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हाथ में एक ग्रंथ

प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास

दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर

कू वूजी · AI सृजन · 9352 अक्षर · लगभग 12 मिनट

झोउ जीपिंग एक छाता नहीं, छातों के चार ऐसे ढाँचे लेकर आया जिन पर अभी कपड़ा नहीं चढ़ा था। उसने उन्हें कंधे पर रखा, नोकें पीछे की तरफ़ थीं। पूर्वी पत्थर वाली गली में घुसने के लिए उसे आधा बदन तिरछा करना पड़ा। गु छिंग वेन परिवार के दरवाज़े पर खड़ी देख रही थी कि दो गाड़ीवान एक लंबा लट्ठा फिर से गाड़ी पर चढ़ा रहे हैं। दोनों में से कोई पहले हटता, बात बनती नहीं थी। छातों की कतार में लगी नोकों से बचने के लिए गु छिंग ने सिर झुकाया, लेकिन झोउ जीपिंग पहले ही रुक गया, मानो उसकी तरफ़ देखने के लिए उसकी एक आँख और हो।

“पीछे अभी आधा छी और है।” उसने कहा।

गू छिंग को लगा कि वह उसके घाघरे के घेर की बात कर रहा है, उसने जल्दी से उसे थोड़ा उठा लिया। वह हँसा और कंधे पर छतरी की तीलियों की तरफ़ इशारा किया। बोला, अगर तुम रास्ता नहीं दोगी तो यह आधा छी मैं अपनी बाँह में तो समेट नहीं सकता। तभी उसने देखा कि आगे लंबी लकड़ी ने उसका रास्ता रोका था और उसके कंधे से पीछे निकली छतरी ने गू छिंग का। दोनों एक-दूसरे का लिहाज़ करते रहे, फिर भी जगह खाली नहीं हुई। आख़िर गाड़ीवान ने लकड़ी खड़ी की, तब सब एक साथ खिसककर आँगन में आ सके।

वेन जीछांग ने उससे उत्तर वाले कमरे में वह जगह देखने को कहा जहाँ बारिश टपकती थी। पुरानी खपरैल अभी बदली नहीं गई थी। बारिश में उसे यूँ ही खुला नहीं छोड़ सकते थे। वे नीचे कुछ समय के लिए एक कपड़ा तानना चाहते थे। कपड़ा शहतीर से सट गया तो हवा चलते ही उस पर पानी जमा हो जाएगा। झोउ जीपिंग आकार आज़माने के लिए बड़े छातों के ढाँचे लाया था। वह कामगारों को बाँह भर से नाप का अंदाज़ लगाने नहीं देना चाहता था। उसने पुराने बरामदे के नीचे चारों ढाँचे खोल दिए। हवा का झोंका आया तो बाँस की पट्टियाँ एक साथ बज उठीं। आँगन में अचानक लगा जैसे कुछ ऐसे पक्षी उठ खड़े हुए हों जिनके पर अभी पूरे नहीं उगे।

गु छिंग ने उसे डोरी से चौड़ाई नापते देखा। काम कुछ फूल बाँधने जैसा था, मगर फूल की कारीगरी से कहीं मोटा। उसने पूछा कि ऐसा ढाँचा कितने दिन टिकेगा। झोउ जीफिंग ने कहा कि यह इस पर है कि इसे छाता बनाती हो या पूरा मकान ढकने के काम में लगाती हो। उसने टूटी शहतीर की ओर इशारा किया। बोला, बाँस की तीलियों की गारंटी दे सकता हूँ। शहतीर गिरेगी तो मेरे छाते बनाने से उसका वज़न कम नहीं हो जाएगा। वन जीछांग की भौंहें सिकुड़ीं। श्यू थान ने कहा, यह बात पहले ही साफ़ हो जाए तो अच्छा है, बारिश में दोनों तरफ़ से गाली-गलौज नहीं होगी।

