प्राचीन परिवेश का सामाजिक उपन्यास
माँ ने उसकी ओर से जो कहा
कू वूजी · AI सृजन · 9353 अक्षर · लगभग 13 मिनट
आ सुइ दूसरी बार दुकान पर बारहवें चंद्र महीने की ग्यारह तारीख की सुबह आई। पिछली रात घर लौटकर करवटें बदलते हुए उसे वेइ छे का उन कुछ लकड़ियों को पकड़े चुप रहने का रूप याद आता रहा। तब उसे लगा कि बेटे की पीड़ा सिर्फ़ वही न जाने। नाश्ता रोज़ से अधिक भरा था। दरवाज़े पर पहुँचकर उसने पहले एक कटोरा युवक को दिया। उसका स्वर अब भी ऐसा था मानो किसी कम खाए हुए छोटे की देखभाल करने आई हो।
वेइ छ ने कहा कि वह खा चुका है। आ सुई ने सोचा वह संकोच कर रहा है और कटोरा और पास कर दिया। बोली, तुम्हारे वरिष्ठ साथी पर इन दिनों काम बहुत है। तुम लोगों की नज़र तेज़ है, पास खड़े होकर एक बार देख लेने से झंझट बच सकता है। ‘पास’ सुनते ही लड़के का हाथ मेज़ पर ठहर गया। उसने कटोरा नहीं लिया। श्यू शन ने अंदर से सुन लिया। वह निकला तब तक माँ छोटी कंघी का ज़िक्र करने लगी थी। घरवालों को पसंद है, सो ठीक है, मगर जो काम पहले करना चाहिए उसे पहले ठीक से कर लेना चाहिए।
“चाची, आपने मुझे छेनी की कौन-सी चोट ग़लत लगाते देखा है?” वेइ त्स ने पूछा।
आ सुई ने ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं की थी। कटोरी हवा में थी और किनारे पर शोरबा हल्का-सा हिल रहा था। उसने ऊँची आवाज़ में बात नहीं की, इसलिए आ सुई उसे किसी बच्चे की झुँझलाहट कहकर टाल भी नहीं सकी। उसने बस कहा कि वह चाकू का हिसाब पूछने नहीं आई। श्यू शन कटोरी लेने झट आगे बढ़ा और माँ को एक ओर ले जाना चाहता था, मगर तभी उसने माँ को जोड़ते सुना कि तुम्हारा बड़ा साथी सीधा-सच्चा है, कुछ हो जाए तो कहता नहीं, तुम भी हर बात यूँ मत भूल जाया करो।
तभी वेइ छ ने नज़र उठाई और कहा कि उसे याद है, ठीक इसीलिए जो काम उसे कहा ही नहीं गया था, उसकी ज़िम्मेदारी वह नहीं ले सकता। उसने छोटी कंघी की बात फिर नहीं की। मेज़ पर से पहले से नापी हुई लकड़ी उठाकर आँगन में चला गया। आ सुई खड़ी रही। उसकी पीठ पर गरमी की एक लहर-सी उठी। उसे लगा जैसे उसने ख़ुद दो बातें ज़्यादा नहीं कह दी थीं, बल्कि इस नौजवान ने दुकान में उसे उस जगह से हटा दिया था जो किसी बड़े-बुज़ुर्ग की होनी चाहिए।
श्यू शेन ने वहीं माँ से नहीं कहा कि मैंने ही उसे दोबारा नापने को नहीं कहा था। उसने शोरबा रख दिया और कहा कि पहले थोड़ा खा लो, तभी दरवाज़ा उतारना ठीक रहेगा। बेटे को अब भी अपनी तरफ खड़ा देखकर माँ को और लगा कि अभी उसने तो बस एक उचित बात सुननी चाही थी, जो मिली नहीं। उसे नहीं मालूम था कि उसकी वही उचित बात वेई त्से के कानों में किसी और की कभी न गिरने दी जाने वाली प्रतिष्ठा का बोझ उस पर डालने जैसी थी।
