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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास

पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा

कू वूजी · AI सृजन · 9249 अक्षर · लगभग 12 मिनट

चौथे महीने की छठी तारीख़ को श्यू शन और उसकी माँ सुबह की गाड़ी से शिखोउ गए। माँ एक खाली टोकरी लाई थी, जिसके भीतर पुराना कपड़ा बिछा था। बेटे के पास उससे भी कम सामान था। मोमजामे की एक कसकर बँधी पोटली, जो उसने कुर्ते के पल्ले के भीतर रखी थी। गाड़ी पत्थर के पुल से गुज़री तो आ सुई ने पूछा, क्या उसमें वही एक सौ साठ वन हैं? उसने सिर हिलाया। माँ ने फिर कुछ नहीं कहा और राह के किनारे हाल में जोते गए खेत देखने लगी।

दुकानदार होंग लकड़ी चुन रहा था। आँगन की छह पुरानी शहतीरों में दो देखने में मोटी थीं, लेकिन कीड़ों ने भीतर से खोखली कर दी थीं; ठोकते ही पता चल जाता था। श्यू शेन ने उसके साथ देखकर ही पैसे निकाले और कहा कि पुराने घर की पिछली शहतीर अब नहीं हटाएगा; बदले में ली गई शहतीर के मूल तय एक सौ साठ सिक्के नकद लौटा देगा। दुकानदार होंग ने आ सुई की ओर देखा और पूछा कि वादा करते समय घर के मालिक से पूछा था या नहीं। उसने कहा कि नहीं।

“पहले बताते तो शायद मुझे उस शहतीर की ज़रूरत ही न पड़ती।” दुकानदार होंग ने कहा। “मुझे तो बाहरी छानी की मरम्मत करनी है। उसके लिए किसी का घर उधेड़ना ज़रूरी थोड़े ही है।” उसने न कम लिया, न दाम बढ़ाया। पूरे पैसे गिनकर उसने लकड़ी बाँधने वाली पुरानी कपड़े की निशानी निकाली और उसके बगल का बकाया माल वाला निशान काट दिया। श्यू शन ने उसके पैसे रख लेने का इंतज़ार किया, फिर पूछा कि जिस लंबी लकड़ी के कोने में दरार पड़ गई थी, उसे छोटा काटने पर उससे क्या बन सकता है।

दुकानदार होंग ने कहा कि छोटा टेक या नीचा चबूतरा बना सकते हो, फिर ऊँचा दरवाज़ा बनाने की ज़िद मत करना। उसने नौकर से एक और लकड़ी मँगवाई जिसमें दरार पड़ी थी, और श्यू शन को दिखाया कि रेशा कहाँ मुड़ता है। श्यू शन कुछ देर उकड़ूँ बैठकर देखता रहा, फिर अपना कोयला निकाला और दरार के हिसाब से काटने की तीन रेखाएँ खींचीं। आ सुई को समझ नहीं आया। वह एक ओर खड़ी आँगन में लकड़ी का पहिया घुमाते बच्चे को देखती रही। पहिया एक तरफ़ ऊँचा था, दूसरी तरफ़ नीचा, और चलते-चलते हमेशा एक ही ओर डोल जाता था।

जाते समय दुकानदार होंग ने उन्हें रोका और पहले शहतीर निकालने की बात तय होने पर तैयार की गई छोटी सहारा-लकड़ी लौटाई। यह उसकी अपनी लकड़ी थी, एक सौ साठ वेन में शामिल नहीं थी। श्यू शेन ने नहीं ली, कहा कि अब उसे ज़रूरत भी नहीं, फिर ऐसी चीज़ न खड़ी करें जिसका मालिक पूछकर स्पष्ट न किया गया हो। दुकानदार होंग ठहाका लगाकर बोला, तब अपने छप्पर की मरम्मत के लिए रखूँगा। हाथ घुमाकर लकड़ी आँगन के कोने में रख दी; एक औपचारिक सौजन्य के कारण किसी को कई ली बेकार ढोना नहीं पड़ा।

आ सुई दुकान से निकली और दो दुकानें पार करने के बाद बोली कि उसका बेटा बचपन में छोटी-सी छुरी भी उधार लेता तो लौटाना याद रखता था, फिर उसके घर की शहतीर की बारी आई तो कैसे लगा कि उसे पहले ही ले सकता है। श्यू शन ने यह जवाब नहीं दिया कि उसे पहले से पता था माँ मना नहीं करेगी। उसने पहले सिर झुकाकर अपने कुर्ते का अगला हिस्सा ठीक से समेटा। वहाँ अब थोड़ा हल्का लग रहा था। बोला, तब उसने सोचा था कि एक अच्छा दरवाज़ा बिक जाए तो बाद में सब कुछ वापस जोड़ सकेगा। माँ ने उसकी ओर देखा और बहुत देर बाद कहा कि उसकी शहतीर कोई खाली जगह नहीं थी जिसे भरने का इंतज़ार हो।

