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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास

भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा

कू वूजी · AI सृजन · 8730 अक्षर · लगभग 12 मिनट

चौथे महीने की चौदह तारीख को खाना पकाते हुए आ सुई ने सड़क पर बाकला की फलियाँ बेचने की आवाज़ सुनी। बाँस की छलनी से टकराकर फलियाँ भप-भप बज रही थीं। उसने खिड़की के पार से भाव पूछा और एक छोटी मुट्ठी खरीद ली। फली खोलने पर अंदर कोमल दानों पर सफ़ेद झिल्ली थी। उँगलियों से ज़रा दबाते ही हरा दाना निकल आया। उसने सोचा था बेटे के लौटने पर साथ खाएँगे, मगर दोपहर बाद हाँडी से बाकले की खुशबू आई तो पहले उसके पेट में गुड़गुड़ हुई।

शू शन ने सुबह कहा था कि वह पूर्वी सड़क पर किसी के घर खिड़की सुधारने जा रहा है और दोपहर बाद शायद रन की दुकान पर आई छोटी लकड़ियाँ देखने चला जाए, इसलिए लौटने का समय पक्का नहीं है। सुनते ही उसने झट से हामी भरी थी, पर जब सचमुच कटोरे लगाने लगी तो हमेशा की तरह दोनों साथ रख दिए। खिड़की के नीचे की वह नीली आस्तीन एक बार धुल चुकी थी। दाहिनी ओर ज़रा सिकुड़ गई थी और पहली सिलाई के वक़्त से कुछ ज़्यादा बराबर लगने लगी थी। उसने उसे देखा, खाने की तीलियाँ उठाईं और फिर रख दीं।

फ़ांग श्याओ ने दरवाज़े पर उकड़ूँ बैठकर पूछा कि खाने को फलियाँ हैं क्या। आसुई ने उसे तीन दाने दिए। गरम होंगे, इस डर से पहले छोटी तश्तरी में रखे। बच्ची ने गाल फुलाकर फूँक मारी, एक दाना खुद खाया और कहा कि गुइन्यांग को ये सबसे अच्छे लगते हैं, बाकी दो वह उनके लिए ले जाएगी। आसुई ने बढ़ाकर पाँच कर दिए और कहा कि तश्तरी में ही ले जाओ, आस्तीन में मत खोंसना। फ़ांग श्याओ तश्तरी लेकर दौड़ी। अहाते के बीच पहुँचकर उलटे पाँव लौट आई और बोली कि लिन दादी को धन्यवाद देना भूल गई थी।

आ सुई ने मुस्कराकर उसकी बात का जवाब दिया। बच्ची के जाते ही कमरा शांत हो गया, पर फलियों की महक और गहरी हो गई। उसने अपने लिए एक कटोरा परोसा और एक दाना चखा। इतना मुलायम कि लगभग चबाना ही नहीं पड़ा। उसने सोचा कि थोड़ी देर और ठहरे, मगर उसका हाथ खुद ही दूसरा दाना उठा चुका था। आधा कटोरा होने पर बाहर क़दमों की आहट आई। उसने सिर उठाया। दू जी ही उधर से गुज़र रहे थे, अपनी बेटी से कैंची उधार लेने आए थे।

दू ची दरवाज़े के पास खड़े होकर फलियों की ख़ुशबू की तारीफ़ करने लगा। उसने पूछा कि खा चुके हो, उसने कहा हाँ, मगर पेट में उसी वक़्त गुड़गुड़ हुई। दोनों ने सुनी। वह पहले हँसा और पूछा कि आधा कटोरा माँग सकता है क्या। आ सुई ने अलग से परोसा और उसे दरवाज़े के पास छोटी चौकी पर बिठाया। बूढ़े ने बताया कि मदिरा बनाने वालों की नई गाड़ी के पहियों पर ग़लत रंग चढ़ा दिया गया है। उसके दोनों तरफ़ जैसे अलग-अलग जूते हों। आ सुई ने चॉपस्टिक में फली उठा रखी थी और इतनी हँसी कि लगभग गले में अटक गई।

