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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में यात्रा और जनजीवन का उपन्यास

नौवीं तारीख का नाव का टिकट

कू वूजी · AI सृजन · 9068 अक्षर · लगभग 12 मिनट

तीसरे महीने की नौवीं तारीख को मंचन का दौर पूरा हुआ तो लू हेन्यांग के बालों की एक पिन ग़ायब थी। सबने मंच के पीछे की आधी जगह उलट-पलट दी और आख़िरकार वह गु मिंग की उतारी हुई आस्तीन में मिली। विदाई वाले अंक में मुड़ते वक़्त दोनों इतने पास आ गए थे कि पिन की नोक धागे में फँसकर साथ चली गई थी। गु मिंग ने आस्तीन उठाकर कहा कि लिउ शंग ने एक वन भी नहीं कमाया, लेकिन प्रेम की निशानी पहले पा ली। लू हेन्यांग ने पिन वापस ली और पूरे आँगन के सामने उसकी मुड़ी नोक सीधी की। कहा कि आगे फिर हाथ लगाना हो तो पिन की मरम्मत के पैसे भी तैयार रखना।

आ झाओ बगल में उकड़ूँ बैठकर कपड़े तह कर रही थी। उसने मुस्कराते हुए काग़ज़ के हाशिये पर दर्ज किया कि धागा कहाँ अटका था। इस दौर की प्रस्तुतियाँ अब पूरी हो गई थीं। गाओ शोउछंग को फिर भी आख़िरी कुछ प्रस्तुतियों में कम दर्शक आने की कसक थी। उसने सबसे कहा कि काम ख़त्म होते ही ऐसे मत भाग जाना कि कोई मिले ही नहीं। श्याओमान अंदर से जूते लेकर निकली और पहले आ शंग को पहनाकर देखने लगी। बच्चे ने दोनों पैर सीधे फैला दिए, जैसे नाव पर बैठने वाला हो। जूते आख़िर बन गए थे। उनका ऊपरी हिस्सा दुकान के जूतों जितना चमकदार नहीं था, मगर पंजों के आगे उसके बढ़ने के लिए थोड़ी जगह थी।

“कल तुम पहले निकलोगी?” श्याओमान ने आझाओ से पूछा।

आ झाओ ने सिर हिलाया। उसने कहा कि नाव कल निकलेगी, वह ग्यारह को ल्योउवान पहुँचेगी और पहले घाट की नाव को थोड़ा सँभालना है। श्याओमान ने कहा कि वह ग्यारह को चलेगी, बारह को पहुँचेगी और पूर्वी किनारे पहुँचकर नदी पार करेगी। तारीख़ें बताने के बाद भी उसकी उँगलियाँ जूते के किनारे को दबाती रहीं, जैसे कोई ऐसी जगह खोज रही हो जहाँ जूता ठीक न बैठे और उसे इस फ़ैसले से कुछ देर के लिए सिर झुकाकर बच निकलने का बहाना मिल जाए। आ झाओ ने जल्दी नहीं मचाई और उसने भी आख़िर बच्चे को जूते फिर पहना दिए।

आ शंग ने पूछा कि क्या नानी घाट पर लेने आएँगी। फिर बोला कि अगर दुकान में बहुत काम हुआ तो वह दीये बेचने वाली दुकान के अक्षर पहचानता है। श्याओमान ने कहा कि गली में दीये रखने वाली एक ही दुकान नहीं है और तुम उस रास्ते पर कभी चले भी नहीं हो। बच्चा बहस करना चाहता था, मगर उसका चेहरा देखकर आ झाओ की ओर मुड़ा कि वह उसकी तरफ़ से कुछ कहे। आ झाओ ने बस कहा कि वह पूर्वी किनारे पर इंतज़ार करेगी। फिर उससे पूछा कि क्या वह मंडली का छोटा तार वाला बाजा नदी पार ले जाना चाहेगा। उस्ताद मो तारों की टेक ठीक करने के लिए इंतज़ार कर रहे थे। उसे बस किनारे पर थोड़ी दूर पीठ पर ढोना होगा।

