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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास

किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए

कू वूजी · AI सृजन · 8609 अक्षर · लगभग 12 मिनट

चौथे महीने की दस तारीख को छन शंग छिंगलान पहुँचा, तो कंधे के बहँगे पर साफ़ गद्दी लगी थी। नई नहीं थी; भाभी ने पुरानी कमीज़ के दो टुकड़े तह करके बाहर महीन कपड़ा सिल दिया था। पहले उसे वह मोटी लगी, लेकिन पत्थर के पुल तक पहुँचते-पहुँचते उसका फ़ायदा समझ गया: बहँगे का मोड़ अब सीधे पुराने घाव को नहीं रगड़ता था। हवा में धूप से गरम हुई घास की गंध आने लगी थी। पुल पार करते समय उसने पानी में अपनी परछाईं देखी। संदूक पहले जितना भरा नहीं था, लेकिन वह खुद कुछ लंबा लग रहा था।

इस फेरे में भी सुई-धागे की लागत साठ वेन थी। पिछली खेप धीरे-धीरे पूरी बिक गई थी और नब्बे वेन लौट आए थे। उसने साठ वेन का नया माल लिया और तीस अलग रखे। रास्ते का खाना और ठहरना अब भी ढुलाई की मज़दूरी से निकलना था। एक संदूक भर माल बेच देने का मतलब यह नहीं था कि उसने एक संदूक भर कमा लिया। बड़े भाई ने उसे धीरे-धीरे हिसाब लगाते सुना और पूछा कि गधा कब खरीदेगा। उसने कहा कि पहले काँवर के दोनों सिरों का भार बराबर कर ले।

दवा की दुकान के पीछे सँकरे बरामदे की बेंच अभी थी, पर चेन शेंग अब पहुँचते ही बहँगा उस पर नहीं रखता था। पहले पूछा कि आज कहाँ रख सकता है। सहायक ने दीवार के पास खाली की गई जगह बताई और कहा, दवा की छलनी मत दबाना। उसने पेटी के नीचे की मिट्टी झाड़ी, नमक की गठरी सँभाली और कपड़ा उठाकर झोउ तोंग को दिखाया। लौटाए बाँस के टुकड़े सब सूखे थे। मूल गिनती के अनुसार सौंपकर ही उसने अपनी सुई धागे की पेटी खोली।

झोउ थोंग गाओपू चार पुड़िया जड़ी-बूटियाँ भिजवाना चाहता था। उनमें से एक पर बस ‘चाची झांग को दें’ लिखा था। छन शंग ने पूछा कौन-सी चाची झांग। सहायक ने कहा कि वही, पुल के किनारे रोटियाँ बेचने वाली। छन शंग ने सिर हिलाया। गाओपू के पुल के पास पहले से झांग कुल की दो औरतें थीं, फिर एक और परिवार आकर बस गया था। अगर उसे खुद अंदाज़ा लगाना पड़े और वह ग़लत निकला तो एक और फेरा लगाने के सिवा चारा नहीं होगा।

मददगार झुँझलाया और गठरी लेकर उस पर एक बड़ा-सा अक्षर और लिख देना चाहता था। झोउ थोंग ने उसे रोककर पूछा कि उस औरत के पति का नाम क्या है और वह किस पुल के किस छोर पर रहती है। उसने यह सब बाहरी कागज़ पर लिखा और एक बार बोलकर भी बता दिया। छन शंग ने वैसे ही दोहरा दिया। उसने भीतर की पुड़िया नहीं खोली, न पूछा कि जड़ी-बूटियाँ किस काम आएँगी। वह जड़ी-बूटियाँ पहुँचा सकता था, नुस्ख़ा पढ़ना उसे नहीं आता था, और जो सामने मौजूद भी नहीं था उसके लिए वह यह अंदाज़ा लगाने वाला नहीं था कि दवा कितने छ्येन लेनी है।