दू यिन पूरब की कोठरी से निकली। पिता को कटोरा थामे देखकर उसने छेड़ते हुए पूछा कि क्या वह फिर किसी और के घर मुफ़्त का खाना खाने आ गए। उन्होंने खाली कटोरा हिलाकर कहा कि बेटी अपने घर में पकाने को राज़ी हो तो भाभी लिन से माँगना न पड़े। वह कटोरा लेकर धोने चली गई। आ-सुई ने दोनों को धीमे स्वर में बहस करते देखा कि कैंची कहाँ रखी है। उसे अचानक लगा कि अपना कटोरा पहले खा लेने से उसने बेटे को घर से बेदख़ल नहीं कर दिया था, न ही कोई नया उधार चढ़ा था जिसे चुकाना पड़े।

उसने बचा खाना पतीले में ही रहने दिया और ढक्कन लगा दिया। चूल्हे के कोयले बुझने को थे और उसने और कोयले नहीं डाले। शाम तक श्यू शन नहीं लौटा तो उसने तीसरी बार खाना गरम नहीं किया। पहले अपनी कटोरी धोई, फिर खिड़की के पास बैठकर हथेली के रक्षक की आख़िरी किनारी सिलने लगी। हुआंगदोउ खाकर चारों पंजे फैलाए सो रहा था। फ़ांग श्याओ आड़ के बाहर से उसे बता रही थी कि उसकी बिल्ली के अब कान उग आए हैं। कुत्ते ने ध्यान नहीं दिया, फिर भी उसने पूरी बात बड़े मन से कह सुनाई।

उस दिन श्यू शन जिस खिड़की की मरम्मत कर रहा था, वह पूरब के अहाते के एक अनार के पेड़ से सटी थी। घर की मालकिन को खिड़की खुलने पर डालियों से उसका रगड़ना अखरता था। पहले बोली भीतर की ओर खुले, फिर बाहर की ओर, और आखिर में फिर भीतर की ओर खोलना बेहतर बताया। उसने लकड़ी का एक कोना छील दिया और दो बार बदलाव किया। उसे भी झुँझलाहट होने लगी। घर की छोटी बेटी पास ही कलियाँ बटोर रही थी। हर कली उठाकर पूछती कि अब खिड़की खोल सकते हैं क्या। वह बच्ची को डराना नहीं चाहता था, इसलिए ग़ुस्सा ज़ाहिर नहीं किया। उसके पाँव के पास पड़ी आखिरी कली उठाकर नीची दीवार पर रख दी।

वह औज़ार समेटने ही वाला था कि घर के मालिक ने पलंग का पाया भी देखने को कहा। पाया टूटा नहीं था, बस फ़र्श ऊबड़ था। सख़्त लकड़ी की एक छोटी फाँक लगाने से पलंग टिक जाता। उसे लगा था पल भर का काम है, पर पलंग के पीछे इतना सामान ठुँसा था कि उसे निकालने, जगह बुहारने और फिर जाँचने में असल काम से ज़्यादा वक्त लगा। जब मालिक ने कहा कि इसे अलग काम तो गिना नहीं जा सकता, उसकी आस्तीनें धूल से भर चुकी थीं। वह बहस करना चाहता था, पर डर था कि लोग समझेंगे वह लकड़ी की एक फाँक तक का हिसाब रखता है। आखिर उसने आधे दिन की मज़दूरी ली। उसका चेहरा हाथ की लकड़ी की तरह सख़्त था।

बाहर निकलते समय छोटी बेटी दौड़कर आई और उसे सबसे लाल फूल की कली दी। वह पहले लेना नहीं चाहता था, मगर बच्ची का उठा हुआ चेहरा देखकर उसने उसे थैली में रख लिया। सारे रास्ते उसे ख़ुद पर हँसी आती रही। किसी ने एक फूल दे दिया तो जैसे सचमुच उसकी आधे दिन की मेहनत का बोझ उतर सकता था। मगर घर पहुँचकर वह उस सारे सुलगते ग़ुस्से को आख़िर ठंडी हाँडी के सामने ले आया।

घुप अँधेरा होने पर ही श्यू शन लौटा। जिस घर में खिड़की ठीक करने गया था, वहाँ नाप बदल दिया गया था और उससे चलते-चलते पलंग का पाया भी देखने को कहा गया। उसने दिन भर काम किया, तीन बार उसमें नुक़्स निकाले गए, और आखिर में तय मज़दूरी भी आधे दिन के हिसाब से मिली। वह उस परिवार के धीरे-धीरे सलाह करने का और इंतज़ार करने को राज़ी नहीं था। पैसे मिलते ही निकल गया। पेट में गरम खाने का एक कौर तक नहीं था। देहरी लाँघते वक्त उसका चेहरा उतरा हुआ था।

