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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास

दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी

कू वूजी · AI सृजन · 8554 अक्षर · लगभग 12 मिनट

आ सुई दवा की दुकान पहुँची तो पहले पुराने दरवाज़े के चारों ओर नज़र दौड़ाई। किनारे की लकड़ी की रेखाएँ घिसकर चमक रही थीं। एक कोने से रंग उखड़ा था। उसे लगा कि बदलना तो बस इतना-सा हिस्सा है। उसके बेटे का बनाया बड़ा नक़्शा असल दरवाज़े से कहीं ज़्यादा रोबदार लगा। उसने हाथ उठाकर दरवाज़े की चौड़ाई का अंदाज़ लिया तो पास खड़ी दवा लिए एक औरत ने पूछा कि क्या उसे अंदर जाने का रास्ता नहीं मिल रहा।

उसने झट हाथ नीचे करके कहा कि वह अंदर के एक आदमी को जानती है। कहते ही लगा कि कुछ बढ़कर कह दिया। श्यू शन यहाँ बस दरवाज़ा बना रहा था, उसे भीतर का आदमी भला कैसे गिनें। आवाज़ सुनकर दुकान का नौकर आया तो उसने घुटने पर पड़े पुराने कपड़े का एक कोना उठाया और धीमे से कहा कि वैद्य को दिखाने आई है। नौकर ने बैठने को कहा, आगे दो लोग और थे। वह बैठ गई और फिर बेटे का नाम नहीं लिया।

जब उसकी बारी आई तो वैद्य छी ने पहले पूछा कि दर्द को कितने साल हुए। वह कहने वाली थी कि कुछ ही साल, फिर सोचकर उस साल के आस-पास से गिनने लगी जब श्यू पो का देहांत हुआ था। आधी गिनती पर एहसास हुआ कि उसे कब का याद नहीं कि पहली बार किस बर्फ़बारी के दिन दर्द उठा था। बस इतना जानती थी कि हर सर्दी में चौकी चूल्हे के पास रखनी पड़ती है और उठने से पहले कुछ पकड़ना पड़ता है। सिर्फ़ यह पूछें कि आज कल से कैसा है तो वह बता सकती है। मगर पूछें कि बीमारी आख़िर किस दिन शुरू हुई, तो यह ऐसा था जैसे कोई पूछे कि चौखट किस एक कदम से घिसकर पुरानी हुई।

वैद्य ने उसकी बात सुनी, उसे कुछ क़दम चलते देखा और पूछा कि क्या वह रोज़ पानी ढोती है। उसने कहा, ज़्यादा नहीं। फिर याद आया कि यहाँ आने के कुछ ही दिन बाद उसने सचमुच भरी बाल्टी उठाई थी, तो झट बात बदलकर कहा कि अब पानी लाने वाला है। वैद्य छी ने उसकी बात नहीं पकड़ी। बस कहा कि काम से छुट्टी का मतलब दिन भर बैठे रहना नहीं, और चल पाने का मतलब यह नहीं कि बोझ भी उठा सकती हो। आसुई को लगा कि एक बात बेटे को सुनाना आसान है और दूसरी उसे अपने तक ही रखनी होगी।

वह पूछना चाहती थी कि शहर का कमरा गरम है, तो क्या यह सर्दी उसमें गुज़ार लेने के बाद दर्द चला जाएगा। पूछने से पहले ही वैद्य ने उसके पुराने कपड़े की ओर इशारा करके कहा कि इन दिनों घुटने का ख़याल रखो। ठंड और सीलन में शायद दर्द फिर उभरे। एक बार की दवा से बरसों की तकलीफ़ मिट जाने की उम्मीद मत बाँधो। उसका मन कुछ बुझ गया। उसने घुटने पर बाहरी कपड़ा खींच लिया, जैसे उस थोड़ी-सी निराशा को भी ढक देना चाहिए।

