मुख्य सामग्री पर जाएँ

CooLWJ पर खोजें

选择搜索范围,输入关键词后按回车。

भाषा

हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं

कू वूजी · AI सृजन · 8997 अक्षर · लगभग 12 मिनट

पाँचवें महीने की सत्ताईस तारीख़ को दादी-पोती नानपू में वापसी की नाव का इंतज़ार कर रही थीं। धारा के साथ जाना हो तो किनारे से एक धक्का काफ़ी था, मगर धारा के विरुद्ध जाने वाली नाव हवा पर निर्भर थी। नाविक पानी का रंग देखता रहा और आधा दिन देर से यात्रियों को चढ़ने बुलाया। शन सू घाट पर बैठकर चावल की टिक्की खा रही थीं। इस बार उन्होंने जान-बूझकर आधी ही खरीदी और गरम रहते पूरी खा ली। आ छुन के लिए उसे सख़्त हो जाने तक पोटली में नहीं रखा। गू छिंग ने उनके होंठ के कोने पर एक सफ़ेद कण देखा और उँगली से इशारा किया। दादी ने उसे ख़ुद पोंछ लिया।

फांग युन विदा करने नहीं आईं। उनका भानजा दौड़ता हुआ आया, हाथ में कपड़े के दो टुकड़े थे जो गू छिंग के सराय के लिए फूल बनाते समय बचे थे। उसने कहा कि मौसी ने लौटाने को कहा है। बहुत छोटे हैं तो पैबंद लगाने के काम आ जाएँगे। गू छिंग ने पुराने परदे के वे पहचाने हुए किनारे लेकर हँसते हुए कहा कि ये तो शुरू से ही फांग परिवार के थे। बच्चे ने कहा कि मौसी कहती हैं, जिनसे फूल सिले गए हों उनकी बात अलग होती है। उसने फिर उन्हें लौटाने की ज़िद नहीं की। सुई-धागे की छोटी थैली में रख लिया और कहा कि लौटकर मौसी को उसका प्रणाम कहना।

किनारा छूटा तो शन सू ने मुड़कर कुछ देर नानपू की छतों की चोटियाँ देखीं। फिर देर बाद उसने गू छिंग से पूछा कि क्या-क्या देखना रह गया। उसने कहा कि मुख्य सड़क, मंदिर के बाहर का पुल और वह रात का बाज़ार जिसकी लोग तारीफ़ करते हैं। किसी को भी उन्होंने पूरा नहीं देखा। बुज़ुर्ग को कुछ अफ़सोस हुआ और गू छिंग को भी, मगर दोनों में से किसी ने और रुकने की बात नहीं की। जहाँ तक चल सकती थीं, वे चल आई थीं। बाक़ी जगहें उनके न आने से किनारे से ग़ायब नहीं हो जातीं। आगे भी अनजान लोग वहाँ जाते रहेंगे।

लौटती नाव के केबिन में कुछ ज़्यादा लोग थे। एक स्त्री मिठाई का खाली डिब्बा गोद में लिए गु छिंग के सामने बैठी थी। उसकी टोपी के एक ओर धूसर-नीला फूल लगा था। गु छिंग ने पहले बस पकड़ की जगह देखी। जितना देखती गई, उतना जाना-पहचाना लगा। एक पंखुड़ी बाहर की ओर मुड़ी थी और नीचे एक छिपा फंदा था। बनावट श्याओमान के पहले फूल से ज़्यादा सुथरी थी। वह पास से देखना चाहती थी, पर उसे लगा यह बदतमीज़ी होगी। जब स्त्री ने टोपी सँभालने को हाथ उठाया, तभी पूछा कि फूल कहाँ से खरीदा।