दोनों गाँव लौटती एक सब्ज़ी की गाड़ी में बैठकर हुआई के पेड़ वाले दोराहे तक गए और बाकी चार ली धीरे-धीरे पैदल चले। आ सुई के पास लाठी थी। कुछ दूर चलकर वह सुस्ता लेती और श्यू शन जल्दी नहीं कराता। कभी वह बेटे को आगे रास्ता देखने भेजती तो वह दस-बारह क़दम जाकर देखता कि सूखी जगह है, फिर लौट आता। दोनों में से किसी ने यह जताने की कोशिश नहीं की कि अब से यह रास्ता चलना आसान हो गया है।

पुराने घर के दरवाज़े पर सूखी बाँस की कोपलों की एक छोटी लड़ी लटक रही थी। छांग की पत्नी आँगन में बाँस की पतली खपच्चियाँ छान रही थी। उन्हें देखकर उसने पहले दरवाज़े के पास पड़ा कीचड़ भरा जूता उठाया और हँसकर कहा कि आज घर बिखरा पड़ा है, सुबह ही कोपलें उलटकर हटी है। आ-सुई ने अंदर जाकर देखा कि जहाँ पहले सुइयों की टोकरी रहती थी, वहाँ दो बड़े टोकरे रखे थे। चूल्हे की चौकी पर किसी ऐसे साग के अचार का मर्तबान था जिसे वह पहचानती नहीं थी। उसके पैर पल भर थमे, फिर उसने अपनी खाली टोकरी मेज़ पर रखी।

चांग का पति पीछे से आया। उसके हाथों पर मिट्टी लगी थी। उसने बताया कि उसने पिछला कमरा नहीं छेड़ा, ताले को भी हाथ नहीं लगाया। बस घर के पीछे की नाली में जड़ें बहुत घनी थीं और सफ़ाई करते हुए हरे प्याज़ की कुछ बारीक जड़ें कट गईं। उसे पता नहीं था कि इससे पौधों को नुक़सान होगा या नहीं। आ सुई बाहर देखने गई। प्याज़ अच्छे उग रहे थे। किनारे के दो पौधे गिर गए थे और उसने उन्हें छोटी टहनियों का सहारा दे रखा था। अब वे पहले से भी सीधे खड़े थे, जब आ सुई ने उन्हें अपने हाथ से लगाया था। उसने कहा कि ज़िंदा हैं, बस यही काफ़ी है। उसके गले में एक अजीब-सी जकड़न थी।

उस रात वह पिछले कमरे में ठहरी। छांग परिवार ने श्यू शन को एक पतली रज़ाई उधार दी ताकि वह बाहर वाले हिस्से में सो सके। मुख्य कमरे में बातें हो रही थीं। एक छोटी देगची में उनकी पसंद का नमकीन सूप पक रहा था। उसकी महक में आ सुई के पहले डाले जाने वाले नमक से ज़्यादा नमक था। पहले उसका जी हुआ कि उन्हें कम डालने को कहे। फिर छांग की पत्नी को कहते सुना कि आज काम में खूब पसीना निकला है, तो उसने परदा नहीं उठाया।

चांग की पत्नी थोड़ी खट्टी सब्ज़ी की तश्तरी लाई और चखने को कहा। आ सुई ने पहले कहा कि वह इसे ज़्यादा नहीं खाती, मगर श्यू शेन ने एक कौर उठा लिया और तीखेपन से आँसू निकल आए। चांग की पत्नी को भी नहीं लगा था कि गलत मर्तबान उठा लिया है। वह जल्दी पानी लाई। तीनों कुछ देर उलझे रहे। आ सुई हँसते-हँसते झुक गई और बोली कि उनके घर की अदरक की तीखाई तो बाँस की कोंपलों के कीड़े भी भगा सकती है। चांग की पत्नी सही मर्तबान लाई, रखकर बाहर चली गई। बूढ़ी स्त्री नहीं खाती थी, इसलिए अपनी पसंद वाला मर्तबान छिपाया नहीं।

