपक चुकी थी। वह एक हाथ से फीता पकड़कर दूसरे से खोलने लगा। जितनी जल्दी करता, गाँठ उतनी ही हाथ से गुम हो जाती।
अगले अंक की पुकार आ रही थी। लू हेन्यांग उस पंक्ति तक पहुँच चुकी थी जहाँ उसे ल्यौ शंग की राह देखनी थी। गू मिंग ने धीमे से एक गाली दी और कोहनी उठाकर चोगा उतारना चाहा, मगर भीगे अस्तर ने आस्तीन अटका दी। आज़ाओ लपककर मदद करने गई। उसके अपने हाथ भी फिसल रहे थे। गले की डोरी आख़िर खुल गई, मगर बग़ल का पल्ला अब भी तलवार के सिरे की सजावट में फँसा था। गू मिंग ने ज़ोर का झटका दिया। आज़ाओ के कान के पास कपड़ा चिरने की आवाज़ आई। नए कपड़े की बस कुछ सिलाई नहीं खुली थी, सीवन के बग़ल में एक पतली चीर पड़ गई थी।
वह पुरानी पोशाक पहनकर बाहर लपका, दो मात्राएँ देर हो चुकी थीं। छाई हंग ने ढोल की एक सजावटी थाप से अंतर भर दिया और लू हन्यांग ने उसी वक़्त मुसाफ़िर साहब से एक बार और पूछ लिया कि फिर देर कैसे हो गई। दर्शक हँस भी पड़े। आझाओ पोशाकों के संदूक के पास खड़ी थी। एक हाथ में कपड़े की चीर थामे थी, दूसरे में अब भी वह डोरी थी जो समय पर खुल नहीं पाई थी। खेल रुका नहीं, फिर भी उसे लगा जैसे किसी ने वह सारी सुंदरता उघाड़ दी हो जिसे वह बाहर दिखाना चाहती थी, और अब बस एक फटा निशान बचा था जिसे रोशनी का छल कहकर टाला नहीं जा सकता था।
प्रस्तुति ख़त्म होते ही गाओ शोउछंग ने पहले पूछा कि पूरी चाल पर आज़माए बिना नई पोशाक पहनकर मंच पर जाने किसने दिया। गु मिंग ने कहा, ‘मैंने आज़माई थी,’ फिर आ झाओ की ओर देखा। ये शब्द सुनते ही उसके भीतर शिकायत उमड़ आई। लगभग कहने ही वाली थी कि पिछली दोपहरों में वह कैसे उसके इंतज़ार में बैठी रही। तब तक श्याओमान ने चोगा लेकर भीतर की ओर पलट दिया था। उसने पूछा कि तलवार-नृत्य और जल्दी पोशाक बदलने की चाल में फेरबदल की ख़बर उसने पहले सिलाई करने वाली को दी थी क्या। गु मिंग ने जवाब दिया कि सबने देखा था। आधी बात कहते-कहते उसकी आवाज़ भी धीमी पड़ गई।
इस पर भी श्याओमान ने आ-झाओ को हर सवाल से बचा नहीं लिया। उसने पूछा कि नए चोग़े की डोरियाँ पुराने कपड़े से कहाँ अलग थीं और पसीने में भीगने वाले अस्तर को शरीर से इतना सटाकर क्यों बनाया गया। आ-झाओ ने एक-एक सवाल का जवाब दिया और जवाब देते हुए ख़ुद भी सुन लिया कि कुछ फ़ैसले बस इसलिए किए गए थे कि देखने में कुछ खुला न लगे। वह जानती थी कि हर बात को पुराने कपड़े की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। फिर भी, इस बार पोशाक बनाने की मुख्य ज़िम्मेदारी हाथ से निकलने के डर में, उसने जहाँ बात साफ़ नहीं थी वहाँ ‘चल जाना चाहिए’ कहकर ख़ाली जगह भर दी थी।
गाओ मान सबसे पहले बैठकर चीर नापने लगी। उसने कहा कि इसे पहले जैसा नहीं जोड़ा जा सकता। सामने की रोशनी पड़ते ही दिख जाएगा। उधेड़कर किसी दूसरे काम में लेना होगा। उसने न आज़ाओ से पूछा कि उसे कितना बुरा लग रहा है, न ऊँची आवाज़ में डाँटा। बस नई पोशाक की मज़दूरी के लिए रखी पंक्ति फ़िलहाल ख़ाली छोड़ दी। वह ख़ाली जगह देखकर आज़ाओ को अचानक डाँट से भी ज़्यादा डर लगा। उसने पूछा कि क्या वह अब भी ख़ुद इसे पूरा कर सकती है। श्याओमान ने कहा कि इस बार काम वह सँभालेगी। आज़ाओ उधेड़ने में मदद करे। आगे की बात बाद में होगी।
