प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
बिना महक का दुकान का नामपट्ट
कू वूजी · AI सृजन · 9008 अक्षर · लगभग 12 मिनट
पहली बार उसने आठ टहनियाँ पहुँचाईं, चार हल्की लाल और चार मटमैली सफ़ेद। गू छिंग ने फूलों को पुराने कागज़ से अलग-अलग रखा। नई बनी घुमावदार दीवार के पास से गुज़रते हुए टोकरी ईंट के किनारे से हल्की-सी रगड़ी तो उसने तुरंत पलटकर देखा। दीवार अब हाथ से नहीं चिपकती थी, मगर किनारे पर रेत का एक छोटा दाना अब भी था, जिसमें लपेटने का कागज़ अटक गया। उसने कागज़ की दिशा बदल दी। अब उसने पहले की तरह सारे फूल बाहर की ओर करके नहीं सजाए कि लोग उन्हें देखें।
श्यू थान मुनीम के कमरे के बाहर माल चुन रही थी। आठों डालियाँ देखने के बाद सात रख लीं और एक मटमैली सफ़ेद डाली खिड़की के पास अलग कर दी। कहा कि पंखुड़ियों की जड़ पर एक घेरा कुछ गहरा है। गु छिंग ने पास से देखा। किनारे मोड़ते वक्त उसके हाथ पर हल्का लाल रंग लगा था और हाथ पोंछ लेने के बाद उसे निशान साफ़ नहीं दिखा था। वह कहने वाली थी कि सफ़ेद मेई में इतनी लालिमा होती ही है। मगर बाकी डालियों की साफ़ सफ़ेदी देखकर उसने वह डाली वापस खींच ली और कहा कि अगली बार इसकी कमी पूरी कर देगी।
मुनीम के कमरे में अभी पूरी अलमारी नहीं लगी थी। हिसाब के पन्ने खाने के एक पुराने डिब्बे में दबाकर रखे थे। वन जीछांग ने अंदर आकर खिड़की के नीचे लगी रेशमी मेई की डाली देखी। उसने हाथ बढ़ाकर पंखुड़ी छुई और पूछा कि उसमें थोड़ी महक डाली जा सकती है क्या। कोई मेहमान पास आता है तो पूछता ही है। गु छिंग को वह जाना-पहचाना शब्द सुनकर अब उतनी झेंप नहीं हुई जितनी पश्चिमी बाज़ार में हुई थी। उसने बस समझाया कि उसे यह रंग बनाना आता है, असली मेई की गंध रेशम में बसाना नहीं।
“सुगंध वाले घोल में भिगो दें तो?” उसने पूछा।
“खुशबू बदल जाएगी, रेशम भी बदल जाएगा। अभी महक आती है तो उससे यह तय नहीं होता कि पहुँचाने के बाद भी वैसी ही रहेगी।”
वन जीछांग ने फूल को फिर देखा, जैसे कारीगर ने एक बात कम मानी तो उसके उपहार की शान कुछ कम हो गई हो। पास में श्यू थान ने स्वीकार की हुई सात डालियाँ अलग-अलग कीं और कहा कि माल लेने वाले जब चावल का भाव तय करने आएँ, तो मेज़ के आसपास हर तरफ़ मीठी खुशबू भी अच्छी नहीं लगेगी। फिर ये फूल दीवार की कारीगरी के बदले हैं, किसी को जादू दिखाने के लिए नहीं बुलाया। गु छिंग की हँसी छूटते-छूटते बची। उसने रोक ली, कहीं ऐसा न लगे कि पत्नी की बात के सहारे पति से मोर्चा ले रही है।
