प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास
दुआनवू से पहले का वह न्योता
कू वूजी · AI सृजन · 8840 अक्षर · लगभग 12 मिनट
जिस दिन दू यिन की मँगाई छोटी डिबिया बनकर तैयार हुई, श्यू शन ने उसे खिड़की की चौखट पर रखा और बीस से ज़्यादा बार ढक्कन खोलकर बंद किया। भीतर तीन खाने थे। दो उँगली की टोपियों के लिए और एक लपेटकर रखे जाने वाले मुलायम फ़ीते के लिए। ढक्कन बाँधने को डोरी नहीं चाहिए थी, हल्का-सा उठाते ही खुल जाता था। उसने पत्तियाँ नहीं उकेरीं। बस उस किनारे पर हल्की गोलाई घिसी जिसे दू यिन का हाथ सबसे ज़्यादा छूता। पहले उँगली फेरकर देखा, फिर पुराने कपड़े से आज़माया। जब कोई धागा नहीं अटका, तब उसने रंदे की छीलन बुहार दी।
दू यिन देर से लौटी। उसके हाथ में शिखोउ से आई महीन रेशम की छोटी-सी गट्ठी थी। दीये के नीचे आते ही उसने पूछा कि डिबिया कितनी भारी है। श्यू शन ने सोचा था कि वह पहले देखेगी कैसी बनी है। उसे वज़न पूछते सुना तो डिबिया हथेली पर रखकर उसकी ओर बढ़ा दी। उसने उसे अपने सफ़र के थैले में रखकर बची जगह देखी और हँसकर कहा, बिल्कुल ठीक। अब बाहर जाते समय उँगली की टोपियाँ लुढ़ककर जूते में घुसने का डर नहीं रहेगा।
वह बाहर जाने वाली थी, मगर शिकौ नहीं। लू साहिबा की बड़ी बहन को यूछ्वान ज़िले में वसंत के कपड़ों की एक खेप बनवानी थी। उसने दो अनुभवी कारीगरों को साथ बुलाया था। दस-एक दिन लगकर काम पूरा करना था। खाना और रहना मेज़बान के यहाँ था, मज़दूरी हर कपड़े के हिसाब से मिलनी थी। दू यिन तीसरे महीने की छब्बीसवीं को निकलने और चौथे महीने की छठी को लौटने वाली थी। रास्ते में शिकौ पड़ता था और वहाँ से अठारह ली और उत्तर-पूर्व जाना था। शहर से कुल दूरी कोई चालीस ली थी।
अठारह ली सुनते ही श्यू शन का हाथ पहले डिब्बी के ढक्कन पर गया और उसने दू यिन के लिए उसे बंद कर दिया। दू यिन ने पूछा कि क्या वह खाना बहुत उथला है। उसने कहा, नहीं। थोड़ी देर बाद पूछा कि क्या वह उस घर के लोगों को जानती है, कितने लोग जाएँगे और रात में कहाँ ठहरेंगे। उसने एक-एक बात का जवाब दिया, फिर भी उसने पूछा कि बारिश हुई तो क्या करोगी और घर के मालिक ने मेहनताना देने से मना किया तो क्या होगा।
“पैसे न देने वाले लोग शहर में भी मिलते हैं,” उसने कहा। शू शन ने सुना तो अपने ऊपर कभी बक़ाया रहे एक सौ बीस वन याद आए। उसका चेहरा थोड़ा गरम हुआ, फिर भी उसे लगा कि दोनों बातों को एक नहीं समझना चाहिए। उसने थैले से डिबिया निकाली और ढक्कन का किनारा थोड़ा और घिसने का बहाना करके उसे अपनी बगल में रख लिया। दू यिन ने डिबिया पर एक नज़र डाली और उसे फिर नहीं उठाया। रात में उसने डिबिया जैसी थी वैसी ही लौटा दी और उसके जाने की तारीख़ फिर नहीं छेड़ी।
अगले दिन लू साहिबा आँगन में कपड़ा देने आईं। श्यू शन ठीक उसी वक़्त बाहर दरवाज़े की धुरी सुधार रहा था। वह गुइन्यांग को यूछ्वान के खाने के बारे में बता रही थीं। वहाँ वसंत में आटे के पकवानों में एक तरह की हरी पत्ती डालते हैं, जीभ की नोक पर हल्की कड़वाहट आती है और फिर मिठास लौटती है। श्यू शन ने बड़ी देर सोचा, फिर बीच में कहा कि दू यिन के पिता के जूते अभी ठीक नहीं हुए हैं, शायद उसके मायके में भी उसकी ज़रूरत हो। क्या कोई दूसरी, कुछ फ़ुर्सत वाली कढ़ाई करने वाली ढूँढ़ी जा सकती है?