स्त्री ने बताया कि युनजिन में फ़ेई परिवार की टोपी की दुकान से ली है; नए फूल बनाने वाली युवती दोंग के हाथ बड़े कुशल हैं, धूसर नीला शुद्ध नीले से देर तक भला लगता है। वह इसे पहनकर अपनी छोटी बहन के जन्मदिन की दावत में गई थी और अब लौट रही थी। युवती दोंग का नाम सुनकर गु छिंग की उँगलियाँ अनायास आस्तीन पर बँधे सुई के बटुए तक पहुँचीं, मानो सुई निकालकर देखना चाहती हो कि पीछे का बंद किसने सुधारा था। वह विचार क्षण भर में गुज़र गया। उसने हाथ नीचे रख लिया और बस कहा कि वह उसे जानती है, उसका काम सचमुच अच्छा है।

उस औरत ने टोपी उतारकर दिखाई। अंदर एक छोटी-सी पर्ची थी, जिस पर लिखा था, नमूना दोंग श्याओमान ने बनाया। बगल में पिन लगाने के तरीके के आगे अलग से दर्ज था कि उसे गु छिंग ने बदला। अक्षर छोटे थे और पर्ची अस्तर के किनारे सिली थी। टोपी पलटे बिना किसी को नहीं दिखती थी। वह अपने नाम को देखती रही। पहले चेहरे पर गरमी दौड़ी, फिर उसे थोड़ी झेंप हुई। उसकी गैरहाज़िरी का फ़ायदा उठाकर किसी ने उसके हिस्से की वह छोटी-सी बात मिटाई नहीं थी। औरत ने पूछा कि क्या वह वही गु छिंग है। उसने हाँ कहा और साथ ही दिखा दिया कि आगे चलकर किस जगह का धागा ढीला पड़े तो वह खुद ठीक कर सकती है। एक पिन के लिए फिर आधा शहर पार नहीं करना पड़ेगा।

बगल में शन सू ऊँघ रही थी। जागने पर उसने बस पिछली आधी बात सुनी और पूछा कि अब उसने रास्ते में कौन-सा काम ले लिया। गू छिंग ने हँसकर कहा कि काम नहीं लिया, एक जाना-पहचाना फूल दिख गया। बुज़ुर्ग ने धूसर नीले फूल की तरफ़ देखकर कहा कि यह उसके बनाए नीले बनों से कुछ अच्छा है। सामने की स्त्री बात नहीं समझी। गू छिंग ने समझाया नहीं, मगर उसके कान लाल हो गए। उसने मुँह फेरकर पानी देखा। उसके मन में अपनी जगह किसी और के ले लेने का जो छोटा-सा काँटा था, वह अचानक बहुत छोटा हो गया।

अट्ठाईस तारीख़ को हवा साथ नहीं दे रही थी और नाव बहुत धीरे चली। किनारे से रस्सा खींचने वाले एक-एक क़दम बढ़ रहे थे। उनके पैरों के निशान जल्द ही पीछे आने वालों के पाँवों से छिटके पानी में बिगड़ जाते। गु छिंग ने सोचा था कि नाविक जिन जगहों के नाम बताएगा, उनके हिसाब से हर दिन पड़ाव गिनेगी। दोपहर तक समझ गई कि गिनती से उसकी बेचैनी ही बढ़ती है, तो उसने सफ़र का काग़ज़ तह करके रख दिया। दादी जागतीं तो ज़्यादातर पानी देखतीं, नींद आती तो सो जातीं। हर शाम उनके दाहिने घुटने की सिकाई अब भी करनी पड़ती थी। कमल देख लेने से एक दिन की सिकाई भी कम नहीं हुई।

रात में एक यात्री को उनका इतने छोटे-छोटे कामों में गरम पानी लेना खला। वह बुदबुदाया कि बुज़ुर्ग घर पर भली-चंगी थीं, इतनी दूर आकर कष्ट उठाने की क्या ज़रूरत थी। शन सू कपड़ा निचोड़ रही थीं। सुनकर उन्होंने झगड़ा नहीं किया, बस कहा कि घर पर उस तरह की पतली रोटी खाने को नहीं मिली थी और उसके लिए एक चक्कर लगाना सार्थक था। वह आदमी ठिठक गया। वह बुज़ुर्गों की सेवा का ऐसा अवसर दुर्लभ होने पर पूरा भाषण सुनने को तैयार था, मगर उसे जवाब में बस एक रोटी मिली। वह मुस्कराया और चुप हो गया। गू छिंग ने मुँह फेरकर खाली कटोरा बार-बार धोया। उसके कंधे हल्के-हल्के हिल रहे थे।

