प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
कू वूजी · AI सृजन · 9499 अक्षर · लगभग 12 मिनट
तेईस को हल्की बर्फ़ पड़ी। दोपहर ढलने से पहले ही वह सड़क के किनारों से पूरी तरह पिघल गई, मगर छज्जों के नीचे नमी रह गई। गू छिंग ने अभी बनी नीली मेई की आठ टहनियाँ मेज़ पर कतार में रखीं। बगल में दस और टहनियों के लिए रंग मिलाकर रखी अधबनी पंखुड़ियाँ थीं। उन्हें देखकर उसे लगा जैसे वे अब खुद चलकर दरवाज़े से बाहर जा सकती हों। फूलों के रंग कहीं गहरे, कहीं हल्के थे। बाहर की ओर मुड़ी पंखुड़ियों में अपनी-अपनी छोटी-सी गोलाई थी, ठीक लुओ यी के चुने नमूने की तरह। उसे डर था कि भेजते समय फिर टकराकर बिगड़ जाएँगे। उसने ख़ास तौर पर मोटे कागज़ के डिब्बे खरीदे और ऊपर से पुराना मोमजामा लपेट दिया। उसे लगा इससे ज़्यादा एहतियात और क्या हो सकती है।
श्याओमान ने कहा, पहले दो डालियाँ डिब्बे में रखकर एक रात देख लें। आज़माने की बात सुनते ही गू छिंग का मन कस गया। रंग से लेकर आकार तक ये फूल इतनी बार आज़माए जा चुके थे। अगर हर बात के लिए एक रात और रुकें तो महीने का आख़िर कभी आएगा ही नहीं। फिर उसे वह कपड़ा याद आया जिसे सूखने से पहले मसलकर बिगाड़ दिया था। आख़िर उसने बाक़ी डालियाँ उसी वक़्त बंद नहीं कीं। दो डालियाँ एक डिब्बे में रखीं, चारों ओर कागज़ ठूँसा, ढक्कन भी कसकर दबाया और डिब्बे को रात भर खिड़की के नीचे रहने दिया।
दूसरे दिन डिबिया खोली तो फूल बिखरे नहीं थे, लेकिन सबसे बाहरी पंखुड़ी काग़ज़ पर चिपक गई थी। गु छिंग ने सुई से उसे धीरे-धीरे छुड़ाया। किनारे का थोड़ा रंग काग़ज़ के साथ उतर गया। पहले उसने मोटे काग़ज़ को दोष दिया। फिर रोशनी में ले जाकर देखा तो जाना कि डिबिया के भीतर नमी घुटकर रह गई थी और डंडियों पर लिपटा धागा भी नरम था। मेज़ पर खुले रखती तो हालत इससे अच्छी होती। श्याओमान ने हाथ बढ़ाकर डिबिया का तला छुआ। कुछ देर बाद बोली, सबको ऐसे बंद करके भेजा तो वहाँ पहुँचकर शायद पता भी न चले कि नमी पहले कहाँ लगी थी।
गु छिंग को लगा जैसे उसने अपने ही हाथों अच्छी चीज़ सँभालकर रखी और वहीं बिगाड़ दी। दादी ने देखा कि वह फूल छोड़ ही नहीं रही, तो पहले कहा कि जो बच सकता है उसे फैलाकर रखो। जितना दुख हो रहा है, उतनी कसकर मुट्ठी मत बाँधो। दोनों टहनियाँ पूरी तरह बेकार नहीं हुई थीं। पंखुड़ियाँ फिर से सँवारनी थीं, मगर जिसका रंग उतर गया था, उसे बदलना पड़ता। उसने ख़राब पंखुड़ी हथेली में दबाए रखी और बहुत देर बाद सामग्री की तश्तरी में छोड़ी। इस बार उसने नहीं कहा कि ग्राहक को दूर से पता नहीं चलेगा।
