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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

चाँद के नीचे कैंची

कू वूजी · AI सृजन · 9115 अक्षर · लगभग 12 मिनट

सुबह गु छिंग ने पतली गर्दन की बोतल खोजी, गरम पानी से धोकर खिड़की पर उलटी रखी। दादी की छोड़ी पुरानी चीज थी; मुँह का किनारा थोड़ा टूटा, रेशमी फूल लगाते नहीं दिखता, मगर पानी आधी ऊँचाई तक ही भर सकती थी। बाँस की टोकरी में गीले कपड़े खोजे। सोचा, बस एक डाल काटे, कली को पानी मिले, तो पेड़ हटाते सब कुछ हाथ से नहीं जाएगा।

शन सू ने देखकर पूछा कि वह क्या धोना चाहती है। गू छिंग ने कहा कि कल के झरे फूलों पर मिट्टी लग गई थी, उन्हें फिर से खँगालना चाहती है। दादी ने सुराही के मुँह की ओर देखा और उसका झूठ नहीं खोला। बस कहा कि गीले कपड़े सफ़ेद रेशम के नीचे मत दबा देना। कमरे में सबसे सफ़ेद रेशम का टुकड़ा अभी कटा नहीं था। गू छिंग ने उसे बड़ी ममता से खरीदा था, उसे छूने से पहले हाथ धोती थी, मानो अच्छा कपड़ा भी भाँप सकता हो कि उसका मालिक ग़रीब है या नहीं।

वह बोतल लेकर बाहर निकली। फूल बेचने वालों से पूछना था कि काटी हुई डाली को कैसे सँभालें। पश्चिमी बाज़ार में फूलवालों से ज़्यादा सब्ज़ीवाले थे। सर्दी के ठेलों पर पत्तियों के किनारे सिकुड़े थे, मगर मूलियों पर अभी मिट्टी लटकी थी। उसे अक्सर चीड़ की डालियाँ बेचने वाली बूढ़ी छी मिलीं। उन्होंने पानी से एक डाली उठाकर कहा कि ग्राहक चाहते हैं वह सामने एक-दो दिन अच्छी दिखे। अगर उम्मीद है कि नए साल के बाद भी पेड़ पर लगी डाली जैसी रहेगी, तो ऐसा हुनर उनके पास नहीं है।

गू छिंग ने पूछा कि अगर टहनी पर बहुत कलियाँ हों तो? दादी छी ने उलटा पूछा, ज़्यादा कलियाँ हुईं तो क्या इसे फ़ायदा समझोगी? एक टहनी में पानी आख़िर कितना रहेगा। उनके लहजे में नरमी नहीं थी, मगर हाथ तेज़ चले। सब्ज़ी के काँवड़ से बाँस की टूटी नली का छोटा टुकड़ा निकालकर गू छिंग को दिया। कहा कि टहनी मिले तो इसे इस्तेमाल करना, अच्छी सुराही टूटने से बचेगी। गू छिंग ने लिया, तब जाकर महसूस हुआ कि वह अपनी पतली गर्दन वाली सुराही कब से कसकर पकड़े हुए थी। उसकी तली से सटी हथेली तक गरम हो चुकी थी।

गली में लौटने से पहले वह बाज़ार के पूर्वी छोर से होकर गई। दिंग फ़ंगछ्वान एक तेल बेचने वाले के लिए दाम लिख रहे थे। मेज़ के पास एक लकड़ी का पट्ट था जिसका कोना चटका हुआ था। उस पर लिखे दो अक्षरों में से एक वह पहचानती थी। पास जाकर पूछा कि दूसरा अक्षर “换” है, यानी बदलना, या “借”, यानी उधार लेना। दिंग साहब ने कहा कि वह “还” है, यानी लौटाना। फिर उसकी बोतल की तरफ़ नज़र उठाकर पूछा कि क्या शेन सु फिर फूल भिजवा रही हैं। बचपन में वह दादी के छोटे-मोटे काम किया करती थी और उनके घर मेई की कटी टहनियाँ दे आई थी। अब उसका चेहरा लाल हो गया। उसने कहा, नहीं।

