प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास
आँगन में उधार ली हुई आग
कू वूजी · AI सृजन · 8279 अक्षर · लगभग 11 मिनट
दसवीं की सुबह, आग जलाते समय आ सुई पहले चूल्हे का मुँह ग़लत ओर ढूँढ़ने लगी। छोटी कोठरी में चूल्हे का मुँह बाईं ओर था, गाँव वाला दाईं ओर खुलता था। वह बैठी तो हाथ की आग पकड़ाने वाली लकड़ी दीवार से टकराई। वह पहले ख़ुद हँसी, फिर हँसने के बाद देखा कि श्यू शन की सोने वाली चटाई लपेटी जा चुकी है। बेटा आँगन में मुँह धो रहा था। वह बहुत धीरे पानी गिरा रहा था, मानो डर हो कि सुबह-सुबह ही लोगों को उन्हें कमरा किराए पर देने का पछतावा न हो जाए।
उसने कहा कि कुछ गरम खाकर जाओ। श्यू शन ने सिर अंदर करके चूल्हा देखा और कहा कि वक़्त नहीं है, दुकान में लकड़ी काटना शुरू करना है। उसने सुइयों की टोकरी के पास कपड़े की एक छोटी पोटली रख दी। उसमें ख़रीदे हुए भाप के पीठों में से कुछ बचे थे। उसने कल का पानी भी फिर भर दिया। आ सुई कहना चाहती थी कि वह ख़ुद पानी भर सकती है। मगर उसके हाथ की पीठ पर बँधा साफ़ कपड़ा देखकर उसने बात वापस ले ली और बस पूछा कि दोपहर को आओगे क्या।
“काम निपटे तो देखूँगा।” उसने कहा।
यह न कोई निश्चित घड़ी थी, न न आने की बात। आ सुई ने इसे कानों में सँभालकर रखा, जैसे ऐसा लंबा धागा टिका दिया हो जिसे किस सुई में पिरोना है, मालूम न हो। श्यू शेन आँगन से निकला, तो हुआंगदोउ दरवाज़े तक दो क़दम पीछे दौड़ा। नीचा तख़्ता आड़े आया, तो उसने दरार में नाक डालकर सूँघा, फिर उसके पैरों के पास लौटकर लेट गया। इस बार वह भौंका भी नहीं। आ सुई को लगा, उसने अच्छी तरह बहला लिया है। दरवाज़ा खोलकर कुछ देर धूप में लेटने देना चाहती थी, तभी सामने के कमरे से बच्चे के निकलने की आवाज़ सुनी और वह हिली नहीं।
बड़ी देगची आँगन के साझा चूल्हे पर थी। वह उसे लेने गई तो देखा कि चूल्हे पर भीगे चावल की एक परात पहले से रखी थी और भीतर आग भी जल रही थी। फांग गुइन्यांग चावल की मिल से लौटीं और बोलीं कि इस देगची का पानी चावल की छलनी गरम पानी से धोने के लिए है, इसमें चावल मत डालना। आ सुई ने झट अपनी छोटी देगची हटाकर चूल्हे के दूसरे मुँह पर रखना चाहा। वहाँ पहले से एक टपकती हुई लकड़ी की परात धरी थी। चूल्हे का एक चक्कर लगाकर ही उसे समझ आया कि शहर में घर पास-पास होने से चूल्हे हर वक्त सबके लिए काफ़ी नहीं हो जाते।
दू यिन पूरब वाले कमरे से दो मोटे कपड़े गोद में लिए बाहर आई। आज वह कल से कुछ कम उम्र की लग रही थी। जूड़े में काँटा ठीक से नहीं लगा था और कान के पास धागे का एक सिरा दबा था, शायद रात को निकालने की फ़ुरसत नहीं मिली थी। उसने लकड़ी का तसला हटाकर कहा कि पानी अभी हल्का गुनगुना ही है और उसे कोई जल्दी नहीं। आ सुई ने शुक्रिया कहा, पतीली चढ़ाई और उसकी मेहनत की तारीफ़ की। उसकी नज़र मगर दोनों कपड़ों की अलग-अलग आस्तीनों पर थी। एक मर्द का था, एक औरत का।
“ग्राहकों के हैं, धोने के लिए,” दू यिन ने कहा।
आ-सुई ने ‘हूँ’ कहा, जैसे वह पहले से जानती थी। फिर पूछा कि घर में कितने लोग हैं। दू यिन ने लकड़ी की चिमटी से आस्तीन की तह झटकी और कहा कि पिता पीछे वाले मुहल्ले में रहते हैं, वह यहाँ काम लेती है और दोनों जगह अपना-अपना खाना बनता है। आ-सुई इससे नहीं समझ पाई कि उसका पति है या नहीं, तो चावल नापने चली गई। पानी उबला तो उसने जान-बूझकर आधी करछी और डाल दी। कहा, जब आग उधार ली है तो नाश्ता भी साथ करेंगे।