वह डिब्बों के बारे में पूछने याओ की दुकान गई। याओ ल्याओ ने बाहर का तेल लगा कपड़ा देखकर कहा कि पास भेजने के लिए वह पेटियाँ इस्तेमाल करती हैं और दूर के माल के लिए अलग-अलग ढुलाई वाले हैं। बाहर से पेटी पर बारिश न पड़ी हो तो भी यह नहीं मान सकते कि अंदर हमेशा सूखा रहेगा। वह गू छिंग को देखने के लिए खानों वाला एक पुराना डिब्बा उधार दे सकती थीं, मगर साल के आख़िर में दुकान व्यस्त थी और वहाँ कोई उसकी अठारह डंडियाँ एक-एक करके पैक नहीं कर सकता था। गू छिंग ने डिब्बा लिया और जल्दी से शुक्रिया कहा। लौटते समय नदी का पुल लेने का मन नहीं हुआ। डर था कि झोउ परिवार की छतरी की दुकान दिख जाएगी और वह कुछ कहे उससे पहले ही वे पूछ बैठेंगे कि उसका चेहरा ऐसा क्यों है मानो माल दबकर ख़राब हो गया हो।
अंत में वह फिर भी उधर गई। झोउ जीपिंग दरवाज़े के भीतर उकड़ूँ बैठा बाँस छील रहा था। पास की स्त्री तेल लगे कपड़ों की तह उलट रही थी। पेटी देखकर पहले पूछा, खरीदना है या ठीक कराना। गू छिंग ने कहा, सामान रखने का तरीका पूछना है। झोउ जीपिंग उठा, लेकिन स्त्री ने अधबँधी छतरी की मूठ उसके हाथ में देकर कहा, पहले इस खेप की गिनती साफ़ करो। गाड़ीवाला सुबह सात से नौ के पहर में लेने आएगा, फिर लोगों को तुम्हें बाहर जाते देखते नहीं छोड़ सकते।
तभी गु छिंग को पता चला कि उनका नाम लू यिंग है, वे झोउ जीफिंग की बड़ी भाभी हैं और दुकान से माल भेजने का इंतज़ाम वही करती हैं। उन्होंने कड़वी बात नहीं कही, न ही जवान लड़की देखकर उसे दोबारा घूरा। बस पूछा, गु छिंग का काम कितना जल्दी का है। अगर सिर्फ़ कुछ देखना है तो दोपहर बाद आ सकती है? गु छिंग ने डिब्बा सीने से लगाए हामी भरी। मुड़ते हुए पहले तो थोड़ी ठेस लगी, मगर पुल पार करते वक्त लगा कि उनके पूछने की वजह भी वही थी जो श्यू थान के फूल जाँचने की थी। अपनी जल्दी की वजह से वह अचानक उस बात को कैसे ग़लत मान ले।
दोपहर बाद जब वह फिर आई तो झोउ जीपिंग की हथेली पर कसाव से बने कुछ नए लाल निशान थे। उसने कागज़ का डिब्बा छतरियाँ सुखाने वाले रैक के नीचे रखा, तेल लगा कपड़ा उठाया और भीतर ठुँसे कागज़ को देखा। उसने पहले गू छिंग पर हँसी नहीं उड़ाई, न फ़ौरन बताया कि क्या करना चाहिए। बस छतरी का एक अधसूखा खोल कसकर मोड़ा, थोड़ी देर बाद फिर फैला दिया और कहा कि देखो, दबा हुआ हिस्सा पहले सूखता है या खुला हुआ।
गू छिंग ने कहा कि डर है रास्ते में भीग जाएँगे, तो क्या उन्हें लपेटे भी नहीं? झोउ जीपिंग ने कहा कि लपेटने से बाहर का पानी रुकता है, भीतर की नमी को भी भुला नहीं सकते। उसने बाँस की कुछ पतली तीलियाँ निकालीं, काग़ज़ को दो तहों में मोड़ा और बीच में एक छोटा खाना छोड़ा, जो डंडी को थामे मगर फूल को न छुए। फिर कहा कि वह तो छतरी को तानने के ढंग से आज़मा रहा है, पंखुड़ियाँ तेल लगे कपड़े से भी पतली हैं, इसलिए लौटकर उन्हें एक रात और खुला रखना होगा। एक रात और रखने की बात गू छिंग इस बार सुबह की अपेक्षा आसानी से मान गई।