बाक़ी दो पोटलियाँ पुराने कपड़ों की थीं और एक मिट्टी का घड़ा, घास से अच्छी तरह बँधा हुआ। सब दवा की दुकान के परिचितों ने पहुँचाने को दिए थे। सब लेता तो बहँगी का एक सिरा भारी हो जाता, सुइयों का बक्सा ऊपर रखना पड़ता और बारिश में उसे बचाना और कठिन होता। छन शेंग ने एक-एक को उठाकर देखा, कपड़ों की पोटलियाँ और जड़ी-बूटियाँ रख लीं, घड़ा लेने से इनकार किया। सहायक ने दस वेन और देने को कहा, उसने सिर हिलाकर मना कर दिया। झोउ तोंग ने नज़र उठाकर उसे देखा और अचानक पूछा कि उस साल सर्दियों में टूटे बारह घड़ों के बदले काटे गए अड़तालीस वेन की भरपाई बाद में हो पाई थी या नहीं।

छन शंग ने कहा कि भरपाई हो गई। कुछ यहाँ संदूक ढोकर और कुछ बाद के फेरों से। उसने उस रात अपने लिए खुले दरवाज़े की दुहाई देकर यह नहीं कहा कि अब उसे हर चीज़ मुफ़्त ढोनी चाहिए। झोउ थोंग ने सिर हिलाया और सहायक से कहा कि किसी और से गाड़ी पर भिजवाने का इंतज़ाम करे। मर्तबान अपनी जगह पड़ा रहा। इससे यह साबित नहीं हुआ कि दोनों में कौन ज़्यादा कंजूस था।

वह थैली लपेट देने के बाद भी झोउ थोंग के दाहिने हाथ से रस्सी ठीक से नहीं पकड़ी जा रही थी। छन शंग ने लेने को हाथ बढ़ाया तो उसने पहले बाएँ हाथ से रस्सी दबाई और किसी तरह पहला फेरा दिया। रस्सी का सिरा गिरा तो छन शंग ने उठाकर उसे दे दिया। गाँठ उसने उसकी जगह नहीं बाँधी। दूसरा फेरा धीरे-धीरे पूरा हो गया। झोउ थोंग ने साँस लेकर कहा कि कोई जल्दी मचा रहा होता तो वह यह गाँठ अब भी नहीं बाँध पाता। छन शंग हँसा और बोला कि वह आज तय समय से पहले आया है, थोड़ी देर खड़े रहने से कोई काम नहीं रुकेगा।

वह पीठा ख़रीदने दुकान से निकला तो श्यू शन सड़क किनारे किसी की पानी ढोने वाली गाड़ी का लकड़ी का हत्था ठीक करता मिला। गाड़ी के मालिक ने शिकायत की कि हत्था बहुत मोटा है। श्यू शन ने कहा कि पहले एक बार सचमुच धकेलकर देखो। धकेलने पर भी उसे मोटा लगा तो उसने उसके बताए नाप के मुताबिक़ थोड़ा और छील दिया। छन शंग बगल में खड़ा इंतज़ार करता रहा। श्यू शन ने नज़र उठाकर उसे पहचाना और पुकारा, मगर इस बार हाथ बँटाने नहीं बुलाया।

गाड़ी का मालिक चला गया तो दोनों दीवार के पाये से लगकर टिकियाँ खाने बैठे। छन शंग ने बताया कि बड़ा भाई चाहता है वह गधा खरीदे। श्यू शन ने कहा कि गधा तो आदमी से भी ज़्यादा बार खाता है। दोनों उँगलियों पर हिसाब लगाने लगे और चारे के खर्च पर पहुँचे तो दोनों हँस पड़े। छन शंग ने कहा कि अभी नहीं खरीदेगा। फिर पूछा कि क्या श्यू शन अपनी दुकान खोलने की सोच रहा है। श्यू शन ने औज़ारों के थैले की ओर देखा, पल भर रुका और बोला, फ़िलहाल ये थोड़े काम पूरे हो जाते हैं और रात में नींद भी आ जाती है। अभी यही करूँगा।

शहर में पहली बार आने पर उसने जो बड़ी-बड़ी बातें कही थीं, वे याद आईं तो मुँह का पीठा अचानक सूखा लगने लगा। मगर श्यू शन ने पहले पूछा कि नई रस्सियों की जोड़ी काम में ठीक है क्या। छन शंग ने एक सिरा खोलकर उसे दिखाया। धुले हुए सन के रेशे अब उतने सफ़ेद नहीं थे, मगर गाँठ अब भी कसी थी। श्यू शन ने छूकर कहा कि अच्छी है और पूछा कि किस दुकान से ली। कल वह भी लकड़ी लादने की अपनी पुरानी रस्सी बदलना चाहता था। उसने इसमें कोई बड़ा सबक़ नहीं ढूँढ़ा।

