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《नदी का बहाव अनंत》 का आवरण

प्राचीन चीनी शैली का भावपूर्ण संगीत · AI संगीत सृजन

नदी का बहाव अनंत

कू वूजी · AI संगीत · 4 बार पढ़ा गया

दू फ़ू की 《登高》, यानी ‘ऊँचाई पर चढ़ना’, से भाव लिया गया है। 风急天高猿啸哀,渚清沙白鸟飞回;无边落木萧萧下,不尽长江滚滚来。万里悲秋常作客,百年多病独登台;艰难苦恨繁霜鬓,潦倒新停浊酒杯。 हवा तेज़ है, आकाश ऊँचा है, वानरों की पुकार करुण है, निर्मल जल के बीच टापू पर रेत सफ़ेद है और पक्षी चक्कर लगा रहे हैं; असीम वृक्षों के पत्ते सरसराते झरते हैं, अंतहीन यांग्त्से उमड़ती चली आती है। घर से बहुत दूर शरद के दुख में सदा परदेसी हूँ, जीवन की ढलान पर रोगों से घिरा अकेला ऊँचे मंच पर चढ़ता हूँ; कठिनाइयों और गहरे दुख ने कनपटियों पर पाले जैसे सफ़ेद बाल बढ़ा दिए, बेहाल अवस्था में हाल ही में मटमैली मदिरा का प्याला भी छोड़ दिया है। छोंगयांग पर्व पर अकेले ऊँचे मंच पर चढ़ना: तेज़ हवा और वानरों की करुण पुकार, झरते पत्ते और यांग्त्से, घर से बहुत दूर परदेसी जीवन, रोगों के कारण प्याला छोड़ना—शरद की गहरी, बोझिल उदासी। पुरुष और महिला स्वर एक ही गीत के बोल गाते हैं।

गीत की वह पंक्ति

风急天高猿啸哀 — हवा तेज़ है, आकाश ऊँचा, वानरों की पुकार करुण है

निर्मल जल का टापू, सफ़ेद रेत, पक्षी चक्कर लगाते मँडराते हैं

प्रेरणा देने वाली मूल कविता दू फ़ू ·《ऊँचाई पर चढ़ना》
पूरे गीत के बोल पढ़ें ↓

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शब्दों में गीत बसे हैं

गीत के बोल

[प्रस्तावना]

[अंतरा 1]

शरद की हवा पहाड़ की चोटी पर सबसे तेज़ है

आस्तीनें हवा में, फट-फट फड़फड़ाती हैं

घाटी में वानर लंबी पुकार भरते हैं

पुकार घाटी में, कई मोड़ घूम गई

हवा तेज़ है और आसमान इतना ऊँचा

शरद की ध्वनियाँ घिर आती हैं,और छँटती भी नहीं

[मुखड़े से पहले]

पानी इतना निर्मल कि चमकता है रेत सफ़ेद है

पक्षी नीचे चक्कर काटते, पानी की काई के ऊपर से निकलते हैं

[मुखड़ा]

风急天高猿啸哀 — हवा तेज़ है, आकाश ऊँचा, वानरों की पुकार करुण है

निर्मल जल का टापू, सफ़ेद रेत, पक्षी चक्कर लगाते मँडराते हैं

无边落木萧萧下,不尽长江滚滚来 — अंतहीन पेड़ों से पत्ते सरसराते झरते हैं, अनंत यांग्त्से उमड़ती चली आती है

万里悲秋常作客,百年多病独登台 — हज़ारों मील दूर शरद का दुख लिए सदा परदेसी हूँ, जीवन भर बीमारियों से घिरा अकेला ऊँचे चबूतरे पर चढ़ता हूँ

कष्टों का गहरा खेद, कनपटियों को जल्दी बर्फ़-सा सफ़ेद कर गया

अभी-अभी छोड़ा मटमैली मदिरा का प्याला, धूल से भर गया

[अंतरा 2]

पत्ते दिन भर गिरते रहे

छोरहीन फैलाव में, सरसराते हुए ढकते जाते हैं

यांग्त्से को इन बातों की परवाह नहीं

उमड़ती लहरों की चोटियाँ, कतार-दर-कतार

पत्ते चाहे कितनी तेज़ी से झरें

नदी झरते पत्तों से भी अधिक उफनती है

[मुखड़े से पहले]

