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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

मेज़ पर छूटे फूल

कू वूजी · AI सृजन · 8511 अक्षर · लगभग 11 मिनट

आख़िरी चालीस डालियाँ याओ की दुकान पर पहुँचीं तब धूप अभी पूरब की दीवार के ऊपर नहीं आई थी। गु छिंग ने संदूक पिछवाड़े में पुरानी जगह रख दिया। फूल परखने की मेज़ के पास पीछे-पीछे नहीं गई। कभी खिड़की देखती, कभी अपने खाली हाथ। इस बार उसने पिछली बार से एक दिन पहले माल दिया था। कुछ डालियाँ फिर बनाने का वक्त बचा था, फिर भी डर था कि अंदर संदूक का ढक्कन बंद होने की आवाज़ सुनाई देगी।

हान जी बाहर आकर उसे बुला ले गईं। पहले उन्होंने भीतर की पर्ची उठाकर उस पर नामों की दोनों पंक्तियाँ जाँचीं, फिर उसे पहले से सजी फूलों की चार कतारें दिखाईं। बीस टहनियाँ चपटी पंखुड़ियों वाली थीं, बीस मुड़ी हुई पंखुड़ियों वाली। मोड़कर देखने पर किसी में सफ़ेद निशान नहीं पड़ा था। बस एक फूल के फंदे के पीछे धागे का सिरा कुछ लंबा छूट गया था, जिसे वहीं छोटा किया जा सकता था। गू छिंग ने सुई ली और बैठकर उसे ठीक किया। धागे का वह छोटा सिरा निकाल लेने पर भी फूल का आधार ढीला नहीं पड़ा। तब जाकर उसकी हथेली का पसीना धीरे-धीरे सूखा।

याओ ल्याओ ने दो सौ चालीस वेन चुकाए। तय रकम से ऊपर कुछ नहीं दिया। कू छिंग सिक्के डोरी में पिरोने लगी तो याओ ल्याओ ने उसे रुकने को कहा। दूसरी जगह से दो सौ फूलों का पहले वाला काग़ज़ निकाला और पहली खेप में चवालीस, अगली दोनों में चालीस-चालीस फूल लिए जाने की गिनती के नीचे एक लकीर खींची। पेशगी के एक सौ साठ वेन पहली खेप में ही कट चुके थे। अब कोई बक़ाया नहीं था और ख़राब फूलों की ज़िम्मेदारी अब भी कू छिंग की थी। दोनों ने एक-एक प्रति रखी। कू छिंग की नज़र बगल में फूल देने वाले दो और घरों के नाम पर पड़ी। उसने यह हिसाब नहीं लगाया कि अगर पूरे दो सौ बनाती तो उसका नाम सबसे आगे होता या नहीं।

लौटते वक्त वह घूमकर टोपी की किनारी वाली दुकान गई और श्याओमान से कहा कि ये बीसों टहनियाँ रख ली गईं। श्याओमान एक काली टोपी की छिपी हुई पिन बदल रही थी। हाथ रोके बिना बोली कि उसे पहले से पता था वहाँ से नहीं फटेगा। डर सिर्फ़ यह था कि गु छिंग खुद को एक और परत जोड़ने से फिर रोक नहीं पाएगी। गु छिंग ने उसे घूरा। श्याओमान ने नज़र उठाकर ज़रा-सा मुस्कराया और कहा कि कपड़े का एक टुकड़ा लेकर दूसरी तरफ़ से थामने में मदद करो। गु छिंग छोटी चौकी पर बैठकर थोड़ी देर थामे रही। इतनी-सी मदद के लिए उसने यह नहीं लिखा कि कौन किसका देनदार है। आगे जो मज़दूरी देनी थी, उसमें से भी इस मदद का कुछ नहीं काटा।

तीसरे महीने की छब्बीस से अट्ठाईस तक, वसंत पुष्प मेले के तीनों दिन, गु छिंग ने सभा भवन में अतिरिक्त मेज़ किराये पर लेने की जगह अपने साधारण फूल पश्चिमी बाज़ार में लगाए। वहाँ तरह-तरह के लोग आते थे। तली हुई टिकियाँ बेचने वाले का धुआँ उड़कर आता और उसकी फूलों की थाली के रंगों से पहले ही ग्राहकों को खींच लेता। उसने हवा रोकने के लिए एक पतला तख्ता लगाया और सिर्फ़ आठ वेन के छोटे फूल सजाए। पेचीदा कमरबंद वाले फूलों का एक नमूना रखा, बेचने के लिए उनका ढेर नहीं बनाया। सरसों का साग खरीदने आई एक औरत ने दो बार फूल छाँटे। उसे लगा सफ़ेद रंग जल्दी मैला होगा। गु छिंग ने पूछा कि वह फूल कहाँ लगाएगी। जब पता चला कि बच्चे की टोपी पर सिलना है, तो उसने पुराने लाल रंग की एक टहनी निकालकर दी कि टोपी पर दबाकर देख ले।