श्रीमती लू ठिठक गईं। उन्होंने पूछा कि क्या यह दू यिन की अपनी इच्छा है। श्यू शन ने कहा कि उसने जाने से मना तो नहीं किया, बस उसे खुद ऐसा लगा। श्रीमती लू ने कोई जवाब नहीं दिया। कपड़ा समेटकर वे पूरब के कमरे में दू यिन के पास चली गईं। भीतर इतनी धीमी आवाज़ में बात हो रही थी कि श्यू शन कुछ सुन नहीं सका, मगर उसके हाथ में दरवाज़े की धुरी छिलते-छिलते और पतली होती गई। जब गड़बड़ी दिखी तो उसे अलग रखना पड़ा और लकड़ी का नया टुकड़ा ढूँढ़ना पड़ा।
दोपहर के खाने के बाद दू यिन दक्षिण की कोठरी के दरवाज़े पर आई। आ-सुई ने उसकी चाल पहचान ली और जगह देने को उठना चाहा, पर उसने हाथ हिलाकर कहा कि बस श्यू शन से मिलना है। दोनों आँगन में आए। उसने यह नहीं पूछा कि वह उसकी ओर से क्यों बोला। पहले डिबिया निकाली और तय किए हुए पंद्रह वन के साथ उसके हाथ के पास रख दी। सिक्कों का कोई ख़ास वज़न नहीं था। फिर भी जैसे ही उसका हाथ नीचे हुआ, लगा कि लकड़ी की डिबिया फिसल जाएगी।
“क्या चाचा दू ने तुमसे कहा था कि उनकी तरफ़ से मुझे रोक लो?” उसने पूछा। श्यू शन ने सिर हिलाकर मना किया। उसने फिर पूछा कि क्या उसने कभी कहा था कि उसे घर से बाहर जाने में डर लगता है। उसने फिर सिर हिला दिया। दू यिन उसे देखती रही। उसकी आँखों में तेज़ ग़ुस्सा नहीं था, उलटे कुछ थकान थी, जैसे कई रातें बारीक सिलाई में लगी हो और आख़िरी टाँके के लिए फिर से सुई में धागा डालना पड़े।
उसने कहा कि उसे बस चिंता थी। उसने डिब्बे का ढक्कन उठाकर किनारे का हल्का चाप दिखाया: “यह ठीक बना दोगे, तो मैं इस्तेमाल करूँगी। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे जाने से अनिष्ट होगा, तो यह मत कहो कि मेरे पिता मेरे बिना नहीं रह सकते।” श्यु शन का गला कस गया। वह पूछना चाहता था कि कुछ हो गया तो क्या, मगर अंततः अपनी ही उस बात में सुन लिया कि अभी न हुई विपत्ति के नाम पर उसने पहले ही उसे पकड़ रखा है।
दू यिन ने कहा कि उसके पिता को पहले से मालूम था। पिछली रात तो उन्होंने किसी के हाथ पूछ भी भेजा था कि क्या वह यूछ्वान से थोड़ा मदिरा का ख़मीर ला सकती है। उन्हें अपनी बेटी हर वक्त अपने जूतों के पास बैठी नहीं चाहिए थी। इतना कहकर उसने डिबिया वापस ली, पूरब की कोठरी में लौट गई और दरवाज़ा बंद कर लिया, पटका नहीं। उस हल्की-सी आवाज़ ने श्यू शन को डाँट सुनने से भी ज़्यादा शर्मिंदा कर दिया। उसने पंद्रह वन मेज़ पर रख दिए और रात भर उन्हें हाथ नहीं लगाया।
