प्राचीन परिवेश में शिल्प और जनजीवन का उपन्यास
मेज़ पर रेशमी मेई
कू वूजी · AI सृजन · 9420 अक्षर · लगभग 12 मिनट
वन जीछांग पूर्वी दरवाज़े के आगे उकड़ूँ बैठकर गाड़ी का पहिया देख रहे थे। कल आई नई लकड़ी अभी पूरी उतरी नहीं थी। गाड़ीवान एक खच्चर को गली के मुहाने तक ले गया था और बची आधी गाड़ी लोगों को धकेलनी थी। पहिया चौखट के निचले हिस्से से लगता और हर धक्के पर आवाज़ करता। गु छिंग को आते देखकर वन जीछांग ने पहले हाथ की लकड़ी की पच्चर पहिए के नीचे फँसाई, फिर उठकर खड़े हुए। आस्तीन पर रगड़ से सफ़ेद धूल की एक लकीर पड़ चुकी थी।
गु छिंग ने पेड़ के बारे में फिर नहीं पूछा। पहले पूछा कि मकान ख़रीदने का दस्तावेज़ ज़रा देखने को मिलेगा? उसने कहा कि वह सारे अक्षर नहीं पहचानती, इसलिए बाज़ार से दिंग जी को पढ़ने बुलाएगी। काग़ज़ बाहर नहीं ले जाएँगे और कोई कलम लेकर उसमें कुछ जोड़ भी नहीं देगा। वन जीछांग दिंग फ़ंगछ्वान का नाम सुनकर कुछ निश्चिंत हुआ जान पड़ा। उसने फिर पूछा कि पढ़कर समझ लेने के बाद वह क्या चाहती है। गु छिंग ने बहुत-सी बातें सोच रखी थीं, मगर सच में सवाल आया तो बस इतना कहा कि पहले यह जानना चाहती है कि दीवार के बारे में क्या लिखा है।
वन जीछांग ने अपनी पत्नी की ओर देखा। श्यू थान गाड़ी से छोटी लकड़ियाँ गिनकर उतार रही थी। उनकी लंबाई पिछली गाड़ी वाली लकड़ियों से नहीं मिली तो नौकरों से दोनों ढेर अलग रखने को कहा। उसने सिर घुमाए बिना कहा कि उसे देखने दो, वरना आज पेड़ पूछेगी, कल कुआँ। काम होगा कि नहीं? गु छिंग को सुनकर ज़रा झेंप हुई, मगर वन जीछांग ने सिर हिलाया और दोपहर से पहले का समय तय किया। बोला कि बेचने वाला भी आएगा, जो पूछना है सबके सामने पूछ लेना।
वह दिंग फ़ंगछ्वान को बुलाने गई और उनके कलमदान के पास पाँच वेन गिनकर रखे। उन्होंने पैसे लेने से मना नहीं किया और न ही इतनी सहजता से पैसे देने पर कोई दिलासा देने वाला वादा किया। उन्होंने एक घिसकर चिकना किया हुआ काग़ज़ दबाने का वज़न ढूँढ़ा, कपड़े में लपेटा और कोयले का एक टुकड़ा भी साथ लिया। बोले, काग़ज़ पर लिखे अक्षर अपनी जगह हैं, ज़मीन पर खिंची हद भी देखनी होगी। गु छिंग ने पूछा कि दादी को भी बुलाएँ? उन्होंने कहा, बस काग़ज़ पढ़ना है तो बुज़ुर्ग को ठंड में खड़ा करने की ज़रूरत नहीं। सच में बात इस पर आए कि देखभाल कितने बरस की, तो दादी को खुद बताना होगा।
गु छिंग ने चौराहे पर जी भाभी को नमूने का काग़ज़ लौटाया। जी भाभी ने एक कोना उठाया और पहले ज़रा हँसी। बोली, सचमुच अब तक रखा है। फिर उँगली से अर्धचंद्र वाली जगह दबाकर गु छिंग को पीछे नाख़ून से भी छोटी एक कटी जगह दिखाई। बरसों पहले काटते वक्त उनसे ही बिगड़ी थी और बाद में गीले काग़ज़ से जोड़ दी थी। उन्होंने सहज भाव से कहा, मगर गु छिंग को पिछली रात की दादी की बात याद आ गई कि ख़रीदार बस उन्हीं को पहचानते थे। बात मन में कपड़े के अंदर के धागे के सिरे की तरह अटकी थी, जिसे न खींचकर निकाल सकी, न समतल बिठा सकी।