वह खड़ी रही और लिखाई पूरी होने का इंतज़ार करती रही। तेलवाला बार-बार हाथ बढ़ाकर किसी ऐसी संख्या पर उँगली रखता जो कम या ज़्यादा लिखी गई थी। मास्टर हर बार क़लम उठाकर उसे जगह देते। गू छिंग ने देर तक देखा, तब समझी कि इश्तहार भी बस बैठकर लिख देने भर से पूरा नहीं होता। जिन चंद अक्षरों को सब साफ़ समझते हैं, उनके लिए भी बार-बार पूछना पड़ता है। तेलवाले के जाने पर उसने झिझकते हुए कहा कि वह मकान की बिक्री का एक काग़ज़ देखना चाहती है। डर है कि सारे अक्षर पहचान न पाए। क्या वह मास्टर से एक बार वहाँ चलने को कह सकती है?

दिंग फ़ंगछ्वान ने तुरंत हामी नहीं भरी। पहले पूछा कि काग़ज़ किसके घर का है और जिसके पास है, क्या वह किसी बाहरी को दिखाने पर राज़ी होगा। अगर वह राज़ी नहीं, तो उनके जाने से भी क्या होगा, बाहर दरवाज़े पर खड़े रहेंगे। गु छिंग ने कहा कि अभी पूछा नहीं है। दिंग ने तश्तरी के किनारे पर कलम पोंछी और कहा, पहले पूछ लो, वह मानेगा तो मैं जाऊँगा। अक्षर पढ़ सकता हूँ, तुम्हारे लिए मकान ख़रीदने वाले को हुक्म नहीं दे सकता। उन्होंने पाँच वेन बताए, आधे दिन के भीतर आना-जाना उसी में था। अलग से कुछ लिखवाना हो तो उसका दाम अलग तय होगा।

गू छिंग को डर था कि वह लंबा उपदेश देगा, मगर पाँच वन सुनकर उलटे उसे तसल्ली हुई। उसने बाँस की नली उठाकर फूलदान के बाहर रख दी और कहा कि कल पहले जाकर पूछेगी। दो क़दम चलकर फिर मुड़ी। पूछा, जो लिखा है कि आँगन की दीवार ही हद है, क्या उसका मतलब यह है कि इस ओर की हर चीज़ इसी ओर के मालिक की हुई? तिंग फंगछ्वान ने लकड़ी की पट्टी मेज़ के बीच में लौटा दी और कहा, देखना पड़ेगा कि कागज़ पर ठीक क्या लिखा है और ज़मीन पर असल में किस दीवार की बात हो रही है। गू छिंग ने उस कलम की ओर देखा। आख़िर उसने यह सवाल फिर नहीं पूछा कि वह जीत सकती है या नहीं।

दोपहर बाद शन सू ने झरे हुए फूलों की तीन छोटी पोटलियाँ बनाईं। एक छन चाची के लिए, ताकि कपड़े धोने पर वे कपड़ों की संदूकची महका सकें। एक अपने तकिए के पास रखी, और बची हुई पोटली को धागे से बहुत ढीला बाँधा। गू छिंग ने कहा कि फूल ज़मीन पर गिर चुके हैं, उनकी महक कुछ ही दिन रहेगी, इतनी पोटलियाँ बाँधने से धागा बेकार जाने का डर नहीं लगता? दादी ने धागे के सिरे बराबर काटे और कहा कि पिछली बार छन परिवार की बेटी आई थी तो उसे सूँघते ही पसंद आ गए थे। कुछ दिन पसंद रहे, तो वे भी कुछ दिन हैं।

गू छिंग बाँधने का वह ढंग पहचानती थी। धागे के दो फेरे लगते, पक्की गाँठ नहीं पड़ती थी। बचपन में वह अक्सर पड़ोसियों की लौटाई फूलों की पोटलियाँ खोलती थी। भीतर पंखुड़ियाँ भूरी पड़ चुकी होतीं, मगर कपड़ा साफ़ धुला रहता और दादी उससे अगली पोटली रफ़ू कर देतीं। तब उसे लगता था कि दादी सब कुछ देने को तैयार रहती हैं। मगर एक बार एक फूलवाला आया और बाज़ार से ऊँचा दाम लगाकर खिली डालियों की एक टोकरी काट ले जाना चाहता था। दादी ने उसे टोकरी तक आँगन में नहीं रखने दी।

