प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
सफ़ेद चूने से घिरी जगह
कू वूजी · AI सृजन · 9232 अक्षर · लगभग 12 मिनट
सफ़ेद चूना पहले गु परिवार के कुएँ के पास गिरा। मुट्ठी भर नहीं, बस हवा में उड़ी थोड़ी-सी धूल। गीली ईंटों पर पड़कर उसने एक सफ़ेद धब्बा बनाया जो मुश्किल से दिखता था। शेन सु कुएँ की रस्सी खींच रही थीं। गु छिंग ने उनसे बाल्टी ली तो दीवार के उस पार किसी को कहते सुना, पश्चिम की तरफ़ एक फ़ुट और नापो। उसने बाल्टी ठीक से रखी भी नहीं और रज़ाई सुखाने की लकड़ी की चौकी पर चढ़कर दीवार के बाहर झाँका।
मेइ के पेड़ के चारों ओर तीन लोग खड़े थे। कल दरवाज़ा नापने वाले छोटी कुरती पहने आदमी ने चूने के घोल से एक घेरा खींचा था। लकीर पुरानी दीवार के पाये से गुज़रती थी और मेइ के तने के ऊपरी हिस्से पर सन की मोटी रस्सी बँधी थी। पेड़ बड़ा नहीं था, मगर उसकी डालियाँ ख़ूब फैलना जानती थीं। एक दीवार के ऊपर से जाती थी, दूसरी तिरछी होकर पुराने बरामदे में घुसती थी, जैसे दोनों घरों में उसने बात करने की अपनी-अपनी जगह छोड़ रखी हो। सफ़ेद चूने के घेरे में आते ही वे छोटी-बड़ी टहनियाँ अचानक बड़ी अकेली दिखने लगीं।
“आप लोग क्या करने वाले हैं?” गू छिंग ने पूछा।
चूने की बाल्टी उठाए आदमी ने सिर उठाकर कहा, पेड़ हटाना है। दूसरे ने उसे नीचे उतरने को कहा; दीवार का पलस्तर भीतर से खोखला है, टूट गया तो जिम्मेदार कौन होगा। गू छिंग के नीचे तो अपने घर का लकड़ी का स्टूल था। वह सफाई देने वाली थी, मगर पीछे से दादी ने पुकारा तो पहले उतर आई। आधी बाल्टी पानी लेकर अपने दरवाज़े से घूमकर निकली और उजड़े मकान के खुले दरवाज़े तक पहुँची। सीधे रास्ते में सिर्फ एक दीवार थी, पर पूर्व की पत्थर वाली गली से घूमने पर काफी चक्कर पड़ता था। बीच में खाली टोकरियों की गाड़ी को भी रास्ता देना पड़ा।
आँगन से पुराना सामान हटाया जा रहा था। टूटे दरवाज़े के दो पट उत्तरी दीवार के पास एक पर एक रखे थे। पुराने चूल्हे की राख बुहारकर छोटी-सी ढेरी बना दी गई थी। गू छिंग को बचपन में यह जगह बहुत बड़ी लगती थी। अब नई खींची काली लकीरों के बीच खड़ी हुई तो पता चला कि एक गाड़ी आड़ी कर दें तो आधे से ज़्यादा आँगन घिर जाता है। पूरबी दरवाज़े के बाहर पत्थर की गली भी सँकरी थी, इसलिए गाड़ी दरवाज़े के भीतर आ जाए तो मोड़ना मुश्किल था। लकड़ी पहुँचाने वाला बाहर खड़ा था और उतावली में तीन बार चिल्ला चुका था कि ज़रा रास्ता दो।
चालीस के आसपास का एक आदमी मुख्य कमरे से निकला। उसके हाथ में पानी पीने का ख़ाली कटोरा था। उसने पूछा कि क्या गु छिंग पश्चिम की पड़ोसन है। उसने साधारण भूरा चोग़ा पहन रखा था और जूतों की किनारियाँ कीचड़ से सनी थीं। गु छिंग ने तो सोचा था कि हवेली ख़रीदते ही वह ऐसा आदमी होगा जिसके लिए दूसरे लोग सारी गंदी जगहें बचाकर रास्ता बना दें। उसके जवाब से पहले ही उसने बताया कि उसका कुलनाम वन है, नाम जीछांग, और उसे एक बाल्टी साफ़ पानी उधार चाहिए। घर के लोग बाद में आएँगे। चाय के बर्तन, देगची और चूल्हे का सामान अभी पूरा नहीं जुटा था और मज़दूर आधा दिन काम कर चुके थे।
