प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
कू वूजी · AI सृजन · 8792 अक्षर · लगभग 12 मिनट
पाँचवें महीने की सत्रह तारीख़ को नानपू की पहली आवाज़ मछलियों के एक काँवर से आई। काँवर ढोने वाले ने ज़िंदा मछलियाँ लकड़ी के टब में उँडेल दीं। पूँछें पानी पर पड़ीं और छींटे गू छिंग के जूतों पर आ गए। उसने अभी-अभी सामान किनारे पर उतारा था। जिस शहर का ज़िक्र इतनी बार सुना था, उसे ठीक से देख भी नहीं पाई थी कि भीड़ ने उसे एक कदम पीछे धकेल दिया। शन सू घाट के किनारे खंभा पकड़े खड़ी थीं। हवा ने उनकी टोपी का हल्का भूरा फूल भीतर की ओर मोड़ दिया। किसी को यह एहसास नहीं था कि दोनों ने इस पल तक पहुँचने के लिए छह दिन सफ़र किया था।
नानपु के पूर्वी गोदाम के पास नदी किनारे कुछ सरायें थीं। गु छिंग ने दाम पूछे तो घाट के पास वाली सरायें लुदू से डेढ़ गुना महँगी थीं। वह दादी को उस सराय में ले गई जो उसे पहले पसंद आई थी। कमरे में खिड़की थी, मगर खुलती उस पिछली गली में थी जहाँ मछलियाँ उतारी जाती थीं। फ़र्श में सीलन थी और रात को बर्तन धोने का पानी बाहर से होकर बहता था। दादी पलंग के किनारे बैठ गईं। मुँह से कुछ बुरा नहीं कहा, मगर दायाँ पैर बार-बार खिसकाती रहीं। उसे ठीक से पसारने की जगह नहीं मिल रही थी।
कू छिंग ने बिस्तर की गठरी नीचे रखी और कल्पना की कि आखिर उसे दो रात चैन की नींद मिलेगी। उसने पहले खुद को यह कहकर बहलाया कि बस ज़रा-सी सीलन है। सरायवाले ने सुना कि वे कमल के सरोवर के लिए आई हैं, तो सिर हिलाकर बोला कि इस साल वसंत ठंडा रहा, फूल अभी इक्का-दुक्का ही हैं, पूरब की तरफ़ उस जल में ज़्यादातर पत्ते हैं, और असली सैलानी महीने के आखिर में ही जाएँगे। कू छिंग का हाथ गठरी की पट्टी पर ठिठक गया। उसने पूछा कि एक-दो अधखिले फूल तो होंगे ही न। सरायवाले ने जवाब दिया कि वह खुद कोई कमल थोड़े ही है, बीच में कई ली पानी है, इतनी दूर से वह फूलों की ओर से कैसे बोले।
उसकी बात में ज़रा भी लिहाज़ नहीं था। सुनकर गू छिंग का चेहरा गरम हो गया। वह नदी किनारे गाड़ी पूछने गई। गाड़ीवान ने कहा कि एक तरफ़ का रास्ता चौबीस ली है और आज चलकर पहुँचीं तो रात वहीं काटनी पड़ेगी, क्योंकि इन दिनों कच्ची सड़क पूरी सूखी नहीं है। फूल खिले हैं या नहीं, इस पर तीन लोगों से तीन जवाब मिले। किसी ने कहा बहुत पहले खिल गए, किसी ने कहा दस दिन और लगेंगे, किसी ने कहा दक्षिणी हवा पर है। फूलों की ख़बर की जगह वह अपने साथ घाट की मछली जैसी गंध और धूल लपेटे लौटी।