मैं हज़ारों मील दूर से आया हूँ

पतझड़ हर साल,मुझे और दूर ले जाता है

[मुखड़ा]

风急天高猿啸哀 — हवा तेज़ है, आकाश ऊँचा, वानरों की पुकार करुण है

निर्मल जल का टापू, सफ़ेद रेत, पक्षी चक्कर लगाते मँडराते हैं

无边落木萧萧下,不尽长江滚滚来 — अंतहीन पेड़ों से पत्ते सरसराते झरते हैं, अनंत यांग्त्से उमड़ती चली आती है

万里悲秋常作客,百年多病独登台 — हज़ारों मील दूर शरद का दुख लिए सदा परदेसी हूँ, जीवन भर बीमारियों से घिरा अकेला ऊँचे चबूतरे पर चढ़ता हूँ

कष्टों का गहरा खेद, कनपटियों को जल्दी बर्फ़-सा सफ़ेद कर गया

अभी-अभी छोड़ा मटमैली मदिरा का प्याला, धूल से भर गया

[वाद्य-संगीत]

[अंतरा 3]

रोगों से घिरा तन लिए ऊँचे चबूतरे पर चढ़ता हूँ

एक-एक सीढ़ी, धीरे-धीरे कष्ट से चढ़ता हूँ

उम्र भर रोगों से जर्जर यह शरीर

इकहरा कपड़ा रोक नहीं पाता, हवा सीने में भर जाती है

सफ़ेद बाल फिर बढ़ गए

हाथ फेरूँ तो, सफ़ेद लटें झरती हैं

[सेतु]

सोचा था मदिरा से ठंड भगाऊँगा

होंठों तक उठाया, फिर धीरे से हिला दिया

फिर क्यों नीचे रख दिया

इसका कारण, खुद भी अनुमान नहीं लगाना चाहता

बस यूँ ही खड़े रहें

देखो नदी गिरे पत्तों को, एक-एक कर बहाए ले जाती है

शरद का दुःख हज़ारों मील तक फैला है

जीवन में फिर भी, एक एक कदम बढ़ाना है

[अंतरा 4]

पहाड़ से उतरने का समय आ गया

साँझ जल्दी करती है, क़दम घिसटते हैं

अगले साल भी शरद आएगा

पता नहीं यह देह, तब रहेगी भी या नहीं

पर यांग्त्से यूँ ही बहती रहेगी

झरते पत्ते और यांग्त्से, किसी के वश में नहीं कि उन्हें बदल दे

[अंतिम मुखड़ा]

风急天高猿啸哀 — हवा तेज़ है, आकाश ऊँचा, वानरों की पुकार करुण है

निर्मल जल का टापू, सफ़ेद रेत, पक्षी चक्कर लगाते मँडराते हैं

无边落木萧萧下,不尽长江滚滚来 — अंतहीन पेड़ों से पत्ते सरसराते झरते हैं, अनंत यांग्त्से उमड़ती चली आती है

万里悲秋常作客,百年多病独登台 — हज़ारों मील दूर शरद का दुख लिए सदा परदेसी हूँ, जीवन भर बीमारियों से घिरा अकेला ऊँचे चबूतरे पर चढ़ता हूँ

कष्टों का गहरा खेद, कनपटियों को जल्दी बर्फ़-सा सफ़ेद कर गया

अभी-अभी छोड़ा मटमैली मदिरा का प्याला, धूल से भर गया

[समापन]

पतझड़ की हवा अब भी तेज़ बह रही है

दुख लिख चुकूँ, तो वहीं दफ़ना दूँ

शास्त्रीय काव्य का भावलोक और मौलिक गीत-बोल · AI संगीत सृजन

नीचे गीत के बोलों का अनुवाद है; रिकॉर्डिंग में मूल गायन ही है, ऑडियो दोबारा तैयार नहीं किया गया है।

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नदी का बहाव अनंत

कू वूजी · AI संगीत

प्रस्तुति एक · पुरुष स्वर

5:23

प्रस्तुति एक · स्त्री स्वर

4:45

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