दू यिन पहले मना करना चाहती थी। उसके हाथ में पकड़ी आस्तीन से अब भी पानी टपक रहा था, तब तक आ सुई कटोरी भर चुकी थी। उसने कपड़ा टाँगा और अपने दरवाज़े के पास चौकी पर बैठ गई। पहले कटोरी ठीक से थामी और आ सुई के कमरे में नहीं गई। आ सुई को लगा कि वह कुत्ते से डरती है। झट बोली कि हुआंगदोउ पिछली रात बहुत शांत था, जब वह ख़ुद रात में उठी तब भी नहीं भौंका। दू यिन ने सिर हिलाया, एक घूँट लिया और कहा कि अचार की मूली बड़ी कुरकुरी है। आ सुई जैसे फिर कोई डिब्बा खुल जाने पर बोलने लगी कि पहाड़ में कौन-सी मूली देर तक टिकती है।
दलिये का कटोरा ख़ाली होने को था कि बात आख़िर श्यू शन पर आ गई। काम करते समय उसे कभी नींद का पता नहीं चलता था। हाथ में रंदा हो तो दूसरे चाहे कुछ कहें, उसे सुनाई नहीं देता। कुछ साल पहले एक बार बुख़ार में भी उसने कुछ नहीं कहा। रन परिवार के उस्ताद ने किसी से ख़बर भिजवाई, तब पता चला कि बीमार है। कहते-कहते आ सुई को ख़ुद लगा कि वह बेटे के गुण ही गिनाए जा रही है। तो उसने जोड़ा कि कभी-कभी उसका मिज़ाज अड़ियल भी हो जाता है, बिल्कुल अपने बाप जैसा।
दू यिन ने चम्मच से कटोरे के किनारे लगा थोड़ा-सा चावल खुरचा और पूछा कि शू शन आज भी दवा की दुकान का दरवाज़ा बना रहा है क्या। आ सुई ने तुरंत सिर उठाया और कहा कि हाँ, उस तरह के बड़े दरवाज़े बनाने में उसका हाथ हमेशा पक्का रहा है। उसने अब तक वह दरवाज़ा देखा भी नहीं था, पर उसके स्वर में बड़ा भरोसा था। दू यिन ने कहा कि उसे मालूम है उसके हाथ में हुनर है। दो साल पहले उसके पिता की किताबों का खाना उसी ने सुधारा था। इतना कहकर उसने कटोरा धोया और दरवाज़े के पास वापस रख दिया। शू शन कितना मिलनसार है, इस पर वह आगे कुछ नहीं बोली।
आ सुई को थोड़ी निराशा हुई। फिर लगा कि दू यिन नपी-तुली बात करती है, तो वह उसे और भी अच्छी लगी। उसने पूछा कि ऐसी लड़की को क्या घरवाले शादी के लिए नहीं कहते। दू यिन के हाथ की कटोरी एकाएक तसले के किनारे से टकराई। चोट हल्की थी, मगर आवाज़ साफ़ थी। उसने कपड़े से कटोरी पोंछकर कहा कि पहले कहते थे, फिर सब अपने-अपने काम में लग गए और बात बंद हो गई। आ सुई पूछने ही वाली थी कि बंद क्यों हुई, पर दू यिन कपड़े टाँगने उठ चुकी थी। भीगा कपड़ा फैला तो बची हुई आधी बात हवा में उसके उस पार रह गई।
दोपहर बाद आ सुई को पता चला कि उसके पास चावल ख़त्म हो गए हैं। जो आधी छोटी बोरी वह लाई थी, उससे पहाड़ पर दो दिन चल जाते। कल रात एक बार ज़्यादा पका लिया और आज सुबह एक कटोरा और डाल दिया। बोरी की तली में बस कुछ दाने बचे थे। उसने बोरी उलटकर थपथपाई तो बारीक धूल का एक घेरा उठा। उसे लगा कि उसकी नई ज़िंदगी की राह सबसे पहले इतनी छोटी-सी बात ने रोक ली है। बेटा लौटा नहीं था, आँगन में किसी के पास फ़ुर्सत नहीं थी। वह आते ही लोगों का दरवाज़ा खटखटाकर यह-वह पूछना नहीं चाहती थी। पहले कमरे में लौटकर उसने सिलाई की टोकरी टटोली।
