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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

कागज़ पर नाम छापना

कू वूजी · AI सृजन · 9327 अक्षर · लगभग 12 मिनट

याओ ल्याओ एक फूल का नमूना नहीं, पूरी डिबिया लाई थी। उसमें कैमीलिया, मेई के आकार की छोटी बाल-पिनें और कुछ छोटे फूल थे जिनका सही नाम बताना मुश्किल था। गरम लाल और हल्का सुनहरा रंग ज़्यादा था। नीले रंग की बस दो आज़माइशी टहनियाँ थीं। उसने हर तरह को अलग किया और कहा कि वसंत के फूलों का मेला तीसरे महीने की छब्बीस तारीख़ के आसपास तय है। दूसरे ज़िलों का माल पहले जाएगा, अपने शहर की नज़दीकी जगहों का थोड़ा बाद में चल सकता है। कुल दो सौ टहनियाँ तीन बार में देनी थीं। एक ही दिन उसकी अलमारी भर देने की ज़रूरत नहीं थी।

गु छिंग ने पहले गिनती देखी, फिर तारीख़ें। पहली बार अस्सी टहनियाँ, दूसरे महीने की आठ तारीख़ से पहले। फिर साठ, दूसरे महीने की पच्चीस तारीख़ को। आख़िरी साठ तीसरे महीने की पच्चीस तारीख़ को। गरम रंगों की कुछ पुरानी पंखुड़ियाँ पहले से मिलाकर रखी जा सकती थीं और साधारण टहनियाँ सारी की सारी लुओ यी के नीले फूलों जितनी पेचीदा नहीं थीं। उसने मन ही मन दिन बाँटे। मेहनत तो बहुत थी, मगर काम उसकी पहुँच से बाहर नहीं लगा। श्याओमान पहले से कुछ ज़्यादा आने लगे, दादी अब भी धागा लपेट सकें और वह ख़ुद रात में थोड़ा और समय निकाल ले, तो दो सौ टहनियाँ ऐसा पहाड़ नहीं थीं जिसकी चोटी को बस गर्दन उठाकर देखा जा सके।

याओ ल्याओ ने कहा कि प्रति टहनी छह वेन मिलेंगे। फूल का ऊपरी हिस्सा चुने हुए नमूने और तय संख्या के मुताबिक होना चाहिए। ऐन वक्त पर घटाना-बढ़ाना नहीं चलेगा। दबकर बिगड़े या रंग उतरे फूल खेप में न मिलाए जाएँ। तारीख सचमुच बदलनी हो तो पहले बता देना। माल लेने की गाड़ी आने तक इंतज़ार करके उसे दूसरा कारीगर ढूँढ़ने को मत कहना। वह अभी एक सौ साठ वेन पेशगी देगी। आगे हर खेप की जाँच के बाद उसके दाम से पेशगी काटी जाएगी और मंज़ूर किए गए माल का बाकी पैसा चुका दिया जाएगा। अगली खेप नहीं पहुँची तो भी सारी रकम नहीं रोकी जाएगी। एक सौ साठ वेन सुनते ही गु छिंग को जी भाभी की दुकान का हल्का सुनहरा रेशम याद आया। इस रकम से कम से कम पहली खेप की आधी सामग्री पहले ही खरीदी जा सकती थी।

उसने पूछा कि क्या दो सौ की दो सौ टहनियों पर ल्याओहुआ जी का नाम लगेगा। याओ ल्याओ ने डिब्बे से एक नमूना-पर्ची निकाली। कहा कि दुकान का नाम अपनी जगह है, फूल देने वाले का नाम भी दर्ज हो सकता है। नया नमूना अच्छा बिका और बाद में कोई ग्राहक ख़ास तौर पर वही माँगे, तो बनाने वाले का पता होना सबको धुँधले-से निर्देश देकर नमूना बदलवाने से आसान है। पर्ची पर इतनी जगह खाली थी कि उसमें ठीक दो अक्षर, 顾家 यानी ‘गू परिवार’, लिखे जा सकते थे। गू छिंग ने कागज़ हथेली में दबा लिया। उसे कहीं वह मुड़ न जाए, इसका डर उन एक सौ साठ वन को सँभालने से भी ज़्यादा था।

