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《तलवार खींचकर जलधारा काटना》 का आवरण

प्राचीन चीनी शैली का भावपूर्ण संगीत · AI संगीत सृजन

तलवार खींचकर जलधारा काटना

कू वूजी · AI संगीत · 3 बार पढ़ा गया

ली बाई की 《宣州谢朓楼饯别校书叔云》 से प्रेरित। 弃我去者昨日之日不可留,乱我心者今日之日多烦忧;长风万里送秋雁,对此可以酣高楼。蓬莱文章建安骨,中间小谢又清发;俱怀逸兴壮思飞,欲上青天览明月。抽刀断水水更流,举杯销愁愁更愁;人生在世不称意,明朝散发弄扁舟。 अर्थात: जो बीता कल मुझे छोड़ गया, उसे रोक नहीं सकता; आज का दिन मन विचलित करता है, चिंताएँ अपार हैं। दूर तक बहती हवा शरद के हंसों को विदा करती है, इस दृश्य के सामने ऊँची अटारी पर जी भर पी सकते हैं। पेंगलाई के लेखन में जियानआन युग का सशक्त मर्म है, और मेरे काव्य में युवा श्ये तियाओ की निर्मल प्रतिभा खिलती है। दोनों के मन में उमंग और महान विचार उड़ते हैं, नीले आकाश में चढ़कर उजला चाँद निहारना चाहते हैं। तलवार खींचकर पानी काटो तो वह और बहता है, प्याला उठाकर दुख मिटाओ तो दुख और बढ़ता है; संसार में जीवन मन के अनुरूप नहीं, कल बाल खोलकर छोटी नाव में निकल पड़ूँगा। पुरुष और स्त्री स्वर एक ही गीत के बोल गाते हैं।

गीत की वह पंक्ति

बीता कल मुझे छोड़ चला गया, उसे रोक नहीं सकता

आज फिर मन उलझा दिया कितनी चिंताएँ भर दीं

पूरे गीत के बोल पढ़ें ↓

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शब्दों में गीत बसे हैं

गीत के बोल

[प्रस्तावना]

[अंतरा 1]

शिए तियाओ की मीनार पर सजी यह मदिरा की मेज़

विदा उस मित्र को दे रहे हैं जो दूर की यात्रा पर निकलने वाला है

बीते कल एक के बाद एक चले जाते हैं

एक विदाई तक कभी न हुई

आज की बातें बोझ बनकर आ पड़ती हैं

हर बात पिछली से अधिक बेवजह

[मुखड़े से पहले]

दस हज़ार ली दूर से लंबी हवा बह आती है

शरद के हंस कतार बाँध दक्षिण जाते हैं, पीछे मुड़ना नहीं चाहते

[मुखड़ा]

बीता कल मुझे छोड़ चला गया, उसे रोक नहीं सकता

आज फिर मन उलझा दिया कितनी चिंताएँ भर दीं

दूर-दूर तक बहती हवा शरद के हंसों को विदा करती है

इस दृश्य पर तो ऊँची अटारी पर चढ़कर जी भरकर पीना चाहिए

抽刀断水水更流 — तलवार खींचकर पानी काटो तो पानी और भी बहता है

举杯销愁愁更愁 — ग़म मिटाने को प्याला उठाया, ग़म और गहरा हुआ

[अंतरा 2]

तुम्हारे लेखन में पेंगलाई का अलौकिक भाव है

उसमें जियानआन की दृढ़ता और युवा श्ये की निर्मल सुंदरता है

शिए त्याओ की अटारी उसी की अटारी है

मीनार के भीतर और बाहर हर ओर अनुपम शोभा है

हम दोनों चाचा भतीजा

हमारा जोश भी एक-सा बुलंद, मानो आकाश के दोउ और न्योउ नक्षत्रों तक पहुँच जाए

[मुखड़े से पहले]

जब विचार उड़ान भरने लगते हैं

आसमान में जाकर उजला चाँद हाथ में उतार लेना चाहता हूँ

[मुखड़ा]

बीता कल मुझे छोड़ चला गया, उसे रोक नहीं सकता

आज फिर मन उलझा दिया कितनी चिंताएँ भर दीं

दूर-दूर तक बहती हवा शरद के हंसों को विदा करती है

इस दृश्य पर तो ऊँची अटारी पर चढ़कर जी भरकर पीना चाहिए

抽刀断水水更流 — तलवार खींचकर पानी काटो तो पानी और भी बहता है

举杯销愁愁更愁 — ग़म मिटाने को प्याला उठाया, ग़म और गहरा हुआ

[वाद्य-संगीत]

[अंतरा 3]

अटारी के नीचे एक जलधारा बह रही है

मेरे मन की उलझनों से भी गाढ़ी बहती है

मैं तलवार खींचकर उसे काटने चला

धार गुज़रते ही वह फिर पहले जैसा जुड़ जाता है

शराब से दुख डुबोने का स्वाद

नशा उतरने के बाद भी दुख दरवाज़े पर दुबका बैठा है

[सेतु]

इंसान इस संसार में जीता है

मनचाहा होने के क्षण सचमुच बहुत कम हैं

दस में से नौ काम अटक जाते हैं

फुरसत का आधा दिन चुरा पाना भी मुश्किल है

भौंहें सिकोड़कर जीने से तो

बेहतर है माथे की शिकन शराब को सौंप दूँ

कल सुबह बाल खोल देना

एक छोटी नाव खेकर नदियों और झीलों में घूमूँगा

[अंतरा 4]

आज रात जी भरकर शराब पीनी है

जी खोलकर पियो, जी भरकर पियो

कल की बात कल करेंगे

नदी पर हवा है,जंगली हंस हैं,एक छोटी नाव है

बालों को खुला ही रहने दो

ऐसी आज़ादी जैसे काँटे से छूट गया हूँ

[अंतिम मुखड़ा]

बीता कल मुझे छोड़ चला गया, उसे रोक नहीं सकता

आज फिर मन उलझा दिया कितनी चिंताएँ भर दीं

दूर-दूर तक बहती हवा शरद के हंसों को विदा करती है

इस दृश्य पर तो ऊँची अटारी पर चढ़कर जी भरकर पीना चाहिए

抽刀断水水更流 — तलवार खींचकर पानी काटो तो पानी और भी बहता है

举杯销愁愁更愁 — ग़म मिटाने को प्याला उठाया, ग़म और गहरा हुआ

[समापन]

बाहर मीनार के पास अब भी तेज़ हवा बह रही है

कल की छोटी नाव घाट पर प्रतीक्षा कर रही है

शास्त्रीय काव्य का भावलोक और मौलिक गीत-बोल · AI संगीत सृजन

नीचे गीत के बोलों का अनुवाद है; रिकॉर्डिंग में मूल गायन ही है, ऑडियो दोबारा तैयार नहीं किया गया है।

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प्रस्तुति एक · पुरुष स्वर

5:02

प्रस्तुति एक · स्त्री स्वर

4:37

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