गद्दी के पीछे कोई कागज़ की पुड़ियाएँ तौल रहा था, तराज़ू की डंडी हल्के उठ-गिर रही थी। आ सुई ने पूछा कि जाँच और दवा का पैसा दरवाज़े के काम के साथ हिसाब में जोड़ सकते हैं क्या। झोउ तोंग तभी भीतर से निकला। सुनकर पूछा, वह किस परिवार की है। तब उसने श्यू शेन का नाम बताया। झोउ तोंग हँसा और गद्दी वाले को स्पष्ट किया: दरवाज़ा अलग, दवा अलग, वरना बाद में किसने क्या चुकाया, यही समझ नहीं आएगा। वह भी हँसी और बार-बार बोली कि भूलने का डर था, मुफ़्त लेने की इच्छा नहीं; मगर हाथ पहले से तेज़ी से थैली में सिक्के चुनने लगे।

बगल में बैठी लगभग उसी उम्र की एक औरत ने उसकी ओर देखा, मगर हँसी नहीं। उसने गहरे हरे रंग की पुरानी जैकेट पहन रखी थी, जिसकी आस्तीन के मुहानों पर दूसरे कपड़े की पट्टी लगी थी। पैरों के पास एक उथली टोकरी थी। उसमें सुई-धागे काग़ज़ से अलग-अलग रखे थे, छोटी से छोटी चीज़ भी सलीके से। अपनी बारी आने पर उसने पहले अपनी तकलीफ़ पूरी बताई, फिर पूछा कि दवा की पुड़िया पर कौन-सा निशान दिन की ख़ुराक का है। ठीक से समझकर ही गई। उसने सारे अक्षर पहचानने का दिखावा नहीं किया।

दरवाज़े से निकलते हुए दोनों का फिर आमना-सामना हो गया। उस औरत ने पूछा, क्या वह नानहुआइ गली में अभी-अभी आई है? कल उसने उसे एक बूढ़े कुत्ते को साथ लिए देखा था। आ सुई ने सिर हिलाया और साथ ही कहा कि कुत्ता बहुत बूढ़ा है, किसी को काटता नहीं। औरत ने कहा, मैंने यह नहीं पूछा कि काटता है या नहीं। मैंने तो देखा कि उसका एक कान मुड़ा है, जैसे अभी-अभी किसी ने उसे सहलाया हो। आ सुई को इस बात पर हँसी आ गई। उसने उसका कुलनाम पूछा। उसने कहा, कू। घर में पहले आ छिन कहते थे और बुढ़ापे में भी कोई-कोई अब तक यही कहता है।

गू छिन नदी किनारे आधे दिन के लिए सुइयों का ठेला लगाने जा रही थी। आ-सुई ने आसमान देखा। अभी जल्दी थी और बेटा दोपहर में आएगा या नहीं, यह तय भी नहीं था। उसने पूछा कि क्या कुछ दूर साथ चल सकती है। गू छिन ने कहा कि पहले सन का धागा ख़रीदना है, बस किसी के साथ टहलने नहीं जा सकती। आ-सुई ने कहा कि उसे जल्दी नहीं है, इसी बहाने देख लेगी कि शहर का सन का धागा पहाड़ से महँगा है या नहीं। दोनों छोटी सड़क की ओर मुड़ीं और अपने-अपने दवा के पुड़े कपड़ों के भीतर छिपा लिए, जैसे नहीं चाहती हों कि आधे दिन की पहली पहचान वही बन जाएँ।

धागे के ठेले पर कई रंग थे। आ-सुई ने एक लच्छी उठाई और उसमें बहुत-से जोड़ देखकर हाथ हल्का कर लिया। तुरंत तारीफ़ नहीं की। गू छिन ने पुराने सफ़ेद धागे की बस दो रीलें चुनीं। दुकानदार ने कहा, नया नीला खूब बिकता है। उसने कहा, सुंदर है, मगर कोई नीले धागे से कपड़ा सिलवाना भी तो चाहे। मेरी टोकरी में दो रीलें अब तक अछूती पड़ी हैं। आ-सुई को उसका बातों में न आना अच्छा लगा, पर उसने कहा नहीं। अगर दुकानदार ने उसी तरह उसे समझाया होता तो शायद वह अब तक बेटे के लिए एक लच्छी और ख़रीद चुकी होती।