स्त्री जिस लड़की को साथ लाई थी उसने लाल फूल लगाने से इनकार कर दिया और पीला माँगा। गू छिंग ने उसे पीला दिखाया तो उसकी नज़र बगल वाले हरे पर जा टिकी। पीछे से माँ जल्दी मचा रही थी। गू छिंग ने सोचा झंझट ख़त्म करने को ख़ुद एक चुन दे। हाथ उठाया, फिर रोक लिया। आख़िर बच्ची ने शुरू वाला वही पुरानी रंगत का लाल फूल चुना, जैसे भूल गई हो कि पहले उसे मना किया था। गू छिंग की हँसी एक आह में बदल गई। उसने आठ वन ही लिए, बच्ची के इतना घूमकर फिर वहीं आने की वजह से समझाने-बुझाने का कोई अलग दाम नहीं लगाया।

तीन दिनों में उसकी दस टहनियाँ बिकीं, अस्सी वन के लिए। थोड़े दिन की जगह का किराया अठारह, सामान का ख़र्च लगभग बीस, बचे बयालीस। इनमें तीन दिन का उसका अपना आना-जाना अभी गिना जाना था। यह कोई बड़ी जीत नहीं थी। फिर भी चावल और धागा ख़रीदने के लिए काफ़ी थी और यह जानने के लिए भी कि फूलों के मेले की मेज़ से हट जाने पर भी उसके हाथों की बनाई चीज़ किसी को चाहिए। लुओ यी की पहली खेप के डिबिया वाले दस फूलों के दो सौ वन महीने के आख़िर में अलग से मिले। उस खेप की सामग्री, मज़दूरी और नमूने का ख़र्च निकालने पर आधे से थोड़ा ज़्यादा ही बचा। गु छिंग ने बिक्री की पूरी रक़म एक बार सामने रखकर देखी। तब उसे घर के ख़र्च, कारोबार की पूँजी और सफ़र की तीन छोटी थैलियों में अलग-अलग रख दिया।

उसने बची हुई थैली के हर वन को मुनाफ़ा नहीं माना। साल की शुरुआत से अब तक बिगड़े फूलों, बरबाद सामग्री, उधार और आधी मेज़ छोड़ने के बदले सामग्री के दाम में मिली कटौती का हिसाब एक अलग रद्दी काग़ज़ पर था। फुटकर बिक्री का कोई ठिकाना नहीं था। कभी दो बार बाहर जाने पर भी एक फूल नहीं बिकता, कभी पड़ोसी किसी और के लिए ले जाते और एक दिन में तीन फूल निकल जाते। दूसरे महीने के आख़िर से वह हर शाम आमदनी और ख़र्च की एक-एक मद लिखती थी। हिसाब मोटा था, लेकिन जिस बड़े सौदे की रक़म हाथ में नहीं आई थी, उससे अब वह अपने मन को नहीं बहलाती थी। उस समय घर में क़रीब चार सौ वन नक़द थे। महीने के आख़िर तक नई छोटी खेपों की रक़म आने लगी और आख़िरकार सफ़र की थैली ख़ाली नहीं रही।

तीसरे महीने की अट्ठाईसवीं की शाम वह लौटी, तो दादी ने अभी बाल धोए थे। आधे सूखे सफ़ेद बाल कंधों पर बिखरे थे। शन सु के बाल जवानी में घने थे और बाद में भी वह उन्हें छोटा कटवाने को राज़ी नहीं हुई थी। एक बार धोने में बहुत पानी लगता था, इसलिए गु छिंग पहले हमेशा काम निपट जाने वाली रात चुनती थी। इस बार वृद्धा ने दोपहर में ही धो लिए थे। खिड़की के पास धीरे-धीरे सुखा रही थी, गीले हिस्से पर हल्का कपड़ा लपेटे हुए; पैरों के पास आधा तसला गुनगुना पानी था जिसमें पैर भिगोए थे।

गु छिंग ने आखिरी खाली बक्सा उसकी जगह रखा और सामग्री की अगली पोटली तुरंत नहीं खोली। अलमारी से उसने तीन फूल निकाले, एक सफ़ेद, एक हल्का भूरा और वही ज़रा टेढ़ा हल्का नीला जिसे दादी ने कुछ दिन पहले चुना था। उसने दादी से एक चुनने को कहा। शेन सु ने कहा कि बाल अभी गीले हैं, फिलहाल रहने दो। गु छिंग उनके पास बैठ गई, खुले सफ़ेद बालों की एक लट अलग की और पूछा कि धीरे से कंघी कर दूँ या सूखने का इंतज़ार करें।

