प्राचीन परिवेश में व्यापारिक मार्गों और पुनर्मिलन पर दीर्घ उपन्यास
वह गली जिसे वह ख़ुद देखना चाहती थी
कू वूजी · AI सृजन · 8778 अक्षर · लगभग 12 मिनट
याओ ज्या उस नक़्शे के सहारे चली जिसे एक बार उलटकर देख चुकी थी। दूसरे पुल के नीचे सब्ज़ी बेचने वाली दो छोटी नावें एक-दूसरे से सटी थीं। नावों पर बैठी औरतें पानी के आर-पार भाव पर झगड़ रही थीं। किसी ने उसकी दिशा बताने को सिर नहीं उठाया। वह पुल के बीच रुकी और मसालों की दुकान की छोटी झंडी पहचान ली। अचानक उसे लगा कि युएपू कल से कहीं बड़ा है।
दुकान में ताज़े पिसे मसाले लकड़ी के उथले खानों में भरे थे। उनकी गंध परत-दर-परत आकर उससे टकराई। उसने सोचा था कि सूँघते ही पहचान लेगी कि उसके सिरके के साथ कौन-सा मसाला जँचेगा, मगर अंदर जाते ही लगातार दो छींकें आईं और आँखें भीग गईं। दुकानदार ने साफ़ कपड़ा देकर हँसते हुए पूछा कि क्या वह पुल के पश्चिम से आई है। उधर के लोग हमेशा उसी वक़्त आते हैं जब मसालों की गंध सबसे तेज़ होती है। याओ ज्या ने आँखें पोंछीं। दोनों छींकों ने आने का मक़सद भी जैसे बिखेर दिया था। उसने सोचा, चलो सबसे छोटे खाने से शुरू करके धीरे-धीरे सूँघती हूँ।
सूखी अदरक की एक पुड़िया की तीखी गंध इतनी कड़ी थी कि चुभती थी। मगर एक खाने में रखा संतरे का छिलका छांगगान में अक्सर खरीदे जाने वाले छिलके से पतला था। तोड़ने पर उँगलियों में हल्की, साफ़ कड़वी महक रह गई। उसने बारह वेन की दालचीनी और संतरे का छिलका खरीदा। दुकानदार ने पूछा कि कितने मर्तबान बनाएगी। उसने कहा कि पहले अपने घर के खाने के लिए ले रही है। कहते ही लगा कि जवाब कुछ छोटा पड़ गया, जैसे सिरके की दुकान चलाने वाली इतनी दूर आई हो तो उसे कम से कम एक बोझ भर माल का सौदा करना चाहिए। दुकानदार तब तक पीछे वालों को देखने चला गया था। उसने छोटी पुड़िया चपटी की और उँगलियों के पोरों को सूँघा। अब उसे उसे किसी सौदे की तरह करीने से रख देने की जल्दी नहीं थी।
पास ही बाँस की चिमटियों का ठेला था। चिमटियाँ धूप में पीली पड़ गई थीं और कुछ के सिरे मछली की पूँछ जैसे तराशे गए थे। याओ ज्या ने छह वेन की दो चिमटियाँ चुनीं। आज़माकर देखा कि उँगली नहीं दबती। उसे घर के मर्तबानों पर बँधे कपड़े के वे कोने याद आए जो हर बार हवा में उलट जाते थे, और अपनी खिड़की का वह ढीला पर्दा भी, जिस पर वह चिमटी लगाना चाहती थी। कौन-सी मछली की पूँछ ज़्यादा बराबर कटी है, यह चुनने में उसने इतनी देर लगाई कि आख़िर दुकानदार हँसकर बोला कि दोनों एक ही बाँस की गाँठ के बीच वाले हिस्से से बनी हैं। वह भी हँसी, फिर भी जिस चिमटी का किनारा थोड़ा टूटा था, उसे बदलवा लिया।