मगर सिलाई की टोकरी में भी चावल नहीं थे। वह दक्षिण वाली खिड़की के नीचे बैठी रही। बाहर से अनाज नापने के बर्तनों की आवाज़ बार-बार आ रही थी। उसे मालूम था चावल की दुकान पास ही है, फिर भी मन में एक ऐसी झिझक उठी जो बरसों से महसूस नहीं हुई थी। कोई अनजान पूछे कि कितने शंग चाहिए, तो उसे क्या पता कि शहर के शंग या दोउ में उसके घर का लकड़ी का कटोरा कितनी बार भरता है। पैसे गिनने में ग़लती हो जाए और कोई हँस दे, तो उसे रोज़ उसी दरवाज़े के सामने से गुज़रना पड़ेगा।
तू यिन कपड़े समेटने लौटी तो उसने आ सुई को ख़ाली कपड़े का थैला लिए दरवाज़े पर खड़े देखा। आ सुई ने पहले पूछा कि नदी किस तरफ़ है, फिर चावल की दुकान का भी पता पूछ लिया, जैसे चावल लेना तो बस रास्ते का एक छोटा-सा काम हो। तू यिन ने थैले को देखा, अपनी पैसों की थैली उठाई और कहा कि उसके यहाँ भी थोड़ा कम है, चलो साथ चलते हैं। इस बार आ सुई ने टाला नहीं। उसने दरवाज़े पर ताला लगाया। पीछे हुआंगतोउ ने नाक से किवाड़ को छुआ, तो उसने दरवाज़े के पार से कहा कि जल्दी लौटेगी, दूर नहीं जा रही।
चावल की दुकान का बूढ़ा मालिक सचमुच ऊँचा सुनता था। आ सुई ने पहले अपनी आम आवाज़ में कहा। दुकानदार को ठीक से सुनाई नहीं दिया। उसने ऊपर रखे नाप के बर्तन की ओर इशारा कर पूछा कि एक दोउ चाहिए क्या। उसने झट सिर हिलाया। उसने फिर पूछा, बाजरा या सफ़ेद चावल? कुछ बातें ऐसे ही एक-दूसरे को काटती निकल गईं। पास खड़ी दू यिन हँसी तो आ सुई का चेहरा भी लाल हो गया। आख़िर उसने आवाज़ ऊँची करके कहा कि पहले उतना तौल दो जितना मैं उठाकर ले जा सकूँ, पूरा दोउ नहीं चाहिए।
यही बात दुकानदार ने उलटे पूरी सुन ली। उसने उसके घुटने पर एक नज़र डाली, छोटा मापपात्र लिया और पूछा कि इतना काफ़ी होगा क्या। चावल के दाने सरसराते हुए गिरे तो आ सुई का मन अचानक शांत हो गया। दरअसल पूरा कमरा उसे हँसने के लिए नहीं बैठा था, और न किसी ने यह मान रखा था कि पहाड़ की बूढ़ी औरत को हर बात आनी ही चाहिए। पैसे देते समय वह अब भी धीरे गिन रही थी; दुकानदार बस हाथ बाँधे इंतज़ार करता रहा। दू यिन ने पिता का ज़िक्र किया तो उसने यह भी पूछा कि पुरानी किताब की सिलाई ठीक हुई या नहीं।
लौटते हुए दू यिन ने हरे साग की एक गड्डी और खरीदी। चलते-चलते बड़ी फुर्ती से बाहर की पत्तियाँ तोड़ती गई। आसुई ने उसे थाम लेना चाहा, पर दू यिन ने नहीं दिया। कहा कि यह गड्डी हल्की है। उलटे एक छोटी डंठल उसकी ओर बढ़ाई कि चखकर देखो, कोमल है क्या। आसुई ने चबाया। ज़रा तीखी थी। बोली कि शहर वालों को भी पहाड़ के लोगों से बेहतर साग चुनना नहीं आता। इस बार दू यिन सचमुच हँस पड़ी और बची हुई आधी डंठल खुद खा ली।
वे नदी तक नहीं गईं। गली के मुँह तक आते ही आ सुई के घुटने फूलते से लगे। थकान नहीं बताई, बस रुककर एक चीनी मिट्टी के कटोरे वाले से पूछा कि सब उलटे क्यों रखे हैं। दू यिन ने देखा, भेद नहीं खोला और साथ रुककर कटोरे चुनने लगी। कुछ देर चुने, एक भी नहीं खरीदा। दुकानदार ने दोनों को आँखें तरेरीं। आ सुई हँसी रोकती रही। दुकान पार करके धीरे बोली, तुम्हारे कारण मैं भी बस सामान देखकर चले जाने वाली बन गई।
