प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
कू वूजी · AI सृजन · 8947 अक्षर · लगभग 12 मिनट
चौथे महीने की आठवीं को श्यू थान ने गू छिंग को खुले आँगन में मेज़ नापने बुलाया। मेई के पेड़ के नीचे हल्की हरियाली फैल चुकी थी। पत्तियाँ अभी घनी नहीं थीं और धूप चौकोर टुकड़ों में धूसर पत्थरों पर गिर रही थी। मेज़ नापने की बात सुनकर गू छिंग को पहले लगा कि गोदाम वाले घुमावदार दीवार के पास एक और अलमारी लगाने वाले हैं। वह अपने आप थोड़ी तन गई। मगर श्यू थान उसे दूसरे सिरे पर ले गईं और बैठने की तीन अस्थायी जगहें दिखाईं। कहा कि पाँचवें महीने में उत्तर-दक्षिण से आने-जाने वाले व्यापारियों को गर्मियों का माल देखने बुलाएँगे। खुले आँगन में नमूने रखेंगे, पेड़ की छाँह में लोग दम लेंगे और सर्दियों के फूलों की बैठक अब नहीं लगेगी।
मेज़ कारीगरों के लिए थी। वन परिवार फूल बनाने वाला एक कारीगर और रंगीन धागों की गाँठें बनाने वाला एक कारीगर पखवाड़े भर के लिए बुलाना चाहता था। वे रोज़ व्यापारियों के सामने काम करते। तैयार माल अलग से बेचा जा सकता था। गु छिंग क्या बनाएगी, यह पहले नमूना आज़माकर तय होता। श्यू थान ने वहाँ रहकर काम करने के चार सौ वेन बताए। बिके हुए माल की सामग्री और मज़दूरी अलग से मिलती और दिन में एक वक्त का खाना भी। सुनते ही गु छिंग की उँगलियों ने कपड़े का किनारा भींच लिया। इस रकम के लिए फुटकर बिक्री की तरह एक-एक फूल बिकने का इंतज़ार नहीं करना था। सफ़र के ख़र्च में जो कमी अभी उसे पूरी होती नहीं दिख रही थी, वह इससे भर सकती थी।
उसने तारीख़ें पूछीं। शू थान ने कहा, पाँचवें महीने की दस तारीख़ से पच्चीस तक। व्यापारियों के आने से पहले ही काम शुरू करना था और किसी एक के आने-जाने से तारीख़ें नहीं बदलेंगी। गु छिंग के चेहरे की चमक अचानक आधी रह गई। पाँचवें महीने की बारह तारीख़ की नाव के बारे में वह हाल में कई बार पूछ चुकी थी। पेशगी अभी नहीं दी थी, पर दादी के साथ नाव में जगह और सफ़र की मोटी रूपरेखा तय कर चुकी थी। उन्हें उसी समय का इंतज़ार था जब हेज़े का पानी गरम हो जाए और दादी को झुलसाती गर्मी भी न सहनी पड़े।
श्यू थान ने उससे तुरंत हामी नहीं माँगी। पहले साथ ले जाकर एक माल का संदूक रखकर देखने को कहा। मेज़ की ऊँचाई हाथ को ठीक बैठी। खिड़की-दरवाज़े खुले थे और दोनों तरफ़ से हवा आती थी। गु छिंग ने वहाँ एक छोटा नमूना बनाया। कुछ नौकर माल ढो रहे थे। किसी ने उसे नहीं रोका, जैसे आने वाला पखवाड़ा अभी से आँखों के सामने हो। उसके मन ने तेज़ी से चार सौ वेन का हिसाब लगाया। दो लड़ियों भर पैसे के लिए फिर चिंता नहीं करनी पड़ेगी, लंबे वक्त से जमा रेशम के टुकड़े बेचने नहीं पड़ेंगे, लौटने पर पूँजी भी रहेगी और शायद ज़्यादा अच्छी गाड़ी किराये पर ले सकेंगी।