नदी के किनारे पहुँची तो पानी का फैलाव उसकी सोच से ज़्यादा था। दूर से आए यात्रियों की कोई बड़ी नाव नहीं थी। जलावन से लदी एक छोटी नाव तिरछी किनारे लगी थी। दो आदमी आगे-पीछे खड़े लकड़ियाँ उतार रहे थे। डालियों पर भीगे पत्ते थे। एक पत्ता गिरा और हल्की धार उसे पत्थर की सीढ़ियों तक धकेल लाई। आ सुई रुककर देर तक देखती रही। गू छिन ने टोकरी रखी, तह होने वाली चौकी खोली और पूछा कि जब जी भरकर देख लो तो क्या मेरी गाँठ पड़ी डोरियाँ छाँटने में हाथ बँटाओगी।

उसने कहा, हाँ, और बैठते हुए फिर नदी की ओर मुड़कर देखा। ठंडी हवा पायचों के भीतर घुस रही थी और दवा का कागज़ भी जैसे उसके साथ ठंडा हो गया था, फिर भी उसका मन तुरंत कमरे में लौटने का नहीं था। आने-जाने वालों से जिस नदी की बातें वह इतने समय से सुनती आई थी, वह आखिर अब किसी और की ज़बान पर नहीं थी। असल में वह खुद भी कुछ ज़्यादा बोलना नहीं जानती थी, बस लहर-दर-लहर उसके सामने से बहती जाती थी। वह धीरे-धीरे धागों के सिरे सुलझाती रही। कभी कोई पक्की गाँठ हाथ आती तो कू छिन को उठाकर दिखाती और पूछती, इसे रहने दें क्या?

कू छिन के पास एक ग्राहक आया तो उसने पहले मोटे कपड़े का एक थैला रफ़ू किया। आदमी को जल्दी थी। उसने कहा कि टाँके बराबर हैं या नहीं, इसकी फ़िक्र मत करो, बस सामान रख सकूँ। उसने फटाफट मुँह की सिलाई पूरी की, थैला पलटकर उसे खुद खींचकर देखने को दिया, फिर पैसे लिए। आ सुई को देखते हुए कुछ कसक हुई। अपने इन्हीं हाथों से वह पहाड़ में दूसरों की चीज़ें रफ़ू करती थी और अक्सर कहती थी, बस ले आना। लोग चीज़ वापस लेते तो अक्सर कहते कि अगली बार कुछ ले आएँगे। कू छिन के यहाँ काम पूरा होने की एक साफ़ खनक थी।

वह कहना चाहती थी कि यह काम उसे भी आता है, मगर मुँह तक पहुँचते-पहुँचते बात फिर बेटे के हुनर की हो गई। गू छिन ने सुनकर पूछा कि तुम्हारे बेटे के हुनर का तुम्हारे इस धागे से क्या लेना-देना है। सवाल इतना सीधा था कि आसुई का चेहरा एकाएक गरम हो गया। गू छिन उसके सुलझाए धागे से सुई पिरोने लगी और जवाब का इंतज़ार नहीं किया। आसुई ने सिर झुकाया, सबसे उलझी छोटी गुच्छी अलग की और साँस रोके कुछ देर उसे सुलझाती रही। वह पहले से भी ज़्यादा साफ़ सुलझ गई।

दोपहर को श्यू शन एक मटकी गुनगुना शोरबा लेकर नानहुआई गली लौटा। माँ के कमरे का दरवाज़ा बंद था। भीतर हुआंगदोउ ने उसकी आहट सुनी और दो बार कूँ-कूँ की। श्यू शन ने माँ को पुकारा, कोई जवाब नहीं आया। उसने दरवाज़ा धकेला। पहले देखा कि बिस्तर के कोने वाली सुई की टोकरी खिड़की के नीचे नहीं थी। दिल एकाएक कस गया, फिर दिखा कि टोकरी बस खिसकाकर दराज़ के पास रख दी गई थी। आसुई की ऊपर पहनने वाली बंडी भी वहाँ नहीं थी। साफ़ था कि वह बाहर गई थी, पहाड़ पर फिर से रहने नहीं चली गई थी।

फिर भी उसने पहले फ़ांग गुइन्यांग से पूछा, मेरी माँ को देखा है? फ़ांग गुइन्यांग चावल की बोरी उठा रही थी। उसने बताया कि सुबह उन्हें निकलते देखा था, शायद दवा की दुकान गई हों। शू शन सूप रखकर चल दिया, फिर कुछ क़दम बाद लौट आया और कमरे का दरवाज़ा उढ़का दिया कि कुत्ता कहीं भाग न जाए। मन में वह मान नहीं रहा था कि उसे चिंता हो रही है, मगर माँ के मिलते ही कहने को तैयार था कि जहाँ भी जाना हो, कम से कम किसी से कहकर तो जाया करें।