श्याओमान मेज़ के बाहर एक कोने पर बैठी थी और नमूनों को एक-एक करके टिकाने में मदद कर रही थी। नीली डाली की पंखुड़ियाँ अब भी बाहर की ओर मुड़ी थीं। गरम लाल रंग वाली डाली में पंखुड़ियों की जड़ उसी ढंग से समेटी गई थी। रंग बदलने से मूल ख़याल ग़ायब नहीं हुआ था। याओ ल्याओ ने देखकर पूछा कि तो क्या ये सब गु परिवार के नए नमूने हैं। गु छिंग ने देखा कि श्याओमान की उँगली अब भी एक फूल के नीचे टिकी है। उसे एकाएक दक्षिण की गली में टोपी के ठेले के सामने की वह धूसर टोपी याद आई और श्याओमान की हँसी भी, जब दूसरी दुकान की ग्राहकों ने फूल छुआ था।

“हमारी तरफ़ बनते हैं।” उसने कहा, फिर थोड़ी देर बाद जोड़ा, “वह थोड़ा मोटा काम करने आती है, अंतिम नमूना मैं तय करती हूँ।”

श्याओमान ने फूल के नीचे से अपना हाथ खींच लिया। याओ ल्याओ ने आगे सवाल नहीं किया और न गू छिंग की पर्ची पर अपनी ओर से 独 यानी ‘अकेले’ लिख दिया। बस कहा कि वह नाम साफ़-साफ़ भर दे। आगे कोई और उसी नमूने का फूल अलग तरह से बेचे तो फ़र्क करना आसान होगा। गू छिंग ने कलम उठाई। पिछली बार दीवार की हद तय करते समय से इस बार उसने 顾 ज़्यादा सधे हाथ से लिखा। 青 का आखिरी हिस्सा अब भी कुछ सिमटा रह गया। स्याही कागज़ में फैलने लगी तो उसे लगा कि आखिर उसके पास एक ऐसी चीज़ है जो पहले दादी का नाम बताए बिना भी उसके नाम से टिकी रह सकती है।

याओ ल्याओ के जाने के बाद ही श्याओमान ने पूछा कि क्या उसे ये फूल बनाने के लिए पूरे दिन आना होगा। गू छिंग ने कहा कि इन दिनों कुछ ज़्यादा आए तो अच्छा है। पहली खेप समय पर हो गई तो बाद में आसानी रहेगी। श्याओमान ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया। उसने पूछा कि रंगाईघर का उसका काम फिर कहाँ जाएगा। गू छिंग ने कहा कि पहले सामान के ज़िम्मेदार आदमी से बात कर ले, कुछ दिन वहाँ कम चली जाए। आगे फूलों का काम जम गया तो शायद उसे इधर-उधर भागना न पड़े। बात इतनी सहजता से निकली कि ख़ुद गू छिंग को भी लगा कि वह उसकी भागदौड़ कम कर रही है।

“मैंने यह नहीं कहा कि रंगाईघर नहीं जाऊँगी।” श्याओ मान ने कहा।

गु छिंग एक पल ठिठकी और बोली कि उसने भी मना नहीं किया, वह तो बस बात कर रही थी। श्याओमान ने खाली डिब्बी का ढक्कन बंद किया और कहा कि कल वह फिर आधे दिन आएगी। इससे ज़्यादा किस दिन आ सकेगी, यह पहले से अलग पूछना होगा। मेज़ के किनारे का नीला नमूना वह नहीं ले गई, मगर कागज़ की वह छोटी पुड़िया उसकी अपनी जेब में ही रही। उसके मुँह से रेशम का थोड़ा-सा रंग झाँक रहा था। गु छिंग ने दो बार उधर देखा और दोबारा उधार माँगने को मुँह नहीं खोला।