पीतल का आईना बस हथेली भर था। दोनों सटकर उसके आगे आईं तो किसी का भी पूरा चेहरा नहीं दिखा। गु छिंग उसे चमकाना चाहती थी। शन सू ने कहा कि पोंछने से वह खिड़की तो बन नहीं जाएगा। फिर भी गु छिंग ने मुलायम कपड़ा लिया और देर तक रगड़ा। आईने में चेहरा अब भी धुँधला पीला था, हाँ, उसके अपने माथे का स्याही जैसा छोटा निशान साफ़ दिख गया। दादी ने पूछा कि क्या वह झोउ परिवार के यहाँ गई थी। फिर हँसकर बोलीं, और कोई नहीं मिला नकल करने को, उन्हीं की तरह मुँह पर कालिख पोत ली।

गू छिंग ने नीला फूल उठाकर दादी के सिर पर लगाने की कोशिश की। शन सू बचकर हटीं तो फूल उनकी जगह गू छिंग के अपने कान के पास अटक गया। दोनों ने एक साथ आईने में देखा। फूल इतना बड़ा था कि गू छिंग का आधा चेहरा ढक गया था। वह नमूने देखने की बैठक में दिखी उस टोपी जैसी लग रही थी, मानो सिर पर वसंत की साग-सब्ज़ी रखी हो। दोनों इतना हँसीं कि आईना सँभाले नहीं सँभल रहा था। शन सू के घुटने में दर्द अब भी था। हँसी थमने पर भी उन्हें पैर धीरे-धीरे सरकाना पड़ा, दर्द यूँ ही जाता नहीं था। गू छिंग ने पैर धोने का तसला पहले ही हटा दिया, ताकि उनका पाँव उसमें न पड़ जाए।

दादी ने आखिर में हल्का भूरा चुना, हल्का नीला नहीं। हल्का भूरा उनके बालों के रंग के करीब था। उसके भीतर गरम पीले रंग की एक महीन लकीर छिपी थी। पास से न देखें तो लगता था कि उन्होंने कुछ लगाया ही नहीं। गु छिंग कहना चाहती थी कि नीले में चेहरा ज़्यादा खिला दिखेगा। मगर दादी को आईने के सामने खुद सिर घुमाते देखा तो सुई में धागा डाला और फूल धीरे से कान के पीछे लगा दिया। शेन सु खुश हुईं, फिर अचानक नुक़्स निकालने लगीं कि उसके हाथ की पिन बहुत चमकीली है, पीछे से दिखेगी। गु छिंग को उसे उतारकर गहरे रंग के धागे का फंदा लगाना पड़ा। हँसी रोककर उसने कहा कि इस ग्राहक को खुश करना सच में मुश्किल है।

“क्या मैंने पैसे दिए हैं?” शन सु ने पूछा।

“यह फूल बिक्री के लिए नहीं है। इसे पहनकर बाहर जाओगी तो लोगों को बताना होगा कि गू छिंग ने बनाया है।”

दादी ने पूरी संजीदगी से हामी भरी, फिर जोड़ा, “नमूना श्याओ मान का नहीं है, तो ले जा सकती हूँ।” गू छिंग उनकी पकड़ में आ गई और आईने को ढकने के लिए कपड़ा उठा लिया। शन सू ने आईना बचाया और कहा कि इस वक्त उनका किसी के नाम का कोई उधार नहीं है। गू छिंग ने आखिर उसे ढका नहीं। कपड़ा मुट्ठी में लिए पलंग के पास टेक लगाकर खड़ी रही। हँसी थमी तो अचानक उसका शरीर ऐसा ढीला पड़ा कि कंधे तक नीचे झुक गए।

कंघी ताँबे के तसले में गिरी तो गु छिंग ने सभा-भवन की बात फिर छेड़ी। किसी ने फूल टोपी के पीछे लगाया था। सामने खड़ी गु छिंग को दिखा ही नहीं और उसे लगा कि ग्राहक ने फूल बेकार में खरीदा। शन सू ने कहा कि पहले भी लोग ऐसे पहनते थे। दूसरों को लगता कि आगे वाला अकेला चला जा रहा है, मगर पीछे चलने वाले की नज़र सबसे पहले फूल पर पड़ती। कहते हुए उसने हाथ उठाकर जगह दिखाई। उसकी उँगलियाँ इतनी फुर्तीली थीं कि लगता ही नहीं था कि अभी उसे धागे का फंदा बदलवाना पड़ा था। गु छिंग ने पूछा कि जवानी में वह खुद कैसे पहनती थी। बूढ़ी ने कहा, मैं तो सब ग्राहकों के लिए बनाती थी, खुद पहनने की फ़ुर्सत कहाँ थी।