माँ दवा की दुकान में नहीं थी। नौकर ने कहा कि बुज़ुर्ग गू अम्मा के साथ कब की चली गईं। गू अम्मा अक्सर नदी किनारे होती हैं। श्यू शन एक और सड़क की ओर मुड़ा। रास्ते में पीछे से कोई वैसा ही दिखा तो कुछ क़दम तेज़ चला, फिर समझा कि पहचानने में भूल हुई। औरत ने मुड़कर पूछा कि क्या उसे बुला रहा था। उसने सिर हिलाया और चाल धीमी हो गई। अचानक उसे लगा कि शहर में माँ की उम्र के इतने लोग हैं और उसने कभी ग़ौर ही नहीं किया कि उनमें से किसे कोई और भी ढूँढ़ रहा होगा।

जब वह नदी किनारे पहुँचा, गू छिन पानी पी रही थी और आ सुई उसकी टोकरी में कपड़े का एक कोना थामे थी। हवा उसे उड़ाती तो वह हाथ की पीठ से समतल कर देती। शू शन कुछ कदम दूर खड़ा रहा। सबसे पहले उसने माँ को हँसते देखा। पता नहीं वह गू छिन से क्या कह रही थी। आँखों के कोनों की सारी लकीरें एक जगह सिमटीं और उसने झट सिर झुका लिया, मानो डर हो कि हँसी में सिलाई भी टेढ़ी हो जाएगी। शू शन जो कुछ कहने की तैयारी करके आया था, उसे बीच में रखने की कोई जगह अचानक नहीं मिली।

आ-सुई ने उसे देखा तो हँसी थम गई। पहले पूछा कि दुकान में कोई बात हुई है क्या। श्यू शन ने कहा कि उसके लिए सूप लाया था, मगर कमरे में कोई नहीं था। उसने दवा का पुड़ा निकालकर कहा कि वैद्य ने दिन भर बैठे रहने से मना किया है और कहा है कि धीरे-धीरे ज़्यादा चला करे। बात सच थी, मगर वैद्य की पूरी बात नहीं थी। ‘हवा कम लगने देना’ वाली हिदायत, जो अभी कहने को बाकी थी, उसने अपने तक रखी। कपड़े का कोना पहले की तरह दबाए रखा। बेटे को देखते ही वह किसी ग़लती करने वाले की तरह खड़ी नहीं होना चाहती थी।

गू छिन थोड़ा खिसकी और पूछा कि श्यू शन बैठेगा क्या। वह बैठने की हिम्मत कैसे करता, रन छ्वान लकड़ी के उन दो टुकड़ों का इंतज़ार कर रहा था। उसने देखा कि माँ के पास की चौकी स्थिर है और राह भी दूर नहीं। आखिर बस इतना कहा कि सूप कमरे में है, लौटकर ज़रा गरम कर लेना, ठंडे पानी की तरह मत पी लेना। आ-सुई ने कहा कि जानती है, ठीक उतनी ही आवाज़ में जितनी पिछली रात घर से निकलते वक्त उसकी थी। उसे सुनकर लगा कि अब वह खुद ऐसा आदमी बन गया है जो और हिदायतें देना चाहता है, मगर जिसके पास उसके लिए वक्त ही नहीं।

जाने से पहले उसने माँ से कहा कि अब और बाहर की ओर मत बैठना, नदी की हवा ठंडी है। फिर उसने बेंच दीवार की छाया में खिसका दी। गू छिन ने देखा कि बेंच का पाया उसकी टोकरी से लग रहा है, सो टोकरी खींच ली और इस पर कुछ भी नहीं कहा। बेटे के दूर जाते ही आ सुई ने बेंच आधी घुमा ली। नदी अब भी दिखती थी और हवा भी पूरी नहीं लगती थी। गू छिन ने देखा, सिर झुकाकर सुई उठाई। उसके होंठों पर जैसे हल्की-सी मुस्कान थी। उसने फिर नहीं पूछा कि किसे किसकी बात माननी चाहिए।