आज़ाओ वहाँ सबके सामने नहीं रोई। उसने सुइयों की डिबिया संदूक में रखी, मगर उँगलियाँ काँप रही थीं। ढक्कन दूसरी कोशिश में बंद हुआ। दोपहर का खाना मिला तो उसने एक कौर नहीं खाया। जितनी देर नहीं खाती, उतना ही लगता कि सब देख रहे हैं कि उसने कुछ नहीं खाया। आख़िर खाना कमरे में ले गई। दरवाज़ा बंद करते हुए खाट के नीचे के ख़ाली ढाँचे से टकराई और वही जानी-पहचानी खटाक सुनाई दी। उसका अचानक बहुत मन हुआ कि ल्युवान लौट जाए। वहाँ कम से कम नाव के पिछले सिरे से रिसता पानी उसे अपनी आँखों से दिखता था।
उसने संदूक आधा खोला तो पाया कि आते वक़्त साथ लाई दोनों पोशाकें अब भी भीतर थीं। समेटने को कुछ था ही नहीं। अगर अभी चली जाए तो बिस्तर के पैसे दे चुकी है, नाव किराये पर दे चुकी है। एक नाकामी के चलते कोई उसके लिए ये सब बातें वापस नहीं लेगा। इससे भी ज़्यादा तकलीफ़ उसे यह सोचकर हुई कि उसे सच में यह जगह नापसंद नहीं थी। वह बस सबके सामने यह मानना नहीं चाहती थी कि जो चीज़ बनाना चाहती है, वह अभी उससे बनती नहीं है।
दोपहर बाद श्याओमान गीतों की पोथी लेने आई। खाना वैसे ही रखा देखकर पूछा कि गरम कर दूँ? आझाओ ने सिर हिलाया। कुछ देर बात दबाए रखने के बाद आख़िर उसने कहा कि गु मिंग ने नया अंश पहले बता दिया होता तो बात यहाँ तक नहीं पहुँचती। श्याओमान ने कहा, हाँ, फिर पूछा कि तुमने गाओ मान को क्यों नहीं बताया कि पूरा पहनकर देखा ही नहीं गया था। आझाओ को लगा जैसे किसी ने ठीक वहीं दबा दिया हो जहाँ वह किसी को देखने नहीं देना चाहती थी। उसने सिर उठाकर कहा कि बता देती तो क्या तुम लोग मेरा इंतज़ार करते? श्याओमान ने तुरंत जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर बाद बोली कि शायद नहीं करते, और इसका सारा बोझ भी तुम्हें अकेले नहीं उठाना चाहिए।
इस बात से उसे कोई राहत नहीं मिली। अगर किसी की बात पूरी तरह सही नहीं थी, तो उसके हाथ में फटी हुई चीज़ बस उसकी अपनी पोशाक ही क्यों थी? श्याओमान ने कहा कि आज रात नया कपड़ा मत छूना। पोशाक की सिलाई खुल जाए तो जो हरकतें पूछनी थीं, उन्हें वह उसके साथ शुरू से करके देखेगी। आ झाओ समझ गई कि पहले फिर भी सिलाई उधेड़नी होगी। उसका मन फिर इसका विरोध करने लगा। मगर श्याओमान नाटक की किताब लेकर निकल चुकी थी। वह बिस्तर के पास बैठकर सब आगे ठीक हो जाएगा कहकर उसे बहलाने नहीं रुकी।
शाम को कू मिंग रोटी लाया और बोला कि इस बार सूखी है। आ चाओ ने पोटली देखी तो उसे सांगछ्याओ की सराय याद आई। वहाँ वह अपनी ग़लती मानने वाला एक मज़ाक़ करके झेंप दूर कर देता था और वह भी हमेशा उसके साथ हँसना चाहती थी। उसने पोटली नहीं ली। पहले पूछा कि क्या वह बैठकर उसके चोग़े से भारी सजावट उधेड़ने में मदद करेगा। उसे कुछ हैरानी हुई। बाहर अब भी अगले अंक के अभ्यास के लिए लोगों को बुलाया जा रहा था। वह पल भर झिझका, फिर भी रोटी रख दी और पीढ़ा खींचकर पास बैठ गया।