दोपहर बाद उसने शहर के फाटक के पास सुई का बक्सा खोलकर माल सजाया। ठीक सामने सफ़ेद फूलों से लदा एक पेड़ था। उसकी एक पंखुड़ी गहरे रंग के धागों में गिरी तो उनका रंग और चमक उठा। उसने दो बार आवाज़ लगाई, पर स्वर पतला था और कोई नहीं रुका। बगल के बूढ़े कंघीवाले ने हँसकर कहा कि वह धागा ऐसे बेच रहा है जैसे डर हो कि कहीं धागा ही न सुन ले। उसने आवाज़ खींचने की कोशिश की तो आख़िरी सुर फट गया। मुर्गी गोद में लिए एक औरत ने पलटकर देखा और मुर्गी भी कुटकुटा उठी। सब हँसे और वह भी लाल मुँह लिए हँस पड़ा।

औरत नीला धागा चुन रही थी। उसे शिकायत थी कि उसकी कई लच्छियाँ एक ही रंग की दिखती हैं। छन शंग ने नीचे धूसर कपड़े का एक टुकड़ा बिछाया, तब हल्के और गहरे रंग अलग दिखे। औरत ने बीच वाली लच्छी चुनी, फिर एक सुई आज़मानी चाही। नोक पुराने कपड़े की दो तहों से आसानी से पार गई तो उसने दो सुइयाँ खरीद लीं। छन शंग को पहली बार लगा कि कपड़े की कतरनों की वह थैली, जो उसे हमेशा जगह घेरती लगती थी, बड़े काम की है। उसने कपड़ा तह करके संदूक में सबसे ऊपर रख दिया और अगले ग्राहक का इंतज़ार करने लगा।

पेड़ के नीचे एक नौजवान पंखे बेच रहा था। पंखों पर मछलियाँ बनी थीं और हर मछली की आँख उसके सिर से भी बड़ी थी। छन शंग को देखते पाकर उसने सीख दी कि चीज़ बेचनी है तो पहले लोगों को रोकना आना चाहिए। छन शंग ने पूछा कि इतनी बड़ी आँख वाली मछली सचमुच कोई ख़रीदता है? उसने कहा, बच्चे भी ख़रीदते हैं और बूढ़े भी। कहते हैं मछली साफ़ देख पाती है। ठेला समेटने का वक़्त हुआ तो सच में एक बूढ़े ने सबसे बड़ा पंखा चुना। उसे खोलकर आधा चेहरा ढक लिया और पंखे के ऊपर से दो छोटी आँखों से रास्ता देखने लगा। पंखे वाले ने छन शंग को आँख मारी। छन शंग ने हँसकर हवा से उड़ते काग़ज़ को दबाकर रखने में उसकी मदद की।

शाम को छन शंग ने पश्चिमी फाटक के भीतर एक छोटी सराय ढूँढ़ी। उसने पहले संदूक की तली से मिट्टी झाड़कर साफ़ की। मालिक ने देखा तो दरवाज़े के पास गरम चबूतरे के बगल की जगह दिखाई और कहा कि आज रात दीवार के पास रख सकते हो, आँगन तक ले जाने की ज़रूरत नहीं। छन शंग को सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई, कोई उसकी दरियादिली की तारीफ़ करता उससे भी कुछ ज़्यादा। रात में बगल वाले कमरे में खर्राटे लेने वाला आदमी दूसरा था, मगर आवाज़ उतनी ही तेज़ थी। उसने करवट लेकर एक बार हँसा और आख़िर गहरी नींद सो गया।

शहर छोड़ने से एक दिन पहले वह दक्षिणी हुआई गली में आ सुई से मिलने गया। हुआंगदोउ ने जंगले के पार से उसके जूते सूँघे और पूँछ ज़मीन पर बुहारने लगी। उठने पर केवल आगे का आधा शरीर उठा, पिछली टाँगें कुछ धीमी थीं। आ सुई ने कहा कि उसे अब भी बर्फ़ वाली रात के वे पुआल के जूते याद हैं। छन शंग ने बैठकर उसके कान सहलाए। हुआंगदोउ ने सिर उसकी हथेली की ओर बढ़ा दिया। उसमें फिर झपटने की ताक़त नहीं थी, लेकिन वह भूला भी नहीं था।

