पाले में जंगली हंसों की दो परछाइयाँ
तीन दिनों से एक अकेला हंस ताओ ये की छत पर बैठकर उसे धोखेबाज़ कह रहा था। दूसरों को केवल दुखभरी पुकार सुनाई देती थी, मगर वह उसका हर शब्द समझता था। पिछले साल हंसों की उस जोड़ी को उसी ने बिछोड़ा था; अब अकेला हंस उसके बनाए पक्षी-लुभावन लकड़ी के सीटी-साधन का पीछा करते हुए अपना साथी वापस खोजने आया था। बहन की दवा के लिए अब भी पैसे चाहिए थे और सरकारी सिपाही ने बारह शुभ-शकुन वाले पक्षियों का आदेश भी दे दिया था। सरकंडों की खाड़ी में हर रात जाल गिरते और छत की वह आवाज़ थमने का नाम नहीं लेती थी।
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