रन छ्वान को बात समझ में आई। अगले दिन उसने सबसे पहले वेइ छ को एक सौ बीस वन दिए। उसने इसे अपनी दरियादिली नहीं बताया। बस शू शन को समझा दिया कि यह रकम उसे लौटानी है। काम का पूरा ठेका अकेले लेने का मतलब यह नहीं कि मज़दूरी पाने वाला तब तक इंतज़ार करे जब तक ठेकेदार अपनी साख सँवार न ले। शू शन ने सिर हिलाया। वेइ छ ने पैसे गिने, रख लिए और हमेशा की तरह उस दिन दुकान की खिड़कियों का काम किया। पैसे हाथ में आ गए, मगर उसके कंधों में वह पुरानी बेफ़िक्री नहीं लौटी, जब वह टेढ़ी नक्काशी दिखाकर बड़े उस्ताद-भाई से पूछ लेता था कि यह चिड़िया जैसी लगती है क्या।
ख़राब दरवाज़े की मरम्मत अब और नहीं टल सकती थी। रन छ्वान और श्यू शन ने छोटी पड़ गई धुरी निकाली, उसकी जगह साबुत सूखी लकड़ी लगाई और निचला आसन फिर बैठाया। घास की पत्तियों की जिस कतार पर पहले रंदा चलाने का मन नहीं हुआ था, उसका बड़ा हिस्सा आखिर खोलने-जोड़ने में चला गया। श्यू शन ने अपने हाथ से रंदा चलाया। छीलन की परतें उठीं। पहले पत्तियों की नोकें ग़ायब हुईं, फिर वह उथला घुमाव भी जिसे उसने कई रातों तक घिसा था। लकड़ी के नीचे फिर लकड़ी ही थी। उसके जी दुखने से उसमें रत्ती भर मज़बूती नहीं बचने वाली थी।
रन छ्वान ने मरम्मत की सारी सामग्री का भार शू शन पर नहीं डाला। दरवाज़ा मज़बूत है, यह सुनकर उसने ख़ुद भी आकर जाँचा नहीं था और एक रात के लिए अस्थायी टेक लगाने की इजाज़त भी उसने दी थी। उस्ताद और दुकान के मालिक के तौर पर उसका जो हिस्सा था, वह चेले को डाँट भर देने से नहीं चुकता था। उसने अपने हिस्से की सामग्री दी, शू शन ने बिना अलग मज़दूरी लिए मेहनत की और महीने की तेरह तारीख़ को दरवाज़ा जिस तरह लगना चाहिए था, उसी तरह फिर लगा दिया।
झोउ थोंग ने दरवाज़ा जाँचते वक्त अपना वह हाथ इस्तेमाल किया जिसे चोट नहीं लगी थी। उसने पहले निचली टेक देखी, दोनों से कुछ बार दरवाज़ा खुलवाया-बंद करवाया, फिर खुद बाहर खड़ा होकर देखा कि पल्ला उसकी ओर तो नहीं झुकता। जिस दिन दरवाज़ा सौंपा गया था उस दिन की तरह बेफ़िक्री से हाथ लगाते उसे डर लगा। उसने अपने पूरे शरीर को थोड़ा फ़ासला देकर रखा। उस फ़ासले को देखकर अचानक श्यू शन का बहुत जी हुआ कि वह उसे डाँटे। डाँटकर फिर दरवाज़ा छू भर लेता तो भी यह देखकर कम दुखता कि वह इत्मीनान से उसके पास आने को तैयार नहीं है।
दरवाज़ा ठीक से बंद हुआ तो चोउ थोंग ने बस कहा कि इस बार इतना ही रहने दो, कुछ और मत जोड़ना। श्यू शन ने वसंत में लगने वाली खिड़की की बात की। उसने फिर कहा, अभी उसे मत छेड़ो। हाथ की पट्टी बदली जा चुकी थी, मगर सूजन एकाएक नहीं उतरी थी। ग्राहक के अंदर आते ही वह ऐसा भी नहीं दिखा सकता था कि उसे चोट लगी ही नहीं। आखिरकार मज़बूती से लगे दरवाज़े के बगल में खड़े होकर श्यू शन को उस नतीजे का सचमुच सामना करना पड़ा जिसे सँभालने का उसने पहले सोचा ही नहीं था: कुछ चीज़ें ठीक होकर मज़बूत हो जाती हैं, फिर भी लोगों को याद रहता है कि चोट कैसे लगी थी।
