प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास
पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
कू वूजी · AI सृजन · 8814 अक्षर · लगभग 12 मिनट
पीछे के कमरे में पलंग का तख़्ता सराय वाले से भी सँकरा था। उसने संदूक पायताने रखा और पहले अंदाज़ा लगाया कि लेटने पर पैर सीधे कर पाएगी या नहीं। फिर फ़ौरन हाथ खींच लिया, कहीं श्याओमान देख ले और लगे कि पहले ही दिन घर में पाँव रखते उसे जगह छोटी लगने लगी। मगर आशंग तब तक तख़्ते के पास आ खड़ा हुआ था। उसने कहा, रात में यह आवाज़ करता है। एक बार करवट लो तो नीचे का खाली ढोल का चौखटा खटाक से बजता है।
आ झाओ ने सिर झुकाया, तब दिखा कि ढोल का वह ढाँचा खाट के तख़्ते के नीचे खिसका दिया गया था। छिन श्याओमान उस पर से धूल झाड़ रही थी। उसने बच्चे से कहा कि हर बात की शुरुआत उसकी बुराई से मत किया करो और ख़ुद दो पुराने कपड़ों से टकराने वाली जगहें लपेट दीं। वह बड़ी बारीकी से कर रही थी। उसे देखकर आ झाओ के लिए यह पूछना और मुश्किल हो गया कि ढाँचा बाहर रखा जा सकता है क्या। वह लू झंग की छोड़ी हुई चीज़ थी। पिछली बार आई थी तो वह कपड़ों के संदूक के पास था। उसके आते ही उसे खाट के नीचे हटना पड़ा।
तीसरे महीने की अट्ठाईस तारीख को लानथिंग पहुँची तो शाम ढल रही थी। यात्री नाव इस बार देर से नहीं आई। घाट से आगे की राह आझाओ पहचानती थी और नानथांग पहुँचकर दरवाज़े पर यह पूछने की ज़रूरत भी नहीं थी कि उसका परिचय कौन कराएगा। मगर जब सचमुच संदूक रखने की बारी आई तो वह सराय में ठहरने के दिनों जितनी सहज नहीं थी। तब पलंग सँकरा होने का दोष आठ वन की कम कीमत को दे सकती थी। अब श्याओमान और बच्चा भी यहीं थे। कोई ज़रा-सा पैर पसारे तो पहले देखना पड़ता कि बगल में कोई है या नहीं।
श्याओ मान ने पूछा कि लेटकर देखेगी क्या। उसने जल्दी से कहा कि रहने दो, जगह काफ़ी है। आ शंग फ़ौरन उसकी जगह लेट गया। उसकी एड़ी ठीक संदूक के कोने से लगी। वह गर्व से बोला कि देखो, उसके लिए अब भी कितनी जगह है। आ झाओ ने उसे उठाया और हँसकर कहा कि वह इसलिए कि तेरे पैर छोटे हैं। बच्चे ने यह बात नहीं मानी और फिर पैर पसारकर दिखाए। माँ दौड़ी आई और बोली कि कीचड़ भरे जूते बिस्तर पर मत रखो। कमरे में पहली बार ऐसी उथल-पुथल हुई जैसे वह सचमुच यहाँ रहने आ गई हो, बस किसी के काम देने की राह देखने नहीं बैठी हो।
कमरे का किराया पैंतालीस वेन महीना था, ईंधन और पानी समेत। खाना साथ की देगची से मिलता और उसका हिस्सा अलग देना था। आ झाओ ने पैसे निकाले। श्याओमान ने उन्हें लौटाया नहीं, यह भी नहीं कहा कि अभी आई हो, क्या ज़रूरत है। गिनकर पहले अपनी छोटी थैली में रखे, फिर उसे सिरहाने की वह जगह दिखाई जहाँ वह सुइयों की डिबिया रख सकती थी। आ झाओ को पहले डर था कि पैसे लेने में किसी को संकोच होगा। जब उसने देखा कि पैसे इतनी सहजता से ले लिए गए, तो उसे उलटे थोड़ी रिक्तता महसूस हुई, जैसे वह काफ़ी पैसे लेकर आई है तो उन पैसों से सारी असहजता भी ख़रीदकर दूर कर लेनी चाहिए थी।