बात हो जाने पर झोउ जीफिंग ने दरवाज़े से गाड़ी का रास्ता देखा। पहले मेइ के पेड़ को नहीं, पहियों से घिसकर बनी दो ताज़ी लकीरों को देखा। फिर दक्षिण की तरफ़ टूटे बगल के दरवाज़े तक गया और उसके छल्ले से सूखी बेल खोली। दरवाज़ा पहले आधा बंद कर दिया गया था। तख़्तों के पीछे से गली की रोशनी छन रही थी। उसने पूछा कि पुराने घर की कोयले की गाड़ियाँ क्या यहीं से आती थीं। वन जीछांग ने कहा, नक़्शे पर तो है, दीवार पर कुछ समझ नहीं आया।

“दरवाज़ा इस तरफ़ खुले तो गाड़ी का अगला हिस्सा गली के साथ जा सकेगा। आँगन के भीतर पूरा मोड़ नहीं काटना पड़ेगा।” झोउ जीपिंग ने कहा।

गु छिंग का दिल उछला और वह लगभग बीच में बोल पड़ी। उसे पिछली रात दादी की कही कोयले की गाड़ी वाली बात याद आई। कहना चाहती थी कि वह भी यही पूछने वाली थी, फिर डर लगा कि लगेगा वह जान-बूझकर इस छोटे-से ख़याल का श्रेय लेने आई है। वह चुप रही। झोउ जीफिंग ने एक खाली गाड़ी गली के मुहाने पर लाने को कहा। खुद पहले टूटे दरवाज़े से बाहर निकला और जूते के तले से ज़मीन पर मोटा-मोटा निशान खींचा कि पहिए कहाँ से जा सकते हैं। दक्षिण की गली पूरब की पत्थरवाली गली से चौड़ी थी। पानी की तरफ़ पैदल चलने की पट्टी भी बची थी। गाड़ी सीधी अंदर आए तो सचमुच मेई के पेड़ वाले कोने की ओर मुँह करने की ज़रूरत नहीं थी।

वन जीछांग पीछे-पीछे निकला। जूतों पर गीली राख की एक परत चढ़ गई। उसने पूछा कि दरवाज़ा इस तरह बदलें तो क्या बारिश की छाजन भी दक्षिणी बरामदे में ले जा सकते हैं और पुराना दक्षिण-पश्चिमी कोना खुले आँगन के लिए छोड़ सकते हैं। झोउ जीफिंग ने छाते की एक तीली से नाप दिखाया। कहा, छाजन यहाँ जोड़ी जा सकती है, दरवाज़े की ऊपरी चौखट का हिसाब अलग होगा। मुझे ढाँचा खड़ा करना आता है, खपरैल लगाने वाले की मज़दूरी तय करना नहीं। गु छिंग ने तब सिर उठाकर मेइ का पेड़ देखा। डाल का सिरा अब भी पुरानी दीवार पर टिका था। लोगों ने दूसरी दिशा की बात शुरू की तो पेड़ का वास्ता ख़त्म नहीं हो गया। उलटे लगा, आख़िर एक ऐसा रास्ता निकल आया है जिसे उसके पास से गुज़रना नहीं पड़ेगा।

चन चाची का कपड़े सुखाने वाला रैक ठीक उसी रास्ते के आर-पार था। वह धुले कपड़ों का टब उठाकर आईं और फाटक के इर्द-गिर्द सबको जमा देखकर वहीं ठिठक गईं। झोउ जीपिंग ने पहिए की आख़िरी लकीर भी पूरी नहीं की थी कि उन्होंने पूछा, पहिया मेरे पैर पर से गुज़रेगा, यह भी ठीक से नापा है क्या? वन जीछांग ने जल्दी से कहा कि अभी बस जगह देख रहे हैं। उन्होंने टब रास्ते के किनारे रखा और बोलीं, पहले देखने वाले बहुत होते हैं। अक्सर सब कुछ देखकर तय कर लेने के बाद ही उन्हें याद आता है कि यहाँ कोई कपड़े भी सुखाता है।

गु छिंग ने झट से पूछा कि ढाँचा कुएँ की तरफ़ खिसका दें तो कैसा रहेगा। चेन चाची ने उसकी ओर घूरकर देखा। “कुएँ की तरफ़ दोपहर बाद धूप नहीं आती, तुम्हें पता नहीं?”