गू छिंग ने कुएँ की ओर देखा और कहा कि घर में पानी है, लेकिन पेड़ को बस कह देने से यूँ नहीं हटा सकते। वन जीछांग ने उसकी नज़र के पीछे मेई के पेड़ को देखा। कुछ देर रुका, फिर कहा कि पेड़ शहर के बाहर जाएगा, उसे काटकर जलावन नहीं बनाया जाएगा। दूसरे अहाते में जगह है, उसके चारों ओर खाली घेरा छोड़ा जा सकता है। यहाँ जड़ें दीवार से दबी हैं और गाड़ी भी नहीं निकल पाती। उसने बड़ी सहजता से कहा, मानो इस बात से उनकी चिंता पहले ही दूर हो गई हो।
“नगर से दक्षिण-पूर्व की ओर बाहर दस ली। बड़ी सड़क से सीधे पहुँच जाएँगे।”
“नगर से दक्षिण-पूर्व की ओर बाहर दस ली। बड़ी सड़क से सीधे पहुँच जाएँगे।”
“उसकी देखभाल कौन करेगा?”
“ज़ाहिर है, किसी ऐसे को बुलाएँगे जिसे पेड़ सँभालना आता हो।”
गू छिंग ने फिर पूछा कि अगर वह आदमी कहे कि पेड़ सँभाल लेगा और वहाँ ले जाने के बाद वह ज़िंदा न रहा तो? वन जीछांग ने पल भर होंठ भींचे। वह जानती थी कि उसका सवाल किसी को अच्छा नहीं लगेगा, फिर भी उससे रहा नहीं गया। उसने सफ़ेद चूने के घेरे के साथ नज़र दौड़ाई। सबसे मोटी जड़ दीवार के पाये के नीचे ओझल हो रही थी। दूसरी तरफ़ ठीक वही जगह थी जहाँ दादी हर साल छोटी खुरपी से मिट्टी ढीली करती थी। पेड़ सँभालना जानने वाला आदमी अगर घेरे के अंदर ही देखे तो उसे कैसे मालूम होगा कि दीवार के पीछे भी यह सब है।
वन जीछांग ने खाली कटोरा सहायक को देकर कहा कि वह ज़रा उधर जाएगा। गू छिंग ने समझा कि वह जड़ें पहचानने आ रहा है और जल्दी से रास्ता छोड़ दिया। गू परिवार के आँगन में पहुँचकर उसने पहले शन सू का अभिवादन किया और पूछा कि क्या वही हैं जो इतने समय से मेइ के पेड़ की देखभाल करती आई हैं। शन सू बरामदे में बैठी एक मुट्ठी गिरे फूल पुराने कपड़े पर फैला रही थीं। कपड़ा पुराने नीले रंग का था और भीगी पंखुड़ियों के किनारे कुछ पारदर्शी हो गए थे। उन्होंने यह नहीं कहा कि हमेशा से करती आई हैं। बस बोलीं, सूखी डाल दिखे तो चली जाती हूँ, सूखा पड़े तो एक डोंगा पानी डाल देती हूँ।
“आप लोगों ने बरसों इसकी देखभाल की है।” वन जीछांग ने कहा। उसने आस्तीन से बीस वन निकालकर मेज़ के कोने पर रख दिए, “अब यह दूसरी जगह चला जाएगा, आगे आपको यह मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इतने बरस की मेहनत का कुछ तो देना बनता है। उसे यूँ मुफ़्त में कैसे ले लें।”
कू छिंग ने बीस सिक्कों के एक-दूसरे से टकराने की साफ खनक सुनी। इतने में कितना कोयला, कितना रेशम खरीदा जा सकता है, वह सबसे अच्छी तरह जानती थी, मगर इस समय देखकर वे इतने कम लगे कि आँखों में चुभे। शेन सू ने पुराने कपड़े के दो कोने मिलाए, पैसों को नहीं छुआ। बोलीं, उनके अपने कुएँ के पास पेड़ है, गर्मियों में वहाँ बैठना भी ठंडा रहता है, किसी का उपकार लेने की बात नहीं। वेन चीछांग ने हाथ लौटा लिया, मगर पैसे मेज़ पर ही रहने दिए।