कमरे की ओर लौटते हुए आसुई की चाल धीमी पड़ गई। अभी वह बैठी ही रह गई थी और उठते वक़्त सुबह से भी ज़्यादा दर्द हुआ था। उसने गू छिन से कुछ नहीं कहा, बस भाप में पकी रोटी के ठेले पर ज़रा देर नज़र टिकाए रखी। गू छिन ने खुद आधी रोटी खरीदी और कहा कि चलते-चलते थक गई है, तुम्हारी इस दीवार के सहारे ज़रा बैठ लूँ। आसुई ने उसकी बात नहीं खोली, साथ बैठ गई। रोटी का एक छोटा कौर लिया तो पता चला कि उसे भी कब से भूख लगी थी।

दोपहर बाद मटकी का सूप लगभग ठंडा हो चुका था। उसने पहले खुद आग जलाकर उसे गरम किया। छोटे चूल्हे के मुँह पर पड़ी सूखी लकड़ियों को देखते हुए सोचा कि पहाड़ पर होती तो यह आधा दिन भी यूँ ही बीत जाता: झाड़ू लगाना, खाना बनाना, कोई आए तो एक कटोरा और भर देना, कोई न आए तो आग के पास बैठकर धीरे-धीरे इंतज़ार करना। आज वह बस एक बार बाहर गई थी, कुछ कमाया भी नहीं था। मगर उसे याद था कि दूसरी बूढ़ी औरत टाँका लगाने से पहले कपड़े के मुँह को थोड़ा खींचती है, और यह भी कि नदी एक गीली टहनी का पत्ता बहाए ले जा रही थी और रुकने को तैयार नहीं थी।

खिड़की के नीचे से धूप खिसकने लगी। आ सुई ने धागा नीचे कर दिया और आख़िरी बची रोशनी में बारीक सुई पिरोने की ज़िद छोड़ दी। मेज़ के किनारे बेटे की लाई आधी रोटी बची थी। चीनी के सारे कण काग़ज़ में झर गए थे। उसने एक कौर खाया और सारी रोटी बचाकर नहीं रखी। हुआंगदोउ पास आया तो उसने उसकी नाक थपकी देकर दूर की और कहा कि यह टुकड़ा तुम्हारे लिए नहीं है। कुत्ता समझा नहीं, लेटकर फिर सिर उठाया। वह गुनगुने सूप का कटोरा थामे पहले ख़ुद धीरे-धीरे सारा पी गई।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. वह दक्षिणमुखी कमरा
  2. दहलीज़ तक बर्फ़
  3. तीसरा कटोरा
  4. दरवाज़े का पल्ला गिरने से पहले
  5. दोराहे पर काले अक्षर
  6. दोपहर बाद शहर का फाटक
  7. आँगन में उधार ली हुई आग
  8. बराबर कीमत का एक दरवाज़ा
  9. दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी
  10. रास्ते की तख्ती का दूसरा रुख़
  11. सुइयों की टोकरी के पास दो हाथ
  12. बर्फ़ का पानी दक्षिणी दीवार में रिस गया
  13. गाँव लौटने पर बैठने की जगह
  14. नाप की पट्टी पर छूटा एक निशान
  15. दरवाज़े के नीचे वह हाथ
  16. माँ ने उसकी ओर से जो कहा
  17. चाय के छप्पर में दरवाज़े की लकड़ी का ढेर
  18. वह छोटी राह जिससे गाड़ी नहीं गुज़र सकती
  19. पिछला आँगन किसका है
  20. एक काँवड़ माल, दो रस्सियाँ
  21. दाश्यू हाँडी उठाकर ले गई
  22. वह चौकी जिस पर कोई नहीं बैठा
  23. पुराने घर का वादा किसने किया
  24. नए दरवाज़े को बारिश में रखना
  25. वह कमरा जो अभी छोड़ा नहीं गया
  26. बढ़ई की दुकान में छूटी कंघी
  27. पट्टी पर किसी का नाम नहीं
  28. गरम कमरा दवा नहीं है
  29. दुआनवू से पहले का वह न्योता
  30. सुइयों की वह टोकरी जो बिकी नहीं
  31. चाय के छप्पर के अपने दिन
  32. पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा
  33. किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए
  34. भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा
  35. दरवाज़ा उन लोगों के लिए ठीक करो जो जीते हैं
  36. धूप कहाँ तक ढली

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