उसके पास रखी बाँस की कुछ पतली तीलियाँ छोटी छतरी के लिए थीं। उन्हें निकालते ही एक छतरी का ढाँचा कम पड़ गया। लू यिंग ने भीतर से देखकर कहा कि जो सामान लगा है, उसे साफ़-साफ़ दर्ज कर लो। महीने के आख़िर में हिसाब न मिले तो फिर मुझ पर मत कहना कि मैंने माल कम गिना। चोउ जीफिंग ने सिर उठाकर हँसते हुए कहा, गु परिवार के नाम लिखूँगा। लू यिंग बोली, नाम किसी का भी लिखो, बस यह मत मानो कि हाथ के पास था तो ले लिया। गु छिंग भी हँसी और ख़ुद ही मज़दूरी और सामान के दाम पूछे। लू यिंग ने सोचकर कहा, दो आज़माइशी ढाँचों और सामान काटने के आठ वन। आगे वह ख़ुद बना सके तो और कुछ नहीं लगेगा।
आठ वन कोई बड़ी रक़म नहीं थी, फिर भी गू छिंग कुछ देर अपनी थैली टटोलती रही। चोउ जीफिंग ने उसकी तरफ़ से कोई फ़ैसला नहीं किया। उसने कहा कि बस बची-खुची खपच्चियाँ लें तो थोड़ा काम कम लगेगा, मगर कोने बराबर नहीं होंगे और बाँधने पर शायद ठीक से न बैठें। आख़िर गू छिंग ने पूरे आठ वन दिए। काम पूरा होने पर उसे बाँस के दो ख़ाली ढाँचे मिले, जो किसी छाते के फैलाव जैसे बिल्कुल नहीं दिखते थे। साथ में न कोई छाता मिला, न सब ठीक रहने का कोई वादा। उसने दोनों आज़माइशी ढाँचे एक पर एक रखे। हाथ में उनका वज़न सुबह के काग़ज़ से भरे डिब्बे से कहीं हल्का लगा।
चलने से पहले उसने छतरी की दुकान के दरवाज़े पर काग़ज़ की एक चिड़िया टँगी देखी। उसके दोनों पंख बराबर नहीं थे। हवा भीतर घुसती तो वह हर बार एक ही ओर झुक जाती। गु छिंग ने सोचा, कोई ग्राहक छोड़ गया होगा। मगर चोउ जीफिंग ने कहा, उसने ख़ुद मोड़ी है, दरवाज़े पर हवा परखने के लिए। गु छिंग ने उसे हथेली पर रख लिया। चिड़िया अब भी टेढ़ी थी और काग़ज़ की सख़्त पूँछ उसकी हथेली में चुभ रही थी। आख़िर उसकी हँसी छूट गई। बोली, तुम तो बड़ी बराबरी से चीज़ें बनाते हो, अपनी चिड़िया ऐसी क्यों है जैसे शराब पी रखी हो?
झोउ जीपिंग ने लेने को हाथ बढ़ाया, तो उसने अपना हाथ थोड़ा ऊँचा कर लिया और पूछा कि क्या उसका एक पंख ठीक किया जा सकता है। बात अनायास निकली थी; कहते ही उसे लगा कि किसी की चीज़ हाथ में लेकर उसे चिढ़ाना ठीक नहीं, और उसने जल्दी से वापस बढ़ा दी। उसने लेने के बजाय चिड़िया के एक पंख की ओर इशारा किया और कहा कि इसे उसने पहले खराब बनाए छाते के कपड़े के आकार पर मोड़ा है; दोनों तरफ शुरू से बराबर नहीं थीं। हवा कहीं से भी आए, इसे वह बात याद रहती है। सुनकर उसे फिर लगा कि उसने उस टेढ़ी चिड़िया की इज़्ज़त बचाने के लिए यह बात अभी गढ़ी है। दोनों कागज़ की उस चिड़िया के आर-पार एक-दूसरे को देखकर देर तक हँसते रहे।
लू यिंग ने काउंटर के पीछे से आवाज़ दी कि दरवाज़ा मत रोको। सच में कोई ग्राहक आ गया तो चिड़िया समेत बाहर जा गिरोगे। उसने काग़ज़ की चिड़िया फिर टाँग दी। गु छिंग ने टोकरी के तल से फूल बाँधने वाला मुलायम धागा निकाला और उसका टूटने को आया धागा बदल दिया। चिड़िया अब भी एक तरफ़ झुकी थी। धागा बदलते ही उसे सीधा रहना नहीं आ गया था। गु छिंग हाथ झाड़कर बाहर निकली तो पीछे से झोउ जीफिंग ने कहा कि जब तुम्हारे नीले फूल पहुँचें, मेरे लिए भी एक टेढ़ा बना रखना। उसने पलटकर नहीं देखा। बस कहा, टेढ़ा बन जाए तो भी उसमें माल लगता है, तुम्हारे लिए ख़ास तौर पर बचाकर नहीं रखा जाता।