उसने पूछा कि क्या पहले पाँच दिन वह ख़ुद आ सकती है और उसके बाद श्याओमान उसकी जगह ले सकती है। शू थान ने पूछा कि क्या श्याओमान ग्राहक के सामने उसी के नाप से फूल बना लेगी। गु छिंग ने कहा, थोड़ा-बहुत कर लेगी। शू थान ने सिर हिलाया। नमूना आज़माने से लेकर सौदा लिखने तक उन्हें एक ही व्यक्ति चाहिए था, ताकि व्यापारी लौटकर आए तो उसी से बात साफ़ कर सके। दो लोग अलग-अलग दिन काम करें तो तालमेल का कोई और इंतज़ाम ढूँढ़ा जा सकता था, लेकिन शू थान के पास उनकी अधूरी बातचीत सँभालने की फ़ुर्सत नहीं थी। चार सौ वन उस नमूने के दाम भी नहीं बन सकते थे जिसकी बनाने वाली सामने ही न आए।
वन जीछांग पास आया और पिछली आधी बात सुनकर बोला कि पंद्रह दिन की ही तो बात है, कमल भला पंद्रह दिन कम खिलेंगे क्या। गू छिंग ने पलटकर जवाब नहीं दिया। वह जानबूझकर उसकी राह नहीं रोक रहा था। वह ख़ुद कारोबार करता था। एक नाव छूटती तो अगली पकड़नी पड़ती। सामने जो पैसा कमाया जा सकता था, उसे ऐसे दिन के लिए छोड़ना उसे मंज़ूर नहीं था जो शायद बेहतर भी न हो। वन परिवार अभी उधार चुका रहा था। वह गोदाम खोलने के लिए ऐसे वक़्त का इंतज़ार नहीं कर सकता था जब सब कुछ आराम से जम जाए। उसे लगता था कि दूसरों को भी अपनी योजनाएँ इसी तरह थोड़ा-थोड़ा करके समय में समेटनी पड़ती हैं।
गू छिंग ने घर लौटकर सबसे पहले चार सौ वन की बात नहीं की। दादी टोपी की डोरी रफ़ू कर रही थीं। जब सुना कि वह पाँचवें महीने में गोदाम में रहकर काम करेगी, तो पूछा कि नाव की तारीख़ अब क्या होगी। उसने कहा कि शायद छठे महीने में, हो सकता है पाँचवें महीने के आखिर में भी पहुँच जाएँ। शन सू ने धागा रख दिया और दाएँ हाथ से बायाँ अँगूठा पकड़कर धीरे-धीरे घुमाने लगीं। देर बाद बस इतना कहा कि छठे महीने में गरमी होती है और उन्हें लू का डर लगता है। सह पाएँगी या नहीं, उस वक़्त ही पता चलेगा।
गु छिंग ने जल्दी से कहा कि नाव में परदा है, गरम पानी है और चार सौ वेन से कुछ ज़्यादा आरामदेह केबिन लिया जा सकता है। बात आधी ही हुई थी कि उसने दादी को अब भी अपना अँगूठा सहलाते देखा। उसे अचानक अपनी ही आवाज़ में सुनाई दिया कि वह फिर उस छठे महीने की गारंटी दे रही थी जो अभी आया तक नहीं। वह रुकी और पूछा कि पैसे का हिसाब छोड़ दें तो दादी कब जाना चाहती हैं। शन सू ने कहा कि अभी पैर रास्ता आज़मा सकते हैं और मौसम ठंडा है, इसलिए पाँचवें महीने में ही जाकर देखना चाहती हैं। उन्होंने सहज ढंग से कहा। कितने बरस से नहीं जा पाईं, इसका बोझ उन्होंने गु छिंग पर नहीं रखा।
दोपहर बाद गू छिंग कमरबंद के फूल बना रही थी। उसने ख़ुबानी रंग की पंखुड़ियाँ एक गलत तह में बाँध दीं। बँधाई खोली तो धागे का गोला ज़मीन पर गिरा। उसे उठाने को झुकी तो हटाकर खाली की गई आधी मेज़ से टकरा गई। उसे इस मेज़ का छोटा होना पसंद नहीं था, हर बार रेशम हथेली-हथेली नापकर खरीदना पसंद नहीं था, और सबसे कम यह पसंद था कि वह कमाए जा सकने वाले चार सौ वन को ऐसी चीज़ मान रही थी जो किसी को चोट पहुँचा सकती है। उसे दोनों में से थोड़ा-थोड़ा मिल सकता था। फिर यही वक़्त इतना तंग क्यों था?