उसे टाँके उधेड़ने नहीं आते थे। उसने सुई पर इतना ज़ोर लगाया कि छोटा छेद और फैलते-फैलते बचा। आझाओ ने कपड़ा वापस लिया और कहा, तुम मत उधेड़ो। ये पीतल के गहने गिनकर रख दो, लू हन्यांग के गहनों में मत मिलाना। गू मिंग ने सिर हिलाया और एक-एक करके उन्हें रखा। आख़िर में पूछा, क्या तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो? वह पहले कहने वाली थी, नहीं, मगर मुँह से निकला, थोड़ी। वह ठिठका, फिर हँसा नहीं। बस बोला, इतनी नाराज़गी तो बनती है।
लेकिन थोड़ी देर बाद उसे फिर आगे अभ्यास के लिए जाना था। वह हर समय उसके पास बैठकर सामान समेटने में मदद नहीं कर सकता था। आ झाओ जानती थी कि मंच पर उसका भी अपना हिस्सा है, फिर भी उसे उठते देख फिर चिढ़ गई, जैसे अगर उसे सचमुच पछतावा होता तो वह उसके लिए थोड़ी देर और रुकता। उसने यह माँग ज़बान पर नहीं आने दी। उसके जाने पर उसने रोटी की पुड़िया खोली और एक कौर लिया। तभी पता चला कि उसे इतनी भूख लगी थी कि दाँतों की जड़ों तक में टीस उठ रही थी।
रात में पोशाक उधेड़ते हुए वह और श्याओमान एक-एक ओर बैठीं। दोनों ने ज़्यादा बात नहीं की। नए कपड़े के काम आने वाले दो टुकड़े अलग तह कर लिए गए। भीगी अस्तर अलग धोनी थी। यह साबित करने के लिए कि पूरी पोशाक ख़राब नहीं हुई, उसे ज़बरदस्ती पुराने रूप में फिर जोड़ना ठीक नहीं था। आ झाओ को धीरे-धीरे दिखा कि उसके टाँके अब भी बराबर थे और गड़बड़ी उनके बराबर होने में नहीं थी। उतारते वक़्त बग़ल की पट किस ओर जाएगी, जल्दी में हाथ को गाँठ मिलेगी भी या नहीं, मेज़ पर बैठकर उसने इन बातों पर लगभग सोचा ही नहीं था।
श्याओमान ने कहा, कल पहले एक बार कपड़े बदलने का पूरा क्रम देखना। परदे में आने से लेकर निकलने तक सब लिखना, नज़र बस मंच पर सबसे सुंदर घूमने वाली चाल पर मत रखना। आझाओ ने सिर हिलाया, फिर पूछा कि इस बार जो मेहनताना रह गया, उसका हिसाब होगा क्या। श्याओमान ने कहा, पूरा कपड़ा तैयार करके नहीं दिया गया, इसलिए मुख्य कारीगर वाला मेहनताना नहीं बनता। उधेड़ने और जोड़ने का जो काम हो चुका है और रखा जा सकता है, उसका हिसाब अलग होगा। कल वह काओ मान के साथ साफ़ कर देगी। जवाब देते हुए उसे भी सहजता नहीं थी। ज़ाहिर था, यह कोई ऐसी बात नहीं थी जो किसी के यूँ ही दरियादिली दिखा देने से तय हो जाए।
आझाओ ने बात याद रखी और पहले पूरी रक़म देने को फिर नहीं कहा। उसने अपना रद्दी काग़ज़ उठाया। धूसर-नीली पोशाक वाले शब्दों के बाद कुछ बातें जोड़ीं, भीगने के बाद, उतारकर बदलना, चालें पहले पूछना। लिखावट पिछली बारों से भी बेतरतीब थी। बत्ती के पास फटकर अलग हुआ नीले कपड़े का एक छोटा टुकड़ा पड़ा था। उसने उसे छिपाया नहीं, काग़ज़ के बग़ल में फैला दिया और उँगलियों से भीतर की परत टटोली जो पसीना सूखने के बाद सख़्त हो गई थी। बाहर फिर ढोल की एक लय उठी। इस बार उसने सिर उठाकर यह नहीं सुना कि कौन-सी थाप सबसे अच्छी लगती है।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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