कमरे में दीया जल रहा था। माँ की मेज़ पर कटोरा नहीं रखा था। श्यू शन ने पूछा कि खाने को क्या है। आ-सुई ने कहा, फलियों वाले चावल, देगची में हैं, थोड़ा पानी डालकर गरम कर लो। उसने ढक्कन उठाया। ऊपर के चावल ठंडे हो चुके थे और फलियों के छिलकों पर हल्की सफ़ेद सिलवटें पड़ गई थीं। जाने क्यों, मन का वह ग़ुस्सा जो अब तक बाहर नहीं निकला था, फ़ौरन अपनी जगह पा गया।

“कहा नहीं था कि लौटकर खाऊँगा?” उसने पूछा।

आ सुई की सुई कपड़े के किनारे पर ठहर गई। उसे याद आया कि उसने दोपहर में खा लिया था और दू जी के लिए आधा कटोरा भी रखा था। अचानक उसे लगा जैसे उसने किसी के साथ कुछ गलत कर दिया हो। वह जूते उतारकर पलंग से नीचे आने लगी। श्यू शन ने देखा कि माँ पलंग का किनारा थामे धीरे-धीरे घुटना सरका रही है। उसकी झुँझलाहट और बढ़ गई। उसने हाथ बढ़ाकर माँ को रोका और कहा कि वह खुद कर लेगा, मगर आवाज़ इतनी कड़ी थी जैसे एक बार फिर उलाहना दे रहा हो।

उसने पतीला चूल्हे पर चढ़ाया। नीचे राख भरी है, यह उसने देखा नहीं, और लौ उठते ही दब गई। उसने पुरानी लकड़ी की कुछ ज़्यादा ही पट्टियाँ ठूँस दीं। धुआँ पलटकर उसे लगा। उसने चेहरा पोंछा और खाँसते-खाँसते दोहरा हो गया। पीछे से आ सुई ने कहा कि पहले राख निकालो। वह फिर भी जल्दी में लकड़ी डालता रहा। तीसरी पट्टी डालने पर आख़िर ख़ुद रुका, चिमटे से कोयले निकाले और उकड़ूँ बैठकर चूल्हे की तली साफ़ की।

दू यिन खाँसी सुनकर आँगन में आई और पूछा कि पानी चाहिए क्या। उसने झट कहा कि नहीं। फिर लगा कि ढंग ठीक नहीं था, तो जोड़ दिया कि बर्तन में चावल बाक़ी हैं, वह ख़ुद गरम कर लेगा। उसने देखा कि माँ अभी खड़ी है, इसलिए उन्हें बिस्तर के किनारे फिर बैठाने साथ गई और हथेली की गद्दी की आख़िरी गाँठ पूरी की। वह चूल्हे के पास जाकर खाना अपने हाथ में लेने नहीं लगी।

भात आख़िर गरम हुआ, मगर देगची की तली में थोड़ा-सा जल गया था। श्यु शन ने पहले चखा। जले की गंध तेज़ थी और उसने सोचा चुपके से फेंक दे। माँ ने परदे के उस पार से कहा कि हुआंगदौ के कटोरे में मत डालना, उसके दाँत ख़राब हैं, सख़्त चीज़ नहीं चबा पाता। उसे छोटी खुरपी से जला हिस्सा अलग करना पड़ा। फिर उसने ऊपर का नरम भात निकाला, थोड़ा गरम पानी डाला और धीरे-धीरे खाने लगा।

कमरे में किसी ने फिर नहीं पूछा कि उसे देर क्यों हुई। आधा खाना खाने के बाद उसने ख़ुद उस घर के पलंग के पाए की बात छेड़ी और बातों में घरवालों की कंजूसी भी निकल आई। माँ ने सुनकर फ़ौरन उन्हें बुरा-भला नहीं कहा। बस पूछा कि शुरू में पलंग ठीक करने की भी बात हुई थी क्या। उसने कहा कि नहीं, बाद में उन्होंने कहा तो उसे लगा कि हाथोंहाथ कर देगा। कहते-कहते उसकी चॉपस्टिक धीमी पड़ गई। उसे अपनी ही बात में सुनाई दिया कि इन दिनों भी वह अनायास ऐसे काम करने का वादा कर बैठता है, जिन्हें हाथोंहाथ निपटा देने लायक समझता है।