वह रेशम की दुकान में ज़्यादा देर नहीं रुकी। घूमकर बगल के घर पहुँची तो लू झाओ आ चुके थे। मकान की बिक्री कराने वाला बिचौलिया दरवाज़े के पास खड़ा था और उनके लबादे से ऐसी धूल झाड़ रहा था जो वहाँ थी ही नहीं। लू झाओ पचास पार के थे, चेहरा दुबला था, मगर बोलते बड़ी जल्दी में थे। गू छिंग को देखते ही कहा कि इतने साल उन्होंने पेड़ उन लोगों की देखभाल में रहने दिया और कभी एक वन भी नहीं लिया। गू छिंग ने कहा कि पैसे नहीं लिए, ठीक इसीलिए अब वह बात साफ़ करना चाहती है। वह आदमी वन जीछांग की ओर मुड़ा, जैसे अभी-अभी बेचे मकान का दाम इस एक वाक्य से कुछ और बढ़ गया हो।
मुख्य कमरे में एक पुरानी मेज़ आनन-फानन खड़ी की गई थी, उसके पायों के नीचे ईंटें थीं। वन जीछांग ने बिक्री का दस्तावेज़ फैलाया और उसका कोना एक साफ़, खाली कटोरे से दबा दिया। गू छिंग ने भी टोकरी से रेशमी मेई की टहनी निकाली। वह उसे इसलिए लाई थी कि फूल दबकर बिगड़ न जाए। अब मेज़ के किनारे रखने पर वहाँ एक ऐसा रंग आ गया जो मकान के सौदे की बातचीत में देखने को नहीं मिलता। बिचौलिए ने पंखुड़ी का किनारा छुआ, कहा कि बिल्कुल असली लगती है, और पूछा कि क्या उसमें खुशबू भी आ सकती है। उसने कहा कि नहीं, और इस मौके पर फूल की कीमत की बात नहीं छेड़ी।
दिंग फ़ंगछ्वान ने पहले मकान का नाम और उसकी चारों हदें पढ़ीं। पूरब में पत्थर की गली, दक्षिण में हुआइ गली, पश्चिम में पड़ोसी गू परिवार के आँगन की दीवार, उत्तर में पुरानी नहर। बोलकर पढ़ने पर ये अक्षर गू छिंग को अपने आप उन्हें ताकते रहने से कहीं ज़्यादा साफ़ लगे। मगर हर वाक्य के आगे अब भी कुछ ऐसा छूट जाता था जो दिखता नहीं था। उसने मास्टर से पश्चिम की हद फिर पढ़ने को कहा। जैसे ही उन्होंने “院墙” यानी ‘आँगन की दीवार’ पढ़ा, उसने पूछा कि पेड़ का तना दीवार में धँसा है, तो उसे किस तरफ़ गिनेंगे।
दिंग साहब ने कोयला लेकर तुरंत बँटवारे की लकीर नहीं खींची। उन्होंने वन जीछांग से सबको दीवार की जड़ तक ले जाने को कहा और ख़ुद उकड़ूँ बैठकर ईंटों के जोड़ देखने लगे। पुरानी दीवार एक बार में नहीं बनी थी। बीच के एक हिस्से में ईंटों का रंग गहरा था, मानो बरसों पहले गिरने पर दोबारा चिनाई हुई हो। मेई का तना उसी हिस्से से तिरछा निकल रहा था। छाल और ईंट का किनारा एक-दूसरे को दबा रहे थे। सबसे मोटा हिस्सा सचमुच वन परिवार के आँगन में था, मगर जड़ें कब की दस्तावेज़ में लिखी ‘तक’ की हद पार कर चुकी थीं। गू छिंग को उम्मीद थी कि इससे निकलेगा कि पेड़ गू परिवार का होना चाहिए। सुनने को बस यह मिला कि दस्तावेज़ में इस पेड़ का अलग से उल्लेख नहीं है।
बिचौलिये ने तुरंत कहा कि हवेली बेचते समय पेड़ को अलग से दर्ज करने की बात उसने कभी नहीं सुनी। लू चाओ ने भी सिर हिलाया। बोले, अगर घास की हर झाड़ी गिननी पड़ती तो उस वक़्त उनके लिए ख़रीदार कौन ढूँढ़ता। वन जीछांग ने उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाई। उन्होंने मास्टर से पूछा कि क्या काम शुरू करने के लिए एक और दस्तावेज़ जोड़ना होगा। दिंग फंगछ्वान ने कहा कि वह यह फ़ैसला नहीं करेंगे कि किस घर की बात सही है। अगर दोनों अपने-अपने मत पर अड़े रहें, तो किसी को बुलाकर फिर नपाई करवा सकते हैं और पुरानी दीवार की कहानी पर बात कर सकते हैं। मगर उसमें दिन और मज़दूरी दोनों लगेंगे और नपाई हो भी जाए तो पुरानी जड़ें किसी खींची हुई लकीर के मुताबिक़ नहीं बढ़ने लगेंगी।
