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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास

धूप कहाँ तक ढली

कू वूजी · AI सृजन · 7920 अक्षर · लगभग 11 मिनट

चौथे महीने की इक्कीस तारीख को नानहुआइ गली के हुआइ के पेड़ों पर फूल खिल गए। हवा गली के मुहाने से चली आई, पहले क्वेइन्यांग की चावल की छलनी तक पहुँची, फिर आँगन की कपड़े सुखाने वाली रस्सी से होकर आखिर आ सुई के हरे प्याज़ के गमले में उतरी। उसने उँगलियों से एक फूल उठाया, सफ़ेद जैसे कच्चे चावल का दाना। उसे सूँघकर खिड़की की चौखट पर रख दिया, ताकि लौटने पर फ़ांग श्याओ खुद देख सके।

सुबह श्यू शेन काम पर निकला तो पहले कह गया कि दोपहर घर नहीं खाएगा; शाम की योजना बदली तो किसी से संदेश भेजेगा। उसने हर गली तक अपना ठिकाना नहीं बताया, माँ ने भी नहीं पूछा। वह बैठकर धीरे-धीरे अपनी खिचड़ी खाने लगी। आधा कटोरा गरम ही पिया, बाकी गुनगुना होने पर हुआंगदोउ को खिलाया। कुत्ता धीरे खाता था, मूँछों पर चावल लग गए, सिर उठाकर उससे पोंछवाने लगा।

गू छिन सुइयों का नया माल लेने शहर के दक्षिणी हिस्से में जाने वाली थी। आ सुई उसके साथ नहीं गई। कल रात घुटने में ज़रा टीस थी। उसने सोचा पहले धूप अच्छी तरह सेंक ले, फिर पुल के पास कुछ देर बैठ आए। गू छिन ने नई सुई दिखाकर कहा कि आज सस्ती है और पूछा कि ले आऊँ क्या। उसने सुई की आँख देखकर तुलना की और बस बड़े छेद वाली एक माँगी। बारीक वाली घर में अभी ख़त्म नहीं हुई थीं। गू छिन ने सुई रख ली। निकलते समय वह दाशिउ के लिए रखी मूली की छोटी मटकी भी साथ ले गई। दाम पिछली बार जितना ही था। एहसान जताने की गुंजाइश रखने के लिए कोई दूसरी मटकी साथ नहीं ली गई।

फिर वह नदी की ओर गई। छड़ी साथ थी, मगर बेटे को यह दिखाने की इच्छा साथ नहीं थी कि उसके कदम कितने सधे हुए हैं। पुल के नीचे मटके लदी नाव ने मुँह फेर लिया था। नाविक पिछली कोठरी में उकड़ूँ बैठा खाना खा रहा था। उसने उसे देखते पाया तो कटोरा उठाकर मुस्कराया। वह उसे पहचानती नहीं थी, फिर भी मुस्कराई, पुल पार किया और पेड़ की छाँह वाले पत्थर पर बैठकर पानी को किनारे की चट्टानों से टकराते सुनने लगी।

तमाशे का मंडप अब भी पूर्वी बाज़ार में था, मगर आज खुला नहीं था। उसे निराशा भी नहीं हुई। कोई घंटा भर बैठकर वह उठी और घर लौट चली। रास्ते में दो कोमल खीरे ख़रीदे। सोचा एक की ठंडी सलाद बनाएगी और दूसरा कल सुबह अपने लिए रखेगी, आराम से खाने को। उसे मालूम था कि शू शन को ज़्यादा खट्टा पसंद नहीं, इसलिए अपना आधा हिस्सा पहले निकाल लिया और थोड़ा और सिरका डाला। खाते-खाते जीभ की जड़ तक ढीली पड़ गई, जैसे शहर के वसंत का कोई स्वाद फिर से चख लिया हो।

