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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास

दहलीज़ तक बर्फ़

कू वूजी · AI सृजन · 9125 अक्षर · लगभग 12 मिनट

आ सुई ने नमक की मटकी बाँस की टोकरी में रखी, फिर निकाल ली। मुँह पर बाल जैसी पतली दरार थी। कपड़े में लपेटे तो थोड़ी और जगह घेरेगी, न लपेटे तो डर था कि बेटे के नए किराए के घर में पहुँचने तक टोकरी में मिट्टी के टूटे टुकड़े ही रह जाएँगे। वह थोड़ी देर मटकी को देखती रही, फिर पहले आधा डोंगा चावल निकालने चली गई। हुआंगदोउ ने चावल के हाँडी में गिरने की आवाज़ सुनी और धीरे-धीरे दरवाज़े के पीछे से निकला। उसे लगा आज फिर उसके हिस्से का एक कौर मिलेगा।

चूल्हे की आग जलते ही हाँडी के किनारे से सफ़ेद भाप उठी। आ सुई ने पैर से छोटी चौकी खींचकर पास की, दोनों हाथ घुटनों पर दबाए और ठंड की उस टीस के उतरने का इंतज़ार किया। दरवाज़े के बाहर की क्यारी में साग के कुछ कमज़ोर पौधे ही बचे थे। पाले ने पत्तियों के किनारे उधड़े धागे के घेरे की तरह मोड़ दिए थे। कल उसने उन्हें तोड़ने की सोची थी, फिर लगा कि एक दिन और छोड़ दे तो शायद एक छोटा कौर और बढ़ जाए। बेटा यहाँ होता तो ज़रूर पूछता कि उस एक कौर के कम होने से आख़िर क्या फ़र्क़ पड़ता।

उसे साग के उस एक कौर की कमी नहीं थी। कमी इस बात की थी कि जाते वक्त उसे मालूम हो कौन-सा काम पूरा मान लिया जाए। अलमारी के ऊपर पुरानी कपड़े की पोटली में उसके दिवंगत पति की स्याही लगी निशान खींचने वाली डोरी रखी थी। डोरी कब की भुरभुरी हो गई थी और स्याही इतनी सख़्त कि दबाने पर रंग नहीं निकलता था। फिर भी उसने पोटली उतारी और झाड़कर थपथपाई। बगल में उसी की हाल में बुनी घास की दो जोड़ियाँ थीं। तलवे घने बुने थे और पहनने पर चुभते। उसका जी था उन्हें शहर ले जाकर लोगों को दिखाए, मगर डर था बेटा हँसेगा कि शहर जाकर भी उसे पहाड़ी रास्ते पर चलना है।

जब ल्योउ चाची अंदर आईं, आ सुई घास के जूतों पर कपड़ा लपेट रही थी। हुआंगदोउ ने उनके क़दम पहचान लिए, बस सिर उठाया और ज़मीन पर दो बार पूँछ फेरी। ल्योउ चाची की नज़र देगची पर पड़ी तो बोलीं कि उसे पहले से पता था वह आने वाली है, तभी तो चावल भी ज़्यादा डाले हैं। आ सुई ने कहा, नहीं, ज़्यादा डाले भी तो बेटे के लिए। फिर दूसरा कटोरा उठाकर उसमें आधा कटोरा गाढ़ी लपसी परोसी और अपने लिए देगची की तह में बची पतली लपसी रख ली।

ल्यू चाची ने कटोरा नहीं लिया और कलछी से आधा दलिया फिर हाँडी में डाल दिया। दो बार दोनों ने एक-दूसरे की ओर बढ़ाया। आखिर ल्यू चाची खड़े-खड़े खाने लगीं और बोलीं, ज़्यादा आग्रह करोगी तो इसे तुम्हारे नाश्ते में से खाया समझूँगी। आ सुई ने हँसकर डाँटा कि उसके घर दलिया ऐंठने चली आईं, फिर बैठने को कहा। खुद ठीक से बैठने पर उसे एहसास हुआ कि अब तक उसकी पीठ तनी हुई थी, मानो एक बार चैन से बैठ जाए तो इस घर में एक और सर्दी काटी जा सकती है।