खिड़की के नीचे सुइयों की टोकरी के मुँह पर बाँस की नई पट्टी लपेट दी गई थी, अब धागा उसमें अटकता नहीं था। छन शंग ने पूछा कि सुइयों में धागा डाल दे क्या। आ सुई ने सुइयों का कपड़ा उसे थमाया और कहा, आज बस दो बारीक सुइयों में डाल दो, मोटी वाली मैं कर सकती हूँ। उसने पहली सुई पकड़ी। हाथ अब सर्दियों की उस रात की तरह अकड़ा हुआ नहीं था, मगर धागा मुलायम था और नाके के पास लाते ही बिखर जाता था। उसने फिर भी तीन बार कोशिश की। आ सुई पास बैठी रही और यह कहकर उस पर हँसी भी नहीं कि उससे बस एक रात ही ढंग से सुई में धागा डाला गया था।

श्यू शन कुछ देर बाद भीतर आया। मेज़ पर तीसरा कटोरा फिर देखकर उसने पहले पूछा कि छन शंग आज कहाँ ठहरेगा। छन शंग ने कहा कि सराय में पैसे दे चुका है, रात के खाने के बाद वहीं लौट जाएगा। आ-सुई ने भी सराय छोड़ने को नहीं कहा। उसने बाँस की कोपलों का सूप एक कटोरे में परोसा और पूछा कि गाओपू में इस साल पानी चढ़ा है क्या। खाते हुए उन्होंने पानी की, बाँस की क़ीमत की और उसकी भतीजी के जूतों में आखिर तले लग जाने की बात की। पहली मुलाक़ात की तरह किसी को जल्दी से दूसरे का एहसान चुकाने का कोई काम ढूँढ़ना ज़रूरी नहीं लगा।

गाओफू लौटने पर नाम लिखी हुई जड़ी-बूटियों की वह पुड़िया पुल के पूरब में पहुँची, पश्चिम में नहीं। पुड़िया लेने वाली औरत ने बाहरी कागज़ पर अपने पति का नाम पहचाना और उसे खोलने को उतावली हुई। छन शंग ने कहा कि पहले पुड़ियों की गिनती ठीक से देख लो। मिलान हो जाने पर ही वह चला। औरत ने बाहरी कागज़ की लिखावट एक बार और देखी, फिर उसकी ओर हाथ हिलाया। उसने काँवर सीधी की और अगले घर की ओर चल दिया।

छन दा घर में बाँस की पतली पट्टियाँ चीर रहा था। छोटे भाई का बक्सा फिर आधा हल्का देखकर पूछा, सुइयाँ इतनी बारीक हैं, क्या सचमुच किसी का पेट पाल सकती हैं? छन शंग ने पहले इस महीने की ढुलाई में बड़े भाई का हिस्सा अलग किया, बाकी अपने कपड़े के बटुए में रखा। बटुए का मुँह घिसकर फट गया था। उसने नई खरीदी सुइयों में से एक ली और खुद दो कतार टाँके लगाए। टाँके तिरछे थे, देखकर कोई उसे सुइयाँ बेचने वाला नहीं कहता। भाभी से देखा नहीं गया, बटुआ लेने को हाथ बढ़ाया। उसने हँसकर उसे बचा लिया और कहा, पिछला आधा देखो, पहले से सीधा है।

रात को उसने लकड़ी की डिबिया खोली। पहले के जमा पाँच सौ बीस वन अब भी बड़े भाई के पास थे। उसने इस महीने अलग रखे पंद्रह वन उसमें वापस जोड़े, पूरी पेटी के नब्बे वन नहीं। बाकी में मज़दूरी, ढुलाई और रोज़मर्रा का ख़र्च पहले ही अलग किया जा चुका था। सबको एक साथ बचत नहीं कह सकता था। छन दा ने गिनकर एक सिक्का निकाला और उँगलियों में घुमाया। कहा कि यही रफ़्तार रही तो गधा बुढ़ापे में आ पाएगा।