शेन सु सीलन भरी रज़ाई उठाकर उसमें हवा लगा रही थीं। गु छिंग ने चौकी पर बैठे-बैठे अचानक कहा कि अगर सच में फूल नहीं हैं, तो एक रात आराम करके लौट चलें, बेकार इंतज़ार करने से क्या फायदा। कहते ही उसे पछतावा हुआ, फिर भी उसने तुरंत बात नहीं बदली। इतने दिनों से उसे सबसे ज़्यादा डर इसी बात का था कि फूल खिले नहीं होंगे। अब जब वे सचमुच नहीं खिले थे, तो मानो वह अपनी चिंता को एक पक्के बुरे नतीजे में समेटकर झट से जानी-पहचानी जगह भाग सकती थी।
दादी ने रज़ाई का कोना छोड़ा और पूछा, वह किसकी ख़ातिर यह बचत कर रही है? गु छिंग ने कहा कि दोनों की ख़ातिर, और उसे डर है कि दादी को वहाँ रहने में तकलीफ़ होगी। शन सू ने पलंग का किनारा टटोला। बोलीं, यहाँ सच में आराम नहीं है, पहले ठिकाना बदलते हैं। जहाँ तक इंतज़ार की बात है, वह कुछ दिन रुकना चाहती हैं। गु छिंग पर उनका कोई फूल उधार नहीं है जिसे आज ही देना पड़े। आख़िरी बात कहते हुए उनकी नाक के पंख भी ज़रा हिले, जैसे फूल न देख पाने की निराशा वे भी दबा रही हों।
दोनों ने उसी दिन वह कमरा छोड़ दिया। सामान रखने और चूल्हे की आग इस्तेमाल करने के थोड़े-से पैसे चुकाए और सराय के मालिक से झगड़ा नहीं किया। नई जगह घाट से आधा ली दूर एक छोटी गली में थी। दरवाज़े के भीतर गमले में अनार का एक दुबला-सा पेड़ था। उसमें अभी फूल नहीं खिले थे और टहनियों पर किसी मेहमान के मोज़े सूख रहे थे। सराय की मालकिन पांग युन की उम्र चालीस के आसपास थी। वह सूखी मूली काट रही थी। जब उन्होंने पूछा कि क्या ऐसा पलंग है जिस पर बैठकर पैर ज़मीन पर रख सकें, तो उसने चाकू की पीठ से भीतर की ओर इशारा किया कि खुद जाकर देख लें।
कमरा साधारण था और खिड़की के बाहर नदी की जगह सफ़ेदी की हुई एक पुरानी दीवार थी। खाट के पाये बराबर थे, दीये का आधार स्थिर था और पास बैठने के लिए बाँस की एक कुर्सी थी। शन सू पहले कुर्सी पर बैठीं, धीरे से दायाँ पैर आगे फैलाया और सिर हिलाया। गू छिंग ने खाट के तख़्ते छूकर पक्का कर लिया कि उनमें नमी नहीं है, तभी पोटली नीचे रखी। दोनों के लिए एक रात के दस वन थे। गरम पानी तय समय पर मिलता था, आवाज़ देते ही अलग से चूल्हा नहीं जलाया जाता था। फांग युन ने यह सब साफ़ बता दिया। सुनकर गू छिंग को तसल्ली हुई।
फांग युन ने उन्हें हज़ का हाल का जलस्तर बताया। कहा कि उसके समधी वहाँ सब्ज़ी बेचते हैं और कल आए तो बोले कि बस एक फूल ने सिर निकाला है, अभी फूलों का फैलाव नहीं हुआ। उसने मेहमानों से हर हाल में रुकने को नहीं कहा। मुड़कर भीतर आए दो आदमियों की ओर भी ध्यान दिया। जो ठहरे वही पैसे दे, इन दोनों ने लंबी राह तय की है, इससे किसी बात की गारंटी नहीं मिलती। शन सू ने सुनकर अपनी छोटी थैली से चालीस वन गिने और कहा कि पहले चार रात रुकेंगे, आगे देखकर बात करेंगे। अस्सी वन एक ही बार में नहीं निकाल दिए।