शोरबे और हल्के खाने वाली गली में उसने तीन वेन की एक कटोरी शोरबा मँगाया। दूसरों को उसमें एक चम्मच गाढ़ा मीठा रस डालते देखकर उसने भी माँगा। पहला घूँट ठीक था। दूसरा इतना मीठा कि मुँह सूख गया और भीतर की बारीक मसालेदार महक का स्वाद ही नहीं आया। बेचने वाले ने पूछा कैसा लगा। मुँह में मिठास लिए याओ ज्या पल भर रुकी, फिर बोली कि थोड़ा मीठा है। दुकानदार ने कहा कि यही तो अच्छी बात है, युएपू में सबको पसंद है। याओ ज्या ने उससे इस पर बहस नहीं की कि युएपू में आख़िर कितने लोग हैं। दो वेन की एक पतली रोटी अलग से ली और शोरबा घूँट-घूँट करके ख़त्म किया।
उसे लगा था कि रास्ते भर चखते हुए कुछ तो ऐसा मिल ही जाएगा जिसे लौटाकर दिखाए तो गाओ ज्यांग की आँखें फैल जाएँ। दोपहर बाद घाट तक आई तो खरीद में अब भी दो छोटी कागज़ की पुड़ियाँ और बाँस की चिमटियाँ ही थीं। सूरज ढलने लगा था और पुल की छाया नाव के छाजन में उतर आई थी। पास ही पुराने नीले-हरे कुरते में एक औरत फूल का गमला गोद में लिए पत्थर की सीढ़ी पर किसी का इंतज़ार कर रही थी। फूल मुरझा चुका था, फिर भी औरत को जल्दी नहीं थी। उसने बस गमला घुमाकर बिना टूटी तरफ़ पानी की ओर कर दी।
याओ ज्या उससे दो सीढ़ियाँ ऊपर बैठ गई, टिकिया की पुड़िया खोली और बचा आधा हिस्सा धीरे-धीरे खाया। इन गलियों में घूमने से टाँगें सचमुच दुख रही थीं। उसे फिर अपना काउंटर याद आया और ख़याल आया कि नौवीं को दुकान खोलेगी तो पहला ग्राहक कहीं यह न कहे कि वह बहुत दिन बाहर रही। मगर अगर अभी उसे काउंटर के पीछे पहुँचा दिया जाए, और उसने आज का वह बेहिसाब मीठा शोरबा तक न चखा होता, तो उसे वह भी अखरता।
वह औरत एक बुज़ुर्ग के आने तक रुकी रही, जिसकी बगल में खाली टोकरी दबी थी। दोनों ने कुछ ही बातें कीं। बुज़ुर्ग ने फूल का गमला ले लिया, औरत ने उसके कंधे से काग़ज़ का एक टुकड़ा झाड़ दिया, और दोनों धीरे-धीरे सड़क पर चले गए। याओ च्या दूर जाते गमले को देखती रही, तब उसे मालूम हुआ कि उसने रोटी लपेटने का काग़ज़ मरोड़कर रस्सी-सा बना दिया था। उसने काग़ज़ फैलाकर सीधा किया, चूरा झाड़ा और सराय का रास्ता ढूँढ़ने उठी। इस बार नक़्शा खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
लू येन शाम को आया। बाँस की दो चिमटियाँ देखकर पूछा कि क्या उसके नीले कपड़े को थामने के लिए हैं। याओ ज्या ने एक चिमटी उसकी आस्तीन के किनारे पर लगा दी। बोली, इससे उसे भी थामा जा सकता है, मगर नीला कपड़ा आख़िर कब सूखने को राज़ी होगा? उसने कहा कि दोपहर को ही उतार लिया था। यूँ लगा जैसे उसे अपने हिस्से की छूटी हुई रोशनी का अफ़सोस हो। उसका चेहरा देखकर याओ ज्या का अचानक बहुत मन हुआ कि उस कमरे में फिर जाए। मगर कल सुबह नाव पकड़नी थी, पोटली अब तक नहीं बाँधी थी और उसकी टाँगें दो ली और चलने को तैयार नहीं थीं।
दोनों सराय के बग़ल वाले दरवाज़े पर छोटे स्टूलों पर बैठे। उसने शोरबे का हाल ऐसे सुनाया जैसे एक चम्मच मीठा रस पूरी नाव को चिपका सकता हो। लू येन हँसा और बोला कि वही दुकान है जहाँ पिता को जाना पसंद है। सुनकर उसे टिकिया बड़े ध्यान से तोड़ते लू त्साई के हाथ याद आए और वह भी हँसी। उसने उसे दालचीनी सूँघाई। वह सिर झुकाकर इतना पास आ गया कि नाक की नोक उसकी उँगली से छू गई। याओ ज्या ने हाथ नहीं हटाया। उसके आँख उठाने पर ही धीमे से कहा कि इस बार उसे रास्ता ख़ुद मालूम है।