थैला उसके आधे क़द से भी ऊँचा था। यह सुनते ही कि उसे पीठ पर ले जा सकता है, आशंग रास्ता पहचानने की बात भूल गया और नापने लगा कि उसके कंधे इसके लिए काफ़ी हैं या नहीं। श्याओमान पहले उसे अपने हाथ में लेने वाली थी, पर आख़िर में उसने बस पट्टा जाँच लिया ताकि थैला ज़मीन पर न घिसटे। उसने कहा कि साज़ मंडली का है, उसे अपना खिलौना मत समझना। बच्चे ने कहा, पता है। उसकी आवाज़ थोड़ी देर पहले अक्षर पहचानते समय से भी ऊँची थी। साफ़ था कि उसने आधी बात भी नहीं सुनी। उसे देखकर आझाओ को अचानक लगा कि इस सफ़र में कम से कम एक ख़ुशी ऐसी होनी चाहिए जिसका उन सोलह सालों से कोई लेना-देना न हो।

रवाना होने से पहले की रात श्याओमान ने बिस्तर पर दो जोड़ी कपड़े फैलाए और आ झाओ से पूछा कि धूसर वाले कहीं बहुत पुराने तो नहीं लगते। आ झाओ ने कंधे के पास छुआ। कपड़ा धुल-धुलकर नरम हो गया था, पर सिलाई अब भी मज़बूत थी। दूसरी जोड़ी हल्के रंग के ऊपरी कपड़े की थी, जिसे वह नाटक गाने के बाद ही पहनने को निकालती थी। वह कुछ नई थी। श्याओमान ने उसे कई बार देखा, फिर वापस रख दिया। उसने पूछा कि कहीं माँ पुराने कपड़े देखकर बस यही न पूछने लगें कि उसका गुज़ारा कितना मुश्किल है। फिर जैसे लगा कि मुँह से कुछ ज़्यादा निकल गया, वह फ़ौरन आ शंग की पोटली देखने लगी।

आझाओ ने यह भरोसा नहीं दिलाया कि ऐसा हरगिज़ नहीं होगा। उसने सोचा, दीपों की अलमारी के सामने बूढ़ी छिन के सवालों की झड़ी वह ख़ुद नहीं सँभाल पाई थी, फिर उनकी तरफ़ से बेटी को कैसे यक़ीन दिलाती कि मुलाक़ात में कोई असहजता नहीं होगी। उसने बस इतना कहा कि थक जाओ तो पहले बैठकर कुछ खा लेना, सारा रास्ता भूखी मत जाना। श्याओमान ने हामी भरी, फिर अचानक कहा कि यह बात वह पहले भी सुन चुकी है, मगर तब उसे हमेशा लगता था कि पेट भर लिया तो निकलना और मुश्किल हो जाएगा।

दसवीं तिथि को रवाना होते समय आझाओ ने इस बार जो कुछ सौंपना था वह सब वापस गाओ मान के पास रख दिया, और जो हिस्सा अधूरा था उसे श्याओमान को समझा दिया, उसके मन में यह ख़याल नहीं आया कि कुछ दिन घर चले जाने से वह काम टल जाएगा। गाओ मान लौटाई गई सामग्री जाँच रही थी, उसने आझाओ के काग़ज़ पर धागा खींचने की जगह बताने वाले निशान की ओर इशारा करके पूछा कि यह क्या है, और जवाब सुनकर उसने उसे अलग से उतार भी लिया, बोली कि आगे कभी इस आस्तीन का सिरा उधेड़ना हो तो पहले यह जगह देख लेना। आझाओ अपना सामान उठा चुकी थी, यह सुनकर वह फिर बैठ गई और निशान को थोड़ा और साफ़ बना दिया।