चाची लिउ मोटी सन की रस्सी की एक गट्ठी लाई थीं। बोलीं, पिछले साल जलावन बाँधने से बची थी, इस पर लगी लकड़ी की किरचों का बुरा मत मानना। उनकी कमर में लटकती चाबियों का गुच्छा कटोरे के किनारे से टकराया और साफ़ खनक उठा। आ सुई ने पूछा कि चाय की छान की चाबी भी साथ है क्या। चाची लिउ ने सिर हिलाया। पिछले महीने मरम्मत की हुई छत दो बारिशें झेल चुकी थी, आज सचमुच बर्फ़ पड़ी तो अच्छा ही होगा, पता चल जाएगा कि कहीं टपकती तो नहीं। उन्होंने यह बात यूँ ही छेड़े किसी मामूली किस्से की तरह कही, पर हाथ से कमर के पास सबसे लंबी चाबी को ज़रा दबाया।

चाय की छप्परवाली दुकान दो साल से बंद थी, फिर भी ल्यू चाची हर बार हाट जातीं तो वहाँ सुस्ता लेतीं। बेटे ने लंबी बेंच तेल की दुकान पर ले जाने को कहा था। उन्होंने कई बार हाँ की और हर बार भूल गईं। आ सुई जानती थी कि वे भूली नहीं थीं, इसलिए उसने याद भी नहीं दिलाया। कटोरे की तली खुरचते हुए ल्यू चाची ने कहा कि वसंत आए तो फिर थोड़ी चाय उबालना चाहती हैं। शहर से आने वाले ग्राहक नई चाय पहचानते हैं। उन्हें तो बड़े बर्तन में बनने वाली वही हल्की चाय बेचनी आती है, पता नहीं अब कोई उसे पीता भी है या नहीं।

“प्यास लगेगी तो पिएँगे।” आ सुई ने झट जवाब दिया। “फिर अब शन शहर में है, उसका उठना-बैठना दुकानदारों के साथ ही है। जिनके दरवाज़े उसने ठीक किए हैं, वे उसे पहचानेंगे ही।”

लिउ चाची ने आँख उठाकर मुस्कराया। आ सुई भी मुस्कराई। फिर अचानक चाहा कि वह बेटे के कामकाज के बारे में दो सवाल और पूछे, मगर लिउ चाची ने केवल पूछा कि ये दोनों जोड़ी जूते क्या कुत्ते के कुतरने को छोड़ रही है। उसने कपड़े की पोटली कस ली, यह नहीं बताया कि अभी कही बात अनुमान भर थी। श्यू शेन लौटकर हमेशा लकड़ी के काम की ही बात करता—कितनी लकड़ियाँ चीरीं, बारिश और नमी में लकड़ी फटी—दूसरे उसे क्या कहते हैं, बताना पसंद नहीं करता था।

ल्यो चाची ने कपड़े समेटकर गठरी बनाने में मदद की और उसमें से एक छोटी बंडी निकाली जिसकी बाँहों का कपड़ा घिसकर झीना हो गया था। आसुई ने कहा कि वह कई साल चूल्हे के धुएँ में उसके साथ रही है और सर्दियों में भीतर पहनने पर सबसे ज़्यादा गरम रखती है। ल्यो चाची ने उसे वापस रख दिया। फेंकने को नहीं कहा। फिर चूल्हे के पीछे से सख़्त लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा टटोलकर निकाला और कहा कि कम से कम यह तो गाड़ी में जगह नहीं घेर सकता। आसुई ने हाथ में लेकर पहचान लिया। श्यू पो ने जब पत्थर की चक्की की धुरी बदली थी तो यह बच गया था। लकड़ी का भीतरी हिस्सा घना था और बरसों से चूल्हे के पीछे पड़ा था। उसने उसे फिर वहीं खोंस दिया।

“वह आएगा तो इसे माँगेगा।” उसने कहा। असल में पिछली बार बेटे ने उस तरफ देखा तक नहीं था।

दोपहर होने से पहले ही आसमान नीचे झुक आया। लिउ चाची को बर्फ़ पड़ने का डर था। अपना खाली कटोरा धोकर साफ़ किया और श्यू शन का इंतज़ार करने को नहीं रुकीं। आ सुई उन्हें आँगन के किनारे तक छोड़ने आई। सूखी घास के बीच कसकर बँधे उनके दोनों पाँयचों को आगे-पीछे जाते देख अचानक पुकारकर पूछा कि क्या शहर के दक्षिण में नदी का पुल एक हिस्सा और बढ़ा दिया गया है। लिउ चाची ने मुड़कर कहा कि उन्होंने खुद अभी उसे देखा तक नहीं और इसे पहले से उसकी फ़िक्र लगी है। आ सुई ने कहा कि आने-जाने वालों से सुना था, बस यूँ ही पूछ लिया। फिर मुड़कर भीतर गई, मगर होंठों पर हल्की हँसी दबाए नहीं दबी।