उस दिन उसने जान-बूझकर देर तक हिसाब किया। दादी की घुटने की पट्टियाँ धोकर भी वह फिर दीये के पास बैठ गई। चार सौ वन से रास्ते में सचमुच आसानी होती, और कम कमाई से लौटने के बाद सचमुच तंगी होती। उसे चन परिवार के दरवाज़े के बाहर हँसी सुनकर हुई निराशा याद आई। अब उसी निराशा ने रूप बदल लिया था। वह चाहने लगी थी कि दादी ख़ुद कह दें कि जाने की जल्दी नहीं है। अगर दादी ऐसा कह देतीं तो उसे यह मानना नहीं पड़ता कि पैसे छोड़ने को उसी का जी नहीं कर रहा।
अगले दिन वह चोउ परिवार की नई दुकान गई। फूलों की थाली साथ नहीं लाई। बस पूछा कि यह काम उसे लेना चाहिए या नहीं। चोउ जीफिंग ने सुनकर कहा, उसकी जगह वह होता तो शायद ले लेता। उसकी और भाभी की नई दुकान पर बारिश की दो छाजन का पैसा अभी बाक़ी था। गु छिंग ने उसकी ओर देखा। वह उसके मुँह से ऐसी बात सुनना चाहती थी जिससे उसका हौसला बढ़े, मगर उसे उसकी अपनी ज़िंदगी की बात सुनाई दी। उसने पूछा, तो क्या उसे भी काम ले लेना चाहिए। चोउ जीफिंग ने रंदा रख दिया। बोला, उसकी कोई दादी नहीं है जो उसके साथ कमल देखने जाने की राह देख रही हो। वह उसकी जगह यह सोच-विचार नहीं कर सकता।
उसे थोड़ा ग़ुस्सा आया कि तसल्ली का एक शब्द भी नहीं मिला। साथ ही वह जानती थी कि चोउ जीफिंग को उसकी परवाह है। वह पीछे से एक अधबनी हल्की छतरी दिखाने लाया। देख रहा था कि दो मोटी तीलियाँ कम करने पर भी वह खुली हुई टिकेगी या नहीं। छतरी बड़ी नहीं थी। उसके नीचे दो लोगों को पास आना पड़ता और तेज़ बारिश में उसे ज़बरदस्ती ताने नहीं रख सकते थे। उसने कहा कि वह पाँचवें महीने में निकले तो छतरी समय पर बन जाएगी। छठे महीने में जाए तो तब तक रखी जा सकती है। उसके इंतज़ार में दाम नहीं बढ़ेगा। उसने छतरी की बात का सहारा लेकर गु छिंग पर कोई तारीख़ चुनने का दबाव नहीं डाला।
बारह तारीख़ को रात के खाने के बाद शन सू ने घुटने की पट्टी उतारी। जहाँ कपड़ा घिसकर पतला पड़ गया था वहाँ नया कपड़ा लग चुका था। गू छिंग ने पूछा, अगर निकलते वक़्त भी दर्द रहा तो क्या उन्हें उससे शिकायत होगी कि वह उन्हें ले गई। दादी ने पलटकर पूछा, अगर गू छिंग यहीं रुककर काम करे तो क्या उसे शिकायत होगी कि दादी ने एक बार भी चलने को नहीं कहा। दोनों आमने-सामने बैठी थीं। कोई भी नहीं कह सकती थी कि मन में ज़रा भी शिकायत नहीं होगी। फिर शन सू ने पैर फैलाकर उसे पैबंद दिखाया और कहा, दर्द हुआ तो रुक जाएँगी, उस वक़्त सचमुच आगे जाना मुमकिन न हुआ तो लौट भी सकती हैं। मगर दहलीज़ पार करने से पहले ही यह कैसे तय कर लें कि जाना हर हाल में नामुमकिन है।