आँगन के बाहर फिर किसी ने दुकानदार वेन को पुकारा। एक औरत आई। उसने गहरे नीले-हरे रंग का कुछ पुराना लबादा पहन रखा था। एक हाथ में कागज़ों का कपड़े का खोल दबा था और दूसरे में खुरदुरी मिट्टी के दो प्याले थे। अंदर आते ही उसने पूछा कि थोड़ा पानी ले सकती है क्या। गु छिंग ने झट कहा, ज़रूर। औरत ने धन्यवाद दिया, खाली प्याले कुएँ की जगत के किनारे रखे और तभी मुड़कर अपने पति से कहा कि दरवाज़े पर वह गाड़ी अब और खड़ी नहीं रह सकती। उसने कपड़ा धोने वाली का गली में लौटने का रास्ता रोक रखा है।
उसने बात आगे बढ़ाकर शन सू को पैसे लेने के लिए नहीं मनाया। गू छिंग ने देखा कि लबादा उठाते समय उसकी आस्तीन का एक सिरा दिखा, जहाँ दोबारा पैबंद लगा था। टाँके बारीक थे, मगर रंग पूरी तरह नहीं मिलता था। वन जीछांग को जैसे उसके इतनी जल्दी आ जाने पर कुछ खीझ थी। उसने कहा कि पहले गाड़ीवान से लकड़ी उतरवा दो। स्त्री ने कहा कि पहले तय करना होगा किस जगह उतारनी है। मज़दूरों से लकड़ी भीतर ढुलवाकर फिर बाहर नहीं निकलवा सकते। कुछ बातें कह देने भर से मज़दूरी नहीं बचती। तब वन जीछांग उसके साथ बाहर गया। आँगन की दीवार के बारे में उसकी आधी बात वहीं अधूरी रह गई।
गू छिंग पानी लेकर दरवाज़े तक पहुँची। उसने सुना कि स्त्री का कुलनाम श्यू था और लोग उसे श्रीमती श्यू कहते थे। पानी डालते वक़्त उससे कुछ बूँदें प्याले के बाहर छलक गईं। श्रीमती श्यू ने हाथ बढ़ाकर हथेली ऊपर कर दी और बूँदें थाम लीं, ताकि वे साथ दबाए काग़ज़ों पर न गिरें। उसका हाथ इतने सधे ढंग से चला, जैसे रोज़ वह दूसरों के हाथ में ठीक से न सँभली चीज़ों को थामती हो। गू छिंग पहले उससे पेड़ के बारे में बात करने में मदद माँगना चाहती थी। मुँह तक बात आई तो उसने पूछ लिया कि वे कब यहाँ आने वाले हैं।
“काम करने वाले अभी तय नहीं हुए हैं।” श्रीमती श्यू ने जवाब दिया, “पहले जगह ख़ाली करनी है। पहले महीने की सोलह को गोदाम खोलना है। पूरब में पहले किराए पर लिया गोदाम उस दिन छूट जाएगा। एक दिन की देर करना भी ठीक नहीं होगा।”
पहले चांद्र महीने की सोलह तारीख। गु छिंग ने मन ही मन दिन गिने। बहुत समय नहीं था। उसे याद आया कि सुबह वह एक छोटे से ठेले की जगह के लिए खीझी बैठी थी, जबकि इन दोनों को साल बदलने से पहले पूरी हवेली तैयार करनी थी। पल भर के लिए समझ नहीं आया कि वक्त की यह तंगी अच्छी है या बुरी। शायद वे इतने व्यस्त हों कि फूलों की बात सुनने की फ़ुर्सत न मिले, या शायद इतने व्यस्त कि समय बचाने का कोई उपाय दिखे तो किसी और चीज़ को भी रहने देने पर राज़ी हो जाएँ।