श्यू शन पहुँचा तो उसके कंधे की रज़ाई की गठरी पर बर्फ़ के कुछ बारीक कण पड़े थे। हुआंगदोउ पहले भौंका। दो बार भौंकने के बाद उसे पहचान गया और उसकी टाँगों से ऐसा सटा कि उसे लगभग चौखट की तरफ़ धकेल दिया। उसने एक हाथ से कुत्ते को सँभाला और दूसरे से दरवाज़ा उठाया। पाँव ठीक से जमे भी नहीं थे कि बोला, यह दरवाज़ा फिर नीचे कैसे आ गया। आ सुई ने उसका थैला लिया। उसके ‘फिर’ को सुनकर उसे याद आया कि पिछली बार तो बस साँकल के खाँचे में बाँस की एक पतली पट्टी लगाई गई थी।

उसने नई रज़ाई पलंग पर रखी और उँगलियाँ उसके किनारे पर फेरीं, जैसे किसी ऐसी लकड़ी की चीज़ को देख रहा हो जो कुछ महीने नज़र से दूर रहे तो बदल जाएगी। आ सुई ने पहले खाने को कहा, मगर वह दरवाज़े के पास खड़ा उसे खोल-बंद कर देखता रहा। दरवाज़े का निचला सिरा हिला तो नीचे से थोड़ा-सा बुरादा झर गया। उसने उकड़ूँ बैठकर टटोला। उँगलियों के पोरों पर धूसर-सफ़ेद मुलायम चूरा लगा तो उसका चेहरा उतर गया। ऊपर की धुरी ठीक थी। नीचे का खेवा घिसकर और गहरा हो गया था और उसमें पहले लगाई बाँस की फाँक घिसकर आर-पार हो चुकी थी।

“कल सुबह ही निकलना है।” वह उठा और हाथ झाड़े, “पिछली बार कहा था कि दरवाज़े के पीछे जलावन मत ठूँसना, पता नहीं तुमने सुना भी था या नहीं।”

आ सुई ने सूखी लकड़ी के उन दो छोटे गट्ठरों को देखा और जवाब नहीं दिया। बारिश में वे आँगन में भीग जाते। दरवाज़े के पीछे ही सबसे पास की सूखी जगह थी जहाँ तक वह उन्हें उठा सकती थी। बेटा घर में घुसते ही दरवाज़ा देख चुका था। पलंग के पास ताज़ा बुहारी हुई ज़मीन नहीं देखी थी, न नए घर के लिए बचाकर रखी उसकी दो छोटी कपड़े की गद्दियाँ। उसने उसके लिए परोसी लपसी फिर गरम करने को देगची में लौटा दी। कलछी लोहे के किनारे से टकराई। उसने जानबूझकर रोज़ से ज़रा ज़ोर लगाया था।

श्यू शन ने आवाज़ सुनी तो मुड़कर पूछा कि आग कम है क्या। माँ ने कहा कि तेज़ है, ख़ूब तेज़, और पूछा कि पलंग भी आरी से काटकर ले चलें क्या। तब वह हँसा और बोला कि शहर में पलंग है, इस बूढ़ी चीज़ को ढोने की ज़रूरत नहीं। दक्षिण की खिड़की की बात आई तो उसकी आवाज़ खिल गई। उसने दीवार पर हाथ से धूप की तिरछी लकीर दिखाई और यह भी तफ़सील से बताया कि खिड़की के नीचे कौन-सी छोटी मेज़ रखी जा सकती है। आ सुई सुनती रही। अभी की थोड़ी नाराज़गी भाप में ढीली पड़ गई, मगर वह उसे भूली नहीं।

खाने के बाद सामान समेटते हुए दोनों फिर बड़ी अलमारी पर अटक गए। श्यू शन ने कहा कि गाड़ी चाहे जितनी चौड़ी हो, उसे ले जाना ठीक नहीं। उसने शहर वाले घर का दरवाज़ा नापा था, अलमारी उसमें से नहीं जाएगी। आ सुई ने सबसे नीचे की दराज़ खींचकर खोली। उसमें से आधे कटोरे के बराबर धागे का गोला, कपड़े में लिपटी कुछ सुइयाँ और घिसकर धुँधला पड़ा एक छोटा काँसे का आईना निकाला। अलमारी में शुरू से ज़्यादा सामान था ही नहीं। उसने दराज़ वापस सरकाई और पूछा कि जो बचा है उसे कहाँ रखें। इस पर उसे भी तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा।