पैसे रात भर कपड़ों के संदूक के आगे रखे रहे। गू छिंग ने उन्हें घर की पुरानी बचत में नहीं मिलाया। रोज़मर्रा की बचत में से चावल-सब्ज़ी, नया सामान और साल के आखिर के कपड़ों का खर्च निकल चुका था। हाल की खुदरा बिक्री से उसमें कुछ पैसे फिर जुड़े थे। अब करीब दो सौ साठ वन इस्तेमाल किए जा सकते थे। उसने सोचा था कि इन्हीं में से एक पुड़िया अलग करके उसे च्यांगनान के सफ़र का पैसा कहेगी। नया ऑर्डर सामने फैलाया तो पता चला कि पहले ये सारे पैसे फूलों के काम में लगेंगे। अगर गलत कपड़ा खरीद लिया, अगर माल ले जाने को लौटती गाड़ी न मिली, तो वे एक सौ साठ वन की पेशगी भी कोई मुफ़्त की भेंट नहीं थी।

दादी पास बैठी पुराना सूती कपड़ा उधेड़ रही थीं। उसकी बताई तारीख़ें सुनकर उन्होंने पूछा कि क्या दो आधे दिन जोड़कर किसी और का पूरा दिन मान लिया जाएगा। कू छिंग ने कुछ उतावले स्वर में कहा कि वह पहले ही कह चुकी है, अलग से पूछेगी। फिर नमूने का फूल दिखाकर बोली कि बस मोटा काम पहले पूरा हो जाए, बारीक काम वह ख़ुद करेगी। दादी को हर रात सुई में धागा नहीं डालना पड़ेगा। शन सू ने और नहीं पूछा। फूल के बीच की छोटी गाँठ छूती रहीं और कुछ देर बाद बोलीं, रात को काम न करूँ तो भी दिन का सारा वक़्त तुम्हें नहीं दे सकती।

गु छिंग यह सुनकर झुँझला गई और पेशगी के पैसे गिनकर दूसरे कटोरे में डाल दिए। उसने दादी से उनकी अपनी बचत में से कुछ नहीं माँगा था। उसके हिसाब से इतना ही दिखाने के लिए काफ़ी था कि वह ज़िम्मेदारी ख़ुद उठा रही है। बार-बार क्यों सुने कि काम पूरा हो भी पाएगा या नहीं। फिर भी उस रात मेज़ समेटते समय उसने बिना लपेटी बाँस की बीस डंडियाँ उस रोशन जगह पर रख दीं जहाँ दादी बैठती थीं। मुँह से मदद नहीं माँगी, पर हाथ ऐसे चले जैसे दोनों की अगली सुबह का काम पहले ही तय कर चुके हों।

जी भाभी की दुकान पर सामान लेने गई तो वह नमूने की पर्ची साथ ले गई। जी भाभी ने जहाँ गु छिंग लिखा था, वहाँ एक नज़र डाली और कहा कि नाम काग़ज़ पर टिकाए रखना और पैसा हाथ में बचाए रखना शायद दो अलग मुश्किलें हैं। उसे सुनना अच्छा नहीं लगा। उसने फ़ौरन पेशगी सामने रखकर कहा कि पहली खेप के लिए जितना चाहिए उतना ही लेगी, पूरा थान उधार नहीं लेगी। उसके पलटकर बोलने से जी भाभी ने मुस्कान ओढ़ने की कोशिश नहीं की। बस कपड़े की चौड़ाई के हिसाब से गिना और आख़िर में उसे काटने का वह ढंग भी दिखाया जिससे एक टुकड़ा और निकल सकता था।

हल्के सुनहरे रंग का थान सस्ता नहीं था। गु छिंग के पास एक साथ पूरा दाम चुकाने के पैसे नहीं थे, और वह अपनी सारी पुरानी बचत भी एक ही रंग पर नहीं लगाना चाहती थी। उसने पूछा कि अभी ज़रूरत भर कपड़ा ले जाए और बाकी हिसाब दस दिन बाद चुकाए तो चलेगा। जी भाभी ने ज़रूरत की मात्रा देखकर कहा कि साठ वेन तक ठीक है। मियाद बीतने के बाद कुछ और खरीदेगी तो नक़द देना होगा, उनके अपने कपड़े के व्यापारी भी वसूली करने आते हैं। दादी से पुरानी पहचान थी, पर उस नाते खाता हमेशा खुला नहीं रखा जा सकता था। गु छिंग ने हामी भरी और दस्तख़त में अपने पहचाने हुए अक्षर 顾 को लिख दिया। उसके मन में अभी-अभी चमकने लगे उस नाम में अचानक इतना वज़न भी आ गया था कि वह उसे पीछे खींच सकता था।