वन दंपती के चले जाने पर शन सू ने मेज़ के कोने में पड़े पैसे दरवाज़े की ओर सरका दिए। गू छिंग ने कहा कि उनके लौटने पर पैसे वापस कर देंगी। दादी ने कहा कि इस बात को लेकर किसी का हाथ रोकने की ज़रूरत नहीं। आदमी पानी माँगने आया था, पूछताछ झेलने नहीं। गू छिंग का चेहरा गरम हो गया। उसने पूछा कि तो क्या उन्हें जैसे चाहें पेड़ ले जाने दें? शन सू ने जवाब नहीं दिया। खाली कटोरा समेटने को उठीं तो घुटना मुड़ा और उनका हाथ पहले मेज़ के किनारे पर टिक गया।
गु छिंग उन्हें सहारा देने लपकी, मगर दादी ने अपनी बाँह हल्के से बाहर की ओर मोड़ ली। कटोरा ठीक से पकड़कर बोलीं कि पैर में दर्द है, ताक़त अब भी है। गु छिंग बगल में खड़ी रही। उसे लगा कि आज जहाँ भी गई, किसी ने उसे बात पूरी नहीं करने दी। वह खीझकर सामान की मेज़ ठीक करने चली गई और दीवार के पास रखी फूल बाँधने वाली बाँस की कई लंबी पट्टियाँ बाँहों में उठाकर हटा दीं। उन पर मेई की एक कली अटकी थी, न जाने कब गिरी थी।
“उन्होंने मकान ख़रीदा है।” शन सू ने आख़िर कहा, “मैं पेड़ को पानी देती हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि उसे मेरी बात माननी ही होगी।”
“मैंने भी यह नहीं कहा कि वह मेरी बात माने।”
“तो कल तुम क्या करने वाली हो?”
गु छिंग ने कहा कि बिचौलिए से पूछेगी, देखेगी कि उन्होंने क्या ख़रीदा है और ऐसे मामलों का अधिकार रखने वाले किसी आदमी को ढूँढ़ेगी। तीसरी बात कहते समय वह खुद ज़रा अटक गई। वह कभी सरकारी दफ़्तर नहीं गई थी। उसे यह भी नहीं पता था कि दीवार पर झुके एक मेई के पेड़ का मामला कौन देखता है। शन सू ने उसकी ओर एक नज़र डाली। हँसी नहीं उड़ाई, बस छोटी कैंची थमाकर कहा, सच में पूछने जाओ तो पहले बाँह के किनारे का यह धागा अंदर कर लेना। लोगों को बस यही उधड़ी जगह न दिखे।
गु छिंग ने कैंची पकड़ ली। जवाब देने का जी हुआ कि आप हमेशा मेरी ग़लतियाँ मत ढूँढ़ा कीजिए। उसने नीचे देखा तो आस्तीन का धागा सचमुच कुछ दूर तक टूट गया था और अंदर का पुराना कपड़ा झाँक रहा था। दादी जब फूल बनाया करती थीं, तो ग्राहक आने पर हमेशा अपना सबसे अच्छा ऊपरी कपड़ा पहन लेती थीं। कोई उन्हें सिलाई करने वाली बुढ़िया कहता तो उनके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आता, मगर उसके जाने के बाद वे सारी दोपहर मुँह फुलाए रह सकती थीं। बचपन में गु छिंग को यह समझ नहीं आता था। अब थोड़ा समझती थी, मगर जब पेड़ उखाड़ा जाने वाला हो, तब वह पहले इस इंच भर धागे की चिंता नहीं करना चाहती थी।
साँझ को दरवाज़ा नापने वाला कामगार पानी की बाल्टी लौटाने आया और साथ ही बीस वेन वापस ले गया। उसे डर था कि गु परिवार ग़लत समझेगा, इसलिए बोला कि मालिक ने भले मन से पैसे दिए थे, इन चंद पंखुड़ियों को खरीदने के लिए नहीं। गु छिंग को उसकी बात में मालिक की लाज रखने की कोशिश सुनाई दी। उसने कहा कि वह समझती है। फिर पूछा कि क्या आज चूने से पेड़ के चारों ओर घेरा बनाने वाला माली था। कामगार ने सिर हिलाया और कहा कि वह तो बढ़ईगिरी करता है। सचमुच पेड़ उखाड़ना हुआ तो कारीगर छ्योउ को अलग से बुलाना पड़ेगा। जड़ कितनी मोटी है, कहाँ काटना चाहिए, यह तय करने की उसकी अपनी हिम्मत नहीं थी।