खिड़की के पास एक नीची चौकी थी। वहाँ दरवाज़े के पास से ज़्यादा उजाला था। श्याओमान के जूतों के तले, गीतों की पोथी और अब तक अलग न किए गए धागों की एक छोटी पुड़िया वहीं रखी थी। आझाओ ने एक नज़र देखकर अपने काग़ज़ अँधेरी तरफ़ रख दिए। श्याओमान ने पूछा कि यहाँ तुम्हें साफ़ दिखता है? उसने कहा कि हाँ। मगर ख़ुद सुई में धागा डालने लगी तो आँखें और पास लानी पड़ीं। दरवाज़े की झिरी से हवा आती थी और धागे का सिरा बार-बार उँगलियों से निकल जाता था। उसे खीझ हुई कि जवाब इतनी जल्दी दे दिया और अब कहना भी मुश्किल था कि असल में साफ़ नहीं दिखता।
आशंग बाँस का छोटा टुकड़ा लिए आया और पूछा कि क्या उसके संदूक में छेद करने के लिए कोई बारीक लोहे की सुई है। आझाओ ने पहले कहा, नहीं। बच्चे को सुई की डिबिया साफ़ दिख रही थी, सो हाथ बढ़ाकर छूने लगा। उसने डिबिया सरका दी और एक पतली, अनछुई लकड़ी की तीली देकर कहा कि पहले इससे जगह का अंदाज़ा लगा लो। सच में छेद करना हो तो किसी जानकार को ढूँढ़ना, कहीं बाँस ही दबकर चटक न जाए। बच्चा कुछ नाख़ुश था, फिर भी तीली लेकर पलंग के पास बैठ गया और अपनी बाँह पर उसकी लंबाई नापने लगा।
आँगन से गु मिंग ने आवाज़ लगाई कि उस्ताद ह क्या नया कपड़ा देखने नहीं आएँगी। ‘उस्ताद’ सुनकर आ झाओ ने इतनी जल्दी सिर उठाया कि सुई उँगलियों से फिसलकर कपड़े की चुन्नट में जा गिरी। श्याओमान पास ही थी। उसने आ झाओ को दो बार ढूँढ़ते देखा तो कपड़ा थाम दिया और धीरे करने को कहा। आ झाओ बताना चाहती थी कि उसे बस काम लेने की जल्दी है। बात मुँह से नहीं निकली थी कि उसके हाथ से संदूक के किनारे रखा कपड़े का छोटा टुकड़ा नीचे जा गिरा।
गू मिंग जो नीला कपड़ा लाया था, उसे गाओ मान अभी कपड़े की दुकान से लाई थी। उसकी चमक पुराने चोग़े से ज़्यादा थी और झटककर खोलने पर उसमें ठंडे पानी-सी रंगत दिखती थी। उसने उसे कंधों पर डालकर पूछा कि अगर ल्योउ शंग यह पहने, तो क्या वह ऐसा लगेगा जैसे सच में अपने लिए लड़ने जा रहा हो। आ झाओ ने सिर झुकाकर कपड़ा छुआ। उसे वह पड़ोसियों के लिए बदले हुए कपड़ों से कहीं सुंदर लगा और उसके मुँह से भी निकला, हाँ, ऐसा ही लगेगा। गू मिंग हँसा और बोला कि उसे मालूम था, उसकी नज़र अच्छी है।