वन जीछांग ने आख़िर हल्की लाल टहनी अपनी बैठने की जगह के पास खिसका ली। उसे खटकती थी, फिर भी उसने फेंकी नहीं। उसने पूछा कि डंठल कुछ छोटा हो सकता है। श्यू थान ने फ़ौरन कहा कि नमूना चुना जा चुका है। छोटा चाहिए तो अलग से बनवाओ, अगली खेप को भी उसके साथ मत बदलवाओ। गु छिंग को अचानक यह बात सुनना बहुत अच्छा लगा। पश्चिमी बाज़ार में फूल पूछने वाले बातों-बातों में एक और फ़रमाइश जोड़ देते थे। उसे जोड़ने में उनकी आवाज़ तक जैसे ज़रा भी नहीं थकती थी, मगर उसे घर लौटकर एक और रात जागना पड़ता था।
वह एक डंडी वापस लाई तो दादी ने देखते ही पूछा कि एक ज़्यादा कैसे बची। गू छिंग ने कहा कि वह मैली हो गई थी, माल लेने वाले ने मंज़ूर नहीं की। शन सू ने लेकर धीरे से रोशनी की ओर घुमाया और कहा कि ग्राहक बड़ी बारीकी से चुनता है। गू छिंग को उम्मीद थी कि वे कहेंगी, इसे ठीक किया जा सकता है। यह सुनकर वह ज़रा खीझी और जान-बूझकर डंडी दूर रख दी। दादी ने भी उसकी लाज बचाने को कोई सफ़ाई नहीं दी। बस सफ़ेद धागा फिर से फूल के बीच रखकर देखा और बोलीं कि अगर उन्हें ख़ुद पहनना हो तो इस रंग से उन्हें कोई डर नहीं। फिर उन्होंने बालों से लकड़ी की पिन निकाली और फूल को कनपटी के पास लगाने की कोशिश की।
धूसर बालों के पास दूधिया सफ़ेद फूल देखकर गु छिंग ठगी-सी रह गई। आम तौर पर उसकी नज़र दादी के हाथों, घुटनों और मेज़ के पास पड़े उनके पुराने ऊपरी कपड़े पर ही जाती थी। उसने दादी पर सजे किसी फूल को इतनी देर गौर से कम ही देखा था। शेन सु ने पूछा, टेढ़ा तो नहीं है। उसने हाथ बढ़ाकर सीधा किया और अचानक हँसकर बोली कि आपको यह पहने देखकर दुकानदार वेन और भी कहेंगे कि इसे जवान लोगों के लिए बनाना ठीक नहीं था। दादी बोलीं, तो कह देना कि मैं अभी उतनी बूढ़ी नहीं हुई। उसकी खातिर यह बात कहने से मत चूकना।
उस दिन उसने दादी से मुफ़्त में पंखुड़ियाँ नहीं मुड़वाईं। बचे हुए फूल जल्दी बनाने थे। दादी ने ख़ुद हाथ बढ़ाकर डंडी उठाई और कहा कि धागा लपेटने में मदद कर सकती हैं, बारीक सुई में धागा नहीं डालेंगी। गू छिंग ने वह डंडी रख ली जो ग्राहक के माल में नहीं जा सकती थी और पूछा कि क्या एक फूल को आपकी मज़दूरी मान लें। शन सू ने कहा कि वह वही पहनेंगी जो उन्हें पसंद हो, काम के बदले मिला फूल नहीं। फिर जोड़ा कि अगर धागा लपेटते-लपेटते खाने में देर हो गई तो खाना तुम गरम करोगी। गू छिंग ने मान लिया, मगर आख़िर एक बार फिर भूल गई। चूल्हे पर पानी की सतह थोड़ी घटकर सूख चुकी थी। दादी ने लकड़ी की कलछी से बर्तन का किनारा बजाकर उसे बुलाया, तभी दोनों साथ हँस पड़ीं।
बारहवें महीने की ग्यारह तारीख को बाकी तेरह टहनियाँ बन गईं। उनमें बदले में दी जाने वाली सफ़ेद मेई की टहनी भी थी। दो बार में सारा माल पहुँचा दिया गया। श्यु थान हर बार माल लेकर संख्या पर निशान लगा देती थी। आखिरी निशान लगते ही गु छिंग ने अनायास पैसों की थैली टटोली। उसमें उतना ही वज़न था जितना पहले। बीस टहनियों के बदले जो मेहनत मिली थी, वह अब दीवार में लगी थी। वह लौटकर ऐसा पैसा नहीं बनने वाली थी जिससे दूसरा रेशम खरीद सके। उसने सिर उठाकर मुनीम के कमरे की खिड़की की तरफ़ देखा। वेन जीछांग एक ग्राहक को हल्की लाल टहनी दिखा रहा था। कह रहा था कि रंग बहुत सधा है और इसे बनाने वाली यहीं पश्चिम की ओर रहती है।
