प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
एक व्यक्ति की राह
कू वूजी · AI सृजन · 8629 अक्षर · लगभग 11 मिनट
चौथे महीने की दूसरी तारीख़ को मौसम साफ़ था। गु छिंग ने तय अनुसार गधे की छोटी गाड़ी बुलवाई। मालिक ने समझा कि वे दक्षिणी शहर के बाज़ार जाएँगी। सुना कि पास के लूवान जाना है, केवल लकड़ी के पैदल पुल पर थोड़ा चलकर देखने के लिए, तो पहले चौंका, फिर भी आने-जाने का भाड़ा बताया। शन सु अपनी हल्की भूरी टोपी लिए दरवाज़े से धीरे-धीरे निकली। गु छिंग को गाड़ी पर तीन तह रज़ाइयाँ बिछाते देखकर पूछा कि क्या पलंग भी उठा ले जाने का इरादा है।
गू छिंग ने कहा कि गाड़ी का पटरा सख़्त है। दादी ने हाथ बढ़ाकर उसे दबाया, फिर सबसे ऊपर की तह हटा दी, “यह तह बिछी रहेगी तो पाँव नीचे तक नहीं पहुँचेंगे, तब और डगमग लगेगा।” गू छिंग अब भी एक पुराना कंबल वापस घुसाना चाहती थी, मगर गाड़ीवान पायदान उतारकर गाड़ी की शाफ़्ट थामे इंतज़ार कर रहा था। उसे पहले बुज़ुर्ग को चढ़ाना पड़ा। फिर उसने बची रज़ाइयों को मोड़कर नीची गद्दी बनाई और चारों ओर से कपड़े की पट्टियों से बाँध दिया, ताकि वह पटरे पर फिसले नहीं।
पश्चिमी फाटक के बाहर पहिए कुछ कंकड़ों पर से गुज़रे। शन सू ने साँस खींची और दाहिने हाथ से घुटना दबा लिया। गू छिंग ने फ़ौरन पूछा कि क्या लौट चलें। दादी ने सिर उठाकर नगरद्वार की ओर देखा और उसका जवाब दिए बिना गाड़ीवान से बस ज़रा धीरे चलने को कहा। इस तरह जो रास्ता आम तौर पर पंद्रह मिनट से कम का था, उसमें क़रीब आधा घंटा लगा। पैसे देते समय गू छिंग ने गाड़ीवान का चेहरा देखा। सोचा वह खीझेगा, मगर उसने बस कहा कि वापसी के लिए वह दोपहर बाद तक इंतज़ार करेगा, उन्हें पुल के पास हड़बड़ी करने की ज़रूरत नहीं है।
लुवान से जियांगनान अभी दूर था। पानी के किनारे बस नरकट की नई नोकें और पुराने पीले-भूरे सरकंडों के झुरमुट थे, कमल नहीं थे। शेन सु किनारे पर खड़ी थीं। सामने से आई हवा ने टोपी का फीता उड़ा दिया तो उन्होंने हाथ बढ़ाकर उसे दबा लिया। लगतीं ऐसी थीं जैसे पहली बार बाहर निकली हों, फिर भी चेहरा ऐसा बनाए थीं जैसे यह सब पहले ही देख चुकी हों। गु छिंग ने पानी की तरफ़ देखते हुए उनका चेहरा देखा और उनकी पोल नहीं खोली। पहले यह पता करने गई कि आज कौन-सी यात्री नाव किनारे लगेगी।
नाव चलाने वाली औरत ने उनसे कहा कि वे भीतर का केबिन देख लें। केबिन नीचा था, दरवाज़े से घुसने के लिए झुकना पड़ता था। सोने की जगह बस कुछ चौड़े तख्तों की थी, जिन पर रात में पुआल की चटाई बिछाई जा सकती थी। घर के गरम तख्त जैसी बात कहाँ थी। कू छिंग की नज़र पहले तमाम असुविधाओं पर पड़ी। दरवाज़े की देहरी, शौच के लिए घूमकर नाव के पिछले हिस्से तक जाना, खाना ऐन गरम मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं, और नाव डोले तो पानी का कटोरा टिककर नहीं रहता। उसने एक-एक बात पूछी। पूछते-पूछते वह औरत उठ खड़ी हुई और बोली कि अगर ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकतीं तो मत जाओ, कहीं आधे रास्ते में एक-दूसरे को कोसने लगें।