उसी दिन पहाड़ी की चाय की दुकान बहुत जल्दी बंद हो गई। लिउ लान ने दो केतली चाय बेची और दूसरी देगची में पानी नहीं चढ़ाया। दा शिउ आज आने वाली नहीं थी। उसे घर जाकर वसंत का वह कुर्ता पूरा करना था जिसकी अभी एक ही बाँह सिली थी। झोउ छ्याओ का बच्चा आग माँगने आया। बोला, उसके पिता के चूल्हे में गीली लकड़ी सुलग नहीं रही। उसने उसे सूखी लकड़ी के दो टुकड़े दिए और खुद भागकर वहाँ नहीं गई। बच्चा लकड़ियाँ सीने से लगाए चला गया। हवा में राह का पट्टा हल्के से खटका, नीचे की कील अब भी मज़बूत थी।

बंद करने से पहले ल्यो लान ने नीची मेज़ के एक कोने पर हाथ फेरा। सचमुच एक नई किरच उठ आई थी। उसने उस कोने पर रूमाल लपेट दिया और पास में बेकार लकड़ी की एक छोटी कतरन निशानी के लिए रख दी। अगली बार श्यू शन आएगा तो रंदा लगा देगा। इस बार किसी की आज रात की ज़रूरत पूरी करने के लिए उसे अपने पूरे दिन का इंतज़ाम छोड़ने की ज़रूरत नहीं थी। उसने ताला लगाया और चाबी फिर कमर पर टाँग ली। आधे रास्ते में याद आया कि चाय पूरी पीना भूल गई थी, फिर भी वह लौटी नहीं।

छन शंग गाओपू पार कर चुका था और इस बार का माल कुछ पास के गाँवों में ले जा रहा था। उसने गधा नहीं ख़रीदा था। भाभी ने कंधे की गद्दी कुछ ज़्यादा मोटी सिल दी थी। पसीने से भीगकर वह गर्दन छीलने लगी तो उसने एक पेड़ के नीचे रुककर उसकी एक तह निकाल दी और किनारा ख़ुद सिल दिया। टाँके अब भी टेढ़े-मेढ़े थे, लेकिन बहँगी उठाने पर गद्दी ठीक बैठती थी। एक राहगीर ने पूछा कि छिंगलान कितनी दूर है। उसने रास्ता दिखाया और पूछा कि वह गाड़ी पकड़ने जा रहा है क्या, क्योंकि पैदल जाना हो तो मौसम का भी ख़याल रखना होगा।

आ-सुई ने इनमें से कुछ नहीं सुना। वह दक्षिण की खिड़की के नीचे बैठी थी। हथेली की चार पट्टियों से बचे कैनवस के किनारे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटे। मोटे टुकड़े सुइयों की टोकरी की तली में बिछाए और पतले बाद में थैली रफ़ू करने के लिए रख लिए। पुराने सुई वाले कपड़े पर कुछ ख़ाली छेद ही रह गए थे। उसे ऐसा नहीं लगा कि किसी की कमी हो गई है। उसने फिर धागा खींचा और नई बड़े नाके वाली सुई में मोटा धागा डाला। पहली बार में ही पार हो गया।

उस दिन श्यू शन एक रसोई में छोटी-सी टेक ठीक कर रहा था। काम बड़ा नहीं था, मगर नीचे से लंबे समय से भाप लगती आई थी, इसलिए नई लकड़ी को कसकर ठूँसना ठीक नहीं था। उसने असल नाप लेकर थोड़ी जगह छोड़ी। मालिक को बुरा लगा कि दरार दिखती है। श्यू शन ने कहा कि पहले देगची चढ़ाकर गरम कर लें, फिर देखेंगे। देगची में पानी उबला और लकड़ी की रगों ने धीरे-धीरे नमी सोखी। वह उकड़ूँ बैठा रहा। जब देखा कि टेक को दीवार पर ज़ोर डालने से रोकने के लिए जगह अब भी काफ़ी है, तब उसने आख़िरी फच्चर जमा दी।