गु छिंग उसकी जगह पैसे देना चाहती थी, पर दादी ने थैली पर हाथ रख दिया, “इस बार मैंने चुना है।” गु छिंग ने वे चालीस वन दोनों के सफ़र के ख़र्च में लिखे, दादी के निजी इस्तेमाल के लिए अलग रखे अतिरिक्त अस्सी में नहीं। पैसे हाथों से गुज़रे तो इंतज़ार का बोझ अब अकेली गु छिंग के कंधों पर नहीं था। ऊपर जाकर उसने हल्का भूरा फूल टोपी के किनारे से उतारा। हवा से बिगड़ी पंखुड़ी ठीक की। उसके हाथ नाव से उतरते समय की तुलना में कुछ ढीले थे।
अठारह तारीख़ की सुबह गु छिंग को जागकर लगा कि वह अब भी नाव में है। पलंग नहीं हिला, मगर कान में किसी बच्चे की आवाज़ आई जो भाप में पकी पूरियाँ बेचने वालों की पुकार की नकल कर रहा था। फांग युन का भांजा उनका नाश्ता लाने में मदद करता था। वह रंगमंच के कलाकार की तरह पुकारता और तीसरी पुकार पर हँसी नहीं रोक पाता। रज़ाई में लेटी शन सु सुनती रहीं और हँसते-हँसते उनकी आँखें सिकुड़ गईं। गु छिंग उठकर फिर पूछने वाली थी कि फूलों के खिलने की क्या ख़बर है। दादी ने उसे खींचकर रोक लिया। बोलीं, चौथी बार में बच्चा ठीक से पुकार ही लेगा, पहले पूरा सुन लो।
उस सुबह दोनों बस छोटी गलियों में टहलती रहीं। शन सू बाँस की कंघियाँ बेचने की एक जगह देखना चाहती थी। कंघी ख़रीदनी नहीं थी, बस पूछा कि डिज़ाइन स्थानीय लोग उकेरते हैं क्या। कंघी तराशने वाले कारीगर को उसके सवाल कुछ ज़्यादा बारीक लगे और पहले उसने अनमने ढंग से जवाब दिया। फिर सुना कि वह भी कारीगर है तो एक कंघी दिखाई जिस पर नक़्क़ाशी बिगड़ गई थी। दो लकीरें टेढ़ी होकर एक साथ मिल गई थीं, सो उसने उन्हें पानी की लहरों का रूप दे दिया था। गू छिंग पास खड़ी थी। पहली बार उसे ऐसा नहीं लगा कि दादी की हर गपशप को किसी सौदे तक पहुँचाना उसका काम है।
उन्होंने वह चावल की रोटी खाई जिसका आछुन ने ज़िक्र किया था। परत सचमुच पतली थी, गरम रहते नरम और ठंडी पड़ते ही सख़्त। शन सू ने ज़िद की कि धीरे-धीरे खाएँगी। आख़िरी कौर तक रोटी ठंडी हो चुकी थी। उन्हें कड़ी लगी, मगर फेंकने को जी नहीं माना। गू छिंग ने आधा कौर लेकर उनकी ओर से चबाया। जबड़े दुखने लगे तो दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसीं। बोलीं कि लौटकर आछुन को मत बताना कि उसकी बताई स्वादिष्ट चीज़ के लिए ख़ास तौर पर इतनी तकलीफ़ सही। वे कोई रोटी वापस नहीं ले गईं। बस तवे से उतरते वक़्त की हल्की-सी महक याद रखी।
उन्नीस तारीख़ को थोड़ी देर बारिश हुई और दादी के घुटने में फिर दर्द उठा। पल भर को गू छिंग को लगा कि सारा दोष उसी का है, उसी ने गलत मौसम चुना। उसने सोचा कि दादी के सो जाने पर फिर जाकर फूलों के बारे में पूछ आएगी। निकलने लगी तो देखा कि कोने में रखी छतरी से पानी टपक रहा है। उसने उसे वहीं छोड़ दिया। वह छज्जे के नीचे बैठकर बारिश देखने लगी। टूटी खपरैल से पानी एक धार में गिरकर अनार के पेड़ के गमले के किनारे पर पड़ रहा था। गमले पर खुदी एक चिड़िया धुलकर चमक उठी।