आने वाली का कुलनाम याओ था। वह याओ ल्याओ थीं, जिनकी पूर्वी बाज़ार में फूलों की दुकान थी। उम्र में गू छिंग से बड़ी थीं। भीतर आते ही पहले उन्होंने अपना लबादा करीने से समेटा, ताकि बारिश का पानी मेज़ पर न झटके। फूल परखने का उनका ढंग श्यु थान से भी अलग था। वह पंखुड़ियों को ज़्यादा उलटकर नहीं मोड़ती थीं। पहले पूरी टहनी पर देखतीं कि पास और दूर के फूल किस क्रम में हैं, फिर डंडी के नीचे से धीरे-धीरे ऊपर तक धागे ढूँढ़तीं। उन्होंने पूछा कि क्या वह शन सू की पोती है। गू छिंग ने हामी भरी। सामने वाली ने पहले दादी का नाम लिया था। इससे उसे अपनापन भी लगा और एक ऐसी कसक भी हुई जिसे वह ठीक से समझा नहीं सकती थी।
याओ ल्याओ ने बचपन में शन सू के यहाँ फूल बनते देखे थे। बाद में उन्होंने अपनी दुकान खोली। अब उनके यहाँ तीन स्त्रियाँ नियमित काम करती थीं। उन्होंने यह नहीं कहा कि पूरी सर्दी के लिए गू छिंग का सारा काम ले लेंगी। बस पूछा कि क्या कल पूर्वी बाज़ार में कुछ टहनियाँ ला सकती हो। छोटी हों या लंबी, दोनों चलेंगी। पहले देखना होगा कि उन्हें बेचना किसे है। गू छिंग ने इतनी जल्दी सिर हिलाया कि याओ ल्याओ हँस पड़ीं। बोलीं कि आते वक़्त एक ऐसी टहनी भी ले आना जिसे बेचना नहीं चाहती। मैं देखना चाहती हूँ कि तुम्हें खुद क्या पसंद है।
घर लौटते हुए वह सारे रास्ते मन में पूर्वी बाज़ार की उस दुकान का नाम दोहराती रही। दरवाज़े के ऊपर “蓼花记” यानी ‘ल्याओहुआ जी’ लिखा था। नाम कोई बहुत बड़ा नहीं था, मगर सुनने में ऐसी जगह का लगता था जहाँ काम टिककर चल सकता है। उसकी अपनी आधी ईंट जैसी बात नहीं थी, जिसे हर दिन उठाकर ले जाना पड़ता था। पहले उसने खुदरा बिक्री से बचे मेई और कैमेलिया के फूल फिर से छाँटे, बारह टहनियाँ चुनीं और अपना अच्छा बाहरी पहनावा भी निकाल लिया। तभी याद आया कि कोई त्योहार नहीं है। दादी ने पूछा कि अचानक कपड़े क्यों ढूँढ़ रही है। उसने कहा कि पूर्वी बाज़ार में कोई माल देखना चाहता है। कहने के बाद लगा कि उसने कुछ ऐसे कहा जैसे बाक़ायदा बुलावा आया हो। उसने जोड़ा कि वे सिर्फ़ देखेंगे, ज़रूरी नहीं खरीदें।
अगली सुबह तड़के वह नदी के पुल के रास्ते गई। झोउ परिवार की छाते बनाने की दुकान के बाहर तेल लगा कपड़ा पहले ही सूखने को पड़ा था। उसकी सूखी, कसैली गंध आई तो उसे झोउ जीफिंग के कंधे पर पड़ी टूटी बाँस की तीली याद आई। वह दरवाज़े पर नहीं था। बस छोटे कुरते में एक औरत छातों के हत्थे लंबाई के हिसाब से छाँट रही थी। उसे झाँकते देखकर पूछा कि कुछ लेने आई हो? गु छिंग ने झट सिर हिलाया और कदम तेज़ कर लिए। इससे उलटे ऐसा लगा जैसे सच में कुछ ऐसा किया हो जिसकी सफ़ाई देनी पड़ेगी।