छन शंग पिछवाड़े में टोकरियाँ समेट रहा था। सुना कि वसंत की खिड़कियों का काम अब भी रुका है, तो लगा कि झोउ थोंग किसी को सँभलने का मौक़ा ही नहीं देता। वह जानता था कि वह ठहरा काँधे पर बोझ ढोने वाला, उसकी बात का क्या वज़न होगा। फिर भी उससे रहा नहीं गया और उसने कहा कि उस्ताद शू वैसे बहुत ध्यान से काम करते हैं और छोटे उस्ताद भी अक्सर नाप लेकर आते रहे हैं। इतना कहते ही उसके अपने मन में ज़रा खटका हुआ। उसने वेइ छ के हाथ में नाप देखा था, उसे दरवाज़े के पास से गुज़रते देखा था, मगर अपनी आँखों से नहीं देखा था कि उसने नाप नई पत्थर की सतह पर रखा था या वहाँ पहुँचाई गई किसी छोटी लकड़ी पर।
झोउ थोंग ने पूछा कि उसने किस जगह नाप लेते देखा था। छन शंग जवाब नहीं दे पाया। झट कहा कि उसने ध्यान से देखा नहीं था, बस वेइ छ आया था। झोउ थोंग ने कहा कि आ जाने से यह साबित नहीं होता कि नाप ठीक से ले लिया गया था। फिर उसने और कुछ नहीं पूछा। छन शंग को निकाला नहीं गया था और आगे की टोकरियाँ भी वह पहुँचा सकता था, मगर उसे इतनी बेचैनी थी जितनी सचमुच डाँट पड़ने पर भी न होती। बार-बार मन हुआ कि कुछ और कहकर अभी की बात में रह गई ख़ाली जगह भर दे।
वह श्यू शन को ढूँढ़ने गया तो पीछे मददगार उसकी बात को इस तरह कह चुका था कि छन शंग ने भी वेइ छे को आकर नाप लेते देखा था। श्यू शन ने सुना, मगर पहले उसे सुधारा नहीं। उसने सोचा कि छन शंग उसकी मदद करने को तैयार है, दूसरों के सामने उसकी सदिच्छा उधेड़ना ठीक नहीं होगा। मन में ज़रा और गहरे उसे सच में लगा कि इस तरह सारा भार अकेले उसी पर नहीं रहेगा। छन शंग बगल में खड़ा सुनता रहा कि बात उसकी आँखों से सचमुच देखी हुई जगह से आगे निकल गई है। वह भी उसे वापस खींचने को फ़ौरन पीछे नहीं दौड़ा।
आ सुई फिर आई और आधी बात उसके कान में पड़ी। उसे आगे-पीछे का कुछ पता नहीं था, बस लगा कि शायद सुबह उसने जो कहा था, वह ग़लत नहीं था। बेटे की किरकिरी न हो, इसलिए वह वेइ छ से फिर बहस करने नहीं गई, पर जिस ख़याल की पुष्टि नहीं हुई थी, उसे अपने मन में और मज़बूती से बिठा लिया। गरम भात की वह हाँड़ी ख़ाली हो चुकी थी, फिर भी कमरे में लौटाते वक़्त उतनी ही भारी थी, मानो उसमें लकड़ी का एक छोटा-सा टुकड़ा और रख दिया गया हो, जिसका ज़िक्र बहुतों ने साफ़-साफ़ करने से परहेज़ किया था।
पुराना दरवाज़ा मज़बूती से ठीक हो गया था, सो कायदे से बाक़ी काम धीरे-धीरे आगे बढ़ाना चाहिए था। मगर शू शन ने उलटे एक और दरवाज़े का नक़्शा बनाना शुरू कर दिया। पहले कोयले की जो थोड़ी धूल पूरी तरह मिट नहीं पाई थी, उसे उसने फैला दिया और एकदम नए दरवाज़े की कल्पना की, जिसकी धुरी लंबी हो, आधार ज़्यादा ठोस हो और नक्काशी भी और बारीक रखी जा सके। अगर झोउ थोंग देखे कि उसने मरम्मत करके ही काम पूरा नहीं मान लिया, तो शायद वह वसंत की खिड़कियों का काम अब भी उसे देना चाहे। लोग दवा की दुकान के आगे से गुज़रते रहें, तो कम से कम इतना याद कर सकें कि घास की वह पत्ती कोई ख़राब दरवाज़ा बनाने के लिए नहीं उकेरी गई थी।