आ-सुई ने सूखी मूली की एक तश्तरी उसके सामने सरकाई। कहा, उसने दोपहर बाद खा लिया था, दू परिवार के बुज़ुर्ग ने भी आधा कटोरा चखा था। जो बचा उसे लगातार गरम नहीं रखा, सोचा था वह लौटकर गरम कर लेगा। उसने ‘ओह’ कहा। पहले मन में ज़रा कसक उठी कि माँ ने उससे पहले किसी और को परोसा। फिर उसे याद आया कि अभी-अभी सड़क किनारे उसने छन शंग के साथ भाप में पकी रोटी बाँटी थी, यह पूछे बग़ैर कि घर में कौन अब भी भूखा है।

खाना खाकर उसने हाँडी की तली में चिपके कड़े भात को पानी में भिगो दिया। कटोरा धोकर ही बैठा। माँ ने उसे बैठते देखा तो पहले सुई की टोकरी एक तरफ़ खिसकाकर उसके लिए जगह बनाई। उसने पूछा कि क्या अब से जब भी वह देर से लौटेगा, वह उसका इंतज़ार नहीं करेगी। आसुई देर तक दीये की बत्ती देखती रही। फिर बोली कि भूख लगेगी तो पहले खा लेगी, नहीं लगेगी तो थोड़ी देर रुकेगी। यह भी वह ठीक से नहीं कह सकती कि किस दिन अपनी कही बात पर चल पाएगी।

श्यू शन ने सिर झुकाया, ज़रा हँसा और बोला, आज तो सच में बेस्वाद था। माँ भी हँसी। बोली, फलियाँ देगची से ताज़ी निकली थीं तो बहुत स्वाद थीं। उसने जानबूझकर माँ को घूरा। आ सुई और ज़ोर से हँसी। हँसी थमी तो हाथ बढ़ाकर उसके गाल के पास चूल्हे की बची राख की एक लकीर पोंछ दी। उँगलियों के पोर खुरदरे थे। गाल छुआ तो थोड़ी खरोंच-सी लगी। इस बार वह हटा नहीं, उसे पोंछने दिया।

हाँडी धोते हुए उसने थैले से दबकर चपटी हुई अनार की कली निकाली और खिड़की की चौखट पर रख दी। आ सुई ने पूछा, कहाँ से आई? उसने कहा, जिस घर की खिड़की ठीक की थी, वहाँ के बच्चे ने दी। माँ ने कली देखी और उस घर के बड़ों को फिर नहीं कोसा। एक छोटी चटकी हुई प्याली ली, थोड़ा पानी डाला और कली उसमें रख दी। वह अब खिल नहीं सकती थी, फिर भी दीये के नीचे उसमें एक हल्की, कोमल लाली झलक रही थी। माँ ने कहा कि कल जागने पर देखेंगे, शायद कुछ खुल जाए। बेटे ने यह नहीं कहा कि ऐसा नहीं होगा।

अगले दिन वह दोपहर से पहले ख़ास तौर पर एक बार घर आया। ताज़ा खरीदे गरम नूडल्स का कटोरा मेज़ पर रखा और कहा कि आज देर से लौटेगा, खाना मत रखना, वह बाज़ार में खा लेगा। आ-सुइ हरी प्याज़ धो रही थी। नूडल्स की महक आई तो उसने मना नहीं किया। श्यू शन उसके बैठने के बाद ही निकला। आँगन तक पहुँचकर वह फिर लौटा और अपने जले चावल की वह परत उठा ले गया। रात भर भिगोने से नरम हो गई थी। उसमें थोड़ी सब्ज़ी मिलाकर खुद खा सकता था। हर बार बेस्वाद हिस्सा माँ के निपटाने के लिए नहीं छोड़ सकता था।

शाम को वह सचमुच सड़क पर खाकर ही लौटा। दरवाज़े के पास रोटी बेचने वाले ने उसे अकेला बैठे देखकर कुछ नहीं पूछा। उसने हमेशा से तेज़ी से खाया। फिर नदी किनारे थोड़ी दूर चला और उसके बाद छोटी डिबिया लपेटने वाला कपड़ा दू यिन को लौटाने पूरब की कोठरी में गया। उसने पूछा कि आज रात खाना किसने पकाया। उसने कहा, एक बार मैंने पकाया था, पककर देगची के तले के रंग का हो गया। दू यिन ऐसी हँसी कि हाथ का धागा बटन में उलझ गया और उसे खोलने के लिए उसी से मदद माँगी।