“सचमुच एक डाल भी नहीं रख सकते?” बहुत देर तक अपने को रोके रखने के बाद उसने आख़िर पूछ ही लिया।

शन सू ने उसके हाथ की सुराही की ओर देखे बिना पहले पूछा कि टहनी रखकर क्या करेगी। गू छिंग ने कहा कि पेड़ अगर उखाड़ ले गए तो कमरे से उसकी ख़ुशबू भी थोड़े ही चली जानी चाहिए। दादी ने सिर हिलाया, जैसे वे ऐसी उदासी सुन रही हों जिसकी सचमुच कोई वजह हो। बोलीं कि कुछ दिन पहले वे सूखी टहनियाँ काट चुकी हैं, जितनी काट सकती थीं सब काट दीं। अब और चाहिए तो अच्छी टहनी काटनी होगी। उसे यूँ ही सफ़ाई करते-करते काट देना नहीं कह सकते।

गू छिंग ने आगे बहस नहीं की। उसने गीला कपड़ा फैलाकर सूखने रखा, फूलदान में आधा कटोरा पानी डाला और उसे खिड़की के नीचे रेशम की पहली मेइ की डाली के पास रख दिया। नक़ली डाली इन दिनों उसके साथ बाहर जाती रही थी और उसने कई बार उसे सुधारा भी था। पंखुड़ियों के किनारों पर बहुत हल्का रोआँ उठ आया था, जो एकदम पास से ही दिखता था। उसने बारीक सुई निकालकर किनारा सँवारा, मगर तभी दीवार के पार से फूलों की ख़ुशबू फिर नाक तक आ गई। हाथ फिसला और सुई की नोक उँगली के पोर में धँस गई। उसने ख़ून की छोटी-सी बूँद कपड़े से दबाई। अब उस एक नक़ली पंखुड़ी को देखने का मन और भी कम था जिसे दिन भर की भागदौड़ में वह ठीक कर पाई थी।

रात होने पर भी शन सू देर तक नहीं सोई। वह अंगीठी के पास बैठी उँगलियों में पुराना साँचे का काग़ज़ फेर रही थी, जिसके बारे में ची भाभी पूछना चाहती थीं। काग़ज़ का कोना उथले-से अर्धचंद्र की तरह कटा था। कू छिंग यह आकार पहचानती थी। दादी ने कहा था कि इसे लपेटकर सबसे सधी हुई पंखुड़ी बनाई जा सकती है। उसने यूँ ही पूछ लिया कि उस साल के फूल क्या ची भाभी के साथ बनाए थे। शन सू ने काग़ज़ पलटा और पहले कहा कि ची घर के लोगों को यही याद रखने का शौक़ है कि किसने पहले हाथ लगाया। फिर कहा कि उस साल ख़रीदार सिर्फ़ उसी को मानता था। उसने ज़िम्मा न लिया होता तो शायद सामग्री भी हाथ न आती।

गु छिंग को सुनकर लगा कि बात का दूसरा आधा अभी बाक़ी है। तभी दादी ने प्याला टटोला और कहा कि चाय ठंडी हो गई है। वह गरम पानी डालने गई। लौटी तो पुराने साँचे का काग़ज़ संदूक की तह में जा चुका था और बस पीला किनारा झाँक रहा था। गु छिंग ने फिर नहीं पूछा। वह ख़ुद भी तो बाहर अक्सर कहती थी, गु परिवार के फूल। कभी एक-एक करके नहीं बताती थी कि रेशम किसने रंगा या डंडी का सिरा कसने का तरीक़ा किसके हाथों से सीखा। उन हाथों को अलग-अलग पहचानना मुश्किल था। जैसे देर तक साथ काम करने भर से वे अपने-आप एक परिवार के हाथ बन जाते हों।