उनतीस तारीख़ को वे लिउवान पहुँचीं। ऊपरी धारा से आए तेज़ बहाव के गुज़रने तक नाव वहीं रुकी। किनारे चाय की एक छप्परदार दुकान थी। गू छिंग दादी को सहारा देकर भीतर बिठा आई। उसने इंतज़ार काटने के लिए तरह-तरह के पकवान नहीं मँगाए, बस गरम पानी और दो कटोरे नूडल्स। उनमें हरे प्याज़ की कुछ ताज़ी पत्तियाँ थीं। शन सू को शोरबा नानपू के शोरबे से फीका लगा, और याद आया कि युनजिन में पहले जो नूडल्स खाए थे, वे कितने कड़े थे। गू छिंग ने पूछा, क्या हर नई जगह को किसी दूसरी जगह की कसौटी पर कसना ज़रूरी है? दादी हँसकर मान गईं। बोलीं, अब इतनी जगहें देख ली हैं कि ज़बान भी बिगड़ने लगी है।

चाय की छतरी के नीचे उन्हें वही दंपती मिला जो जाते वक़्त कंघियाँ बेच रहा था। दोनों नानपू का कारोबार निपटाकर पहले लौटने वाली नाव में बैठ गए थे, मगर उनकी नाव भी यहीं रुकी थी। स्त्री ने शन सू को पहचानकर पहले पूछा कि फूल देखा या नहीं। इस बार बुज़ुर्ग ने उदासीनता का दिखावा नहीं किया। उसने हाथों से आकार दिखाते हुए बताया कि सबसे पहले खिला फूल मुरझाने को था, और जो अधखिला था उसका रंग बहुत हल्का था, फूलों के चित्र वाले काग़ज़ जैसा लाल नहीं। स्त्री सुनते-सुनते सिर हिलाती रही। बीच में उसने कहा कि उसके अपने ताल की कमल-पत्तियाँ बत्तख़ों की राह रोकती रहती हैं, मगर उसने कभी उन्हें ग़ौर से नहीं देखा।

बात पूरे रंग में थी कि शन सू अचानक रुकीं और हँसकर बोलीं, मैं भी बरसों पहले की जी भाभी जैसी हो गई हूँ। ज़रा-सा पानी देखा और आधा दिन उसी की बात कर सकती हूँ। गु छिंग समझ गई कि किसकी बात कर रही हैं। उसने दादी के लिए और पानी डाला और उन्हें चुप नहीं कराया। उस औरत ने उलटे पूछा कि अधखिला फूल बाद में पूरा खिला या नहीं। शन सू ने संजीदगी से कहा कि पता नहीं, जाने से पहले वह फिर अंदर देखने नहीं गईं। जवाब देकर नदी की ओर एक नज़र डाली। अब उनके पास कहने को कम था, मगर आँखों में पहले वाली चमक अब भी थी।

छठे महीने की पहली तारीख़ को आधी रात तक बारिश नाव की छत पर बजती रही। गु छिंग ने सपना देखा कि घर के कुएँ के पास पानी चढ़ आया है। हड़बड़ाकर जागी तो उसका हाथ जूते टटोलने लगा था। नाव का कमरा बहुत अँधेरा था। नाव अब भी हवा से बची घाट की ओट में मज़बूती से बँधी थी। दादी की साँस सुनकर उसे समझ आया कि वह हुआई गली में नहीं है। वह कुछ देर उठकर बैठी रही और बाहर उस किनारे की ओर देखती रही जो दिखाई नहीं देता था। उसने सोचा, क्या छन चाची ने नाली देखी होगी, क्या मा भाभी चाबी सौंप चुकी होंगी। एक के बाद एक ख़याल आते रहे, मगर उनमें से कोई भी ऐसा नहीं था जिसे वह अभी जूते पहनकर सुलझा सकती थी।