दोपहर बाद काम पूरा करके वह रन परिवार की दुकान पर बारीक लकड़ी के दो टुकड़े ख़रीदने गया। देखा कि वेइ छ एक नए लड़के के साथ खिड़की नाप रहा था। वेइ छ ने कहा कि पक्का नहीं है तो फिर नापो, किसी दूसरे के कह देने से कि सब ठीक है, बात को ढँको मत। लड़के का चेहरा लाल हो गया। शू शन दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा और किसी की तरफ़ से कुछ नहीं बोला। रन छ्वान लकड़ी लाया तो उसने तय दाम चुका दिए।

रन छ्वान ने पूछा कि आजकल कैसा चल रहा है। उसने कहा कि काम कम है, मगर खाने भर को है। रन छ्वान ने उसके कंधे के औज़ारों के थैले पर नज़र डाली और कहा कि कल लकड़ी का एक टुकड़ा है जिसे दो लोगों को उठाना होगा। क्या वह आधा दिन निकाल सकता है? दिहाड़ी हमेशा के हिसाब से होगी। उसने अपना समय देखा और कहा कि दोपहर बाद आ सकता है, सुबह एक डिब्बा देना है। रन छ्वान ने सिर हिलाया। उसने दुकान में लौटकर पहले वाली चौकी सँभालने को नहीं कहा और न उस साल की सर्दियों का पन्ना वहीं पलट दिया।

दुकान से निकलकर वह पूर्वी बाज़ार में दू यिन को ढूँढ़ने गया। वह अभी-अभी आया कपड़ा एक कामचलाऊ लकड़ी के रैक पर टाँग रही थी। जिस रैक को उठाकर ले जा सकें, उसका नाप अभी तय नहीं हुआ था, इसलिए शू शन ने उसे पहले से नहीं बनाया था। दोनों ने साथ जगह देखी। उसने कहा कि यह मौजूदा रैक से आधा ची चौड़ा हो, मगर दरवाज़े के पास एक आदमी के निकलने की जगह बचे। उसने नाप निकाला, जगह नापी और बेकार लकड़ी के एक टुकड़े पर निशान बनाया। फिर उससे कहा कि धकेलकर एक बार खोलने और फिर बंद करने की कोशिश करे।

उसने हाथ बढ़ाकर धकेला तो आस्तीन एक पुरानी कील में अटक गई और लगभग फट गई। उसने फौरन कील खींच निकाली और उँगली की पीठ से छूकर देखा कि जगह समतल है। दू यिन ने कहा, रैक बन जाए तो पीछे एक नन्ही पत्ती छोड़ देना, मुझे देखने में अच्छी लगेगी। उसने सिर उठाया, एकाएक हँसा और पूछा, कैसी पत्ती? उसने कहा, कोई भी, बस इतनी न बढ़ जाए कि रास्ता रोके। श्यू शन ने बेकार लकड़ी के कोने पर एक छोटी लकीर बनाई। असली लकड़ी पर छेनी चलाने की जल्दी नहीं की।

शाम को वह लकड़ी का एक नन्हा लटकन घर लाया। उसे अपनी बची हुई छोटी लकड़ी से बनाया था, आधे पर पुराने रेशे, आधे पर उथली खुदी पत्ती। उसने उसे दू यिन के दरवाज़े पर नहीं बाँधा, न माँ को देकर राय माँगी। उसे अपने औज़ारों के थैले के अंदर बाँध लिया। चलते हुए वह छोटी छेनी से हल्के से छूता, आवाज़ नहीं करता। हाथ भीतर डालो तभी महसूस होता, जैसे दूसरों के लिए नाप से करने वाले तमाम कामों के बीच अपनी पसंद की लकड़ी का एक इंच अब भी बचा हो।