ग्यारहवीं को ल्युवान लौटने पर तिंग छ्वान पश्चिमी घाट के लोगों से बात कर रहा था। आझाओ बीच में नहीं गई। पहले नाव के पिछले सिरे पर जाकर मरम्मत की हुई दरार टटोली। थोड़ा पानी था, निकलने से पहले से ज़्यादा नहीं। उसने पानी उलीचने का डोंगा धोया और अगले दिन के लिए जगह खाली की, तब घर की चाबी लेने गई। तिंग छ्वान को मालूम था कि श्याओमान और उसका बेटा आएँगे। उसने पूछा, नाव पर कुछ रंगीन सजावट टाँग दें क्या? आझाओ ने कहा, ज़रूरत नहीं, जैसे रोज़ पार लगाते हैं, वैसे ही लगाएँगे। वह सुनकर हँसा। बोला, उसने भी बस यूँ ही पूछ लिया था, भला नाव भर लोगों के लिए सजावट करने की फ़ुरसत कहाँ है।

दीप-दुकान का परदा धोया जा चुका था। नीले कपड़े के जोड़ अब भी गीले थे और परदा पिछले आँगन में टँगा था। बूढ़ी छिन ने आझाओ को देखते ही पूछा कि नाव देर से तो नहीं आई। जब सुना कि श्याओमान कल आएगी, तो फिर पूछ बैठीं कि आज क्यों नहीं। आझाओ ने दोनों सफ़रों की तारीखें फिर से बताईं, तब जाकर बूढ़ी छिन को याद रहा। उन्होंने आँगन में सूखते बिस्तरों की ओर इशारा करके कहा कि उन्हें उतावली नहीं है, बस डर है कि इधर बारिश हो गई तो आने वालों को बैठने की सूखी जगह नहीं मिलेगी।

आज़ाओ ने सोचा कि श्याओमान ने बस दो रात रुकने को कहा था, इसका ज़िक्र कर देना चाहिए। उसने देखा कि बूढ़ी छिन उसी रज़ाई के कोने को दूसरी बार झाड़ रही थीं, तो पहले दूसरा सिरा पकड़कर उसे ऊँचा टाँगने में मदद की। बिस्तर सूखने के लिए ठीक से टँग गया, तभी उसने तारीख़ें साफ़-साफ़ बताईं। बूढ़ी छिन ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर बाद पूछा कि आराम के लिए दो रातें काफ़ी होंगी क्या। आज़ाओ ने कहा कि श्याओमान ने ख़ुद यही तय किया है। चौदह को उसे लानतिंग लौटकर काम सौंपना है। बूढ़ी छिन ने सिर हिलाया, मगर दूसरी रज़ाई भी निकाल लाईं। दो ही रातों के लिए आ रही है, यह सोचकर उन्होंने अपनी तैयारी में एक चीज़ भी कम नहीं की।

बारह तारीख़ की सुबह छिन दादी ने उजाला होने से पहले ही दरवाज़ा खोल दिया। पहली खेप नदी पार कराते वक़्त आ झाओ ने उन्हें गली के मुहाने पर मछली ख़रीदते देखा। वे इतनी बारीकी से चुन रही थीं कि मछलीवाले ने भी कह दिया कि एक और दूसरी में आधे कौर से ज़्यादा का फ़र्क़ नहीं है। फिर भी उन्होंने पूछा कि बच्चा बारीक काँटों वाली मछली खा पाएगा या नहीं। मछलीवाले को उलटे पहले पूछना पड़ा कि बच्चा कितने बरस का है। आठ बरस सुनकर पास खड़ी श्यू चाची हँस पड़ीं और बोलीं कि कहीं ऐसा न हो कि उसका बचपन का नाम तक भूल गई हो और अब भी उसके लिए काँटे चुन रही हो।