आ सुई ने पूछा क्या हुआ। उसने कहा कि वह ज़रूरत से ज़्यादा बोल गया। माँ बात सँभालने के लिए दू यिन के कमरे में जाना चाहती थी। उसने रोककर कहा, बात मेरे मुँह से निकली है, माँ को उसमें और कुछ जोड़ने की ज़रूरत नहीं। कहते वक्त भी उसने पूरा नहीं सोचा था कि बात कैसे सुधारे। इतना जानता था कि अगर माँ को भी भेज दिया, तो दू यिन के सामने एक दरवाज़े की जगह उन लोगों की परत-दर-परत खड़ी हो जाएगी जो समझते हैं कि वे उसी की भलाई कर रहे हैं।
अगले दिन वह लू न्यांगज़ी से मिलने गया। आँगन में वसंत के कुर्ते सूख रहे थे। कपड़ों की पतली डोरियाँ हवा में उठ रही थीं, जैसे मुलायम पंखों का झुंड हो। लू न्यांगज़ी ने उसे देखा, भीतर नहीं बुलाया। उसने दरवाज़े पर ही कहा कि कल वह दू यिन का संदेश लेकर नहीं आया था। जाने की तारीख़ वही मानी जाए जो दू यिन खुद पक्की करके बताए। लू न्यांगज़ी कुछ देर उसे देखती रहीं, फिर कहा कि काम तय हो चुका है और उनका पहले से भी किसी बढ़ई के मुँह से कढ़ाईगर की छुट्टी की अर्ज़ी सुनने का इरादा नहीं था।
श्यू शन आँगन के बाहर खड़ा रहा। हँसना चाहा, हँसी नहीं निकली। उसने पूछा कि वहाँ का रास्ता पहले जाकर देखना होगा क्या। उसने कहा, साथ जाने वाले दो बार उस रास्ते से जा चुके हैं, ज़रूरत नहीं। लौटते हुए वह घूमकर ल्योउजिंग गली गया। दू जी दरवाज़े पर उकड़ूँ बैठा पुराना जूता खोल रहा था। बेटी का ज़िक्र सुनकर बोला कि शराब बनाने की ख़मीर ले जा सके तो ले जाए, उस ज़रा-सी चीज़ के बोझ से उसके कपड़े का माल ख़राब न हो। श्यू शन ने हामी भरी। उसे इस बात से ज़्यादा मुनासिब कहने को और कुछ नहीं सूझा।
साथ जाने वाली कढ़ाईकार झांग रोंग नमूने का कपड़ा मिलकर देखने पहले ही आँगन में आ गई। पीछे उसका पति कपड़े रखने की लंबी टोकरी उठाए था। वह टोकरी का सामान कम करना चाहता था, मगर झांग रोंग ने उसकी आस्तीन से अपने दो जोड़ी मोटे मोज़े ढूँढ़ निकाले। उसे डर था कि रास्ते में पत्नी के पाँव ठिठुरेंगे, इसलिए चुपके से ठूँस लिए थे। तलवों पर अभी जलावन की राख लगी थी। दोनों वहीं हँसते हुए एक-दूसरे को कोसने लगे। झांग रोंग ने राख झाड़ी, एक जोड़ी रखी और दूसरी उसे वापस ले जाकर धोने को दी।
आदमी ने पूछा कि रात को मुर्गियाँ दड़बे में न लौटें तो क्या करे। उसने कहा, हमेशा की तरह दक्षिण की दीवार की ओर से हाँकना, पिछली बार की तरह पड़ोसी का मुर्गा भी साथ मत बंद कर देना। उसने कहा कि समझ गया, फिर मुड़कर दू यिन से पूछा कि क्या वह देखेगी कि उसकी पत्नी कच्ची और ठंडी चीज़ें कम खाए। दू यिन ने हँसकर कहा कि उसका अपना भी उन्हें खाने का मन है। आख़िर उसने और हिदायत नहीं दी, ख़ाली टोकरी उठाकर चल दिया। आँगन के फाटक तक पहुँचकर याद आया कि टोकरी साथ नहीं ले जानी थी। लाल चेहरा लिए फिर लौटाकर गया। शू शन ने कमरे में हँसी सुनी तो वह भी हँस पड़ा। फिर बड़ी-सी रोटी का जो टुकड़ा दू यिन के थैले में चुपके से रखने को तैयार किया था, उसे वापस मेज़ पर रख दिया।