रात में पीछे के कमरे से खोखली लकड़ी की हल्की आवाज़ आई। आ सुई करवट लेकर कुछ देर सुनती रही। उसे याद आया कि श्यू पो पहले हमेशा कहता था कि घर में चूहे हैं। एक बार डंडा लेकर आधी रात तक चक्कर लगाता रहा, आखिर पता चला कि खिड़की की चौखट पर रखा उसका अपना रंदा था, जिसे हवा थोड़ा-थोड़ा धकेलकर दीवार से टकरा रही थी। तब आ सुई तीन दिन तक उस पर हँसी थी। फिर जब भी हवा उठती, वह पहले रंदा समेटता, जान-बूझकर डंडा उसे पकड़ा देता और कहता कि अब सारे घर के लिए चूहों की पहरेदारी करो। इस बार वह धीरे से हँसी। बाहर श्यू शन ने सोचा वह बुला रही है और पूछा, क्या हुआ? उसने बस कहा, कुछ नहीं।

बेटा दरवाज़े के पास बैठा उसके लिए बाँस की एक नर्म कोंपल छील रहा था। आधी छीलने पर पता चला कि एक छोटा कीड़ा उसमें सुराख़ कर गया है। उसने कहा, फेंक देते हैं। माँ ने कोंपल ले ली, ख़राब हिस्सा काटा और बचा हुआ छोटा टुकड़ा साफ़ पानी में रख दिया। हर बिगड़ी चीज़ को ठीक करके पहले जैसा नहीं बनाया जा सकता, मगर जिसमें पकाने लायक़ एक कौर बचा हो उसे भी साथ फेंक देना ज़रूरी नहीं। उसने बेटे से यह बात नहीं कही, बस पानी की केतली भर दी।

छांग की पत्नी थोड़ी देर बाद पूछने आई कि क्या चौथे महीने का किराया भी किसी के हाथ भेजें। आ सुई ने कहा कि वह ख़ुद आ ही गई है, तो चालीस वन वहीं ले लेगी, अलग से फेरा लगाने की ज़रूरत नहीं। उसने पैसे अपने दूसरे छोटे कपड़े में बाँधे, श्यू शन को रखने नहीं दिए। छांग परिवार ने बस उस महीने का किराया दिया जिसमें उन्हें अब रहना था। पाँचवें और छठे महीने के लिए महीने की शुरुआत का इंतज़ार करेंगे। न चार महीने का पैसा पहले से उसे दिया, न बक़ाया रखा कि माँगते हुए उसे संकोच हो।

अगली सुबह श्यू शन ने दरवाज़े की धुरी का निचला आसन देखा। सर्दियों में लगाई गई सख्त लकड़ी अब भी ठीक थी, मगर उसके किनारे बाँस की कोंपलों के बारीक छिलके जमा थे। उसने छांग के पति से कहा कि फुरसत में वहाँ झाड़ू लगा दे, जगह लगातार गीली न रहे। छांग के पति ने उसकी छोटी छेनी माँगी, चूल्हे के पास की चौकी के एक पाये का कोना गोल करना था। श्यू शन ने एक सवाल किया, फिर छेनी थमा दी और पास खड़ा उसे धीरे-धीरे लकड़ी छीलते देखता रहा। उसने काम अपने हाथ में लेने की जल्दी नहीं की। उस आदमी का हाथ अनगढ़ था, मगर वह जानता था कि कहाँ रुकना है।

आ सुई ने पुराने घर में बचा छोटा-मोटा सामान एक बार समेटा। दो टूटे कटोरे छांग परिवार के इस्तेमाल के लिए छोड़ दिए, पुराना कपड़ा धोने के लिए नगर ले गई और श्यू पो का पुराना घास का बरसाती लबादा धूप दिखाने के बाद भी पिछली कोठरी में टँगा रहने दिया। उसने किसी को उसे छूने से मना नहीं किया, न सब कुछ गाड़ी पर लाद लिया। धूप में सूखकर भुरभुरे हो चुके किनारे को छुआ, फिर उसे वहीं टँगा रहने दिया। घर अब सिर्फ़ उसके दरवाज़ा खोलने की राह देखते हुए चुप नहीं था, और जीवन के पहले आधे हिस्से को एक ही दिन में बुहारकर साफ़ करना भी ज़रूरी नहीं था।