मछली घर लाकर बूढ़ी छिन पहले उसके शल्क उतारना भूल गईं। छुरी से एक टुकड़ा कट भी चुका था। श्यू चाची ठीक तभी पिछली रात छोड़ी हुई सुराही लेने आईं। काटने की चौकी की हालत देखकर उन्होंने हाथ बढ़ाकर छुरी ली और कहा कि दीप बनाने वाले हाथों को आज ऐसे चलाओगी तो तीन ढाँचे तोड़ दोगी। बूढ़ी छिन को उनकी ज़्यादा बोलने की आदत पर खीझ आई, फिर भी हट गईं। श्यू चाची ने कहा कि वह बस यह मछली साफ़ करेंगी, फिर उन्हें अपनी दुकान पर लौटना है। सारा दिन का काम निपटा नहीं देंगी, इसलिए अपनी आँखें बार-बार खिड़की की ओर मत दौड़ाओ।

आझाओ दरवाज़े के पास सुनती रही। पहले हँसी रोकी, फिर देखा कि छिन दादी सचमुच खिड़की पर पहरा नहीं दे रही थीं। वह सब्ज़ी धो रही थीं, कटोरे ढूँढ़ रही थीं। तीन रखे और फिर एक उठा लिया। हर काम में व्यस्त थीं, मगर जैसे कोई एक बात थी जिसका भरोसा उन्हें अब भी नहीं था। आझाओ ने कहा कि पूरबी किनारे पहुँचने पर फिर खबर देगी और पतवार उठाकर पारघाट लौट गई। उसने बूढ़ी से यह नहीं कहा कि आराम से कीजिए। नाव इंतज़ार कर रही थी और पहले उसे भी अपना काम करना था।

दोपहर बाद आख़िर वह यात्री नाव थोंगश्यू के घाट पर लगी। आझाओ ने दूसरों की गठरियों के पार श्याओमान को देखा। वह एक हाथ से आशंग को पकड़े थी और दूसरे में छोटी पोटली लिए थी। धूसर कपड़े का कंधा पिछली रात से भी ज़्यादा सिकुड़ा था, जैसे नाव में उसे बेफ़िक्र होकर टिकने की जगह न मिली हो। नाव में बच्चे का वाद्य-थैला माँ ने अपनी पीठ पर लिया था। किनारे उतरते ही उसने उसे अपने कंधे पर वापस माँग लिया। पट्टा तिरछा था और थैले का तल बार-बार उसकी टाँग से टकरा रहा था।

आझाओ आगे बढ़कर थैले का निचला सिरा थामने लगी। आशंग ने फौरन कहा कि वह खुद उठा सकता है। ज़बान से तो अकड़ा, मगर हाथ से उसने आझाओ को हटाया नहीं। श्याओमान ने पूछा, माँ दुकान में हैं क्या। आझाओ ने कहा, पीछे सब्ज़ी काट रही हैं। उसने मछली के शल्कों वाली मज़ेदार बात छोड़ दी। उसे डर था कि अगर वह कह दे कि बूढ़ी इतनी घबराई हुई थीं कि छुरी तक नहीं चला पा रही थीं, तो श्याओमान को मिलने से पहले ही उन पर तरस खाने का बोझ उठाना पड़ेगा।

नाव पर चढ़ते ही श्याओमान ने पहले बच्चे को बीच में धकेलकर ठीक से बिठाया। फिर साज़ का थैला उतारकर ऐसी ऊँची जगह रखा जहाँ पानी न लगे। आशंग ने दोनों हाथों से नाव की बग़ल पकड़ी और बिना छतरी वाली छोटी नाव को देखकर पूछा कि क्या यह उस बड़ी नाव से धीमी चलती है जिसमें वह आया था। आझाओ ने कहा कि पानी के इस हिस्से में तेज़ चलने की होड़ नहीं है। थोड़ा धीरे चलोगे तो साज़ तुम्हारी जगह नदी में नहीं कूद जाएगा। बच्चे ने झट हाथ खींचकर थैले की गाँठ बचाई, मानो साज़ सच में सुन ले तो नाराज़ हो जाएगा।