श्याओमान पीछे से आई। उसने आझाओ को देखने से नहीं रोका, बस गु मिंग से पूछा कि क्या वह पुरानी पोशाक भी साथ लाएगा ताकि दोनों पहनकर देखी जा सकें। गु मिंग ने कहा, ज़रूर लाएगा। वह इन दिनों अंक के पिछले हिस्से का अभ्यास करके उसे खोलना चाहता है, लिउ शंग को अब और किनारे खड़ा करके सिर्फ़ संवाद नहीं बुलवा सकता। श्याओमान ने भौंहें सिकोड़कर पूछा कि अब कौन-सा अंश जोड़ना चाहता है। उसने कहा कि पहले देख ले कि अभ्यास में बनता भी है या नहीं। जाते-जाते उसने नीला कपड़ा आझाओ के हाथ में थमा दिया और कहा कि लोगों की यह बात मत सुनना कि उसे बस उधम मचाना आता है।
कपड़ा सीने से लगाए आझाओ को एक हल्की-सी ख़ुशी महसूस हुई। वह जानती थी कि इससे यह साबित नहीं होता कि गु मिंग उसे कितना महत्व देता है। बच्चों को बहलाते, दर्शकों को रिझाते या लू हन्यांग की डाँट थमवाते वक़्त भी वह इसी लहजे में बोलता था। मगर जब बात अपने ऊपर आई तो उस पर थोड़ा ज़्यादा यक़ीन करने से बचना मुश्किल था। उसने कपड़ा मेज़ के पास रखा। पहली बार उसका पहला ख़याल यह नहीं था कि यह मंडली का कपड़ा है और इसे मनमाने ढंग से नहीं काट सकते। उसने सोचा कि नई पोशाक बन गई तो मंच पर वह एक घुमाव कैसी चमक बिखेरेगा।
रात का खाना छोटे चूल्हे के पास बाँटा गया। गाओ शोउछंग अगली प्रस्तुति के लिए दो मेज़ें कम पड़ने की चिंता में था। उसने आ झाओ को भी कटोरा लिए खड़े देखा तो कहा कि छज्जे के नीचे बैठ जाओ, इंतज़ार में गरम खाना ठंडा मत करो। यह सुनकर कि उसे अलग से खाने की दुकान नहीं ढूँढ़नी पड़ेगी, आ झाओ ने पहले राहत की साँस ली। गाओ मान खाने का हिसाब रखने वाली लकड़ी की छोटी पट्टी लाई, तब पता चला कि हर किसी का हिस्सा फिर भी दर्ज होगा। उसे यह ग़लत नहीं लगा। बस वह थोड़ी-सी गरमाहट, जो किसी के घर लौट आने जैसी लगी थी, हिसाब के अंक सामने आते ही सच भी लगी और ऐसी भी जिस पर पूरी तरह निश्चिंत होकर भरोसा नहीं किया जा सकता था।
श्याओमान खाकर पहले आगे के हिस्से में गीत का एक अंश साधने चली गई। आशंग के कटोरे की तली में थोड़ा भात बचा था। मेज़ समेटते हुए आझाओ उसे यूँ ही फेंकने लगी तो बच्चा झट कटोरा लेने लपका। बोला, थोड़ी देर में खाऊँगा। माँ ने कहा है कि बाहर लोग दिखें तो खाना नहीं भूलना। मुँह से यह कह रहा था, मगर आँखें आँगन के नए खड़ताल पर थीं। आझाओ ने कटोरा ढक दिया और उसे पहले हाथ धोने भेजा। खुद चूल्हे के पास के खाली कटोरे उठाकर कुएँ के पास ले गई।
पहले जब वह मेहमान बनकर आती थी, श्याओमान उसे कटोरे धोने नहीं देती थी। आज जब वह उन्हें उठाकर ले गई, तो श्याओमान ने आँगन के उस पार से बस इतना पुकारा कि फूटे तले वाला कटोरा बाकियों पर मत रखना, नहीं तो सब तरफ पानी टपकेगा। उस पुकार में कोई औपचारिकता नहीं थी, फिर भी आझाओ के हाथ पल भर को रुक गए। उसे लगा, अभी-अभी पैसे चुकाकर भी वह एक रात आराम करने की बात नहीं सोच सकती। अगले ही पल उसे अपने इस ख़याल पर शर्म आई। किस घर में साथ खाना खाकर कटोरे नहीं समेटने पड़ते? क्या वह सचमुच चाहती थी कि कोई सब कुछ उसके बिस्तर तक पहुँचा दे?