लू यान ने कहा कि अगली बार वह उसे वहाँ ले जा सकती है। उसने सिर हिलाया, मगर ‘अगली बार’ सुनकर उसका मन थोड़ा कस गया। कल वह हमेशा की तरह फर्म लौटेगा और वह हमेशा की तरह नाव पर चढ़ जाएगी। आज इस तरह सटकर बैठने का समय ‘अगली बार’ कह देने भर से बढ़ नहीं जाएगा। उसने बाँस की चिमटी खोल ली, मगर आस्तीन की कोर अब भी थामे रही। कुछ देर बाद पूछा कि छठे दिन सुबह आ सकोगे? लू यान ने कहा, आऊँगा। उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखकर कुछ देर थामे रखा, फिर उसे सामान समेटने ऊपर जाने दिया।
छह की सुबह आसमान अभी धूसर था जब सराय की मालकिन छ्योउ ने नीचे के दरवाज़े के पट हटाए। याओ ज्या ने बिताई हुई तीन रातें फिर गिनीं, तीन, चार और पाँच। हर रात बिस्तर पर पूरी नींद ली थी, फिर भी लगा कि इस बार कितनी जल्दी जाना पड़ रहा है। उसने तसले के पास गिरा एक बाल उठाया, कुंडी छुई, देख लिया कि कागज़ की कोई पुड़िया नहीं छूटी और गठरी लेकर नीचे उतरी। लू येन बाहर था। उसके हाथों में नए सामान का कोई ऐसा ढेर नहीं था जिसे वह उठा न सके। उसने बस उसकी पुरानी गठरी थाम ली।
धारा के विरुद्ध ऊपर जाने वाली नाव का टिकट अस्सी सिक्के था। उसने नाव के अगले सिरे पर गिनकर पूरा भुगतान किया। लू येन ने बंडल सँभाला और उसने उसका खाली हाथ पकड़ लिया। दोनों अभी ठीक से न जमे चढ़ने के तख्ते के पास खड़े थे, पर समझ नहीं पा रहे थे कि अंत में और क्या कहें। उसने पूछा कि अगली बार वह शोरबा फिर पिएगी या नहीं। उसने उसकी ओर देखा और कहा कि दूसरी दुकान जाएँगे; उसने अभी पूरी सड़क का खाना थोड़े ही चख लिया है। वह हँसा। हँसी थमी, तो उँगलियों की पकड़ फिर कुछ कस गई।
नाविक ने चढ़ने की जल्दी मचाई। मुड़ने से पहले याओ ज्या पंजों पर उठी और उसके गाल को हल्के से छू लिया। फिर गठरी अपनी बाँहों में ली और खुद तख्ते पर चढ़ गई। छाजन के पास जाकर उसने लू येन की ओर हाथ उठाया। कहना चाहती थी कि खुबानी रंग का फीता टेढ़ा नहीं हुआ, मगर होंठ भींचकर उसे देखती रही। किनारा धीरे-धीरे दूर होने लगा। वह कुछ कदम चला, फिर रस्सा बाँधने के एक खूँटे के पास रुक गया। किसी के कंधे के बोझ से निकली लंबी बाँस की पट्टी उसके कपड़े के किनारे से टकराई। वह फिर भी उसी की ओर देखता रहा। जब एक खिसकती छाजन वाली नाव ने उसकी आकृति ढक ली, तब वह बैठी।