फांग युन पास आकर दरवाज़े का परदा सिलने बैठी। पुराने कपड़े के सारे किनारे उधड़ चुके थे। उसने शन सू की टोपी पर फूल देखा और पूछा कि क्या वह घर का बना है। क्या पुराने परदे के काटे हुए किनारों से मोटे कपड़े के दो फूल बनाए जा सकते हैं? उन्हें बैठक में खाने के आदेश वाली लकड़ी की थालियों के पास रख दें तो पहचानना आसान होगा कि कौन-सी थाली ऊपर ठहरे मेहमान के लिए है। गू छिंग ने कहा कि मोटा कपड़ा रेशम की तरह आकार नहीं लेता, मगर बड़े फूल बनाए जा सकते हैं। फांग युन ने दो सबसे मज़बूत टुकड़े चुनकर उसे दिए, ताकि उसे अपनी ओर से कपड़ा न लगाना पड़े।
दोनों फूल बन गए तो फांग युन ने कहा कि वे एक रात के किराये के बराबर हैं। अगर वे और रुकें तो अगली रात के पैसे से काट लेगी और उनसे और फूल नहीं बनवाएगी। शन सू बग़ल में बैठी धूसर-हरा धागा चुन रही थीं। गू छिंग ने उनके सादे कमल के नमूने से कपड़ा काटा, मगर फूल का बीच बहुत कसकर नहीं भरा। फूलों में न ख़ुशबू थी, न वे असली थे, मगर पुरानी लकड़ी की तश्तरियों के पास दूर से दिख जाते थे। ऊपर ठहरे एक मेहमान ने सचमुच फूल देखकर अपनी खाने की तश्तरी पहचान ली। फांग युन संतुष्ट हुई और मुड़कर किसी और की खिचड़ी के पैसे गिनने लगी। गू छिंग ने सुई-धागे की पोटली रख दी और अगले दिन एक और रात का किराया बचाने के लिए फूल बनाना जारी नहीं रखा।
बारिश थमी तो शन सु और सोने को राज़ी नहीं हुईं। उन्होंने गु छिंग से कहा, सामने की सड़क पर ख़ुद थोड़ी देर घूम आओ। फांग युन नीचे ही हैं, घुटने की रखवाली में दो लोगों का बैठना ज़रूरी नहीं। गु छिंग पल भर हिचकिचाई, फिर निकल गई। न फूलों के नमूने लिए, न कपड़ा ख़रीदने का नाप। बालों के फीते वाले एक ठेले तक पहुँची तो उसे पता चला कि जिन रंगों को तुरंत किसी हिसाब में नहीं बदलना है, उन्हें देखने का ढंग ही उसे नहीं आता। दुकानदार ने हल्के ख़ुबानी रंग का फीता थमाया और कहा कि जवान लड़कियों पर ज़रा चमकीला रंग अच्छा लगता है। गु छिंग ने पहले दाम देखा, फिर फीता। उसके होंठों के कोने अपने-आप ऊपर उठ गए।
उसने तीन वेन देकर फीता ख़रीद लिया। उस वक्त ऐसा भी नहीं था कि उसके बिना काम न चले। लौटते हुए वह पानी के किनारे से घूमकर गई और एक अँधेरी खिड़की में अपना अक्स देखकर फीता ठीक किया। उसका चेहरा वैसा ही था जैसा युनजिन में फूल बनाते वक्त होता था, फिर भी लगा जैसे किसी ने उसकी हमेशा झुकी ठोड़ी ज़रा ऊपर उठा दी हो। वह कुछ देर और खड़ी रही। सोचा, कहीं दादी पानी का इंतज़ार तो नहीं कर रही होंगी। पाँव बढ़ाया, फिर रुक गई और नदी की हवा को फीते का सिरा कंधे पर उड़ाने दिया।