दादी के सो जाने पर घर में आख़िर शांति हुई। चाँद पुराने मकान के टूटे छज्जे के ऊपर से निकल रहा था और कुएँ की मुँडेर का आधा हिस्सा सफ़ेद, आधा धूसर दिख रहा था। गू छिंग को डर था कि रात की हवा चूल्हे के पास की बची आँच बुझा देगी, इसलिए उसने पहले भट्ठी का दरवाज़ा ठीक से भेड़ा, फिर आँगन का दरवाज़ा खोला। कैंची बाँह में थी और पतली गर्दन वाली सुराही खिड़की के नीचे रखी थी। आधी सुराही के साफ़ पानी में दीए की थोड़ी रोशनी झलक रही थी। उसने सोचा था कि यह काम रेशम का एक थान उठा लेने जितनी सफ़ाई से कर लेगी। टहनी के नीचे पहुँची तो सबसे पहले जूते के तले पतले पाले की एक परत चटकने की आवाज़ सुनी।

गू छिंग पहले चुपके से मेइ की डाल काट लेना चाहती थी। रात हुई तो उसने कैंची हवा में उठाई, फिर नीचे कर ली। डाल अच्छी तरह बढ़ी थी और उसकी नोक पर दस से ज़्यादा अनखिली कलियाँ थीं। उसे अचानक समझ आया कि दादी इतने बरसों से काटी हुई डालियाँ पड़ोसियों में क्यों बाँटती आई थी, मगर पैसे कमाने के लिए एक मुट्ठी ज़्यादा काटने को क्यों तैयार नहीं होती थी।

चाँदनी रात में आँगन की दीवार के पास रेशमी फूल बनाने वाली युवा कारीगर कैंची उठाए मेइ की डाल के सामने ठिठकी है। डाल पर अब भी कलियाँ हैं और दीवार के पीछे अँधेरे में मरम्मत की बाट जोहता पुराना घर दिखाई देता है।
चाँदनी में कैंची नहीं चली

वह फ़ौरन कमरे में नहीं लौटी। बाएँ हाथ में अब भी डाल का सिरा थामे थी। वह रेशम की डाल से सख़्त लगा और अँगूठे के पास एक कली में ज़रा-सी गीली ठंडक थी। काट ले तो फूल उसके अपने फूलदान में खिलेंगे। कम-से-कम बग़ल का मालिक इस एक डाल को नहीं ले जा सकेगा। मगर डाल का सिरा अभी और बढ़ सकता था। अगले साल इस वक़्त वह यहीं होगा या नहीं, इसका वादा फूलदान का आधा कटोरा पानी नहीं कर सकता था। उसने डाल के नीचे से हाथ हटा लिया। डाली हल्के से ऊपर उछली, कलियों ने चाँदनी छुई और फिर स्थिर हो गईं।

कैंची नीचे नहीं आई, पर ठंड से उसके हाथ में दर्द होने लगा। गू छिंग कुएँ के पास उकड़ूँ बैठ गई और कैंची घुटनों पर सपाट रख ली। अचानक उसे लगा जैसे वह कोई ग्राहक हो जो दाम चुका चुका है मगर माल नहीं मिला, और अब बेकार बैठा इंतज़ार कर रहा है कि बाकी का हर्जाना भी कोई उसे दे। उसे यह ख़याल अच्छा नहीं लगा। सिर उठाकर खिड़की की ओर देखा। दादी की खाट ठीक उसके भीतर थी। दीये की बाती बहुत धीमी कर दी गई थी और परदे पर किसी की परछाईं नहीं थी।

उसने सोचा कि थोड़ी देर में दादी से जाकर कहेगी कि उसने टहनी नहीं काटी। मानो यह बात कहते ही दादी निश्चिंत हो जाएँगी और पेड़ बचाने का काम फिर उसे सौंप देंगी। मगर वह पाँव सुन्न हो जाने तक बैठी रही। आखिर उठकर बस गीला कपड़ा घर के भीतर ले गई और बोतल का पानी वापस फूलों को सींचने वाले बर्तन में डाल दिया। बोतल के मुँह की चिप्पी उसके हाथ की पीठ से रगड़ी। उसने उस जगह को छुआ, फिर उसे छिपाने के लिए कोई टहनी नहीं ढूँढ़ी।