बेशक उसे पता था। सर्दियों में दादी को अक्सर एक रज़ाई तीन बार घुमानी पड़ती थी, तब कहीं जाकर उसके कोने सूखते थे। गु छिंग ने इतनी हड़बड़ी में कहा था कि बात पहले उसी के कानों को बुरी लगी। वह उकड़ूँ बैठकर चेन चाची के टब के किनारे से फिसलते कपड़े को थामने लगी। ठंडा पानी कलाई से होकर आस्तीन में बह गया। वह चाहती थी कि इस बात को किसी ऐसे काम में बदल दे जिसे वह अपने हाथों से कर सके। चेन चाची ने मौके का फ़ायदा उठाकर उसे और नहीं सुनाया। टब सँभालकर उसके हाथ में दिया और कहा कि पहियों के लिए खींची लकीरों के बीच मत खड़ी रहो।

सड़क किनारे फलियाँ बेचने वाली दादी ल्योउ भी आ गईं। उनका काँवर रोज़ दक्षिणी दरवाज़े के पास का एक छोटा कोना घेरता था। उन्होंने छतरी नहीं लगाई थी, मगर छह-सात साल से वहीं बैठ रही थीं। नया दरवाज़ा खुला तो वे गरम फलियों का बर्तन वहाँ नहीं रख सकती थीं जहाँ से लोग और गाड़ियाँ निकलेंगी। वन जीछांग ने कहा कि दूसरी तरफ़ थोड़ी जगह छोड़ी जा सकती है। दादी ल्योउ ने पहले पूछा कि हवा किस ओर से आती है, फिर पूछा कि ग्राहक उन्हें देख पाएँगे या नहीं। उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, मगर उनके दोनों सवाल जगह सरकाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल थे। गू छिंग को पहले लगा था कि दरवाज़े की दिशा बदलने से सबकी आसानी होगी। अब पता चला कि एक जगह जो झंझट कम होता है, वह कहीं और थोड़ा बढ़ भी सकता है।

चोउ जीफिंग ने पाँव से पहियों की खींची लकीरें मिटाईं और फिर बनाईं। ख़ाली गाड़ी गली के मुहाने पर हटा दी गई। दोनों गाड़ीवान दीवार के पास खड़े रहे। खच्चर ने भी सिर एक ओर झुका लिया और इंतज़ार करने लगा। शू थान ने किसी से तुरंत हामी भरने को नहीं कहा। उसने पहले ल्योउ दादी से कहा कि फलियों का काँवर वैसे ही लगाएँ जैसे रोज़ लगाती हैं। फिर नौकर से दो तख़्ते मँगवाकर छन चाची की कपड़े सुखाने की अड़गनी के नीचे रखवाए, ताकि पता चले कि कपड़ा लटकने पर सच में कितनी जगह घिरेगी।

गू छिंग ने एक क़दम आगे बढ़ाया तो गीले कपड़े के किनारे से टकरा गई। कपड़ा उसके चेहरे पर फिरा और ठंडक की एक लकीर छोड़ गया। चोउ जीफिंग ने छाते की तीली से कपड़ा थोड़ा उठाकर कहा कि वह पहले निकल जाए। सिर उठाते ही गू छिंग ने देखा कि उसकी आस्तीन के मुहाने पर बाँस की एक टूटी खपच्ची खोंसी थी, किसी ऐसी सूखी टहनी की तरह जिसे माली फेंकना न चाहे। उससे रहा नहीं गया, उसने हाथ बढ़ाकर खपच्ची निकाल दी। उसने कहा कि उसे रखना काम का है, छोटी खपच्ची से छोटा छाता सुधारा जा सकता है, हर टूटी चीज़ फेंकनी नहीं पड़ती। उसने खपच्ची लौटा दी। कुछ देर तक दोनों में से किसी ने भी उस मज़ाक़ को आगे नहीं बढ़ाया।