धोकर कमरे में लौटी तो आशंग मेज़ के पास लिख रहा था। बाँस के छोटे टुकड़े ने कागज़ दबा रखा था। श्याओमान दिन में गीतों की जो पोथी छोड़ गई थी, उसे उसने किनारे तक सरका दिया था। आझाओ ने हाथ बढ़ाकर उसे सँभाला तो देखा कि पुरानी लिखावट की एक पंक्ति के पास दूसरी, छोटी लिखावट जुड़ गई थी। उसे यूँ किसी की पोथी नहीं पढ़नी चाहिए थी, फिर भी नाव को विदा करने वाली पंक्ति पर एक और नज़र डाले बिना नहीं रह सकी। शब्दों में कोई किसी की राह नहीं देख रहा था, मगर गाए जाते तो पूरे आँगन को किसी की राह देखने पर लगा सकते थे। वह जानना चाहती थी कि श्याओमान पहले आहंग का किरदार कैसे निभाती थी, मगर डर था कि पूछना कहीं पुरानी बात छेड़कर चिढ़ाने जैसा न लगे।
लिखते-लिखते बच्चे को नींद आ गई। सिर कागज़ पर झुक गया, मगर हाथ ने कलम नहीं छोड़ी। आझाओ ने उसकी स्याही की तश्तरी सरकाई। तभी लौटी श्याओमान ने देखकर कहा कि उसे टालने मत दो, जो चीज़ खुद समेटनी है उसे खुद ही समेटे। आझाओ को फिर चुभा कि उससे बस मददगार की तरह काम लिया जा रहा है। उसने कहा कि उसे सिर्फ़ स्याही उलटने का डर था, मगर आवाज़ उसके इरादे से ज़्यादा सख़्त निकली। श्याओमान पल भर ठिठकी। उसने बात आगे नहीं बढ़ाई और पहले बच्चे को जगाया कि कलम समेटे।
दोनों कुछ देर अलग-अलग बैठी रहीं। बाहर रियाज़ की आवाज़ों में कमरे से ज़्यादा रौनक थी। गु मिंग और लू हन्यांग घूमकर कदम रखने की एक चाल आज़मा रहे थे। दीवार के पार से लगा जैसे झगड़ रहे हों, फिर थोड़ी देर में दोनों एक साथ हँस पड़े। आझाओ से सुई में धागा किसी तरह नहीं पड़ रहा था। उसे अपनी उँगलियों पर ग़ुस्सा आया कि अचानक इतनी अनाड़ी क्यों हो गई हैं। नज़र उठाई तो श्याओमान भी उँगलियों की जड़ें मल रही थी, उसके हाथ भी आझाओ से ज़्यादा सधे हुए नहीं लग रहे थे। फिर भी इस वक़्त किसी और को थका देखकर वह अपनी सारी थकान को मामूली मानकर टाल नहीं सकती थी।
आखिर श्याओमान उठी, खिड़की के पास की धागों की पुड़िया हटा दी और अपने जूते सिरहाने सरका दिए, जिससे चौकी पर थोड़ी जगह निकल आई। उसने कहा कि यहाँ रोशनी अच्छी है, दिन में कपड़े सिलने हों तो यहीं आ जाना, बस गीतों की पोथी दबकर सील न जाए। आझाओ ने हामी भरी और सुइयों की डिबिया लेकर वहाँ चली गई। उसने पलटकर अपनी वही बात नहीं दोहराई कि उसे साफ़ दिखता है। दोनों ने खुलकर बात नहीं की, बस दीप की छाया में आखिर एक और जोड़ी हाथों के लिए थोड़ी जगह बन गई।