पच्चीसवीं तारीख़ आई तो दू यिन आँगन में अपना सफ़र का सामान धूप दिखा रही थी। आ-सुई को कपड़े में लिपटे कुछ अंगुश्ताने दिखे। पास जाकर कहना चाहती थी कि सामान ज़्यादा होने की फ़िक्र मत करो, खाने को थोड़ा और रख लो। होंठों तक बात आई तो बदलकर कहा, रास्ते में धीरे चलना। दू यिन ने शुक्रिया कहा और अचानक पूछा कि क्या बाहर निकलते समय उसका भी मन होता है कि घर का सब कुछ साथ ले जाए। आ-सुई हँसी और बोली कि शहर जाते समय तो टूटी डोई तक गाड़ी में ठूँसना चाहती थी।
दू यिन ने उसे अपना थैला दिखाया। उसमें बदलने के दो जोड़े कपड़े, सुई-धागे की एक छोटी पोटली और लकड़ी की डिबिया भर थी। आ सुई ने देखा कि डिबिया में वही लचीला नाप रखा है, जिसका सिरा घिसकर चमकने लगा था। अचानक उसे लगा कि इस युवती को जो चालीस ली जाना है, वह पुराने घर से शहर आने में उसके अपने अठारह ली से भी कुछ ज़्यादा दूर है। उसने कमरे में लौटकर अचार वाली मूली की दो फाँकें काटीं और पूछा कि ले जाओगी? दू यिन ने कहा, ले जाऊँगी, बस बहुत ज़्यादा मत देना, नमक वाली चीज़ खाने से जल्दी प्यास लगती है।
शाम को दू यिन ने नई डिबिया में अंगुश्ताने रखने शुरू किए। एक छोटा-सा अंगुश्ताना लुढ़ककर उसके पाँव के पास आ गया। श्यू शन ने उठाकर अपनी उँगली में पहनना चाहा। किसी तरह नहीं चढ़ा तो दोनों हँस पड़े। उसने अंगुश्ताना उसकी हथेली पर लौटा दिया। वहाँ बारीक सुई का छोड़ा एक लाल बिंदु था। उसकी नज़र पल भर ज़्यादा ठहरी तो दू यिन ने मुट्ठी बंद कर पूछ लिया कि क्या अब भी नाप लेना है। उसके कान गरम हो गए। कहा, नहीं, डिबिया उसी अंगुश्ताने की नाप पर बनी है जिसे तुम इस्तेमाल करती रही हो। उसने सिर झुकाकर ढक्कन खोला। सचमुच नाप बिल्कुल ठीक थी। उसने उसके हुनर की फिर तारीफ़ नहीं की, बस सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला अंगुश्ताना सबसे आसानी से हाथ आने वाले खाने में पहले रख दिया।
शाम को श्यू शन ने पूरब वाले कमरे के दरवाज़े के पास चलने की एक छड़ी रखी। वह चौकी की मरम्मत से बची सख़्त लकड़ी की थी। उसने बस किरचें छीली थीं, अपनी मर्ज़ी से उस पर नाम नहीं तराशा था। रखकर उसने छड़ी फिर उठा ली और दरवाज़ा खटखटाकर पूछा कि वह इसे इस्तेमाल करेगी क्या। दू यिन ने दरवाज़ा खोला, लंबाई परखी और कहा कि ज़रा लंबी है। उसने जहाँ दू यिन का हाथ टिकता था उसके हिसाब से कुछ हिस्सा काट दिया। कटा हुआ टुकड़ा ठीक उन दोनों के जूतों की नोकों के बीच आ गिरा।