उस रात गू छिंग ने आधी मेज़ पर रखे काम आ सकने वाले सारे कपड़े एक-एक करके फैलाए। अब उसने पूरा हिसाब बस मन में किसी धुँधले ढेर की तरह नहीं रखा। धुएँ जैसे बैंगनी रेशम के अलावा हल्के धूसर रंग के दो टुकड़े थे। रंग एक था, बुनावट अलग। एक अस्तर के लिए रखा जा सकता था, दूसरा बरसों से किसी काम में नहीं आया था। उसने नाख़ून से पुरानी तह की लकीर दबाई। याद आया कि ख़रीदते समय उसे पक्का लगता था कि अगला बड़ा ग्राहक आते ही इसे इस्तेमाल करेगा। हिसाब के आख़िर तक चार सौ वन भी आसमान में अकेली लटकी सिक्कों की लड़ी जैसे नहीं रहे। उसके साथ आधे महीने की सुबहें और शामें, नाव पर खाली बिछौना, छठे महीने की गर्मी और वह थोड़ी-सी दूरी बँधी थी जिसे उसने और दादी ने अभी चलकर आज़माया था।
भोर होने को आई तो उसने कपड़े फिर तह किए। चुने हुए तीन टुकड़े अलग रख दिए। उन्हें किसी के हाथ बेच देने की जल्दी नहीं की, बस ऊपर धागे की एक ख़ाली फिरकी रख दी। फिरकी की कोई क़ीमत नहीं थी, मगर अब वह काम आने वाली भरी फिरकियों में नहीं पड़ी थी। थोड़ी देर सोकर उठी, तब वन परिवार के यहाँ गई। आँखों के नीचे हल्की नीलाई थी, पर उसकी बात फिर घूमकर छठे महीने पर नहीं गई।
तेरह को गू छिंग ने नमूने दिखाने वाली मेज़ के नाप की पर्ची श्यू थान को लौटा दी और कहा कि वह वहाँ बैठकर काम करने की पेशकश स्वीकार नहीं करेगी। वजह उसने संक्षेप में बताई। मई में उसे दादी के साथ बाहर जाना है और तय तारीख़ नहीं बदलेगी। श्यू थान ने पहले भौंहें सिकोड़ीं और पूछा कि क्या वह सचमुच पहले पाँच दिन भी नहीं आ सकती। गू छिंग ने कहा कि अगर इस तरह बाँटा तो फिर भी उसका मन कुछ और दिन रुकने को करेगा, इसलिए शुरू में ही साफ़ कह देना बेहतर है। श्यू थान ने नाप की पर्ची बही में वापस रखी और कहा कि तब उसे किसी और को ढूँढ़ना होगा। वह जगह उसके लिए ख़ाली नहीं रख सकती।
इन चंद बातों के बाद चार सौ वन हाथ से चले गए। गू छिंग पेड़ की छाँव के किनारे खड़ी थी। सामने से उसे कोई ख़ास हमदर्दी नहीं मिली, फिर भी कंधे थोड़े हल्के और सीना कुछ खाली लगा। श्यू थान ने उसे रस्सी की एक कुंडली थमाने को कहा। उसने दे दी और फिर विदा ली। दरवाज़े के बाहर आछुन गिरे पत्ते बुहार रहा था। उसने सिर उठाकर पूछा कि क्या गू दीदी पाँचवें महीने में यहाँ नहीं रहेंगी। उसने कहा, नहीं, नानपू जाएगी। लड़के ने बताया कि वहाँ चावल की एक रोटी मिलती है। उसकी परत पतली होती है और तवे से उतरते ही खानी चाहिए, बाँधकर घर लाओ तो कड़ी हो जाती है। उसने यह बात याद रख ली, जिसका पहले से कोई दाम नहीं लगाया जा सकता था।