गू छिंग को कुछ निराशा हुई और वह कहे बिना नहीं रह सकी कि दादी ने दस साल से भी ज़्यादा उसकी देखभाल की है। लू झाओ ने फ़ौरन कहा कि उन्होंने भी उन्हें मेई के फल तोड़ने दिए हैं और खाली आँगन में रज़ाइयाँ सुखाने दी हैं, इन सबका भी तो कुछ हिसाब होगा। कहते-कहते उनकी आवाज़ ऊँची हो गई। बिचौलिया झट मुस्कराकर बीच में सुलह कराने लगा और दोनों परिवारों के सारे लेन-देन को बरसों का पड़ोसी प्रेम बता दिया। गू छिंग को पहली बार ‘पड़ोसी प्रेम’ शब्द बहुत बुरा लगा। मानो वह जिस मेहनत की बात करना चाहती थी, उसे यह शब्द एक ऐसे थैले में डाल सकता हो जिसकी कोई तली ही नहीं है।
वे फिर मुख्य कमरे में बैठ गए। लू चाओ ने बताया कि पुराना मकान कैसे उजड़ता गया और उसे बेचने की जल्दी क्यों पड़ी। शुरू में किसी का सुनने को जी नहीं था। उसका एक छोटा भाई था जो अब अकेला नहीं रह सकता था। उसे पास के ज़िले में रिश्तेदारों के यहाँ भेज दिया गया था और वहाँ रहने-खाने का खर्च हर महीने देना पड़ता था। खर्च पूरा करने को मकान की पुरानी लकड़ी पहले भी कई बार उखाड़कर बेची जा चुकी थी। जितना उखाड़ते गए, मकान उतना ही रहने लायक कम दिखने लगा। बिक्री की रकम सुनने में जितनी सीधी लगती थी, उतनी थी नहीं। एक हिस्सा पहले ही किसी और को देना तय था और अपने हिस्से से उसे मकान किराये पर लेना था। यहाँ पहुँचकर वह अचानक चुप हो गया, जैसे डर हो कि आगे बोला तो अजनबियों से रियायत माँगने लगेगा।
वन जीछांग ने भी अपने घर की मुश्किलें गिनाकर उस पर दबाव नहीं डाला। बस बिचौलिए से कहा कि जिन पुराने संदूकों को ले जाने की बात हुई थी, उन्हें ठीक से गिन ले। गू छिंग ने लू चाओ का हाथ देखा, जिसने लबादे की डोरी कसकर पकड़ रखी थी। उसे याद आया कि अभी थोड़ी देर पहले उसने उसे ऐसा आदमी समझा था जो अपना खाली मकान लिए बैठा है और दूसरों के काम करने का इंतज़ार करता है। उसका चेहरा फिर कुछ गरम हो गया। मगर पेड़ को अब भी हटाया जाना था और दादी अब भी दीवार के पीछे रहती थीं। उस ज़रा-से पछतावे से उसकी समस्या हल नहीं हुई।
दोपहर हुई तो श्यू थान एक केतली गरम पानी और दो मोटी रोटियाँ ले आई। उसने सबको लंबी मेज़ पर बैठने को नहीं कहा। हर किसी को एक छोटा टुकड़ा बाँटकर बोली कि चूल्हा अभी ठीक नहीं हुआ है, बस यही है। गू छिंग पहले मना करना चाहती थी कि दादी घर पर खाने के लिए उसकी राह देख रही हैं, मगर उसके पेट से आवाज़ आ गई। रोटी में दाँत लगाते वक़्त उसने सिर झुका लिया कि कहीं कोई देख न ले कि वह कितनी जल्दी खा रही है। श्यू थान तब तक दरवाज़े पर लौटकर लकड़ी ढोने वाले से उस पटरे पर बहस करने लगी थी जो आधा छी छोटा था। किसी ने गू छिंग की ओर नहीं देखा।
दिंग फ़ंगछ्वान ने कोयले से ज़मीन पर दीवार, कुआँ और दरवाज़ा बनाया और सबसे कहा कि जो जगह पहचानते हैं, दिखाएँ। गू छिंग ने देखा कि गू परिवार का कुआँ पेड़ के उससे भी पास था जितना उसने बताया था। यह भी दिखा कि वन परिवार के आँगन में गाड़ी निकलने की राह पुराने चूल्हे, टूटे बरामदे और मेई की शाखाओं के कारण कई छोटे टुकड़ों में बँटी थी। वन जीछांग ने जूते की नोक से पूर्वी दरवाज़ा दिखाकर कहा कि गाड़ी भीतर आए और उसका अगला हिस्सा घर की ओर, पिछला हिस्सा दरवाज़े की ओर हो, तो किसी तरह माल उतारा जा सकता है। दूसरी गाड़ी को गली में रुकना पड़ेगा। बारिश में माल हमेशा बाहर तो नहीं रह सकता।
“पेड़ हटा दें तो यहाँ गाड़ी मोड़ पाएँगे?” गू छिंग ने पूछा।
“इतना कोना और मिल जाएगा।”
“बस इतना-सा कोना?”