“तो आपको जगह इतनी ठीक-ठीक कैसे मालूम है?” गू छिंग ने पूछा।

शन सु का हाथ पल भर रुका। पहले तो वह ख़ुद हँसीं, फिर माना कि एक बार नया नमूना पहनकर किसी रिश्तेदार की दावत में गई थीं। तब उनके पास आईना नहीं था। आधी गली तक जी भाभी को साथ खींचती गईं और पूछती रहीं कि पीछे से फूल सीधा है या नहीं। इतना पूछा कि जी भाभी का मन हुआ, फूल ही निकाल दें। जी भाभी का नाम सुनकर गु छिंग ने यह नहीं पूछा कि नमूना किसने पहले बनाया था। उसने दादी का फूल ज़रा पीछे सरकाया ताकि वह भी एक बार उस तरह आज़मा लें। आईने में दिखाई नहीं दिया तो दादी ने गु छिंग को पीछे खड़े होकर देखने को कहा और लगातार तीन बार पूछा कि सीधा है या नहीं। तीसरी बार गु छिंग के जवाब में थोड़ी झुँझलाहट आ गई। शन सु ने पलटकर उसकी आँखों में देखा और दोनों एक साथ हँस पड़ीं।

उस रात उन्होंने टोफ़ू के हल्के सिककर भूरे हुए किनारे और एक कटोरा हरे प्याज़ का शोरबा खाया। गू छिंग की चॉपस्टिक आधे रास्ते पहुँची थी कि उसे तश्तरी में बचा सबसे बड़ा टुकड़ा दिखा और आदतन वह दादी को देने लगी। दादी ने पहले ही एक छोटा टुकड़ा उठा लिया और कहा कि बड़ा उनसे खाया नहीं जाएगा। गू छिंग ने बड़ा टुकड़ा तोड़ दिया और दोनों ने आधा-आधा लिया। कौन ज़्यादा त्याग करेगा, इस पर उसे एक-दूसरे की तरफ़ वापस नहीं सरकाया। खाकर उन्होंने फूलों के नमूने नहीं समेटे। बस बर्तन धोए और आँगन में बैठकर वन परिवार की तरफ़ फाटक बंद होने की आवाज़ सुनने लगीं।

मालगोदाम की आवाज़ों का अब एक क्रम था। पहले गाड़ी रुकती, फिर दरवाज़े की साँकल चढ़ती और आख़िर में दीये जलाकर पिछले आँगन की ओर जाती शू थान की पदचाप सुनाई देती। मेई की डालियों पर पत्ते आ गए थे। उनकी पतली-पतली परछाइयाँ घुमावदार दीवार पर पड़तीं। गु छिंग अब भी कभी सिर उठाकर सोचती कि पेड़ हटा दिया गया होता तो यह जगह कैसी दिखती। मगर हर रात यह सोचना ज़रूरी नहीं था। एक रात उसके न देखने से पेड़ ग़ायब नहीं हो जाता था और एक रात काम न करने से उसके खाने के लाले नहीं पड़ते थे।

देर रात शन सु ने फूल उतारा। दबकर बिगड़ न जाए, इसलिए एक उथली तश्तरी ढूँढ़कर खाने की मेज़ पर रख दिया। गु छिंग उसे नमूने के फूलों वाली अलमारी में रखना चाहती थी। दादी ने हाथ हिलाकर कहा, कल फिर पहनना है, किसी ऐसी जगह मत रखो जहाँ अपना-सा न लगे। उसने उसे वहीं छोड़ दिया। भूरा फूल सफ़ेद चीनी मिट्टी की गोल धार के पास था। बगल में पानी के दो कटोरे उलटे रखे थे। न कोई पर्ची थी, न दाम। वह दीया बुझाने गई और पलटकर एक बार फिर देखा। लौ बुझने से पहले लगा जैसे वह फूल ज़रा-सा उसकी ओर मुड़ा हो।

उनतीस की सुबह लुओ यी उस खेप की आख़िरी सुगंध की डिबिया ले गई और तय हुआ कि अगली खेप लेने चौथे चांद्र महीने की सात तारीख को आएगी। गु छिंग ने उसे दरवाज़े तक छोड़ा और घाट से पूछकर लाया हुआ केबिन के किराये का काग़ज़ निकाला। वह पहले फूलों के नमूनों के बीच रखा था और किनारे पर थोड़ी लेई लग गई थी। उसने सूखी लेई धीरे-धीरे उधेड़ी और काग़ज़ अलग से सफ़र की पोटली में रख दिया। दादी ने देखा, मगर जल्दी नहीं मचाई। वे मेज़ के पास बैठी अपने फूल के धागे के फंदे सँवारती रहीं। गु छिंग ने पूछा कि कल धूप निकली तो क्या पास के देहात तक एक बार गाड़ी में चलेंगी। दादी ने सुई रखकर ध्यान से सोचा और कहा कि नई रफ़ू की हुई टोपी साथ लेंगी।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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