पूर्वी बाज़ार के लोगों के कपड़े पश्चिमी बाज़ार के लोगों से ज़्यादा सलीकेदार थे। माल पहुँचाने वालों तक के पास अक्सर बदलने के लिए एक बाहरी कमीज़ होती थी। गू छिंग ने दुकान के बाहर अपने घाघरे का किनारा झाड़ा, टोकरी के हत्थे पर लिपटा पुराना कपड़ा उतारकर आस्तीन में रख लिया, तब भीतर गई। याओ ल्याओ सहायक को बता रही थी कि फूलों का एक डिब्बा फिर से लपेटना है। गू छिंग को देखकर उसने काउंटर पर बिछे साफ़ कपड़े का एक हिस्सा ख़ाली कर दिया। फूल निकालते समय गू छिंग को अचानक डर लगा कि उस कपड़े पर ज़रा-सी मिट्टी न लग जाए। उसने अनायास आस्तीन के सिरे पीठ के पीछे कर लिए।
याओ ल्याओ ने उसकी घबराहट भाँप ली, मगर समझाने नहीं लगी। उसने फूलों को दो तरफ़ बाँटा। कहा, इस तरफ़ के सिर की सजावट के लिए बेचे जा सकते हैं, दूसरी तरफ़ के मेज़ पर सजाने के लिए अच्छे हैं और उन्हें परिचित ग्राहक ही लेंगे। गु छिंग की सबसे पसंदीदा टहनी संयोग से दूसरे ढेर में गई। उसने कारण पूछा। याओ ल्याओ ने फूल की ओर इशारा किया और कहा, यह कुछ ज़्यादा आगे झुका है, कान के पास लगाओगी तो नज़र अटक सकती है। फूलदान में बहुत अच्छा रहेगा। दोनों में कोई ऊँच-नीच नहीं है। गु छिंग ने उसे अपनी कनपटी के पास उठाकर देखा। सचमुच अलमारी का कोना दिखाई देना बंद हो गया। उसकी हँसी छूट गई और पहले जो अपने फूल को नीचे आँके जाने का ग़ुस्सा था, वह कुछ कम हो गया।
दाम की बात चली तो याओ ल्याओ ने आपूर्तिकर्ता को दिया जाने वाला भाव बताया। वह गू छिंग का पश्चिमी बाज़ार में लगाया खुदरा दाम नहीं था। उसने कहा, काउंटर, डिब्बे, सहायक और ग़लत माल बिक जाने पर लौटकर आने वाले ग्राहक, सब सँभालने के लिए कोई चाहिए। अगर गू छिंग को लगता है कि दुकान का बढ़ा हुआ दाम पूरा का पूरा उसी के हिस्से से जाता है तो वह अपने तरीक़े से बेचे, साथ काम करने की मजबूरी नहीं है। सुनते हुए गू छिंग ने काउंटर के पीछे तीन औरतों को सिर झुकाए देखा। उनमें से एक बार-बार एक फूल खोलकर दोबारा लपेट रही थी और सामने बेकार धागों के टुकड़ों का ढेर था। तब उसे समझ आया कि दुकान के नामपट्ट के नीचे महज़ कोई खाली जगह नहीं है जहाँ लोग फूल आने की राह देखते हैं।
याओ ल्याओ पहले बारह डालियाँ लेने को तैयार थी। दो डिज़ाइन आज़माकर बेचे जाते और पाँच दिन बाद बचा माल देखा जाता। जो बिक जाए उसका भुगतान होता और जो न बिके उसका डिज़ाइन बदला जा सकता था। गू छिंग ने फ़ौरन हामी नहीं भरी। पूछा, क्या कपड़े का आधा दाम पहले मिल सकता है? याओ ल्याओ ने कहा, पहली बार इसी तरह करें। अभी दोनों को नहीं पता कि ग्राहक इन्हें पसंद करेंगे या नहीं। अगर हर बार बिके तो नियमित सौदे की बात करेंगे। गू छिंग का मन पूरी तरह राज़ी नहीं था, फिर भी उसने चुनकर आठ डालियाँ उसे दीं और चार अपने पास रखीं। कहा, इस बार थोड़ी कम से शुरू करें।