चौथे महीने की तेईसवीं की शाम हल्की बारिश शुरू हुई। श्यू शन शहर के उत्तर में डिबिया पहुँचाने गया था। बारिश शुरू होते-होते देर हो चुकी थी और रास्ते का कीचड़ जूतों से चिपक रहा था। उसने एक परिचित ठेले से कटोरे भर नूडल खरीदे। खाकर पश्चिमी फाटक की ओर जा रहे एक आदमी से घर पर कहलवा भेजा कि उसे ज़रा देर होगी, वह खा चुका है, खाने के लिए इंतज़ार न करें। वह आदमी फांग गुइन्यांग को जानता था। उसने कहा कि दरवाज़े तक ख़बर पहुँचा देगा, पलंग के पास तक जाकर खटखटाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

आ सुई ने संदेश सुना तो उसकी छोटी देगची में साग की लपसी पक रही थी। उसने अपने लिए एक कटोरा परोसा और केतली में अलग से साफ़ पानी छोड़ दिया। इस बार उसने लपसी ढककर ठंडी होने का इंतज़ार नहीं किया। दू यिन कैंची लौटाने आई। उसे अकेले खाते देखा तो बैठकर आधा कटोरा पी लिया। दोनों ने बात की कि शहर के दक्षिण में मूली और सस्ती होती जा रही है, और गुइन्यांग की भतीजी ने जो बिल्ली बनाई थी उसके कान असल में बराबर ऊँचाई पर नहीं थे। किसी ने भी इस खाने को झट से परिवार का खाना कह देने की जल्दी नहीं की।

श्यू शन लौटा तब गली में इक्का-दुक्का दीये जल चुके थे। हुआंग दोउ ने सबसे पहले कदमों की आहट सुनी और बाड़ के पीछे से दो बार भौंका। उसकी आवाज़ नीची और भर्राई हुई थी। अब वह जवानी की तरह एक साँस में इतना नहीं भौंकता था कि पहाड़ी राह के आखिरी छोर तक सुनाई दे। आ सुई ने खिड़की से पूछा, कौन? श्यू शन ने कहा, मैं हूँ। उसकी आवाज़ महीन बारिश पार कर कमरे में उतरी, किसी ऐसी मामूली बात की तरह जिसे बार-बार पहचानने की ज़रूरत न हो।

वह दरवाज़े के बाहर जूते पोंछ रहा था। माँ ने दीया ज़रा पास सरकाया और कहा कि देहरी के किनारे नया गमला रखा है, ध्यान रखना। उसमें उसका लगाया पुदीने का एक पौधा था। नदी किनारे पौधे बेचने वाले ने कहा था कि पत्ते मसलने पर अच्छी महक आती है, बस इसीलिए उसने आज़माने को एक पौधा ख़रीद लिया था। शू शन ने सिर झुकाकर पत्ती की नोक छुई। उसकी उँगली के पोर पर ठंडी-सी महक रह गई।

कमरे में खाने के दो कटोरे सलीके से रखे हुए नहीं थे। सिलाई की टोकरी खिड़की के नीचे थी, छोटी केतली अब भी गरम थी। माँ ने उससे कहा कि छांग परिवार का पाँचवें महीने का किराया महीना शुरू होने पर ही लेंगी, अभी उसे हिसाब में लगाने की ज़रूरत नहीं। बेटे ने कहा कि इन दिनों की बची मज़दूरी में से पहले घर का ख़र्च पूरा रख लें। माँ के पाँच सौ नब्बे वन अगला काम पूरा करके धीरे-धीरे लौटाएगा। उसने सुनकर कहा कि समझ गई, फिर उसके भीगे औज़ारों का थैला उठाकर ताक पर रख दिया। उसने उसे आज रात वही बात फिर से सुनाने को नहीं कहा।

वह बैठकर मोज़े बदलने लगा। आसुई ने लौटाई गई घास की जूतियों की जोड़ी उसके पैरों के पास रख दी और कहा कि एक की डोरी ढीली है, कल वह खुद फिर गूँथ देगी। श्यू शन पहले उसे देखना चाहता था, मगर उसने कहा कि पहले बाल पोंछकर सुखा लो। हुआंगदोउ पास ही थोड़ा खिसका ताकि उसके पैरों को जगह मिले। वह बहुत दूर नहीं हटा, तो श्यू शन ने पाँव कुछ तिरछे रख लिए और आराम से बैठ गया।