चाची छन गली के मुहाने से लौटीं। उनकी बाँह पर अधसूखा कपड़ा था और चलते-चलते वे उसका पानी ज़मीन पर झटक रही थीं। उन्होंने उस कारिंदे को रोककर पूछा कि कल भी रास्ता रुकेगा या नहीं। उसने कहा कि जब तक सारा सामान उतर नहीं जाता, तब तक और खेपें तो आएँगी ही। चाची छन ने सबसे ऊपर का कपड़ा उसके सामने करके कहा कि गाड़ी के पहिए से लगी कीचड़ देखो। वह कपड़ा किसी ग्राहक के लिए साफ़ धोना था। आज रात उन्हें कुएँ से एक बार फिर पानी खींचना ही पड़ेगा।
गू छिंग ने कहा कि नए मालिक को गोदाम खोलना है, शायद आगे से अक्सर गाड़ियाँ आएँगी। चन चाची ने मुड़कर उसे देखा। “तुम्हें मालूम था कि गाड़ियाँ आती रहेंगी, फिर भी बस पेड़ की पूछती रहीं?”
चेन चाची का लहजा सख़्त नहीं था, फिर भी गु छिंग के पास सवाल का जवाब नहीं था। दोनों घरों का बरसों का आना-जाना था। चेन चाची अक्सर दादी के लिए नमक ले आती थीं और गु छिंग ने उनकी बेटी के बालों की पिन का फूल भी कभी ठीक किया था। आज वह मेई के पेड़ के खयाल में इतनी डूबी थी कि देख ही नहीं पाई कि गली के मुँह पर ढाँचे भर गीले कपड़े उठाकर ज़मीन पर रखने पड़े थे। उसने चेन चाची के लिए टब में थोड़ा गुनगुना पानी मिलाया और उनके साथ कीचड़ के धब्बे रगड़कर निकालने लगी। जितना रगड़ती गई, उतना समझ आया कि उस पेड़ के नीचे सिर्फ़ उन दोनों की ज़िंदगी नहीं थी।
गू छिंग की बेचैनी कुछ कम हुई। सफ़ेद चूने का वह घेरा अपने आप में कल पड़ने वाली कुदाल नहीं था। उसने यह ख़बर दादी को दी। दादी ने बस ‘हूँ’ कहा और पुराने कपड़े में फूल रखती रहीं। गू छिंग ने अचानक हाथ बढ़ाकर उनकी उभरे जोड़ों वाली उँगलियाँ थाम लीं और कहा कि वह ज़रूर कोई उपाय ढूँढ़ लेगी। शन सू उसे देखती रहीं। उन्होंने न हामी भरी, न उसे पीछे हटने को कहा। काफ़ी देर बाद हाथ छुड़ाकर बस बोलीं कि पानी चढ़ा है, सिर्फ़ मुझे ही मत देखती रहो।
रात में दोनों घरों की दीवारों की दरारों से हवा आई। उसमें ताज़े गारे की कसैली गंध थी। गु छिंग ने दीये की बाती ठीक की और उसकी रोशनी में आस्तीन पर कुछ टाँके लगाए। फूल बनाते समय वह इससे कहीं बारीक टाँके लगाती थी। मरम्मत आधी हुई थी कि उसने फिर खिड़की खोलकर मेई के पेड़ को देखा। डालियों के बीच से सन की मोटी रस्सी लटक रही थी और रात में सफ़ेद चूने का घेरा हल्का-सा दिख रहा था। उसने अचानक सोचा कि अगर पहले एक टहनी काट ले, तो कम से कम एक चीज़ ऐसी होगी जिसे पूरी तरह दूसरे लोग उठाकर नहीं ले जाएँगे। यह खयाल आते ही कैंची के साथ उसकी हथेली से ऐसा चिपका कि छूटने का नाम नहीं ले रहा था।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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