वन जीछांग ने उसकी ओर देखा, फ़ौरन जवाब नहीं दिया। गू छिंग को लगा वह डगमगा गया है और वह फिर पूछने ही वाली थी कि दरवाज़े के बाहर से श्यू थान बोलीं कि कोने के अलावा बारिश से बचने का छप्पर भी है और माल उतारने वालों के खड़े होने की जगह भी। हर बार गाड़ी को हिसाब में लेकर लोगों को नक़्शे से बाहर नहीं छोड़ सकते। उन्होंने कोयले की लकीर पर लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा आड़ा रखा। अभी जो जगह चौड़ी दिख रही थी, वह फ़ौरन सँकरी हो गई।
गू छिंग ने सोचा था कि ‘बस एक कोना’ वाली बात पकड़कर थोड़ी गुंजाइश निकाल लेगी। अब वह बस उकड़ूँ बैठी और कोयले की लकीर के पास गिरे बुरादे को हटा दिया। फूल बनाते वक़्त वह सबसे अच्छी पंखुड़ी के लिए जगह निकाल सकती थी और बाक़ी को पीछे मोड़ सकती थी, पर गोदाम में माल ढोने वालों के कंधे ऐसे पीछे नहीं मोड़े जा सकते थे। उसने पूछा कि क्या छप्पर लगाने की कोई और जगह है। श्यू थान ने कहा, अभी देख रहे हैं, लेकिन जो काम पहले से चल रहा है उसे यूँ ही रोककर इंतज़ार नहीं कर सकते।
तभी गली में फिर छन चाची की आवाज़ आई। खाली बाँस के ढाँचों से लदी एक गाड़ी ने उनकी कपड़े सुखाने की छड़ रोक रखी थी। वह छड़ को गाड़ी के नीचे से खींचना चाहती थीं, मगर गाड़ीवान को उनका इधर-उधर निकलना ख़तरनाक लग रहा था। गू छिंग उठने ही वाली थी कि वन जीछांग बाहर जाकर एक सिरा उठा चुका था। दोनों ने थोड़ा-थोड़ा रास्ता दिया। छड़ बाहर निकल आई और पहिए के पास एक गीली लकीर उभर आई। गू छिंग ने दक्षिण के टूटे बगल वाले दरवाज़े की ओर देखा। उसके बाहर की जगह पूर्व की पत्थर वाली गली से कुछ चौड़ी लग रही थी। वह पूछने ही वाली थी कि बिचौलिया लू चाओ की आस्तीन थपथपाकर उसे याद दिलाने लगा कि उसे कहीं और भी पहुँचना है।
जाने से पहले बेचने वाले ने उससे कहा कि अगर पेड़ बच सकता है तो उसे भी आपत्ति नहीं, बस वह जो पैसे आगे दे चुका है उन्हें वापस न खींचना पड़े। गू छिंग ने कहा कि समझ गई। उसने यह नहीं कहा कि उसका इरादा उससे पैसे माँगने का था ही नहीं। उसे लगा कि कहने से कोई फ़ायदा भी नहीं होता। लू झाओ के बस में नहीं था कि अपने छोटे भाई, अपने पेड़ और वन परिवार की गाड़ी को अलग-अलग किनारे रखकर सबको एक साल इंतज़ार करने को कह दे।
जाते समय तिंग फंगछ्वान ने ज़मीन पर कोयले की आधी लकीरें मिटा दीं और दीवार, कुआँ और पूर्वी फाटक छोड़ दिए। कहा कि अगर और पूछना हो तो इस नक़्शे को सामने रखकर पूछ लेना, कागज़ के अक्षरों को इतनी सख़्ती से रटने की ज़रूरत नहीं। उसने कागज़ दबाने का वज़न लपेट लिया और अलग से पैसे नहीं लिए। गू छिंग उसे दरवाज़े तक छोड़ आई। मन में थोड़ा खालीपन था। जैसे सुबह के पाँच वन देकर उसे बस इतना पता चला हो कि मामला उसकी सोच से बड़ा है, पर कोई ऐसा रास्ता नहीं मिला जिस पर वह आगे बढ़ सके।