पुल पार करते वक़्त वह अब भी हँस रही थी। ठंडी हवा से चेहरे पर हल्का दर्द होने लगा था। वह इस हँसी को घर ले जाकर यह हिसाब नहीं समझाना चाहती थी कि किसने उसकी कितनी मदद की। बस सिर झुकाकर बाँहों में पकड़े आज़माइशी ढाँचे को बचाती रही। ढाँचा पतला था और मोड़ पर दूसरों की आस्तीनों से बचाना पड़ता था, मगर अब उसे नहीं लग रहा था कि वह यह रास्ता बस एक डिब्बा बिगड़े हुए फूलों के लिए तय कर रही है।
दादी ने आज़माइशी ढाँचा पलटकर पहले कहा कि बनाने वाले का हाथ सधा है। फिर गू छिंग की लाई बाँस की छुटपुट पट्टियाँ देखकर पूछा कि मुफ़्त मिलीं या ख़रीदी हैं। गू छिंग ने कहा कि सबका हिसाब हुआ है। तब दादी ने सिर हिलाया और नई मोड़ी काग़ज़ी आड़ को नाख़ून से परखा। श्याओमान बगल में देख रही थी। उसने ख़ुद तीसरी आड़ मोड़ी, जो पहली दो से थोड़ी सँकरी थी और खोलकर अलग किए जा सकने वाले छह फूलों को ठीक अलग रख सकती थी। उन्होंने अलग-अलग तरीक़े आज़माए। बस इसलिए किसी को अपने हाथ से मोड़ी आड़ से बेहतर नहीं माना कि उसे किसी कारीगर से बनवाया गया था।
पच्चीस की सुबह डिब्बे में फूलों के सिर अब भी एक-एक करके अलग किए जा सकते थे। गु छिंग ने पहले राहत की साँस ली। फिर डिब्बा उठाकर आँगन का चक्कर लगाया और गाड़ी के हिचकोलों की तरह उसे हल्का-हल्का हिलाया। श्याओमान से हँसी रोकी नहीं गई। बोली, एक बार हिलाने से क्या होगा, शियान तक की सड़क हमारे आँगन से लंबी है। गु छिंग ने फिर हिलाया, फिर हिलाया। डालियों के सिरे टकराते सुनकर झट डिब्बा नीचे रखा और बँधी जगह पर एक फेरा और कस दिया। शन सू दरवाज़े के पास बैठी थीं। हँसते-हँसते उन्हें खाँसी आ गई। बोलीं, डिब्बा परखने के चक्कर में पहले अपना ही सिर मत घुमा लेना।
जो पंखुड़ियाँ बदलनी पड़ीं उनकी मरम्मत गू छिंग ने ख़ुद की और श्याओमान को डिब्बों के अंदर के ढाँचे बनाने का तय मेहनताना दिया। वह इसी मौक़े पर दो वन वाले दोबारा किए काम की बात उठाना चाहती थी। फिर मेज़ पर नए डिब्बे करीने से सजे देखे और सोचा कि आख़िर अठारह डालियों को जगह मिल गई है, तो बात खाने के बाद पर टाल दी। खाना ख़त्म होते ही श्याओमान पुराना माल लेने रंगशाला लौट गई और बात वहीं मेज़ के पास रह गई। गू छिंग ने खाली कटोरे को देखा। वह जानती थी कि बात करने के मौक़े अब भी थे। वह बस ऐसा वक़्त चुनना चाहती थी जिसमें किसी को बुरा भी न लगे और उसे अपनी पिछली ग़लत गिनती माननी भी न पड़े।
अट्ठाईस तारीख़ को शिश्येन जाने वाली गाड़ी लुओ यी ने पहले ही तय कर ली थी। उसमें सुगंधित चूरा, ख़ाली मर्तबान और लकड़ी की तख़्तियों की एक छोटी पेटी जानी थी। ढुलाई वाले पूछने आए, तब गु छिंग को याद आया कि फूलों के दाम में गाड़ी का भाड़ा अलग से तय नहीं हुआ था। उसने सोचा, बचे हुए भुगतान में से दे देगी। मगर गाड़ीवान ने कहा, हल्की तो हैं, पर पेटियों के ऊपर कुछ नहीं रखा जा सकता, इसलिए उन्हें एक अलग कोना घेरना होगा। भाड़ा वज़न से नहीं लगेगा। बारह वन पर बात तय हुई। उसने होंठ भींचकर हामी भरी और इस छूटे हुए ख़र्च के लिए लुओ यी से पहले तय फूलों का दाम बदलवाने नहीं गई।