घर लौटते हुए उसने काग़ज़-स्याही के ठेले पर पूछा कि छोटे अक्षर मुहर पर खुद सकते हैं क्या। दुकानदार ने कहा कि अगर दो ही अक्षर हैं तो ख़ुद लिखना बेहतर है। दस-पंद्रह बार लिखने से हाथ सध जाएगा, सिर्फ़ दिखावे के लिए अलग मुहर बनवाने से यह सस्ता पड़ेगा। गु छिंग को कुछ निराशा हुई। उसके मन की वह छोटी लकड़ी की मुहर ऐसी थी जैसे दुकान की जगह पक्की हो चुकी हो, जबकि उसके अपने हाथ के अक्षर अब भी जैसे कहीं थोड़ी देर के लिए रख छोड़े गए हों। वह जाने को मुड़ी, फिर सबसे साधारण सूखे काग़ज़ की दो चादरें ख़रीद लीं। सोचा, पहले नमूनों की पर्चियाँ अच्छे से लपेटकर रखेगी।

दक्षिण पुल पार करते समय चोउ जीपिंग किसी के साथ लंबे बाँसों का एक गट्ठर उठा रहा था। उसे बात करने की फुरसत नहीं थी, बस उसने सिर हिला दिया। गू छिंग सड़क किनारे खड़ी रही। वह उसे बताना चाहती थी कि उसने दो सौ फूलों का काम लिया है। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद उसे लगा जैसे बचपन में वह अपना बनाया फूल हाथ में लिए खड़ी रहती थी और जब तक कोई देख न ले, घर के भीतर जाने को तैयार नहीं होती थी। उसने बाँस उतरने का इंतज़ार नहीं किया। कागज़ आस्तीन में छिपाया और नदी के किनारे-किनारे धीरे-धीरे घर लौट गई।

नया रेशम घर पहुँचा तो धूप देहरी के भीतर एक ची तक पड़ी हुई थी। गू छिंग का मन उसे तुरंत काटने को नहीं हुआ। उसने हल्के सुनहरे रंग का वह टुकड़ा उठाया। रोशनी रेशम के पार उसकी उँगलियों पर पड़ी, यहाँ तक कि आस्तीन का पुराना सिरा भी ज़रा चमक उठा। दादी ने बिस्तर के पास से देखकर कहा कि इस रंग का पहनावा भी सुरुचिपूर्ण लगेगा। वह कहने ही वाली थी कि सारा कपड़ा ग्राहकों के लिए है, मगर हाथ पहले ही कंधे के पीछे घूम गया। उसने रेशम को अपने ऊपर ढीले से ओढ़ा और काँसे के आईने के सामने जाकर देखने लगी।

आईने पर पुराने निशान थे, इसलिए चेहरा बहुत साफ़ नहीं दिखता था, पर हल्के सुनहरे रंग ने बालों और चेहरे की अलग-अलग रेखाएँ उभार दी थीं। गु छिंग ने एक हाथ उठाया, मानो सचमुच कोई हल्का, झीना नया कपड़ा पहन रखा हो। उँगलियाँ फिर कंधे के पास लाईं तो उनके पोरों पर सुई की रगड़ से बनी कड़ी त्वचा की छोटी-छोटी कतार दिखी। वह अचानक हँस पड़ी और बोली कि अगर सच में यह पहन लिया, तो पानी भरने से पहले कुएँ से भी कहना पड़ेगा कि छींटे मत उड़ाना।

शन सू भी हँसीं। बोलीं, उसे यूँ मत खींचो, कपड़े का किनारा अभी बराबर नहीं किया है, ओढ़ते वक़्त तिरछा हुआ तो ग्राहक की दो सौ डालियों में आधी डाल कम पड़ जाएगी। गू छिंग ने कपड़ा उतार लिया, मगर उसे ओढ़ने पर जो हल्की चमक दिखी थी वह मन में रह गई। उसने पूछा, क्या दादी ने जवानी में कभी सबसे बढ़िया रेशम पहना था? शन सू ने कहा, दूसरों के लिए उसके कपड़े बनाए थे। अपनी बारी आती तो लगता, एक बार पहनने का बना लिया तो उसे खोलकर किसी और काम में नहीं ला सकेंगी। जी नहीं माना। कहकर उन्होंने उस रेशम को छुआ, अपने कंधे पर नहीं डाला।