याओ ल्याओ ने नज़र उठाकर उसे देखा। उसने इस वजह से अपनी पेशकश वापस नहीं ली, बस दुकान के सहायक से आठ फूल दर्ज करने को कहा। माल देने वाले का नाम लिखते वक़्त उसने पूछा कि शन परिवार का नाम लिखूँ या गू परिवार का। गू छिंग ने कहा, गू छिंग। उसकी आवाज़ पहले से ऊँची थी। काउंटर के पीछे धागा लपेटती औरत ने उसकी ओर एक बार देखा और फिर सिर झुका लिया। उसे अचानक थोड़ी ख़ुशी हुई। उसके नाम के वे दो अक्षर न दादी के थे, न किसी और के लिए माल पहुँचाने वाले की पहचान। वे आठ फूलों के साथ यहाँ पाँच दिन टिक सकते थे।
याओ ल्याओ उसे दरवाज़े तक छोड़ने आईं। कहा कि दुकान में हर किसी का नाम नहीं लिखा जाता, डिब्बे पर अब भी ल्याओहुआ जी ही रहेगा। गू छिंग के कदम एक पल को रुक गए। वह बात समझती थी, मगर अभी-अभी मिली खुशी पूरी तरह समेटने को तैयार नहीं थी। बस कहा कि वह जानती है, कागज़ पर सही नाम दर्ज हो जाए तो काफ़ी है। याओ ल्याओ ने सिर हिलाया और कहा कि अगली बार बारिश का दिन मत चुनना। रेशमी फूलों के डिब्बे की नमी ऐसी नहीं होती कि दरवाज़े के भीतर आकर कपड़े झाड़ने से सारी निकल जाए।
लौटते हुए कू छिंग वन परिवार के घर के सामने से गुज़री। फूलों की तारीफ़ करने को कहने के लिए उसने इस बार दरवाज़ा नहीं खटखटाया। दीवार के ऊपर मेइ के फूल पूरे खिले थे। उसने एक व्यापारी को टहनी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाते देखा तो कहा कि टहनी पतली है, मत मोड़िए। फिर उसे वन परिवार के हिसाब के कमरे में रखी रेशमी मेइ की टहनी दिखाई। उसने हँसकर पूछा कि क्या भीतर जाकर पेड़ देख सकता है। कू छिंग ने अपने आँगन की ओर देखा। दादी रोशनी में बैठी एक पुरानी पोटली उधेड़ रही थीं। उसने बस कहा कि दीवार के इस पार से भी दिखता है और दरवाज़ा नहीं खोला।
रात को उसने दादी को बताया कि आठ डालियाँ बिक्री के लिए दुकान पर रख आई है और वहाँ अपना नाम लिखवाया है। सुनकर शन सू ने हाथ में पकड़ी फूलों वाली केशपिन घुमाई। बोलीं, जब पहली बार किसी ने उन्हें उस्ताद शन कहा था, तो घर आकर शोरबे में नमक डालना भूल गई थीं। सबको कटोरा ख़ाली होने पर ही पता चला। गू छिंग ने पूछा, उस वक़्त आपको ख़ुशी हुई थी? दादी ने खिड़की पर पड़ती छाया को देखा। पहले बोलीं, इसमें कौन-सी बड़ी बात है? फिर थोड़ी देर बाद कहा, ख़ुशी हुई थी, भला क्यों नहीं होती? गू छिंग भी हँस पड़ी। उसने बिक्री के लिए न दी गई चार डालियाँ खिड़की के नीचे रख दीं। लगा जैसे कमरे में रोज़ से थोड़ी ज़्यादा रोशनी हो, जिसका ज़िक्र करें तो भी ठीक और चुप रहें तो भी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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