आख़िर उन्होंने एक ही दराज़ निकाली। शू शन ने लकड़ी की कीलें उतारीं और आ सुई ने पुराने कपड़े से उसकी तली पोंछी। उसने कहा कि शहर में अगर अलमारी नहीं है तो इसे पलंग के नीचे रख देना भी काफ़ी होगा। शू शन को भीतर सुई-धागा रखने की एक बिगड़ी हुई डिबिया दिखी, जिसकी बगल में आरी के निशान थे। वह पूछने ही वाला था कि माँ ने ताँबे का आईना उलटकर उसके ऊपर रख दिया। वह डिबिया उसी ने तराशी थी। तो माँ मेज़ के पाए के नीचे से उसका आधा हिस्सा भी उठाकर ले आई थी और कभी उससे कहा तक नहीं था।

बर्फ़ कुछ घनी होने लगी तो श्यू शन आँगन में जलावन बाँटने गया। आ सुई ने सोचा कि वह बची-खुची लकड़ी जला देगा और झट दरवाज़े पर देखने आई। वह आज रात भर की लकड़ी अंदर लाया, बाक़ी दीवार के कोने में जमाकर फटी चटाई से ढक दी। फिर पूछा कि घास के जूतों की दोनों जोड़ियाँ साथ ले जानी हैं या नहीं। उसके कुछ कहने से पहले ही बोल पड़ा कि शहर में कपड़े के जूते ख़रीद लेंगे, सर्दियों में ये पहनने की ज़रूरत नहीं। उसने उसके हाथ के जूतों को देखा, हाथ बढ़ाकर वापस लिए और बस इतना कहा कि अभी रहने दो, तुम्हारे बिस्तर बिछाने में आड़े नहीं आएँगे।

अँधेरा होने तक कुंडी ठीक से नहीं सरकी। श्यू शन ने उसे निकालकर कमरे की बची-खुची रोशनी में एक तरफ़ से छीला। दो बार आज़माया, पूरा दरवाज़ा उतारने की हिम्मत नहीं की। दीवार में धुरी का खाँचा भी पुराना हो गया था। सख़्त हिस्सा टटोले बिना बरमी चलाने से वह और ढीला हो सकता था। लंबी बरमी दुकान में छूट गई थी और साथ लाई छोटी छेनी से बस धीरे-धीरे मरम्मत हो सकती थी। आ-सुई ने उसे भौंहें सिकोड़ते देखा तो कहा, कल हम चले जाएँगे। फिर दरवाज़ा कसकर बंद न भी हुआ तो कौन देखेगा, इतनी मेहनत किसलिए? उसने जवाब नहीं दिया। लकड़ी की कुंडी चूल्हे के किनारे टिका दी और कब का ठंडा हो चुका पानी उठा लिया।

यहाँ से चार ली दूर हुआई के पेड़ वाले दोराहे की तख़्ती का आधा कोना ही बाहर दिख रहा था। छन शंग ने काँधे की रस्सी पीछे सरकाई और तख़्ती की बर्फ़ झाड़ी। उसे 城, यानी ‘शहर’, का अक्षर तो पहचान में आया, पर तीर की नोक किस ओर थी, साफ़ नहीं दिखा। कल रात वह शिकौ में ठहरा था। आज सुबह वह जल्दी ज़िले के शहर पहुँचकर मज़दूरी का हिसाब लेना चाहता था, पर रास्ते में एक घर के लिए मोटा धागा ले गया, जिससे कुछ और चलना पड़ा। घिसकर खुल गए जूते के तले को सीने के लिए रुकने का समय भी वह नहीं निकाल पाया।

उसके काँधे पर चौबीस खुरदरे मर्तबान थे। एक सिरे की बड़ी टोकरी में नीचे धान की पुआल ठूँसकर उन्हें रखा गया था। दूसरे सिरे पर तेल लगे कपड़े में सूती कपड़ा और फुटकर माल बँधा था। मर्तबान सब ख़ाली थे, फिर भी काँधा उनके बोझ से सुन्न पड़ रहा था। बर्फ़ उनके मुँह पर सफ़ेद घेरा बना लेती थी। हर थोड़ी दूर पर उसे वह झाड़नी पड़ती, कहीं गीली पुआल मिट्टी की दीवारों पर चिपक गई तो दुकान पहुँचने पर कहेंगे कि माल साफ़ करके नहीं लाया। दवा की दुकान दूरी के हिसाब से मज़दूरी देती थी, मगर मर्तबान टूटें तो उनकी गिनती ख़ास तौर पर ठीक रखती थी।