बूढ़ी जागी और पूछा कि क्या फिर पेड़ याद आ रहे हैं। गु छिंग ने माना, और यह भी कहा कि फूलों की अलमारी में नमी लगने की चिंता है। शेन सु रज़ाई में थोड़ा खिसकी और उसे पास टिकने को कहा। बोली कि उसे भी याद आते हैं; सपने में तो छन चाची को तीखी मूली कुएँ के पास फूल की तरह लगाते भी देखा। गु छिंग हँस पड़ी, फिर आवाज़ दबा ली कि कोई और न जाग जाए। दोनों नम रात में बैठी घर को याद करती रहीं। उन्होंने यह दिखावा नहीं किया कि मोह छोड़ना सीख लेने से सारी चिंताएँ मिट जाती हैं। बारिश की आवाज़ विरल होने पर ही वे फिर सोईं।

दूसरी तारीख़ को हवा बदली और नाव कुछ दूर तेज़ चली। किनारे पर कोई कपड़ा सुखा रहा था। लंबे कपड़े पेड़ों की छाया को छूते थे। गू छिंग उनमें से एक हल्के खुबानी रंग के कपड़े को देखती रही और जाने क्यों उसे नानपू में बालों का फीता खरीदती हुई अपनी ही सूरत याद आई। उसने फीते का सिरा टटोला। घर से निकलते समय लगाई गाँठ कई बार ढीली हो चुकी थी, मगर अब भी उसी के हाथ की बाँधी थी। रास्ते में कपड़े सिलवटों से भर गए थे और चेहरा धूप में साँवला पड़ गया था, फिर भी उसने फीते को थैले की तह में नहीं छिपाया। उलटे साफ़ पानी में एक बार और सँवारा।

तीन तारीख को वे शियान में उतरीं और आधा पहर घूमीं। लुओ यी वहाँ नहीं थी। दुकान में मदद करने वाली औरत गु छिंग को पहचानती थी। वह सुगंध की एक डिबिया ले आई, जिसके सारे फूलों वाले क्लिप बिक चुके थे। उसने कहा कि डिबिया वाले फूल अच्छे चले, अगली ऋतु की बात मालकिन लौटकर ही करेंगी। गु छिंग ने डिबिया के किनारे पर घिसाव का निशान एक नज़र देखा और पूछा कि लगाते समय फूल ग्राहकों के कपड़ों में चुभते तो नहीं। औरत ने कहा, कोई शिकायत नहीं सुनी। गु छिंग को तसल्ली हुई। उसने उसी वक्त अगली खेप की संख्या लिखवाने की कोशिश नहीं की। वह औरत दादी को नहीं जानती थी, फिर भी गु छिंग ने सफ़ाई में यह नहीं बताया कि यह सफ़र किसके लिए था।

दुकान से निकलकर शन सू पुल के पास किसी को एक टूटी छतरी खोलते देखने लगीं, बड़े ध्यान से। गू छिंग ने छतरी की तीलियाँ देखीं तो झोउ जीपिंग की नई दुकान की खिड़की याद आई और फिर जल्दी लौटने का मन हुआ। उसने दादी को आगे नहीं खींचा। पास खड़ी होकर उनके साथ आख़िर तक देखा, तब कहा कि अगली नाव तक कुछ दूर चलना होगा। शन सू उठीं, पहले टोपी कसकर जमाई और ख़ुद चलकर उसके पास आ गईं।

चौथे दिन की नाव इतनी धीमी थी कि झुँझलाहट होने लगी। उसी केबिन में बैठी एक औरत ने मिठाई का डिब्बा निकाला। वह खाली था, मगर उसमें कुछ गोल पत्थर छिपे थे, जिन्हें उसकी छोटी बहन के बच्चों ने वापस ले जाने को कहा था। उन्होंने कंकड़ कतार में रखे और बूझने लगीं कि किसकी मुट्ठी में कौन-सा कंकड़ है। शन सू को पहले साफ़ नहीं दिखा तो गू छिंग ने जान-बूझकर उसे सबसे गहरे रंग वाला कंकड़ दिया। बुज़ुर्ग ने भौंहें चढ़ाकर कहा कि उसे रियायत मत दो, ग़लत बूझने पर नाव का किराया थोड़े ही देना पड़ेगा। गू छिंग को सारे कंकड़ फिर से मिलाने पड़े और वह सचमुच लगातार दो बार हार गई।