उस दिन बात तय नहीं हुई। वेन जीछांग को राजमिस्त्री से पूछना था कि दरवाज़ा बदलने में कितना अतिरिक्त खर्च आएगा। चेन चाची को देखना था कि दोपहर बाद धूप आखिर कहाँ पड़ती है। दादी लिउ महज़ यह सुनकर मानने को तैयार नहीं थीं कि समय आने पर जगह दे दी जाएगी। फिर भी गु छिंग का मन परसों बिक्री का कागज़ देखकर लौटने की तुलना में कुछ सँभला हुआ था। कम से कम लोग सफ़ेद चूने के घेरे से हटकर देख चुके थे कि आँगन का सिर्फ़ एक कोना नहीं है। उसने खुद वेन परिवार से पूछा कि क्या कल खाली गाड़ी उधार लेकर एक बार फिर आज़मा सकते हैं। फिर पहले चेन चाची का कपड़े सुखाने वाला ढाँचा वापस रखा, ताकि उन्हें अकेले सब समेटना न पड़े।

सबके जाने के वक्त झोउ जीफिंग ने तख़्ता उठाने में उसकी मदद की। गु छिंग ने पूछा, वह आधा दिन और वहाँ क्यों खड़ा रहा? उसने कहा कि उसके घर की छातों वाली गाड़ी भी उसी गली से गुज़रती है। पूरब का फाटक रोज़ अटका रहा तो माल पहुँचाने वालों को इंतज़ार करना पड़ेगा। यह भी कहा कि अगर वन परिवार ने ढकने का कपड़ा ठीक से तान लिया तो आगे भी तेल लगा कपड़ा उसी से लेंगे। उसकी मदद मुफ़्त नहीं थी। यह सुनकर गु छिंग को बार-बार शुक्रिया कहने की ज़रूरत नहीं लगी। बस पूछा कि दुकान कहाँ है। उसने ठोड़ी से नदी के पुल की तरफ़ इशारा किया और कहा, जिस सड़क पर तुम्हारी दादी बाँस की पट्टियों की रस्सी ख़रीदती हैं, उसी में दो दुकान और आगे।

“मैं तो तुम्हें बढ़ई समझती थी।” उसने कहा।

“कुछ लोग यह भी समझते हैं कि छाता बनाने वाला बारिश को थोड़ी देर रोक सकता है।”

गू छिंग हँसी। उसे याद आया कि ग्राहक पूछते थे उसके रेशमी फूल महकते क्यों नहीं। इस बार आख़िरकार उसे लगा कि कोई उसका मज़ाक नहीं उड़ा रहा। उसे हँसते देखकर झोउ जीपिंग ने पूछा कि टोकरी में फूल हैं क्या, एक देख सकता है? उसने बहुत पास से देखा, मगर नाक के नीचे नहीं लाया। डंडी की जड़ पलटकर देखा कि बारीक धागे ने बाँस को कैसे लपेटा है। गू छिंग ने कहा कि फूल को कनपटी के पास खोंसते वक़्त लोग यहीं पकड़ते हैं, इसलिए यह हिस्सा मोटा नहीं हो सकता। उसने सिर हिलाया और कहा कि छतरी की मूठ भी ऐसी है। खरीदते वक़्त लोग पहले ऊपर का कपड़ा देखते हैं। बारिश में जाकर पता चलता है कि हाथ कहाँ पकड़ता है।