सराय लौटी तो शन सू फांग युन से सुन रही थीं कि कैसे उसका भांजा एक मेहमान के जूते ग़लत इमारत में पहुँचा आया। अधखुले दरवाज़े से हँसी बाहर आ रही थी। सुनकर गु छिंग के भीतर एक जाना-पहचाना खालीपन उठा, मगर अब उसका मन यह नहीं चाहता था कि अंदर पहले से कोई परेशान बैठा हो। उसने दरवाज़ा खोला। दादी की नज़र सीधे नए फीते पर पड़ी। पहले रंग की तारीफ़ की, फिर कहा कि गाँठ बहुत कसी है। सिर झुकाओ, मैं ढीली कर दूँ। गु छिंग नहीं मानी। उसे अपनी बाँधी गाँठ ही रखनी थी। उसने हँसते हुए चेहरा उठाया और बच निकली। फीते का सिरा दादी के बढ़े हुए हाथ को छू गया।
बीस तारीख को आसमान साफ़ था। फांग युन के समधी के घर से ख़बर आई कि हेज़ के बीच पानी में कुछ कमल अच्छे खिले हैं। कल-परसों धूप रही तो अब भी दिख जाएँगे, मगर पूरे ताल के लाल हो जाने की उम्मीद न रखें। इस बार गु छिंग तुरंत गाड़ी करने नहीं गई। पहले कमरे में जाकर दादी के घुटने का हाल पूछा। दादी उठकर दरवाज़े तक चलकर देख आईं और बोलीं कि कल एक दिन और आराम करेंगी, बाईस को चलेंगी। वे कुछ फूल तब तक ठहरेंगे या नहीं, दोनों को पता नहीं था। गु छिंग ने चौखट पर एक बार उँगली थपथपाई और आख़िर हामी भर दी।
इक्कीस तारीख़ को उन्होंने उसी दर पर एक रात और ठहरने का तय किया। कपड़े के वे दो फूल उस रात के दस वन के बदले गए और अलग से कुछ नहीं देना पड़ा। पहले के चालीस वन ठीक पिछली चार रातों के थे। बचा हुआ दिन दोनों ने नदी किनारे बैठकर एक छोटे पुल पर आते-जाते लोगों को देखते बिताया। कमल की जड़ें ढोता एक आदमी पुल के बीच पहुँचा और अपनी काँवड़ उतारकर सुस्ताने लगा। इस छोर से लोगों ने रास्ता देने को पुकारा तो वह बस आधा क़दम खिसका और फिर बैठ गया। इस पर हँसी-मज़ाक और गालियों का शोर उठा। देखकर शन सू बोलीं कि अगर वह कमल की जड़ें बेचतीं तो उन्हें भी आराम करना पड़ता। गू छिंग ने पूछा, तो क्या पुल पर सबको उनसे इतनी धीमी चाल सीखनी होगी? दादी ने जवाब नहीं दिया, मगर आँखें चमक उठीं, जैसे आख़िर उन्हें कोई ऐसा साथी मिल गया हो जिसे कोई जल्दी चलने पर मजबूर न कर सके।
साँझ को गु छिंग ने कल का पानी और हल्का छाता दरवाज़े के पास रखा। दादी का धूसर कमल डिब्बे से निकाला; नाव में कुछ दबकर टेढ़ा हो गया था, नुकीले कोने बराबर नहीं थे, फिर भी बूढ़ी उसे ले जाना चाहती थी। गु छिंग ने उनकी टोपी के पीछे लगाया और खुद कुछ कदम दूर जाकर देखा, जैसे कभी जी भाभी शेन सू को पीछे से देखती थीं। बूढ़ी ने पूछा, सीधा है? उसने कहा, थोड़ा टेढ़ा है, मगर टोपी टेढ़ी है। शेन सू ने टोपी सँभालने को हाथ बढ़ाया तो गु छिंग हँसकर बोली, रहने दो, टेढ़ी हो तब भी पहचान में आओगी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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