झोउ थोंग ने कभी यह नया दरवाज़ा माँगा ही नहीं था। रन छ्वान ने भी याद दिलाया था कि पुराना दरवाज़ा अब मज़बूत है और काम के लिए काफ़ी है। ग्राहक ने कहा है कि कुछ और मत जोड़ो तो फ़िलहाल मत जोड़ो। श्यू शन ने सुना, मगर उसे बार-बार लगता कि अगर वह यहीं खड़ा रह गया तो लोग हमेशा उसे उसी गिरे हुए दरवाज़े से पहचानेंगे। वह कुछ बड़ा करना चाहता था ताकि लोगों की नज़र सिर्फ़ ख़राबी पर न जाए और उसकी माँ भी आगे उनके सामने सिर उठाकर बोल सके।
आ-सुई ने देखा कि वह कई रात से नहीं सोया, तो उसे भी बेचैनी होने लगी। जब वह पहली बार किराए का कमरा लेने गया था तो वह साथ नहीं थी, मगर जानती थी कि बेटे ने कैसे थोड़ा-थोड़ा जोड़कर पैसे बचाए थे। जूते का तला घिसकर फटता तो फिर सिलवा लेता, नई रुईदार पोशाक के लिए हर साल कहता कि पुरानी अब भी गरम है, मगर पहाड़ में घर लाने के लिए चावल हमेशा अच्छा चुनता। अब एक दरवाज़े के चलते दुकान में उसके खड़े होने की जगह तक जैसे सँकरी पड़ गई थी। उससे देखा नहीं जाता था। उसने यह नहीं पूछा कि क्या वह जगह सिर्फ़ एक और नया दरवाज़ा देकर ही वापस ख़रीदी जा सकती है।
महीने की चौदह तारीख़ को उसने छिपाकर रखे पैसे निकाले। आठ सौ तीस वेन पहले ही गिने जा चुके थे। छह सौ निकाल लिए तो दो सौ तीस बचे। तीन-तीन सौ की लड़ियाँ पुराने कपड़े में लपेटकर उसने हाथ की टोकरी के तल में दबा दीं। हाथ में उनका भार भात की भरी हाँडी से भी ज़्यादा था। चावल की दुकान के सामने से निकली तो दुकानदार ने हमेशा की तरह पूछा कि चावल लेंगी क्या। उसने सिर हिलाया, जैसे उसकी आँखों के सामने से कोई ऐसी दूर की यात्रा छिपाकर ले जा रही हो जिसकी ख़बर किसी को नहीं होनी चाहिए।
रन छ्वान ने सुना कि वह नए दरवाज़े की लकड़ी खरीदना चाहती है तो पहले कहा कि पुराना दरवाज़ा ठीक हो चुका है, फिर से पैसे खर्च करने की ज़रूरत नहीं। वह मानती नहीं दिखी तो उसे और साफ़ कहना पड़ा: छह सौ वन में सही सूखी लकड़ी मिल सकती है, उससे आगे के सारे काम नहीं खरीदे जा सकते, और इस बात की गारंटी भी नहीं कि चोउ थोंग उसके बेटे की भेंट लेगा। वह एक माँ की सारी उम्मीदें अपने सिर नहीं लेना चाहता था, मगर दुकान को सचमुच लकड़ी भी बेचनी थी। मन पसीजने भर से पेट नहीं भरता।
आ सुई ने सिर हिलाकर कहा कि वह समझ गई, पैसे अभी यहीं रख देती है। उसके कानों में ‘सूखी लकड़ी’ और ‘फिर से बना सकते हैं’ पहुँचा, ‘गारंटी नहीं दे सकता’ भीतर तक नहीं पहुँचा। पैसे लेने से पहले रन छ्वान ने फिर कहा कि यह सौदा सिर्फ़ लकड़ी की बिक्री का है। बाहर का कोना दूसरे महीने की पाँच तारीख तक उधार इस्तेमाल कर सकते हैं। फिर नई लकड़ी आएगी तो जगह खाली करनी होगी। पुरानी जान-पहचान के चलते वहाँ अनिश्चित समय तक ढेर नहीं लगा सकते। उसने फिर हामी भरी। उसे लगा, जब तक वे उसके शन को लकड़ी बेचने को तैयार हैं, तब तक उन्होंने उससे पूरी तरह मुँह नहीं मोड़ा है।
श्यू शन लौटा तो अपनी नई लकड़ी के पास माँ की कपड़े की गठरी रखी देखी और एक नज़र में समझ गया कि कौन आया है। वह उसे दुकान के बाहर खींच ले गया। बोला कि तय हुआ था न, तुम्हारे पैसे नहीं लगेंगे। आसुई ने पूछा कि अभी तुम्हारे पास कितने हैं। वह चुप रहा। उसने फिर कहा कि कम पड़ें तो वह कुछ और इंतज़ाम कर सकती है। आधी बात पर याद आया कि कपड़े की गठरी में सचमुच बस दो लड़ियों भर खुले सिक्के बचे हैं। आगे जो कहना था, उसे कहने का भरोसा भी कम पड़ गया।