साँझ को घर लौटी तो गू छिंग के जूते-मोज़े पूरी तरह भीगे थे। उसने पहले उन्हें चूल्हे के पास उतारकर सूखने को रखा। शन सू ने उसके चेहरे पर धूल की एक लकीर देखी, पोंछने को कपड़ा दिया और पूछा कि क्या वह दरवाज़ा खुल पाएगा। गू छिंग ने कहा अभी पता नहीं। फिर चाची छन, दादी ल्योउ, गाड़ीवान और बारिश से बचाने वाले छज्जे की एक-एक बात सुनाई। जब दादी ने सुना कि उसने चाची छन का ढाँचा कुएँ के पास ले जाने का सुझाव दिया था, तो धीरे से हँस पड़ी। गू छिंग ने फ़ौरन कहा कि बाद में उसे अपनी ग़लती समझ आ गई थी, अब और मत हँसो। शन सू ने बड़ी धीरे-धीरे अपनी हँसी समेटी, आधी आँखों के कोनों में रहने दी।

उसने पुराने आधे साँचे वाले काग़ज़ की बात भी बताई। भाभी जी ने कहा था कि तब कटाव उन्हीं से ग़लत कटा था; दादी ने कभी बताया क्यों नहीं। शन सु ने हाथ का चावल छानने वाला सूप आगे सरकाया और पहले कंकड़ चुनने को कहा। इस बार गु छिंग ने तुरंत सिर नहीं झुकाया, तभी दादी बोली कि उस आयोजन में ग्राहक जल्दी में थे, काम बहुत था, हर बात अच्छी तरह याद नहीं रहती। फिर जोड़ा कि भाभी जी का काम मोटा होता था, बाद में अधिकतर सुधार उसे ही करना पड़ता था। गु छिंग सुनती रही, समझ नहीं पाई कि कौन-सी बात वृद्धा सच में भूल गई है और कौन-सी आज भी छोड़ने को तैयार नहीं।

दूसरे दिन गाड़ी निकालकर देखी गई। छन चाची ने पहले कपड़े सुखाने का ढाँचा थोड़ा छोटा कर दिया। बूढ़ी ल्यो ने अपनी फेरी की टोकरी के दोनों पायों की दिशा बदल दी। आखिर दक्षिणी दरवाज़े के आगे कुछ जगह खाली हुई। मगर पहिया टूटी देहरी पर पहुँचकर फिर अटक गया। गाड़ीवान ने कंधे से धक्का दिया तो खाली गाड़ी झटके से आगे लपकी और छतरी की तीलियाँ गिरते-गिरते बचीं। चोउ जीपिंग ने हाथ बढ़ाकर एक ओर से रोका। गू छिंग ने लपककर दूसरा सिरा पकड़ा। दोनों ने एक-एक सिरा थामकर बिना कागज़ मढ़े बाँस का ढाँचा उठाया और पीछे मेई के पेड़ के नीचे हट गए। एक टहनी की नोक गू छिंग के सिर से छुई और एक छोटा फूल गिरा, ठीक उसकी आस्तीन के गीले हिस्से पर चिपक गया।

वन जीछांग देर तक दरवाज़े के पास उकड़ूँ बैठे रहे। आख़िर बोले कि दहलीज़ नीची करनी होगी और दक्षिणी बरामदे का छोटा-सा हिस्सा भी तोड़कर फिर बनाना होगा। महज़ यह कह देने से कि मेहनत बचेगी, सारी मेहनत नहीं बचने वाली थी। ज़मीन पर पहले जो सुगम रास्ता खींचा गया था, अब उसके लिए ईंट, लकड़ी और मज़दूरी की क़ीमत देनी थी। पैसे का नाम सुनकर गु छिंग का दिल फिर भी ज़रा सिकुड़ा, मगर उसकी पकड़ छतरी के ढाँचे पर ढीली नहीं हुई। बगल में शू थान कोयले से हिसाब लिख रही थी। लिखकर उसने उँगली की पोर से एक निशान मिटा दिया। लगा कि वह भी इसी तरह कुछ रख रही थी, कुछ हटा रही थी।