रात गहरा गई थी और आशंग सोने को तैयार नहीं था। वह बाँस के उस टुकड़े को फूँक रहा था जिसके सारे छेद अभी बने नहीं थे। आवाज़ दरवाज़े की चरमराती धुरी जैसी तीखी थी। श्याओमान ने रुकने को कहा। वह एक बार रुका, फिर आज़माया। नए तख़्ते पर लेटी आज़ाओ भी पहले खीझ रही थी, मगर बच्चे को चोरी से और धीरे फूँकते सुन उसे उलटे हँसी आ गई। हँसी रोकते वक़्त उसका बदन हिला तो खाट के नीचे का ख़ाली ढाँचा खटाक से टकराया। बच्चा डरकर बाँस रज़ाई में छिपा गया। दोनों ने धुँधले उजाले में एक-दूसरे को देखा और आख़िर साथ-साथ हँसी दबाने लगे।
श्याओमान नहीं हँसी। वह खाट से उतरी, ढोल के ढाँचे पर हाथ फेरा और पूछा कि दिन में कपड़ा ठीक से नहीं लपेटा था क्या। फिर उसने कपड़ा थोड़ा और भीतर ठूँस दिया। आज़ाओ फ़ौरन चुप हो गई। उसे लगा कि अब करवट लेने से पहले भी लकड़ी के उस पुराने टुकड़े से माफ़ी माँगनी पड़ेगी। श्याओमान को नहीं मालूम था कि वह क्या सोच रही है। उसने बस कहा कि सो जाओ, कल एक पूरी नई पोशाक देखनी है। लौटते हुए आशंग ने जो जूते लात मारकर दूर कर दिए थे, उन्हें उठाकर खाट के पैताने रख दिया।
आ झाओ को बत्ती बुझने के बाद ही याद आया कि वह हरा-नीला कपड़ा अभी बगल के कमरे में है; आज उसने केवल छुआ था, ठीक से नापा नहीं था। जब गु मिंग पहनकर देखने को राज़ी था, तभी उसे उसकी हरकतें ठीक से पूछ लेनी चाहिए थीं, मगर “उस्ताद हे” की एक पुकार से उसे लगा था मानो उसे सब कुछ पहले ही आता हो। कमरे में अँधेरा हो गया था, और उस खुशी के नीचे छिपी घबराहट भी अंततः दिखने लगी। उसने अँधेरे में नाप वाला काग़ज़ टटोलकर निकाला; केवल स्मृति से जान सकती थी कि कौन-सी पंक्ति खाली है, अभी उसे भर नहीं सकती थी।
बाद में श्याओमान ने छोटा दीया फिर जलाया। सुबह के लिए फ़ौरन चाहिए ऐसी एक डोरी बनानी रह गई थी। आ झाओ ने कैंची की आवाज़ सुनी और करवट लेकर पूछा कि क्या वह बना दे। उसे बहुत नींद आ रही थी, पर शरीर से पहले मुँह ने हामी भर दी, जैसे डर हो कि यहाँ रहते ही वह किसी काम की नहीं लगेगी। श्याओमान ने कहा कि पहले सो जाओ। फिर पल भर रुककर बोली कि अगर उसके लिए सुई में एक लंबा धागा डाल दे तो अच्छा होगा। आ झाओ उठ बैठी, ऊपर से कपड़ा ओढ़ा और उसी ज़रा-सी रोशनी में आख़िर धागा सुई से पार कर दिया।
उसने सुई थमाई तो देखा कि श्याओमान की आँख के कोने लाल थे। वह कहना चाहती थी कि तुम्हें भी सो जाना चाहिए, मगर उसे याद आया कि दिन में ऐसी ताकीद सुनना ख़ुद उसे कैसा लगा था। उसने कुछ नहीं कहा। बचा धागा ठीक से लपेटा और अपनी छोटी सुई मेज़ के नए ख़ाली कोने में रख दी। खिड़की के बाहर चाँद छज्जे के पार जा चुका था। अब वह उस उजली जगह पर नहीं था जहाँ आझाओ ने पहले रुकना चाहा था। फिर भी मेज़ के पास की ज़रा-सी रोशनी में दोनों अपने हाथ की चीज़ें साफ़ देख सकती थीं। इसी पल उसे सचमुच लगा कि कल सुबह आँख खुलेगी तो उसका संदूक यहीं होगा।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।
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