बारिश की आवाज़ बहुत महीन थी। बूँदें खपरैलों पर पड़ रही थीं, उस रात की तरह चौंकाती नहीं थीं जब बर्फ़ के बोझ से डालियाँ टूटी थीं। पहाड़ का पुराना दरवाज़ा अब भी कोई खोलता-बंद करता था। हुआई के पेड़ वाले दोराहे पर झोउ परिवार के चूल्हे की लौ बस उनके अपने दरवाज़े के आगे उजाला करती थी। चाय के छप्पर में आज रात ताला लग चुका था। कोई ऐसे आदमी के लिए रात भर जागकर रखवाली नहीं कर रहा था जो अभी आया ही नहीं था। आ सुई ने खिड़की ज़रा-सी खुली छोड़ी। बारिश के साथ आँगन के हुआई के पेड़ की महक भीतर आई। वह बेटे को एक नन्हे-से पत्ते की बात करते सुनती रही। आधी बात तक उसे नींद आने लगी और उसने तकिए से टिककर धीरे-धीरे आँखें मूँद लीं।

श्यू शन ने बोलना बंद किया और माँ की साँसें बराबर हो जाने पर दीया थोड़ा बाहर सरका दिया। उसने रोशनी पूरी तरह नहीं बुझाई। उसे गीले जूते फैलाकर रखने थे और कल वाली डिबिया का एक बारीक किनारा सँवारना था। दरवाज़ा ठीक से बंद हुआ, कुंडी हल्के से गिरी और हुआंगदोउ ने एक आह भरी। दूर कोई राह तय कर रहा था। कुत्ते के भौंकने की आवाज़ फिर उठी। दो भौंकों के बाद सब शांत हो गया और रात शहर और पहाड़ के बीच दूर तक बिछ गई।

· पूरा पाठ समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. वह दक्षिणमुखी कमरा
  2. दहलीज़ तक बर्फ़
  3. तीसरा कटोरा
  4. दरवाज़े का पल्ला गिरने से पहले
  5. दोराहे पर काले अक्षर
  6. दोपहर बाद शहर का फाटक
  7. आँगन में उधार ली हुई आग
  8. बराबर कीमत का एक दरवाज़ा
  9. दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी
  10. रास्ते की तख्ती का दूसरा रुख़
  11. सुइयों की टोकरी के पास दो हाथ
  12. बर्फ़ का पानी दक्षिणी दीवार में रिस गया
  13. गाँव लौटने पर बैठने की जगह
  14. नाप की पट्टी पर छूटा एक निशान
  15. दरवाज़े के नीचे वह हाथ
  16. माँ ने उसकी ओर से जो कहा
  17. चाय के छप्पर में दरवाज़े की लकड़ी का ढेर
  18. वह छोटी राह जिससे गाड़ी नहीं गुज़र सकती
  19. पिछला आँगन किसका है
  20. एक काँवड़ माल, दो रस्सियाँ
  21. दाश्यू हाँडी उठाकर ले गई
  22. वह चौकी जिस पर कोई नहीं बैठा
  23. पुराने घर का वादा किसने किया
  24. नए दरवाज़े को बारिश में रखना
  25. वह कमरा जो अभी छोड़ा नहीं गया
  26. बढ़ई की दुकान में छूटी कंघी
  27. पट्टी पर किसी का नाम नहीं
  28. गरम कमरा दवा नहीं है
  29. दुआनवू से पहले का वह न्योता
  30. सुइयों की वह टोकरी जो बिकी नहीं
  31. चाय के छप्पर के अपने दिन
  32. पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा
  33. किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए
  34. भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा
  35. दरवाज़ा उन लोगों के लिए ठीक करो जो जीते हैं
  36. धूप कहाँ तक ढली

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