छांग के पति को महीने की सात तारीख़ को ज़िले के शहर में बाँस की कोंपलें बेचने जाना था। माँ-बेटे ने साथ चलने का गाड़ी का भाड़ा दिया और दोपहर बाद शहर पहुँच गए। पश्चिमी फाटक पर आ सुई ने देखा कि गुइन्यांग की चावल की दुकान वाली छोटी गाड़ी भी खड़ी थी। उसे अचानक घर की देहरी पर लौटने का हल्कापन महसूस हुआ। पहाड़ का कुआँ पीछे रह गया था, और अब चावल की भूसी की गंध वाली इस सँकरी गली ने ही उसे सबसे पहले अपनेपन का एहसास कराया।

दू यिन छठी तारीख़ को ही लौट आई थी। पूरब के कमरे की खिड़की खुली थी। जूते धोकर एक तरफ़ सुखाने को रखे थे। सफ़र की छड़ी दरवाज़े से टिकी थी, जैसे एक इंच छोटी हो गई हो। असल में उसका सिरा थोड़ा घिस गया था। वह पलंग के किनारे औंधी सो रही थी। आ सुई ने बेटे से कहा कि धीरे चलो, पहले टोकरी अपने कमरे में रखो, उसे जगाना मत। श्यू शन ने छड़ी की ओर देखा। उसके अपने जूतों के तलवों में पहाड़ी राह की मिट्टी अभी लगी थी। अचानक लगा कि उन चालीस ली ने भी आखिर एक आकार पा लिया है।

आ सुई ने उस ख़ाली टोकरी के भीतर का पुराना कपड़ा फैलाया। उसमें छांग की पत्नी की ओर से जवाबी भेंट में मिली आधी गट्ठी बारीक बाँस की खपच्चियाँ भी थीं। पहले तो उसने लेने से मना किया था, फिर बाहर निकलते वक़्त अनजाने ही साथ ले आई। छांग की पत्नी ने कहा था कि वह उससे टोकरी बनवाना नहीं चाहती, बस वसंत के बाँस की खपच्चियाँ अभी कोमल हैं, टोकरी की मुँडेर पर लपेटोगी तो हाथ में नहीं चुभेंगी। शू शन ने एक खपच्ची लेकर आज़माई। टोकरी के जिन दो हिस्सों पर रेशे उभर आए थे, उन्हें उससे ठीक से बाँधा जा सकता था। उसने माँ का पूरा काम अपने हाथ में नहीं लिया। आधा घेरा लपेटकर दिखाया, फिर खपच्ची लौटा दी। माँ ने उसे थामा और सिर झुकाकर धीरे-धीरे लपेटने लगी।

शाम को दू यिन जागी तो बालों में दबने से टेढ़ी लकीर पड़ गई थी। दरवाज़ा खोलकर उसे देखा तो पहले पूछा कि नूडल की दुकान अभी खुली होगी या नहीं। उसने कहा, खुली होगी, और दोनों नदी के किनारे चल पड़े। वह मदिरा का ख़मीर लाकर पिता को दे आई थी। अपने लिए रेशमी कपड़े का एक छोटा टुकड़ा रखा था, पुरानी कमीज़ का गला रफ़ू करने को। श्यू शन ने पूछा कि यूछ्वान में मज़ा आया या नहीं। उसने हँसकर कहा कि काम करने गई थी, घूमने-फिरने को वहाँ कितना कुछ मिलता। हाँ, जिस घर में ठहरी थीं उसके बाहर एक पेड़ था। रात को कोई चिड़िया बार-बार खिड़की से टकराती और दोनों समझतीं कि कोई दरवाज़े पर बुलाने आया है।

उसने दू यिन के नूडल के कटोरे के ऊपर उठती भाप हाथ से हटाई। याद आया कि उस रात वह भी हवा की आवाज़ सुन रहा था। लगभग कह ही दिया था। दू यिन ने पहले बताया कि वहाँ मेज़बान के छोटे बेटे ने उससे सुई में धागा डालना सीखा। एक साँस में दस सुइयों में धागे डाल दिए, फिर सारे धागे अपनी ही बाँह के बटन में उलझा बैठा। श्यू शन इतना हँसा कि उसकी एक चॉपस्टिक गिर गई। वह झुककर उसे उठाने लगा। लौटा तो दू यिन उसके लिए दूसरी जोड़ी ले आई थी।

उस खाने पर शादी की कोई तारीख तय नहीं हुई, न किसी ने वादा किया कि आगे कभी दूर नहीं जाएगा। आधा खाना हुआ तो दू यिन ने पूछा कि छोटी डिब्बियाँ बनाना जारी रखा या नहीं। उसने कहा, लू जी ने बाद में एक और बनवाने को कहा था। उसने आँखें उठाईं और मुस्कराकर कहा, उसके उठने वाले ढक्कन की बनावट को ही एकमात्र सुविधाजनक ढंग मत समझ लेना, औरों की उँगलियाँ उसकी उँगलियों जैसी हों, ज़रूरी नहीं। श्यू शन ने हामी भरी और चॉपस्टिक से नूडल्स उठाए। अब वह बैठने के समय से कुछ तेज़ खा रहा था।