उस रात श्यू शन देर से लौटा। आ-सुई चावल की लपसी की देगची दो बार गरम कर चुकी थी। चावल के फूले दाने टूटकर बिखर गए थे और ऊपर गाढ़ी परत तैर रही थी। भीतर आते ही उसने चूल्हे को देखा और कहा कि आगे से राह देखने की ज़रूरत नहीं। माँ ने कहा कि उसने भी अभी-अभी खाया है। दू यिन घर के सामने से गुज़री। सुनकर उसके कदम पल भर रुके, पर उसने कुछ कहा नहीं। श्यू शन को पता नहीं था कि उसने दोपहर में चावल की खाली बोरी देखी थी। उसे बस लगा कि शहर में माँ का आज का दिन ठीक ही बीता जान पड़ता है। कटोरा उठाकर वह दुकान की बातें करने लगा।
आ-सुई ने सुना कि रन छ्वान उसे कुछ और काम देना चाहता है तो खुश हुई और चलते वक्त अपने डगमगाते कदमों की बात फिर नहीं उठाई। उसने सब्ज़ी चुनने में दू यिन की समझ और उसके सधे हुए काम की तारीफ़ की, फिर टटोलते हुए कहा कि अकेले काम लेना भी आसान नहीं होता। श्यू शन ने सिर उठाकर उसे देखा। अचानक समझ गया कि बात घूमकर कहाँ जा रही है और बोला, माँ। उसने अचार की तश्तरी उसकी ओर सरका दी और कहा, अपना खाना खाओ, मैंने तुमसे कुछ करने को नहीं कहा।
ग्यारह और बारह तारीख़ तक आँगन में सुबह के खाने का कुछ क्रम बनने लगा। आ सुई अब बड़ी हाँड़ी पहले से नहीं घेरती थी और फ़ांग गुइन्यांग ने भी चावल की परात ज़रा भीतर खिसका दी। दोनों ने जगह की हर इंच पर बैठकर समझौता नहीं किया था। बस दोनों को अपने-अपने ढंग से समझ आया कि पहले दिन की तरह इधर-उधर खिसकते रहे तो किसी का काम नहीं होगा। फ़ांग श्याओ पूरब के कमरे में सूखते लाल कपड़े को देखने गई तो अब भी दक्षिण वाले कमरे के दरवाज़े से बचकर निकली। आ सुई ने उसे फिर कुत्ते पर हाथ फेरने के लिए नहीं बुलाया।
तीसरे दिन शाम को हुआंगदोउ ने बाहर किसी कुत्ते को भौंकते सुना तो सचमुच उसके जवाब में कई बार भौंका। आ सुई ने झट उसका सिर नीचे दबाया। वह समझा नहीं और पहले से भी उतावला होकर भौंकने लगा। कोई उपाय न सूझा तो आ सुई ने भीतर की खिड़की खोल दी, ताकि वह उसकी जाली से सामने वाले कमरे में बन रहे खाने की गंध सूँघ ले। कुत्ते को आँगन के बाहर भौंकता दूसरा कुत्ता नहीं मिला। वह देर तक सूँघता रहा, फिर चूल्हे की भाप ने उसका ध्यान खींच लिया और वह धीरे से लेट गया।
फांग गुइन्यांग आईं। देखा कि नीचा तख्ता अभी लगा है और फ़र्श भी बुहारा गया है। बस इतना कहा कि अभी कुत्ते को ऐसे ही रखो। हर बार उसके भौंकते ही किसी को बाहर आकर हँसते हुए सफ़ाई देने की ज़रूरत मत समझो। उनका स्वर बहुत नरम नहीं था, मगर आ सुई समझ गई कि फ़िलहाल बात सँभल गई है। फांग श्याओ अपनी बुआ के पीछे खड़ी दूर से हुआंगदौ के सिर पर सफ़ेद बालों की छोटी-सी लट देखती रही। वह फिर रोई नहीं, फिर भी देहरी लाँघने को राज़ी नहीं हुई।
लोग चले गए तो आसुई ने कुत्ते के नीचे कपड़े का एक छोटा टुकड़ा बिछा दिया। बाहर किसी ने दू यिन को काम समेटने को कहा। उसने जवाब दिया कि बस एक कोना बचा है। कुछ देर बाद उसने दीया बुझाया। आसुई फिर दरवाज़ा खटखटाकर पूछना चाहती थी कि सुबह का खाना साथ ही पका दे क्या। हाथ बढ़ाया, फिर खींच लिया और पहले अपनी चावल की थैली समेटकर रख दी। रात में दक्षिण की खिड़की से कुछ नहीं दिखता था, मगर उसे अब याद था कि चावल खरीदने किस दरवाज़े तक जाना है। दिन में किसी के उसे सुघड़ गृहिणी कहने से कहीं ज़्यादा, सोने से पहले उसे यही बात बार-बार याद आई।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।
टिप्पणी अनुभाग
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं…
कुछ कहना चाहते हैं?टिप्पणी में भाग लेने के लिए लॉग इन करें →