आ सुई दक्षिण की खिड़की के पास बैठी थी। जवान लोगों की धीमी हँसी-बात सुनकर उसे थोड़ा सूना लगा। फिर भी उसने मेज़ पर बचा नूडल्स का शोरबा उड़ेल दिया। उसे ढककर इस इंतज़ार में नहीं रखा कि कोई दूसरा आए और उसकी ख़ुशबू की तारीफ़ करे। उसने अगले दिन भिगोने के लिए फलियाँ निकालीं, बस एक छोटी कटोरी। श्यू शन हुआ तो एक और तरकारी बन जाएगी। वह न हुआ तो उसे अकेले तीसरे दिन तक वही नहीं खाना पड़ेगा।

उस शाम एक पतंगा दीये के चारों ओर मंडरा रहा था। आ सुई ने सरकंडे का पंखा लेकर उसे राह दिखानी चाही, मगर वह बार-बार उजाले की ओर झपटा। आख़िर उसकी नई नीली आस्तीन पर बैठ गया। उसके पीले-सलेटी पंख एक बार खुले, फिर बंद हो गए। आ सुई बाँह उठाए कुछ देर इंतज़ार करती रही। बाँह दुखने लगी तो उसने आस्तीन का सिरा धीरे से खिड़की के पास कर दिया। पतंगा आख़िर उड़ गया। वह कंधा मलते हुए हँसी कि उससे एक छोटा-सा कीड़ा भी रोककर नहीं रखा जाता। हुआंगदोउ ने नाक से फुँफकार छोड़ी, जैसे उसकी ओर से कह रहा हो, नहीं रुकता तो जाने दो।

अँधेरा होने पर श्यू शेन घर लौटा, चौखट हल्के खटखटाई, माँ ने भीतर से उत्तर दिया। पानी उठाने आया, सहज पूछा दीया अभी उजला है?आ सुई ने कहा, पर्याप्त है। बाहर सोफोरा के पत्ते फैल चुके थे। गली की पास-दूर की आवाजें जैसे पत्तों से छनकर लहरों में कमरे में गिरती थीं। किसी को दूसरे का घर लौटना सुनने के लिए पहले अपना खाना ठंडा नहीं करना पड़ता था।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. वह दक्षिणमुखी कमरा
  2. दहलीज़ तक बर्फ़
  3. तीसरा कटोरा
  4. दरवाज़े का पल्ला गिरने से पहले
  5. दोराहे पर काले अक्षर
  6. दोपहर बाद शहर का फाटक
  7. आँगन में उधार ली हुई आग
  8. बराबर कीमत का एक दरवाज़ा
  9. दोपहर का दरवाज़ा जिस पर दस्तक न पड़ी
  10. रास्ते की तख्ती का दूसरा रुख़
  11. सुइयों की टोकरी के पास दो हाथ
  12. बर्फ़ का पानी दक्षिणी दीवार में रिस गया
  13. गाँव लौटने पर बैठने की जगह
  14. नाप की पट्टी पर छूटा एक निशान
  15. दरवाज़े के नीचे वह हाथ
  16. माँ ने उसकी ओर से जो कहा
  17. चाय के छप्पर में दरवाज़े की लकड़ी का ढेर
  18. वह छोटी राह जिससे गाड़ी नहीं गुज़र सकती
  19. पिछला आँगन किसका है
  20. एक काँवड़ माल, दो रस्सियाँ
  21. दाश्यू हाँडी उठाकर ले गई
  22. वह चौकी जिस पर कोई नहीं बैठा
  23. पुराने घर का वादा किसने किया
  24. नए दरवाज़े को बारिश में रखना
  25. वह कमरा जो अभी छोड़ा नहीं गया
  26. बढ़ई की दुकान में छूटी कंघी
  27. पट्टी पर किसी का नाम नहीं
  28. गरम कमरा दवा नहीं है
  29. दुआनवू से पहले का वह न्योता
  30. सुइयों की वह टोकरी जो बिकी नहीं
  31. चाय के छप्पर के अपने दिन
  32. पहाड़ की लकड़ी का वह सौदा
  33. किसके हाथ से काँवड़ लेनी चाहिए
  34. भात की हाँड़ी जिसे ठंडा होने तक रोकना नहीं पड़ा
  35. दरवाज़ा उन लोगों के लिए ठीक करो जो जीते हैं
  36. धूप कहाँ तक ढली

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