छन शंग पलटकर कहना चाहता था कि बड़े भाई की कमाई भी धीरे-धीरे ही आती है। मगर उनके अँगूठे और तर्जनी के बीच बँधी पट्टी देखकर चुप रहा। उसने कपड़े की थैली से लकड़ी की एक छोटी चिड़िया निकाली। शिकौ में तीन वन देकर भतीजी के लिए ख़रीदी थी। चिड़िया की आँखें नहीं उकेरी गई थीं, मगर पंख हिल सकते थे। बच्ची ने उन्हें खोला और बंद किया। दो बार खट की आवाज़ आई तो उसे फिर हिलाने में संकोच हुआ। उसने चिड़िया अपने नए जूतों के बगल में रख दी, डर था कि जूते की नोक उसे दबाकर तोड़ देगी।

छोटी लड़की पीछे पड़ी रही कि चिड़िया की आँखें क्यों नहीं हैं। छन शंग ने कहा, आँखें बनाने वाले को डर था कि पहाड़ दिखते ही वह उड़ जाएगी। लड़की ने यकीन नहीं किया। उसने चूल्हे की राख का एक कण उठाया और आँख बनाने चली, मगर माँ ने आँखों पर यूँ हाथ लगाने से मना किया। उसने चिड़िया को कसकर पकड़ लिया और कहा, तो अभी इसे एक आँख दे देते हैं, दूसरी कल उग आएगी। छन दा का सिर झुका था और कंधे हँसी से हिल रहे थे। उसने अपनी पतली बाँस की तीली स्याही में डुबोकर लड़की को दी और इशारे से समझाया कि हाथ न काँपे।

भाभी हँसकर बोली कि छोटा भाई अब लोगों का मन रखने के लिए छोटी-मोटी चीज़ें ख़रीदना जान गया है। छन दा के होंठों का तनाव भी ढीला पड़ा। पंद्रह वन और बच जाने पर उन्होंने मुर्गी नहीं काटी। बस चूल्हे से सब्ज़ी का शोरबा ले आए और तीनों ने एक कटोरा बाँटकर पिया। बच्ची ने ऊपर का साफ़ हिस्सा पिया। छन शंग दरवाज़े के पास बैठा अपने थैले पर टेढ़े टाँके टटोलता रहा। सोचा कि अगली बार इन्हें ठीक करना होगा, पर उसे लगा कि बोझ ढोने की रस्सी के अलावा आख़िर एक चीज़ और है जिसे उसने अपने हाथों से मज़बूती से सी दिया है।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. वह दक्षिणमुखी कमरा
  2. दहलीज़ तक बर्फ़
  3. तीसरा कटोरा
  4. दरवाज़े का पल्ला गिरने से पहले
  5. दोराहे पर काले अक्षर
  6. दोपहर बाद शहर का फाटक
  7. आँगन में उधार ली हुई आग
  8. बराबर कीमत का एक दरवाज़ा
  9. दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी
  10. रास्ते की तख्ती का दूसरा रुख़
  11. सुइयों की टोकरी के पास दो हाथ
  12. बर्फ़ का पानी दक्षिणी दीवार में रिस गया
  13. गाँव लौटने पर बैठने की जगह
  14. नाप की पट्टी पर छूटा एक निशान
  15. दरवाज़े के नीचे वह हाथ
  16. माँ ने उसकी ओर से जो कहा
  17. चाय के छप्पर में दरवाज़े की लकड़ी का ढेर
  18. वह छोटी राह जिससे गाड़ी नहीं गुज़र सकती
  19. पिछला आँगन किसका है
  20. एक काँवड़ माल, दो रस्सियाँ
  21. दाश्यू हाँडी उठाकर ले गई
  22. वह चौकी जिस पर कोई नहीं बैठा
  23. पुराने घर का वादा किसने किया
  24. नए दरवाज़े को बारिश में रखना
  25. वह कमरा जो अभी छोड़ा नहीं गया
  26. बढ़ई की दुकान में छूटी कंघी
  27. पट्टी पर किसी का नाम नहीं
  28. गरम कमरा दवा नहीं है
  29. दुआनवू से पहले का वह न्योता
  30. सुइयों की वह टोकरी जो बिकी नहीं
  31. चाय के छप्पर के अपने दिन
  32. पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा
  33. किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए
  34. भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा
  35. दरवाज़ा उन लोगों के लिए ठीक करो जो जीते हैं
  36. धूप कहाँ तक ढली

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