मगर शेन सू ने पूछा कि नाव पर कहाँ पीठ टिका सकती है, रात में पीछे जाने पर कोई दीया दिखाएगा क्या, और क्या वह पैसे देकर पैर रखने का एक पटरा लगवा सकती है। नाव चलाने वाली को सवाल काम के लगे। वह उसे भीतर की ओर एक बिछावन तक ले गई और कुछ देर बैठने दिया। बूढ़ी ने धीरे-धीरे पैर सीधे किए। आधा क पहर बैठकर उठी तो अब भी अकड़न थी। कू छिंग के कंधे का सहारा लेकर ही स्थिर खड़ी हो सकी। उसने नाव को आरामदेह नहीं कहा, मगर इस वजह से तुरंत घर लौटने को भी नहीं कहा।
किनारे पर उतरने के बाद दोनों लकड़ी की पगडंडी के आख़िरी सिरे की ओर चलीं। वहाँ से मोड़ पर पानी दिखता था। पास ही एक खूँटे पर एक चिड़िया बैठी थी जिसका नाम गू छिंग नहीं जानती थी। दादी चिड़िया को देखते हुए कुछ तेज़ चली, मगर आधी ली से पहले ही धीमी पड़ गई। उसने रेलिंग थाम ली और माथे पर पसीना आ गया। गू छिंग उसे सहारा देकर पुल के सिरे की छोटी छतरी तक ले जाना चाहती थी। दादी ने कहा कि पहले ज़रा खड़ी रहेगी, फिर थोड़ी देर खड़े रहने के बाद एक ख़ाली पत्थर पर बैठ गई।
हवा ने उनके सफ़ेद बाल होंठों तक उड़ा दिए। दादी ने हाथ से उन्हें हटाना चाहा, मगर उँगलियाँ इतनी काँप रही थीं कि ठीक से हटा नहीं पाईं। गू छिंग पानी निकाल चुकी थी। उन्हें अब भी अपना दायाँ घुटना मलते देखकर आख़िर बोली, “अगर नानपू पहुँचकर भी ऐसा ही रहा तो क्या करेंगे?”
“तो वहाँ भी ऐसा ही होगा।” शन सु ने साँस सँभाली, “मैंने कब कहा कि दक्षिण पहुँचते ही मुझे नए पाँव मिल जाएँगे।”
गू छिंग ने फिर कुछ नहीं कहा। उकड़ूँ बैठकर दादी के जूते की ढीली डोरी कसकर बाँध दी। उसने कभी दूर आसमान तक फैले कमल के पत्तों की कल्पना की थी और यह भी सोचा था कि दादी ख़ुशी में दर्द भूल जाएँगी। बस यह नहीं सोचा था कि ख़ुशी और दर्द दोनों एक ही पत्थर पर साथ टिक सकते हैं, पूरे के पूरे। डोरी बाँधकर उसने दादी को फ़ौरन उठाने की कोशिश नहीं की। उनके पास बैठ गई और हथेली धूप से गरम पत्थर पर रख दी।
छप्पर के नीचे गरम पानी और गेहूँ की रोटियाँ बिक रही थीं। चूल्हे पर मिट्टी की केतली से भाप उठ रही थी। गू छिंग ने दो कटोरे पानी खरीदा। शन सू ने अपने पैसे निकालने को हाथ बढ़ाया तो गू छिंग ने लगभग उनका हाथ रोक ही लिया था, फिर अपना हाथ खींचकर बस इतना कहा कि इस बार मैं आपको बाहर लाई हूँ, पानी के पैसे मैं दूँगी। दादी मान गईं, मगर बगल का हरे मेई फल बेचने वाला गुज़रा तो ख़ुद उसे रोककर तीन फल खरीदे। सबसे छोटा चुनकर गू छिंग को दिया। उसने लिया और खट्टेपन से उसका चेहरा सिकुड़ गया। शन सू का पूरा चेहरा हँसी से खिल उठा।