नदी के बीच पहुँचकर उसने फिर पूछा कि क्या इस नाव पर कोई भी बैठ सकता है। आज़ाओ ने कहा कि किराया देने वाला कोई भी बैठ सकता है, बशर्ते पानी इतना न चढ़ा हो कि नाव चल ही न सके। आशंग ने पूछा कि उसे बड़ा गिना जाएगा या बच्चा। श्याओमान तब तक आस्तीन में पैसे टटोल रही थी। उसने कहा, जान-पहचान है तो इसका फ़ायदा उठाकर एक और सीट मत घेरो। आज़ाओ ने पहले चप्पू का एक फेरा दिया, नाव को धारा के साथ सँभलने दिया, फिर कहा कि उसके तीन वन और माँ के पाँच वन लगेंगे।

श्याओमान ने आठ वन हथेली पर फैलाए और आझाओ ने रोज़ की तरह ले लिए। दोनों में से किसी ने नहीं कहा कि रहने दो, मानो इतनी-सी रक़म छोड़ देने से पूरा सफ़र कुछ हल्का हो सकता हो। सिक्के बाँस की नली में गिरे। आशंग ने मुड़कर पश्चिमी किनारे की छतें देखीं और कहा, अच्छा, तो नानी भी ऐसी ही जगह रहती हैं। आझाओ ने उसकी ओर देखा। उसे मालूम नहीं था कि बच्चा पूरे रास्ते कैसी जगह की कल्पना करता आया था। उसने बस कहा कि उस घर में भी बत्ती जलानी पड़ती है और खाना पकाना पड़ता है।

किनारा पास आया तो हवा ने श्याओमान की आस्तीन का एक कोना उड़ा दिया। उसने हाथ उठाकर दबाया तो उँगली की जड़ पर धागा उधेड़ते हुए घिसी एक छोटी लाल लकीर दिखी। आझाओ का अचानक बड़ा मन हुआ कि उसका बस्ता भी थाम ले। फिर याद आया कि कुछ दिन पहले उसने दीप को किस तरह अपनी बाँहों में जकड़ रखा था, किसी और के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी। आख़िर उसने उतरने का तख़्ता मज़बूती से जमा दिया, ताकि श्याओमान ख़ुद बच्चे का हाथ पकड़कर किनारे उतर सके। श्याओमान उस पर चली, एड़ी एक पल को ठिठकी। उसने पलटकर ह परिवार के घाट की ताँबे की पट्टी देखी, मगर कुछ पूछा नहीं।

उस्ताद मो की दुकान गली में घुसते ही मोड़ पर थी। आझाओ ने दोनों को रास्ता बताया। बच्चा अब भी वाद्य का छोटा हिस्सा पीठ पर ढोना चाहता था और ऐसे चल रहा था जैसे झंडा उठाए हो। श्याओमान ने इस बार फ़ौरन नहीं कहा कि वह अपनी ताक़त दिखा रहा है। बस एक बार पीछे से हाथ बढ़ाकर थैले का कोना सँभाला। उन्होंने तय किया कि वाद्य सौंपकर लालटेन की दुकान जाएँगी। आझाओ उनके साथ आख़िर तक नहीं गई। उसे पूर्वी किनारे पर इंतज़ार कर रहा सब्ज़ियों का एक काँवर भी लाना था।