वन परिवार के यहाँ नए दरवाज़े की आज़माइश चल रही थी। गाड़ी दक्षिण से आई और सचमुच उसे अब मेई के पेड़ वाले कोने की ओर सीधे नहीं बढ़ना पड़ा। मगर फूलों के बक्से उतारने के समय दादी ल्यू ने अभी अपना काँवड़ नहीं समेटा था। गाड़ीवान उन्हें जल्दी करने को कहने ही वाला था कि गू छिंग ने पहले दोनों बक्से गोद में उठाकर उतार लिए। जब दादी ल्यू ने गरम फलियों का बर्तन सुरक्षित जगह रख दिया, तभी उसने उसे आगे आने को कहा। बक्से उठाए-उठाए उसकी कलाइयाँ दुखने लगीं, पर उसे अचानक यह बात अच्छी लगी कि वह थोड़ा ठहर सकती है। माल की जल्दी जताने के लिए उससे धीमे चलने वाले हर इंसान को नासमझ अड़चन बना देने की ज़रूरत नहीं थी।
लुओ यी गाड़ी के साथ नहीं आई। उसने माल ढोने वाली फ़र्म से कहलाया कि बाक़ी एक सौ अड़सठ वन सिक्के फूलों के शिश्येन पहुँचकर जँच जाने पर वापसी की गाड़ी से भेजे जाएँगे। गु छिंग ने गाड़ीवान को अठारह डालियाँ गिनाईं। अलग की जा सकने वाली छह कलाकृतियों को अलग दर्ज किया और रसीद के कुछ शब्द श्यू थान से फिर जँचवा लिए। श्यू थान ने पैकिंग देखकर कहा कि पिछली बार से साफ़-सुथरी है। वह यहीं रुक गया, उसने इसकी ज़मानत नहीं ली कि वहाँ पहुँचकर फूल ठीक वैसे ही रहेंगे। उसने रसीद सँभाल ली और पीछे से यह भी नहीं पूछा कि सचमुच ख़राब तो नहीं होंगे।
गाड़ी जाने के बाद मेज़ का बड़ा हिस्सा खाली हो गया। श्याओमान ने बचा सामान तीन ढेरों में बाँटा, जिसे काट सकते थे, जिसे खोलकर फिर इस्तेमाल कर सकते थे, और जो किसी काम का नहीं था। गू छिंग रसोई में नूडल उबालने गई। पहली बार उसे कौर जल्दी-जल्दी उठाकर समय बचाने की ज़रूरत नहीं थी। दादी ने पूछा कि इस ऑर्डर में कितना कमाया। उसने मुँह खोला, मन में देर तक हिसाब चलता रहा। आखिर कहा कि अभी नहीं मालूम, लौटती गाड़ी का इंतज़ार करना होगा। शन सू ने कहा तो पहले खा लो, ज़्यादा उबल गए नूडल लौटती गाड़ी तक रुककर बचाए नहीं जा सकते।
वे हँसते हुए खाना खाकर उठीं। गु छिंग ने बाँस के ढाँचे का नमूना छत की बल्ली के नीचे रख दिया, ताकि आगे दूर भेजे जाने वाले माल की पैकिंग उसी के मुताबिक़ बदल सके। उस रात बर्फ़ नहीं पड़ी, मगर पेड़ के नीचे ठंड ठहरी हुई थी। उसने खिड़की खोलकर एक नज़र देखी। नई दीवार के ऊपर से मेई की डालियाँ चली आई थीं। उन्हें जैसे इससे कोई मतलब नहीं था कि आज भेजे गए नीले फूलों में असली मेई का रंग था या नहीं। खिड़की के नीचे उसकी सबसे पहली हल्की मेई भी अब तक बिना सुगंध की थी। उसने खिड़की ज़रा-सी खुली छोड़ी कि फूलों की ख़ुशबू ख़ुद अंदर आए। किसी डाली को अपनी ओर खींचने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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