बीस तारीख़ की दोपहर हे फंगछ्यो दीवार देखने आए। उन्होंने छोटी हथौड़ी से पेड़ के पास की पुरानी ईंटें ठोंकीं और कहा कि सीधी दीवार चुनना सबसे आसान है। घुमाव बनाने में आधा दिन और लगेगा। पुरानी नाली भी रखनी है तो नींव के पास लगने वाली सामग्री अलग चुननी होगी। वन जीछांग ने गु छिंग की ओर देखा, मगर पूरी बात मुँह से नहीं निकाली। गु छिंग समझ गई कि अब पेड़ रखना सिर्फ़ चाहने या न चाहने की बात नहीं रही। उसे अपनी ओर से कुछ ऐसा देना होगा जिसे फिर यूँ ही किसी और काम में नहीं लगा सकेगी।

कमरे में लौटकर उसने रेशमी आलूबुखारे के फूल की पहली टहनी मेज़ पर सीधी रखी और उँगली डाल के आधार पर लिपटे महीन धागे के घेरे पर फेरी। चाहे कितनी अच्छी बनी हो, एक टहनी का दाम एक टहनी का ही था; बीस टहनियाँ होतीं तभी एक छोटा ढेर बनता। सचमुच उनसे घुमावदार दीवार का एक हिस्सा बनवाना हो तो पहले संख्या साफ़ करनी होगी। शेन सु ने चावल की छलनी हटा दी और उसके लिए आधी मेज़ ख़ाली कर दी। दोनों ने पहले यह नहीं कहा कि किस चीज़ की क़ीमत ज़्यादा है। बस साथ मिलकर कपड़ों का संदूक खींच निकाला और सुना कि भीतर पैसे की वे कुछ छोटी लड़ियाँ पुराने कपड़े के पार हल्के से टकराईं।

· अध्याय समाप्त ·

यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।

इस पुस्तक की विषयसूची · 36 अध्याय
  1. ठंडी महक रेशम में नहीं
  2. सफ़ेद चूने से घिरी जगह
  3. चाँद के नीचे कैंची
  4. मेज़ पर रेशमी मेई
  5. दरवाज़े का मुँह दूसरी ओर
  6. सिक्कों की दो छोटी लड़ियाँ
  7. जगह देने वाला मोड़
  8. बिना महक का दुकान का नामपट्ट
  9. आधे दिन की मज़दूरी
  10. वह फूल जो फूल नहीं है
  11. बर्फ़ के बाद पेटी बाँधना
  12. एक टहनी कितने की
  13. किसी और के घर नए साल की रात
  14. फूलों का मौसम बीतने के बाद
  15. कागज़ पर नाम छापना
  16. ठंडे भात का एक कटोरा
  17. पहली बार दोबारा बनाने की इजाज़त नहीं
  18. लौटाया हुआ डिब्बा
  19. दो लोगों का आँगन
  20. बारिश का पानी पुरानी नाली से गुज़रता है
  21. श्याओमान का हिसाब
  22. छतरी के किनारे की खाली जगह
  23. ग्राहकों को जैसा वसंत चाहिए
  24. मेज़ पर छूटे फूल
  25. एक व्यक्ति की राह
  26. पाँचवाँ महीना कारोबार के हवाले नहीं
  27. फूल देखने वाले
  28. पैसों की तीसरी थैली
  29. गर्मियों में पेड़ का क्या होगा
  30. नाव पर चढ़ने से पहले
  31. जलमार्ग का पहला पड़ाव
  32. कमल के पत्ते अभी खुले नहीं हैं
  33. पानी के बीच का वह फूल
  34. लौटते समय फूलों के मौसम की जल्दी नहीं
  35. मेई के पेड़ की गर्मियों की छाँह
  36. फिर एक नई फूल-डाली बनाएँ

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