शेन सु गहरी नींद में नहीं थीं। पानी की आवाज़ सुनकर पूछा, बाहर ठंड है क्या। गु छिंग ने कहा, है। दादी ने उससे कैंची पोंछकर सुखाने को कहा, वरना धार पर जंग लग जाएगी। वह मेज़ के पास एक पल ठिठकी। दादी तब तक करवट ले चुकी थीं, जैसे उन्हें और कुछ कहना ही न हो। गु छिंग ने कैंची पोंछी और दोनों की साझा सिलाई की थैली में लौटा दी। उँगलियाँ अभी पूरी तरह गरम नहीं हुई थीं। उसने उन्हें थैली की एक ओर के टाँकों पर दबाया तो एक हल्की-सी छाप रह गई।

पूर्णिमा की रात चाँदनी देर तक उजली रही। बगल के घर से निकालकर रखे गए टूटे दरवाज़े के पट की छाया दीवार पर पड़ रही थी। गू छिंग लेटने के बाद भी मेइ की उस डाल को पहचान पा रही थी। उसने डाल काटकर नहीं ली थी, फिर भी वह कुछ ज़्यादा सुरक्षित लगती हो, ऐसा नहीं था। उसे याद आया कि मास्टर दिंग ने कहा था, वे लिखे अक्षर पढ़ सकते हैं, किसी को हुक्म नहीं दे सकते। उसे वन जीछांग की बात याद आई कि गाड़ी मोड़ना मुश्किल है, और चाची छन की सिकुड़ी भौंहें याद आईं, जब वे किसी के कपड़े से कीचड़ के छींटे रगड़कर निकाल रही थीं। इन बरसों में वह जिस काम में सबसे निपुण हुई थी, वह था कपड़े को मनचाहे आकार में काटना। सामने के इन जीते-जागते लोगों की ज़रूरतों को एक ही बार में बराबर काट दे, ऐसी कोई कैंची नहीं थी।

उजाला पूरा फैला भी नहीं था कि वह उठकर पानी गरम करने लगी। शेन सु अभी रज़ाई ओढ़े बैठी थीं। गु छिंग ने पहले दादी के रोज़ के जूते अंगीठी के पास सरका दिए और उनसे आज घर से न निकलने को नहीं कहा। उसने पिछली रात सँभालकर रखी गिरे हुए फूलों की तीन छोटी पुड़ियाँ टोकरी में डाल लीं। सोचा, रास्ते में चेन चाची को देती जाएगी, फिर घूमकर वेन परिवार के लोगों से मिलेगी। फूलों की पुड़ियाँ इतनी हल्की थीं कि उनके होने का पता भी नहीं चलता था। पतली गर्दन वाली बोतल वह शेल्फ़ पर ही छोड़ गई।

निकलते समय शन सू ने उसे रोककर कहा कि सबसे बाहर वाली रेशमी मेई को टोकरी की तली में रख ले, नहीं तो फूल रास्ते भर दीवार से टकराएगा। गू छिंग ने उसकी जगह बदली और फिर कहा कि आज वह बस कागज़ के बारे में पूछने जा रही है। वे उधार देने को तैयार हुए तो दिंग साहब से पढ़वा लेगी, नहीं हुए तो भी पहले उनकी बात पूरी समझेगी। दादी ने सिर हिलाया। जी भाभी ने जिस पुराने नमूने का कागज़ माँगा था, उसकी छोटी चौकोर तह बनाकर टोकरी के किनारे रख दी। बोलीं, रेशम की दुकान के पास से गुज़रो तो पहले यह लौटा देना। किसी को यह न लगे कि एक पुराना कागज़ छोड़ने को भी मेरा मन नहीं करता।

गु छिंग ने काग़ज़ लिया। वह उसके अंदाज़े से मोटा था और पीछे अब भी हल्के निशान थे जहाँ किसी और तरह के नमूने उस पर रखे गए थे। उसने न बताया कि पिछली रात क्या सोचा था, न कहा कि दादी का काग़ज़ लौटना चाहिए था या नहीं। उसने दोनों चीज़ें अलग रखीं। झरे हुए फूल टोकरी में और साँचे का काग़ज़ आस्तीन में। दीवार के उस पार किसी ने नया बुहारा हुआ आँगन का दरवाज़ा खोला। लकड़ी की धुरी से एक आवाज़ उठी और वह उसी आवाज़ की ओर, पड़ोस की तरफ़ चल दी।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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