पत्थर पर बैठकर पानी पीने भर का आराम लेने के बाद वे रास्ते के छोर तक पहुँचीं। चिड़िया कब की उड़ गई थी, खूँटा खाली था और पानी अब भी बार-बार आकर उससे टकरा रहा था। गू छिंग ने कहा कि पता होता तो थोड़ी देर पहले तेज़ चलतीं। शन सू ने सिर हिलाया, “उसने भी तो मेरा इंतज़ार करने का वादा नहीं किया था।” कहकर वह हँस पड़ीं। उन्हें लगा कि उनकी बात किसी ऐसे बुज़ुर्ग जैसी लगी जिसे लोगों के सामने अपना अनुभव जताने का शौक हो। फिर भी वह खाली खूँटे पर एक और नज़र डालने से खुद को रोक न सकीं।
वापसी की गाड़ी पुल के सिरे पर खड़ी नहीं थी। कुछ दूर और चलना था। गु छिंग ने पहले सोचा कि गाड़ीवान से गाड़ी पास ले आने को कहे। उसने कहा कि आगे कीचड़ नरम है और गाड़ी धँस गई तो और झंझट होगी। गु छिंग ने एक बार दादी को, फिर उस छोटी-सी दूरी को देखा और पूछा कि क्या वह चल पाएँगी। शन सु बोलीं, चल पाऊँगी, ज़रा धीरे चलेंगे। गु छिंग ने फिर दूर देखकर बार-बार हिसाब लगाना छोड़ दिया। बस दादी की टोपी उठा ली और आधे रास्ते में उन्हें एक पेड़ से टेक लगाकर थोड़ी देर रुकने दिया।
घर लौटने के दिन दादी का घुटना सचमुच और दुखने लगा। रात में उठने के लिए बिस्तर के किनारे का सहारा लेना पड़ा। गू छिंग ने पानी गरम किया और गरम पत्थर कपड़े में लपेटा। छूकर देखा कि वह जलाने जितना गरम नहीं है, तभी घुटने के पास रखा। शन सू ने बिस्तर से टिककर कहा कि आज कुछ ज़्यादा चल लीं। इससे न सारी गाड़ियाँ ख़राब हो गईं, न यह साबित हुआ कि वे कहीं जा ही नहीं सकतीं। वे ऐसी बोलीं जैसे डर हो कि गू छिंग इसी एक रात पर फ़ैसला कर लेगी। मगर गू छिंग ने पहले ही कहा, “कल नहीं निकलेंगे। परसों फिर देखेंगे। दूर के सफ़र के लिए ठहरने के कुछ दिन और रखने होंगे।”
दो दिन दादी ने फूल नहीं बनाए और गू छिंग ने भी आज के आराम के बदले कल एक हिस्सा ज़्यादा बनाने की भरपाई नहीं रखी। उसने लुओ यी की अगली खेप के रंग अकेले तय किए। मोटे डंठल श्याओमान तय समय पर पहुँचा गई। श्याओमान ने पूछा, पुल से नज़ारा अच्छा था? गू छिंग बोली, कोई ख़ास बात नहीं थी, बस ज़रा-सा पानी और लकड़ी का एक खाली खूँटा, मगर वहाँ तक चलना काफ़ी थकाने वाला था। भीतर से दादी ने सुन लिया और बोल उठीं कि तीन बेहद खट्टे आलूबुखारे भी थे और गू छिंग ने एक भी नहीं छोड़ा।