कमरे में लौटी तो शन सू खाना दो बार गरम कर चुकी थीं। गू छिंग उतावली थी यह बताने को कि बिक्री के दस्तावेज़ में पेड़ का अलग से ज़िक्र नहीं था, मगर दादी ने पहले पूछा कि कहीं उसने किसी और का कटोरा तो नहीं इस्तेमाल किया और रोटी साफ़ थी या नहीं। वह सवालों से झुँझला गई। बोली कि वह बच्ची नहीं है और बची हुई रोटी निकाल दी। शन सू ने उसे लेकर एक छोटा टुकड़ा तोड़ा, कुछ देर चबाया और कहा कि वन परिवार को भी हर वक़्त बना-बनाया खाना नहीं मिलता। गू छिंग सोच रही थी कि दस्तावेज़ पढ़वाकर दादी को अच्छी ख़बर देगी, मगर अब उसे लगा कि उसमें जो बात छूटी थी, उसे समझाना और भी मुश्किल है।
उसने शुरू से सारी बात सुनाई और किसी के मुँह में अपनी ओर से कोई कड़वी बात नहीं डाली। सुनकर शन सू धीरे-धीरे घुटने पर हाथ फेरती रहीं। फिर पूछा कि क्या दक्षिण के टूटे फाटक के बाहर वही जगह है जहाँ चन परिवार अक्सर कपड़े सुखाने का रैक रखता है। गू छिंग ने सिर उठाकर पूछा, आपको कैसे पता कि मैं उसी फाटक के बारे में पूछने वाली थी? दादी ने बताया कि उनके बचपन में कोयला बेचने वाले वहीं से निकलते थे। गाड़ी मुड़ नहीं पाती थी तो आधा माल सड़क पर उतारते थे। सबको झंझट लगता था, इसलिए आख़िर वह फाटक बंद कर दिया गया।
गू छिंग ने ‘झंझट’ शब्द सुना और पहली बार उसे फ़ौरन यह नहीं लगा कि कोई उसे काम छोड़ने की सलाह दे रहा है। वह खिड़की के पास गई, ख़ाली बोतल से रेशमी मेइ निकाला और टोकरी में वापस रख दिया, ताकि कल फिर एक चक्कर लगा सके। नक़ली फूल मेज़ पर पूरी सुबह लोगों की बहस का साथी रहा था। उसका रंग अब भी वैसा ही था और उसने गू छिंग के लिए कुछ साबित नहीं किया था। मगर उसे श्यू थान की वह बात याद रही कि लोग कहाँ खड़े होंगे। आँगन में लौटकर उसने कुएँ के चबूतरे से दरवाज़े तक की ख़ाली जगह क़दमों से नापी।
· अध्याय समाप्त ·
यह पुस्तक AI की सहायता से मौलिक रूप में लिखी गई है और वांग आनशी की 《梅花》(प्लम के फूल) तथा इस वेबसाइट की मूल लघुकथा 《不卖春风》(वसंत की हवा बिक्री के लिए नहीं) का विस्तार है। पात्र, व्यापार, भूगोल और कालगणना सभी काल्पनिक हैं; यह कवि की जीवनी नहीं है। मूल रचना में पेड़ बचाने, रेशमी फूलों में सुगंध न होने और दादा-दादी तथा पोते-पोती की दो पीढ़ियों के कमल देखने के केंद्रीय चुनाव बनाए रखे गए हैं।
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