उसने दो कदम चलकर देखा, कहा कि काम की है, और दाम पूछा। उसका मन कहने का हुआ कि पैसे नहीं चाहिए। पल भर रुका, फिर बोला कि छोटी लकड़ी उसकी अपनी बची हुई थी, मेहनत के चार वन होंगे। उसने पैसे निकाले और उसने ले लिए। उसके मन में पिछली बार डिब्बी बेचने जैसी ठंडक नहीं थी। वह जानता था कि उसे ज़रूरत न हो तो वह मना कर सकती है, और उसे भी अब अपने मन की बात ऐसी चीज़ में छिपाने की ज़रूरत नहीं थी जिसे लेना उसके लिए मजबूरी हो।
रवाना होने के दिन श्यू शन उसे विदा करने शहर के फाटक तक दौड़ा नहीं गया। सुबह उसने मो यिंग से पानी खींचने का लकड़ी का ढाँचा ठीक करने का वादा किया था। ढाँचे का एक सिरा फटा था। दोपहर बाद तक टालता तो बिस्तर की धुलाई आधा दिन देर से होती। वह आँगन में काम करता रहा। दू यिन और साथ जाने वाली कढ़ाईगरों की हँसी-बातें सुनीं। फांग श्याओ ने पूछा कि क्या वह यूछ्वान की एक चिड़िया ला सकती है। दू यिन ने कहा, चिड़िया के अपने पंख हैं, वह मेरे थैले पर सवारी करने को राज़ी नहीं होगी।
जाने से पहले दू यिन उसके पास रुकी। उसने नए संदूक पर हाथ रखकर ज़रा-सा दबाया और पूछा कि क्या वह उसके लौटने तक इंतज़ार कर सकता है, फिर दोनों साथ नदी किनारे वाली दुकान में नूडल्स खाने चलें। शू शन ने सिर उठाया। वह लगभग उसकी बात को किसी तरह का वादा समझ बैठा। थोड़ी देर बाद ही कहा, ठीक है। उसने यह भी कहा कि दुआनवू उत्सव तक इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं। छह तारीख़ तक लौट आई तो सात को चलेंगे। रास्ते में देर हुई तो लौटकर तय करेंगे।
वह उसे दरवाज़े से निकलते देखता रहा। हाथ की छेनी पल भर उठी रही, फिर उसने एक तरफ़ रख दी। आ-सुई खिड़की के नीचे बैठी थी। उसने कुछ नहीं कहा कि यह अच्छी बात है या नहीं। नया धागा पकड़े देर बाद सुई में डाल पाई। आँख उठाकर देखा कि बेटा अब भी बाहर देख रहा है, तो कहा कि पानी की बाल्टी की टेक ज़रा और ऊँची बनाना। मो यिंग की बाल्टी उसकी अपनी बाल्टी से बड़ी है।
दोपहर बाद उसने ढाँचे के पाए दबाकर जमा दिए। मो यिंग आज़माने के लिए पानी से भरी बाल्टी लाई। ढाँचा नहीं हिला। उसने बाल्टी नीचे रखी, साँस छोड़ी और कहा कि आज आखिर इसे घुटने से टेक नहीं देनी पड़ेगी। श्यू शन ने अपनी मज़दूरी ली। अपने कमरे में लौटते हुए देखा कि पूरब के कमरे की खिड़की आधी बंद थी और उसके किनारे नीले धागे का छोटा-सा सिरा छूटा था। उसने उसे उठाया, अपनी थैली में नहीं रखा। दू यिन की देहरी के अंदर रख दिया ताकि हवा उसे न उड़ा ले जाए।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।
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