पाँच तारीख को गु छिंग फिर दक्षिणी घाट पर किराया पूछने गई। इस बार उसने सिर्फ़ यह नहीं पूछा कि दो लोगों का आने-जाने का कितना लगेगा। उसने पूछा कि क्या शियान में एक दिन रुक सकती हैं, अगली नाव लेने पर पहली का किराया कैसे गिना जाएगा, सस्ता केबिन नाव के पिछले किनारे से कितनी दूर है और रात में पकड़ने के लिए वहाँ रेलिंग है या नहीं। नाववालों ने कहा कि सफ़र टुकड़ों में करने पर सीधे जाने से कुछ ज़्यादा लगेगा और हर बार अंदर की तरफ़ बिछौना मिलना भी पक्का नहीं। उसने सबसे सस्ता विकल्प काट दिया और जो कुछ उसे मंज़ूर थे, उन्हें रहने दिया। यह भी पूछकर तय किया कि एक-दो दिन में नाव न मिली तो किनारे किसी सराय में ठहरेंगी।
वह दो नाव कंपनियों के यहाँ गई थी। लौटकर उसके पास कोई पक्का आश्वासन नहीं था। धारा के साथ पाँच-छह दिन, धारा के विरुद्ध सात से नौ दिन, और मौसम बिगड़ा तो उससे भी ज़्यादा। जहाँ नाव रुकती थी, वहाँ सरायें थीं, मगर हर जगह साफ़-सफ़ाई नहीं थी और हर जगह चूल्हा इस्तेमाल करने को भी नहीं मिलता था। उसने ये बातें दादी को बताईं। दादी ने खुद ऐसी बर्थ चुनी जहाँ रात में किसी चीज़ का सहारा लेकर उठना आसान हो। किनारे का एक नज़ारा कम दिखे तो चलेगा, मगर कुछ पैसे बचाने के लिए आधी रात में उनका पैर खाली जगह पर नहीं पड़ना चाहिए।
पूछते-पूछते गु छिंग ने बरसों पहले मालवाहक नाव पर अपने पिता के साथ हुई बात छेड़ी तो उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। वह अक्सर इसका ज़िक्र नहीं करती थी। डर था कि दादी दुखी होंगी और यह भी कि वह खुद फिर किनारे तक जाने से डरेगी। शन सू ने कहा कि इस बार सवारी की नाव है। उस पर क्या लदा है और कहाँ जाती है, वह सामने की बात देखकर समझो। पुराने हादसे को बार-बार हर नाव में मत भर दो। कहकर दादी ने उसे गरम पानी थमाया। उनकी उँगली एक पल को उससे छुई। उन्होंने यह नहीं कहा कि मन साफ़ हो तो सफ़र सकुशल होगा।
गू छिंग ने केबिन की तंग जगह की नाप लेकर अपने घर के फ़र्श पर रस्सी से उसका नक़्शा घेरा और एक बेंच रखकर दादी से दीवार के सहारे बैठने को कहा। थोड़ी देर में शन सू बोलीं कि पैरों के नीचे खाली है, कुछ टिकाने को चाहिए। वह पुरानी लकड़ी की पेटी लाई, वह ऊँची थी। छोटी ईंट रखी, वह नीची थी। आख़िर में पेटी की ऊपरी तख़्ती निकाल दी। पैर मज़बूती से टिके, तब जाकर कमर अधर में रहना बंद हुई। खिड़की के पास सामान में जाने वाली मोटी लपेटी रज़ाई भी उसके अनुमान से आधी पतली करनी पड़ती, तभी टाँगें रखने की जगह बचती।