दोराहे से मुड़कर सनोबर के दूसरे झुरमुट में पहुँचा तो उसे समझ आ गया कि रास्ता ग़लत है। मुख्य सड़क की चढ़ाई इतनी तेज़ नहीं होनी चाहिए थी और रास्ते के किनारे सिर्फ़ एक आदमी के पुराने पदचिह्न भी नहीं होने चाहिए थे। उसने बहँगी उतारी और सूखा खाना निकालना चाहा, तभी पीछे की नमी खाई पुरानी रस्सी एकाएक खुल गई। मिट्टी के मटके जमकर सख़्त हो चुके पत्थरों से टकराए। आवाज़ें इतनी सघन थीं, जैसे कोई बर्फ़ के नीचे हड़बड़ी में छोटा ढोल पीट रहा हो। उसने रोकने को हाथ बढ़ाया, मगर हथेली में बस टूटे हुए एक ठंडे किनारे का स्पर्श आया।

बारहवें मर्तबान तक गिनकर उसने गिनना छोड़ दिया। तेलिया कपड़े वाला सिरा अब भी ठीक था। उसने पहले सूती कपड़े को बचाया, फिर सलामत मर्तबान सामने वाले सिरे पर सरकाए। कई बार कोशिश की, पर काँवर फिर बराबर नहीं हो पाई। जूती के उधड़े तलवे से बर्फ़ रिस रही थी। हर क़दम पर लगता जैसे पाँव की उँगलियों के नीचे बर्फ़ की कोई पतली किरच दब रही हो। दूर एक नीची छत दिखी तो उसे लगा कि चाय का छप्पर है। पास आया तो कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनी। भीतर किसी ने जवाब दिया, आवाज़ कुछ बूढ़ी थी।

छन शंग आँगन के बाहर रुक गया। टेढ़ी काँवड़ पैरों के पास रखी और हाथ की पीठ से लकड़ी का दरवाज़ा हल्के से खटखटाया। अंदर से रुक-रुककर लकड़ी खुरचने की आवाज़ आ रही थी। वह थम गई। उसने पहले कहा कि राह भूल गया है, फिर पूछा कि थोड़ा गरम पानी मिल सकता है क्या। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि बर्फ़ उसे लगभग निगल गई। दरवाज़े के पीछे से एक आदमी ने कहा कि घरवाले कल यहाँ से जा रहे हैं। छन शंग झट एक ओर हट गया और मुँह से कहा कि समझ गया, मगर हाथ उस बाँस की टोकरी पर ही रहा जिसकी उठाने वाली डोरी जा चुकी थी।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. वह दक्षिणमुखी कमरा
  2. दहलीज़ तक बर्फ़
  3. तीसरा कटोरा
  4. दरवाज़े का पल्ला गिरने से पहले
  5. दोराहे पर काले अक्षर
  6. दोपहर बाद शहर का फाटक
  7. आँगन में उधार ली हुई आग
  8. बराबर कीमत का एक दरवाज़ा
  9. दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी
  10. रास्ते की तख्ती का दूसरा रुख़
  11. सुइयों की टोकरी के पास दो हाथ
  12. बर्फ़ का पानी दक्षिणी दीवार में रिस गया
  13. गाँव लौटने पर बैठने की जगह
  14. नाप की पट्टी पर छूटा एक निशान
  15. दरवाज़े के नीचे वह हाथ
  16. माँ ने उसकी ओर से जो कहा
  17. चाय के छप्पर में दरवाज़े की लकड़ी का ढेर
  18. वह छोटी राह जिससे गाड़ी नहीं गुज़र सकती
  19. पिछला आँगन किसका है
  20. एक काँवड़ माल, दो रस्सियाँ
  21. दाश्यू हाँडी उठाकर ले गई
  22. वह चौकी जिस पर कोई नहीं बैठा
  23. पुराने घर का वादा किसने किया
  24. नए दरवाज़े को बारिश में रखना
  25. वह कमरा जो अभी छोड़ा नहीं गया
  26. बढ़ई की दुकान में छूटी कंघी
  27. पट्टी पर किसी का नाम नहीं
  28. गरम कमरा दवा नहीं है
  29. दुआनवू से पहले का वह न्योता
  30. सुइयों की वह टोकरी जो बिकी नहीं
  31. चाय के छप्पर के अपने दिन
  32. पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा
  33. किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए
  34. भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा
  35. दरवाज़ा उन लोगों के लिए ठीक करो जो जीते हैं
  36. धूप कहाँ तक ढली

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