दूसरी बार छिन परिवार के दरवाज़े से गुज़री तो श्यू चाची अपनी मछली की दुकान पर लौट चुकी थीं। पिछली कोठरी से बस बर्तन के ढक्कन की हल्की खनक आ रही थी। छिन दादी कपड़े से उसी कटोरे को पोंछ रही थीं। आझाओ को खाली हाथ देखकर पहले उठ खड़ी हुईं। आझाओ ने कहा, वे आ गए हैं, अभी साज़ देने गए हैं, थोड़ी देर में यहाँ आ जाएँगे। बूढ़ी ने पूछा कि क्या उन्हें खुद जाना चाहिए। बात मुँह से निकली ही थी कि बर्तन का पानी अचानक उफन पड़ा। वह फौरन ढक्कन उठाने को मुड़ीं और सवाल पूरा न कर सकीं।

आज़ाओ ने बूढ़ी छिन की तरफ़ से यह तय नहीं किया कि उन्हें स्वागत करने जाना चाहिए या नहीं। चूल्हे के पास तिरछी पड़ी एक पतली लकड़ी भीतर सरकाई और दरवाज़े से बाहर निकल गई। गली के मुहाने पर उसने श्याओमान को आशंग का हाथ थामे मुड़ते देखा। बच्चा अब भी पूछ रहा था कि साज़ की दुकान में उस बड़े तार वाले साज़ को छू क्यों नहीं सकते। श्याओमान ने धीमे से जवाब दिया। सिर उठाकर अपने घर की दुकान का दरवाज़ा देखा तो उसकी चाल धीमी हो गई। आज़ाओ एक ओर हट गई और हाथ का चप्पू कंधे के पीछे कर लिया, ताकि उस सँकरी राह पर दो लोग अगल-बग़ल चल सकें।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से लिखी गई है और झांग रुओश्यु की 《春江花月夜》(वसंत की नदी, फूल और चाँदनी रात) तथा मौलिक लघुकथा 《借灯还舟》(दीप उधार लेकर नाव लौटाना) के आधार पर विस्तारित की गई है। पात्र, भूगोल और घटनाएँ सभी काल्पनिक हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या पुनर्कथन अथवा कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. नाव की क़ीमत, तीन बार
  2. पीतल की पट्टी और सूना घाट
  3. दीयों की दुकान की वह खिड़की
  4. बाँस की संदूक में रखी राह
  5. जलमार्ग के दो चरण
  6. टाँके खोलने वाली
  7. मंच की पोशाक और देह की पोशाक
  8. ढोल के पास की खाली जगह
  9. दीप फिर दुकान के काउंटर पर
  10. उसका नाम, जिसका अपना घर बस चुका था
  11. नानथांग का नया नाटक
  12. नौवीं तारीख का नाव का टिकट
  13. दरवाज़े के भीतर हरे प्याज़ की एक डंडी
  14. रात को खिड़की कौन बंद करता है
  15. दो छी कपड़ा, जिसकी सिलाई पूरी तरह नहीं उधेड़ी गई
  16. नाव किराये पर देने के पंद्रह दिन
  17. पलंग के एक तख़्ते की आवाज़
  18. आस्तीन का जोड़ एक बार फिर खोलना
  19. चौथे महीने का ज्वार
  20. दर्शकों के बीच से एक पूरा अंक
  21. दूसरा खाना लानथिंग में
  22. नन्हे जूतों की क़ीमत
  23. परदे के पीछे से गुज़रती हवा
  24. मंदिर का रंगस्थल पानी के किनारे आ गया
  25. वापस लिया गया नाटक
  26. लोगों को थामे रखने वाले टाँके
  27. नाव के अगले सिरे पर दो पट्टियाँ
  28. बच्चा साथ जाए या नहीं?
  29. उस नाव का टिकट न लेना
  30. गर्मी के दिनों में फिर सँवारा गया पुराना नाटक
  31. देख लेने के बाद ही जवाब
  32. पोशाक पहनने वाले के हाथ में
  33. दीयों की अलमारी का एक दरवाज़ा खुला रहे
  34. एक बार फिर नदी पार
  35. शरद की प्रस्तुति का आख़िरी धागा
  36. लालटेन रात भर जलाना ज़रूरी नहीं

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