चौथे चंद्र महीने की आठवीं तारीख़ को आ सुई बेटे के साथ गुइन्यांग के पास किराया आगे बढ़ाने गई। उसने तीसरे और चौथे महीने के मौसमी किराए से मिले कुल अस्सी वन निकाले और अगले महीने के एक सौ बीस में लगाए। श्यू शन ने चालीस और दिए। फ़ांग गुइन्यांग ने पुरानी दर से लिए और कहा कि इस बार एक ही महीना बढ़ाते हैं, पाँचवें महीने की नौवीं तक। एक सौ बीस वन का बोझ सर्दियों से कम नहीं था, मगर इस बार बेटे ने माँ की ओर से एकमुश्त इतनी दूर तक किराया नहीं भर दिया था कि उसे पूछने की भी ज़रूरत न रहे।

कमरे में लौटकर आसुई ने सुई की टोकरी फिर खिड़की के नीचे रख दी। उसके निजी ख़र्च के लिए पहले जितने पैसे थे, उतने ही बचे थे। किराया देने से वह थैली खाली नहीं हुई थी। उसे पता था उसके पास कितने हैं। एक सुई के लिए बेटे से माँगने की ज़रूरत नहीं थी और हर बार नीले कपड़े का टुकड़ा खरीदने से पहले घर पर आने वाली सबसे बुरी मुसीबत सोचने की भी ज़रूरत नहीं थी। श्यू शन ने होंग परिवार के पैसे रखने वाला खाली तेलिया कपड़ा धोकर अहाते में सुखाने डाल दिया। तेल का निशान अब भी था। कितना भी धोता, एक फीका घेरा रह जाता।

शाम को हवा चली तो खाली कपड़ा रस्सी के उस पार पलटा, फिर वापस। श्यू शन ने हाथ बढ़ाकर उसे क्लिप से जमा दिया। देखा कि पूरब की कोठरी के दरवाज़े के अंदर भी धुले हुए कपड़े के छोटे टुकड़े सूख रहे थे। हल्के-गहरे वही टुकड़े थे जो दू यिन बाहर से लाई थी। माँ ने पीछे से खाने को बुलाया। इस बार उसने तुरंत जवाब दिया और कमरे में जाते वक्त पहले दरवाज़ा आज़माने नहीं रुका।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. वह दक्षिणमुखी कमरा
  2. दहलीज़ तक बर्फ़
  3. तीसरा कटोरा
  4. दरवाज़े का पल्ला गिरने से पहले
  5. दोराहे पर काले अक्षर
  6. दोपहर बाद शहर का फाटक
  7. आँगन में उधार ली हुई आग
  8. बराबर कीमत का एक दरवाज़ा
  9. दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी
  10. रास्ते की तख्ती का दूसरा रुख़
  11. सुइयों की टोकरी के पास दो हाथ
  12. बर्फ़ का पानी दक्षिणी दीवार में रिस गया
  13. गाँव लौटने पर बैठने की जगह
  14. नाप की पट्टी पर छूटा एक निशान
  15. दरवाज़े के नीचे वह हाथ
  16. माँ ने उसकी ओर से जो कहा
  17. चाय के छप्पर में दरवाज़े की लकड़ी का ढेर
  18. वह छोटी राह जिससे गाड़ी नहीं गुज़र सकती
  19. पिछला आँगन किसका है
  20. एक काँवड़ माल, दो रस्सियाँ
  21. दाश्यू हाँडी उठाकर ले गई
  22. वह चौकी जिस पर कोई नहीं बैठा
  23. पुराने घर का वादा किसने किया
  24. नए दरवाज़े को बारिश में रखना
  25. वह कमरा जो अभी छोड़ा नहीं गया
  26. बढ़ई की दुकान में छूटी कंघी
  27. पट्टी पर किसी का नाम नहीं
  28. गरम कमरा दवा नहीं है
  29. दुआनवू से पहले का वह न्योता
  30. सुइयों की वह टोकरी जो बिकी नहीं
  31. चाय के छप्पर के अपने दिन
  32. पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा
  33. किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए
  34. भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा
  35. दरवाज़ा उन लोगों के लिए ठीक करो जो जीते हैं
  36. धूप कहाँ तक ढली

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