गू छिंग ने देखा और आखिर कपड़े का दूसरा सिरा धीरे से दादी की गोद में रख दिया। कहा, बैठकर देख लीजिए, इससे कपड़ा कट थोड़े ही जाएगा। रेशम के उसी टुकड़े के एक-एक सिरे पर दोनों थीं, और धूप बस बीच का हिस्सा रोशन कर पा रही थी। दादी ने उसे फिर से उसके हाथ में थमा देने की जल्दी नहीं की, बस सिर झुकाकर कुछ देर और देखती रहीं। बाहर श्याओ मान की पदचाप सुनाई दी, तब उन्होंने कपड़ा समतल बिछाया और काटने की तय नाप के हिसाब से उजले हिस्से से इंच-इंच नापना शुरू किया।

उस दोपहर श्याओमान तय बात के मुताबिक आधे दिन के लिए ही आई। तीन हिस्सों का शुरुआती काम निपटाकर उसने पूछा कि क्या आज रंग भी आज़माना है, और अगर हाँ, तो वह एक हिस्सा कम बनाएगी। नए ऑर्डर को देखते हुए गु छिंग का जी हुआ कह दे कि रंग आज़माने में ज़रा ही देर लगेगी, पर आखिर उसने रंग की परख अगले दिन पर छोड़ दी। काम समेटने से पहले श्याओमान ने तीनों नमूनों की एक-एक पंखुड़ी छोटी तश्तरी में रखी। एक कसकर समेटी हुई, एक बाहर की ओर मुड़ी हुई और एक का बस आधा किनारा पलटा हुआ। उन्हें सजाने का उसका अपना क्रम था।

गु छिंग ने पूछा कि क्या तीनों पंखुड़ियों को तय नमूना मान लें। श्याओमान ने कहा, तुम ख़ुद देख लो, आख़िरी नमूना तुम्हीं तय करोगी। यह बात पहले गु छिंग ने याओ ल्याओ से कही थी। अब ज्यों की त्यों लौटकर आई। लहजे में ज़ोर नहीं था, मगर मेज़ पर पड़ते ही वह तीनों रेशमी पंखुड़ियों से भारी लगी। उसने बाहर की ओर मुड़ी पंखुड़ी को बीच में करने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रुक गई। श्याओमान ने जिस क्रम में उन्हें रखा था, उसे नहीं छेड़ा।

चौबीस तारीख़ को उसने नमूने का पहला औपचारिक लेबल तैयार किया। नीचे हर डाली के लिए एक छोटी संख्या रखी ताकि वह उन्हें आसानी से पहचान सके। आपूर्तिकर्ता के आगे अब भी गू छिंग था, बग़ल में श्याओमान का नाम नहीं था। उसने अपने आप से कहा कि पहले यह काम ठीक से पूरा हो जाए, फिर किसने कौन-सी पंखुड़ी सोची थी, उसका हिसाब करना देर नहीं होगी। कुछ बातें शायद पहली छोटी पर्ची पर पूरी तरह नहीं लिखी जा सकतीं। उसने पर्ची भीतर की दीवार पर चिपका दी। सिर उठाते ही दिख जाती थी, बाहर की नई दीवार पर लगे चूने के छोटे-से निशान से कहीं ज़्यादा साफ़।

रात को दादी सो चुकी थी और मेज़ पर गरम लाल रंग का मेल बैठाना अभी बाक़ी था। गू छिंग ने एक पंखुड़ी उठाई और अचानक उसे सूँघने का मन हुआ, जबकि वह अच्छी तरह जानती थी कि रेशम में असली फूल की ख़ुशबू नहीं होती। उसे थोड़ी कलफ़ और नए रंग की कुछ कसैली गंध आई। दीवार के पार वाला बूढ़ा मेइ अब कमरे में अपनी ख़ुशबू नहीं भेजता था। उसने पंखुड़ी नाक से हटाई, फिर दीपक के नीचे बैठ गई और वसंत का वह पहला फूल बनाने लगी जो उसके अपने नाम के साथ बाहर भेजा जाने वाला था।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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