वह पैसे लौटा देना चाहता था। हाथ गठरी के कोने पर रखा, मगर उसे उठाया नहीं। ये छह सौ वेन थे। बात कोई एक वक़्त का खाना खिलाने या रात के मेहमान के लिए कुछ सुइयों में धागा डालने जैसी नहीं थी, जिसे दोनों हँसकर वहीं ख़त्म कर दें। उसने कहा कि आगे चलकर लौटा देगा। माँ ने पहले ही कह दिया कि लौटाने की मत सोचो, जल्दी दरवाज़ा बना डालो। उसकी आँखें बेटे पर टिकी रहीं, जैसे उसके हाथ बढ़ाने भर की देर हो और वह फिर से अपने उस बेटे को थाम पाए जो लकड़ी का हर काम ठीक कर लेता था।
आखिर उसने सिर हिलाया। पैसे मिल जाने से कंधे कुछ ख़ास हल्के नहीं हुए। माँ का वह थोड़ा-सा भरोसा ठीक नई लकड़ी पर आ टिका और उसके लिए यह कहना और मुश्किल हो गया कि शायद दरवाज़ा पूरा होने पर भी कोई उसे देखना न चाहे। रन छ्वान भीतर से निकले और याद दिलाया कि काम की मौजूदा मेज़ मत घेरना। ये कुछ बल्लियाँ पहले बाहर के कोने में रख सकते हो। सचमुच काम करने लगो तो दूसरी जगह ढूँढ़ना। श्यू शन ने माँ पर नज़र डाली, तब समझा कि उसने भी इस बात को उस तरह नहीं सुना था जैसे उसने पहले सोचा था, कि उसे यहीं काम करने दिया जाएगा।
नानह्वाइ गली लौटते हुए आ सुई ने बाहरी छानी की चाबी निकाल ली। पहले कहा कि लिउ चाची ने वसंत लगते ही उसे खिड़की ठीक करने को कहा है और छानी खाली है, उसमें लकड़ी के कुछ टुकड़े रख देने में क्या है। श्यू शन ने पूछा कि क्या उनसे इस बारे में बात की है। उसने जवाब दिया कि लिउ चाची ने चाबी तक उधार दे दी है। वे अपने ही लोग हैं, फिर खिड़की की मरम्मत भी तो करनी है। सुनकर उसे लगा कि फिर पूछने जाए तो जैसे अपने दोस्त को बहुत हिसाबी समझता हो। इसलिए नई लकड़ी कहाँ रखेगा, इस बात की घबराहट उसने फ़िलहाल दबा दी।
उस रात श्यू शन ने काग़ज़ पर पहले से ज़्यादा सुघड़ दरवाज़ा बनाया। घास की पत्तियों के पास पानी की एक बेहद बारीक लहर जोड़ी। सोचता रहा कि बारिश के बाद लकड़ी का रंग कैसा होगा, फिर माँ की डलिया की तली में रखी सिक्कों की वे दो लड़ियाँ याद आईं। उसने काग़ज़ पलटा। पीछे कोरा था। अचानक उसे और देखने का मन नहीं हुआ। उसने काग़ज़ फिर सीधा किया और लकड़ी के भार से दबा दिया। खिड़की के बाहर कोई घर लौटा और दरवाज़ा धकेलने की आवाज़ आई। उसने सुना तो पहला ख़याल फिर यही था कि उसके दरवाज़े को लोग दोबारा कब अच्छा कहेंगे।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से की गई मौलिक रचना है, जिसे ल्यू छांगछिंग की 《逢雪宿芙蓉山主人》 और इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《雪夜留门》 के आधार पर विस्तृत किया गया है। पात्र, काउंटी नगर, मार्ग और घटनाएँ सभी तांग शैली के काल्पनिक परिवेश का हिस्सा हैं; यह मूल कविता का अनुवाद या कवि की जीवनी नहीं है।
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