आज़माते-आज़माते दोनों ने आधे कमरे को बिना पानी की नाव बना दिया। छन चाची आईं तो पहले फ़र्श पर पड़ी रस्सी लाँघी और पूछा, किनारा किस तरफ़ है। शन सु ने कटोरा उठाकर कहा, पानी पीना है तो पहले नाव का किराया दो। छन चाची ने सचमुच एक सिक्का उछाला जिसे गु छिंग ने हथेली में पकड़ लिया। हँस लेने के बाद वे उसी बेंच पर बैठकर नापने लगीं कि रात में करवट बदलने के लिए कितनी जगह चाहिए। शन सु ने मेज़ का कोना पकड़ने को हाथ बढ़ाया तो गु छिंग ने काग़ज़ पर लिख लिया कि रात में उस तरफ़ हाथ टिकाने की जगह होनी चाहिए। इस हँसी को उसने इस बात का सबूत नहीं माना कि एक बार आज़माया और सब ठीक है। रस्सी उठी तो फ़र्श पर धूल की एक पतली लकीर रह गई, मगर दादी के पाँवों के नीचे वाला छोटा किया हुआ लकड़ी का बक्सा वहीं रहा। गु छिंग ने बाहर निकली कीलों की नोक हथौड़े से समतल की, दोनों कोने कपड़े से लपेटे और दादी से उस पर एक बार फिर पाँव रखवाया। तब उसे साथ ले जाने वाले सामान में रखा।
छह तारीख की साँझ को वे फिर नगरद्वार के बाहर आधी ली से कुछ कम चलीं। इस बार गाड़ी नहीं ली। एक विलो के पास पहुँचकर रुक गईं। दादी बैठ गईं और गु छिंग पास की दुकान से एक छोटा पीढ़ा माँग लाई, जिसे घर लौटने से पहले पहले की तरह वापस कर दिया। हवा लूवान वाले दिन से गरम थी। दादी ने खुद घुटने की पट्टी आधा घेरा ढीली की। गु छिंग उसे फिर कसकर बाँध देना चाहती थी, लेकिन उन्हें पैर फैलाकर हिलाते देखा तो पीढ़ा गोद में लिए इंतज़ार करती रही।
उस रात खाने के समय शन सू ने अपनी पैसों की थैली मेज़ पर रखी। उसे उलटा नहीं, बस कू छिंग से कहा कि हाथ लगाकर देखे, कितनी भारी है। बोली कि सफ़र पर निकलेंगे तो यह उसके अपने ख़र्च के लिए है, इसे यूँ मत समझना कि वह घर में इस्तेमाल होने से बचाने के लिए पैसे छिपा रही है। कू छिंग की उँगलियाँ सिक्कों की लड़ी से छुईं तो उसे वे तमाम मौक़े याद आए जब उसे लगा था कि सारा बोझ उसी के कंधों पर है। उसने थैली वापस सरका दी और कहा कि अभी अपनी-अपनी थैली सँभालकर रखते हैं, जिस दिन सफ़र का ख़र्च गिनेंगे उस दिन दोनों साथ निकाल लेंगे।
सातवीं को लुओ यी दूसरी खेप के दस फूल जाँचने आई। गु छिंग ने डिब्बे का ढक्कन खोला। अंकुर जैसा हरा रंग पहली खेप से कुछ हल्का था; पहले जाँच चुकी थी कि रंग नहीं उतरता, बकसुए के पीछे की छोटी नोक भी कहे अनुसार बदल दी थी। लुओ यी ने देखकर फूल ले लिए और दो सौ वन दिए। गु छिंग ने श्याओमान के काम के पारिश्रमिक और अगली खेप की सामग्री के पैसे अलग किए, तब शेष यात्रा की थैली में रखे। लूवान जाने में लगे अतिरिक्त गाड़ी-भाड़े का उसे पछतावा नहीं था, मगर उस रात अलग से ख़रीदे गरम पानी और अगले दिन छोड़े काम के समय को एक ओर दर्ज किया। मुड़कर देखा तो दादी फूलों वाली टोपी पहने छोटी बाँस की चिक के पीछे बैठी थी। उँगलियाँ टोपी के किनारे-किनारे छिपे बकसुए तक ले गई, ख़ुद खोला और फिर बंद कर दिया।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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