धारा के विरुद्ध सफ़र आते वक़्त से धीमा था। नाव का बदन एक लहर को चीरता तो सचमुच कुछ आगे खिसका है, ऐसा लगने में बहुत देर लगती। आते वक़्त वह गिन रही थी कि उससे मिलने में कितनी घड़ियाँ हैं। अब किनारे पर उसी एक झुके हुए विलो को देखते हुए उसके मन में बार-बार अभी की वह उँगली उभरती थी जो छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने थैला खोला, फिर बंद किया और आखिर बाँस की दोनों चिमटियाँ निकालकर छाजन के किनारे का वह छोटा कपड़ा पकड़ दिया जो बार-बार उसके चेहरे से छू रहा था। पास बैठी बुढ़िया ने देखा तो उससे एक चिमटी उधार माँगी।
एक चिमटी कम हुई तो कपड़ा अब भी फड़फड़ाता रहा। दोनों ने अपनी-अपनी चिमटी की जगह बदली और किसी तरह उसे रोक लिया। बुज़ुर्ग औरत ने टोकरी से एक नाशपाती निकालकर उसे देनी चाही। याओ ज्या ने थोड़ा संकोच किया। औरत ने छोटी छुरी से एक फाँक काटी, तब उसने ली। इतनी खट्टी थी कि उसकी आँखें तुरंत सिकुड़ गईं। औरत उसे देखकर हँसी। बोली, बहू के लिए ले जा रही थी, डर था कि उसे खट्टी लगेगी, ख़ुद भी चखने की हिम्मत नहीं हुई। नाशपाती का वह छोटा टुकड़ा मुँह में रखे याओ ज्या ने सुना कि बहू को पहले नाशपाती पसंद थी और अब उसमें नुक़्स निकालती है। उसे याद आया कि माँ भी बचपन की उसकी पसंद का अचार साल-दर-साल एक तश्तरी में रखकर लाती थीं। आख़िरी साल भी पूछा था, खाती क्यों नहीं।
नाव के नीचे उथले पानी की आवाज़ उठी। बुज़ुर्ग औरत ने नाशपाती फिर लपेटी, मगर खुद भी एक कौर काट लिया। याओ ज्या ने उसे हल्के से सिसकारी भरते सुना। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और हँसी रोक न सकीं। उस हँसी से सीने में अभी तक ठिकाना न पा सके खालीपन ने आखिर इतनी जगह छोड़ दी कि गरम खाने के कुछ कौर उसमें समा सकें।
पहली रात नाव एक सँकरे घाट पर ठहरी। किनारे चूल्हे पर चावल का दलिया पक रहा था। दूसरे दिन हवा तिरछी चल रही थी। आगे रस्सी से नाव खींचने वाले एक-एक क़दम रखते गए और नाव के लोगों की रफ़्तार भी धीमी पड़ गई। इन दो दिनों में रास्ते का दलिया और सब्ज़ी लेने पर उसने छह वेन ख़र्च किए। बाक़ी समय गाओ ज्यांग की दी सूखी टिकियाँ खाईं। तीसरे दिन भी थोड़ी बची थी। किनारे सख़्त हो चुके थे, तो उसने गरम पानी में भिगोकर खाया। गेहूँ के छिलके की हल्की महक आई जिसे पहले वह भद्दा समझती थी। पोटली में अभी अठहत्तर वेन थे। चांगगान के काउंटर में अलग बाँधकर रखे बर्तनों की ज़मानत और सामग्री की पूँजी में से उसने पूरे रास्ते कुछ नहीं छुआ।
सातवीं की रात अचानक नाव की छाजन पर हल्की बारिश पड़ी। बूँदों की टप-टप बहुत पास सुनाई दी। याओ जिया की आँख खुली तो उसे लगा वह अब भी सराय में है। हाथ बढ़ाया तो सफ़र का थैला मिला, और पाँव भी बिस्तर की तरह सीधे नहीं हो सके। वह थोड़ा खिसकी, बग़ल वाले को कुछ जगह दी और बारिश थमने की आवाज़ सुनती रही। लू यान के बारे में सोचते हुए उसे वह नीला कपड़ा भी सुंदर लगने लगा जिसने सफ़ेद दीवार ढक दी थी। वह उसी ख़याल में डूबी थी कि आगे से आए एक ज़ोरदार खर्राटे पर उसकी हँसी छूट गई।