वे तंग केबिन में इतनी हँसीं कि नाव चलाने वाले ने भी सिर अंदर करके देखा। शन सू ने आख़िरी चमकीला कंकड़ गू छिंग की हथेली पर रखा, उसे साफ़-साफ़ देखने दिया, फिर उसकी मुट्ठी बंद करके पूछा कि क्या इस बार भी ग़लत बूझेगी। गू छिंग ने उभरे हुए पोरों वाले उस हाथ को देखा और जानबूझकर दूसरा हाथ बता दिया। बुज़ुर्ग ने उतावली में हथेली खोल दी। कंकड़ रज़ाई पर गिरा और दोनों एक साथ उसे उठाने झुकीं। उनके माथे हल्के से टकराए। दर्द पल भर का था, मगर हँसी रात के खाने तक साथ रही। नाव का फीका, लुगदी जैसा खाना भी उतना बेस्वाद नहीं लगा।

पाँच तारीख की रात नगर के बाहर की बत्तियाँ धुँधली-सी दिखने लगी थीं, पर नाववाले को निचले घाट पर एक रात और रुकना था। आख़िरी उथला हिस्सा अगले दिन ही पार होना था। गु छिंग ने दूर देखा और पल भर को सोचा कि अलग से एक छोटी नाव लेकर सीधे घर जा सकती है। फिर उसे अपनी बाँह पर टिकी दादी का वज़न महसूस हुआ और उसने कुछ नहीं कहा। वह लकड़ी के खंभे से टिक गई और उस नन्ही रोशनी को पानी पर टुकड़ों में बिखरने दिया। घर पास था, फिर भी आज रात वहाँ पहुँचने की कोई मजबूरी नहीं थी।

छह तारीख़ की साँझ वे युनजिन के घाट पहुँचीं। पानी का सफ़र ठीक नौ दिन का हुआ। गु छिंग ने वापसी के तीन सौ बीस वन चुका दिए। पैसे कम बचे थे, पर किनारे पर एक रात और ठहरने के लिए काफ़ी थे। शन सु के पाँव सूज गए थे और जूते के ऊपरी हिस्से ने उन पर एक लकीर छोड़ दी थी। गु छिंग ने यह नहीं पूछा कि क्या वे किसी तरह घर तक चल लें। वह दादी को पहले उस सराय में ले गई जिसके बारे में पूछ चुकी थी। मालिक ने एक रात का सुनकर यूँ ही पूछा, घर बहुत दूर है क्या। गु छिंग ने कहा, दूर नहीं, कल सुबह जाएँगे। कहते ही उसे नानफू में कमरा बदलने के वक़्त से भी ज़्यादा हल्का महसूस हुआ।

खिड़की के बाहर युनजिन की जानी-पहचानी पुकारें थीं। तवे की रोटी बेचने की आवाज़ और काँवड़ों की आवाज़, सब अपनी पुरानी जगहों से आ रही थीं। दादी ने धूसर कमल का डिब्बा खोला। भीतर पंखुड़ियाँ थोड़ी दबकर मुड़ गई थीं, पर फूल पूरा नहीं बिगड़ा था। गू छिंग ने फांग युन के दिए पुराने कपड़े के कोने से एक पट्टी काटकर नीची पंखुड़ी के नीचे लगा दी। दादी ने देखते हुए कहा कि कल छिंगन्यांग को दिखाएँगी। पहले बताएँगी कि कहाँ क्या सच में देखा, कहीं सुनाते-सुनाते ख़ुश होकर ढेर सारी अनदेखी बातें भी न जोड़ दें। गू छिंग ने सिर हिलाया और ढक्कन थोड़ा खुला छोड़ दिया, ताकि नमी धीरे-धीरे बाहर निकल जाए।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

टिप्पणी अनुभाग

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं…

← अलमारी पर लौटें, अगली कहानी पढ़ें

अपनी थीम चुनें

आपकी थीम पूरी साइट पर लागू होगी।