उस दोपहर उससे गिने-चुने फूल ही बन पाए। वह तारीख़ अभी आई भी नहीं थी और कमाई गँवाने का पछतावा दरवाज़ा खटखटाने लगा था। उसने नमूने के लिए बचाकर रखा धुएँ जैसे बैंगनी रेशम का पूरा टुकड़ा निकाला, फिर वापस ठूँस दिया। वह रेशम अभी के डिब्बे वाले फूलों के लिए ठीक नहीं था। उसे बेचा जा सकता था, मगर बेच देने के बाद दोबारा ख़रीदने पर ज़रूरी नहीं कि वैसी ही चमक मिले। उसने कोने पर उभरा एक महीन रेशा छुआ। लगा जैसे कोई उँगली बढ़ाकर उसे थाम रही हो कि जाने मत दो। आखिर उसने रेशम तुरंत नहीं काटा। तह करके उस सामान में रख दिया जिसका हिसाब अभी बाकी था, सफ़र के कागज़ के साथ।
अगले दिन श्यू थान मंग कुलनाम की एक स्त्री को बुला लाईं। उसने वहीं अनार की एक फूलदार डंडी बनाई। उसका हाथ गू छिंग से स्थिर था, मगर रंगों का मेल कुछ भारी था। कुएँ के पास से देखकर गू छिंग का पहला ख़याल अब भी यही था कि लाल की वह परत हरे को दबा रही है। अगले ही पल उसे अपनी बात पर हँसी आई। मंग को भी पेट भरना था, हो सकता है वह भी इन चार सौ वन का इंतज़ार कर रही हो। गू छिंग कमरे में जाकर नहीं छिपी। दीवार के पार से श्यू थान ने पूछा कि क्या उसके इस्तेमाल के लिए एक बाल्टी पानी मिल सकता है, तो वह बाल्टी भरकर दरवाज़े तक ले गई। मंग ने सिर हिलाकर अभिवादन किया, उसने भी हमेशा की तरह जवाब दिया।
उस रात शन सू ने उसे बचा सामान उलट-पलटकर देखते पाया तो पूछा कि क्या उनकी पुड़िया भी हिसाब में जोड़ लें। गू छिंग ने कहा कि अभी पैसे गिनने का दिन नहीं आया है, पहले यह छाँट रही है कि किस चीज़ की सच में ज़रूरत नहीं है। दादी बैठ गईं और धुएँ जैसे बैंगनी रंग का रेशम उठाया। कहा कि एक समय इस रंग को इस्तेमाल करने को भी उनका मन नहीं होता था। गू छिंग को लगा कि दादी इसे रखने को कहेंगी, मगर शन सू ने पूछा कि ऐसा पुराना, साबुत टुकड़ा कौन-सा कपड़े वाला खरीदेगा। इसे कतरन समझकर सस्ते में मत बेच देना। गू छिंग एकाएक हँस पड़ी और पूछ बैठी कि दादी को ज़रा भी दुख क्यों नहीं हो रहा।
“दुखता है।” शन सू ने कपड़े की सतह पर हाथ फेरा, “इसीलिए एक हथेली भर रख लो, पूरा मत बेचो। तुम्हें यह रंग रखना है, ज़रूरी थोड़े ही है कि इतने बड़े टुकड़े को सीने से लगाए नदी पार करो।”
गु छिंग ने हथेली भर टुकड़ा काटा और उँगलियों पर रखकर देखा। दीपक से छनता धुँधला बैंगनी जैसे रोशनी की परत बदल गया हो। इससे वह चार सौ वेन बिल्कुल नहीं भूली। बगल से मेंग महोदया के नमूना आज़माने की आवाज़ आती तो अब भी सिर उठाती। बस उस रात पूरे किए दोनों खुबानी-रंगी कमरबंद के फूल अपने तारीख़ वाले खाने में वापस रखे गए। पाँचवें महीने की बारहवीं तारीख़ वाला खाना फिर नहीं बदला गया।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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