आठ तारीख़ को जब नाव नदी के जाने-पहचाने मोड़ से गुज़री तो उससे बैठे नहीं बना। बग़ल की बूढ़ी औरत ने बाँस की चिमटियाँ लौटा दीं। उसने लेकर दोनों मछलियों की पूँछें उलट-पलटकर देखीं, उन्हें फिर से छाजन पर लगाने की जल्दी नहीं की। अँधेरा उतरने पर नाव छंगझोउ पहुँची। याओ ज्या ने स्थानीय घाट के पटरे पर क़दम रखा तो टाँगें ऐसी ढीली पड़ीं जैसे तीन दिन की नाव भी पीठ पर ढो लाई हो। वह एक ओर टेक लगाकर कुछ देर रुकी, फिर अपना हल्का-सा सामान ख़ुद उठाया और दो ली दूर से धीरे-धीरे छांगगान लौट गई।
बुआ के घर का दरवाज़ा पहले खुला। याओ लान ने उसे देखते ही पूछा कि खाना खाया है या नहीं। उसने कहा कि नाव पर खा लिया था। बुआ फिर भी आधा कटोरा गरम पतला दलिया ले आई और बताया कि घर की छत नहीं टपकी। चार तारीख़ को कोई हल्का सिरका पूछने आया था। नौ को मर्तबान खुलने की तख़्ती देखकर कह गया कि नौ को फिर आएगा। ग्राहक का सुनते ही याओ च्या आदतन पूछने वाली थी कि किस घर का था, मगर बात होंठों तक पहुँची तो दलिये के एक घूँट ने पहले उसे रोक लिया। उसने बुआ से पूछा कि नए जूते अब भी चलते समय काटते हैं क्या।
चाबी वापस लेकर उसने देर में सिरके की दुकान का दरवाज़ा धकेलकर खोला। जानी-पहचानी खट्टी महक ने उसे एकदम घेर लिया। उसने गठरी रखी और काउंटर का किनारा छूकर हँस पड़ी। इन दिनों नाव पर उसे यह तक याद आया था कि इस कोने पर उँगली फेरने से कहाँ छोटा-सा गड्ढा लगता है। कागज़ की तख्ती अभी दरवाज़े के अंदर लटकी थी। उसने उतारी तो पिछली तरफ़ हवा से आई बारीक धूल की परत थी। दालचीनी और संतरे के छिलके सूखी जगह रखे और दोनों बाँस की चिमटियाँ फ़िलहाल खिड़की के परदे पर लगा दीं।
उसने मुँह धोया। कोई नया हिसाब नहीं खोला, न युएपू की हर बात लिख डालने की जल्दी की। बिस्तर पर आख़िर पैर सीधे हो गए। आँखें मूँदने से पहले उसे याद आया कि लू येन ने पूछा था, अगली बार किस दुकान में खाएँगे। अचानक ज़रा अफ़सोस हुआ कि छह तारीख़ को उसने उसके गाल के पास बस उतना-सा हल्का स्पर्श क्यों किया। खिड़की के पास मछली की पूँछ की परछाईं दीवार पर पड़ी थी, इतनी छोटी कि जैसे सचमुच तैरकर चली जाएगी। वह करवट लेकर भीतर की ओर हुई, हाथ से ख़ुबानी रंग की फीती टटोली और उसे तकिए के पास दबा दिया।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से रचित मौलिक कृति है, जिसका विस्तार ली बाई की 《长干行二首》 (छांगगान के दो गीत) और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《青梅旧账》 (कच्चे मेह फलों के दिनों का पुराना हिसाब) से किया गया है। पात्र, व्यापारिक प्रतिष्ठान, मूल्य, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; इसमें पुराने ऋणों का पूरा हिसाब साफ़ करना, हुनर और श्रम को फिर से पहचान मिलना, तथा वयस्क होने पर संबंधों की शर्तें नए सिरे से तय करना जैसे मूल रचना के केंद्रीय तत्व सुरक्षित रखे गए हैं। यह कवि की जीवनी नहीं है।
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